| ऑटोमोटिव उद्योग किसी भी विकासशील अर्थव्यवस्था का मुख्य संचालक है। यह देश के त्वरित आर्थिक और औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह मूल उद्योगों जैसे इस्पात अलौह धातु उर्वरक, शोधन, पेट्रोरसायन, नौवहन, कपड़ा, प्लास्टिक, ग्लास रबर कैपिटल उपकरण, लॉजिस्टिक, कागज, सीमेंट चीनी आदि की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। यह विभिन्न अवसंरचना सुविधाओं जैसे विद्युत, रेल और सड़क परिवहन में सुधार सुकर बनाता है। अर्थव्यवस्था में लगभग सभी वर्गों से इसके प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष गहरे संबंधों के कारण उद्योग का मजबूत और सकारात्मक गुणक प्रभाव है और इस प्रकार से राष्ट्र की प्रगति को आगे बढ़ाता है। ऑटोमोटिव उद्योग में ऑटो मोबाइल और ऑटो संघटक क्षेत्रक शामिल हैं। इसमें सवारी कार, हल्के माध्यम और भारती वाणिज्यिक वाहन, बहुउपयोगी वाहन जैसाकि जीप, स्कूटर, मोटर साइकिल, तिपहिया, ट्रेक्टर आदि शामिल हैं और ऑटो संघटक जैसे ईंधन के पुर्जे, ड्राइव और ट्रांसमिशन के पुर्जे, सस्पेंशन और ब्रेकिंग पार्ट्स, बिजली बॉडी और चेसीस के पार्ट्स आदि हैं।
भारत में ऑटोमोबाइल क्षेत्र ने पिछले कुछ वर्षों में असाधारण वृद्धि दर्शाते हुए सबसे बड़े उद्योग में से एक बनने का गौरव पाया है और यह देश में समग्र औद्योगिकी विकास का योगदान बढ़ाते हुए उल्लेखनीय रहा है। वर्तमान में भारत के अंदर दो पहिया वाहनों के विश्व के द्वितीय विनिर्माता, वाणिज्यिक वाहनों के 5वें सबसे बड़े निर्माता और सबसे बड़े मोटर साइकिल निर्माताओं की उपस्थिति है। यह एशिया के कार बाजारों में चौथा सबसे बड़ा यात्री कार बाजार रखता है और साथ ही यहां 1,590,000 चार पहिया वाहन (यात्री कार सहित) और 7,950,000 दो और तीन पहिया वाहन हैं। इस क्षेत्र में विकास, फैलाव, नई प्रौद्योगिकियों का समायोजन और बदलते हुए व्यापार परिवेश में आई नम्यता में काफी उन्नति देखी गई है।
भारतीय ऑटोमोटिव उद्योग 1991 से डीलाइसेंसिंग और क्षेत्रक के खुलने से तेजी से वृद्धि की है। इसमें अनेकानेक नए विनिर्माताओं का प्रवेश हुआ है आधुनिकतम प्रौद्योगिकी के साथ, इस प्रकार से इसमें कुछेक विनिर्माताओं के एकाधिकार का प्रतिस्थापन हुआ है। वर्तमान में यात्री कारों के साथ बहु उपयोगिता वाहनों के 15 विनिर्माता हैं, वाणिज्यिक वाहनों के 9 विनिर्माता, दो / तीन पहिया वाहनों के 16 और टेक्टर के 14 निर्माता हैं, जिनके अलावा पांच केवल इंजन के निर्माता है। विदेशी निवेश और प्रौद्योगिकी आयात के मानदंडों को उदार बनाया गया है जिससे वाहनों का विनिर्माण किया जा सके। वर्तमान में 100 प्रतिशत विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) इस क्षेत्रक में स्वत: मार्ग के अधीन अनुमत है जिसमें सवारी कार वर्ग शामिल है। प्रौद्योगिकी उन्नयन के लिए प्रौद्योगिकी का आयात बिना किसी अवधि सीमा के 5 प्रतिशत रॉयल्टी भुगतान पर 2 मिलियन अमरीकी डॉलर का एक मुश्त भुगतान भी इस क्षेत्रक में स्वत: मार्ग के अधीन अनुमत है। भारतीय ऑटोमोटिव उद्योग ने पहले ही 1,65,000 की आय (34 बिलियन अमरीकी डॉलर) हासिल कर लिया है और इसने 1.31 करोड़ लोगों को देश में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार प्रदान किया है।
भारतीय मध्यम वर्ग का विकास, बढ़ती क्रय शक्ति के साथ सुदृढ़ वृहत् आर्थिक मूलभूत के साथ-साथ मुख्य विनिर्माताओं को भारतीय बाजार में आकर्षित किया है। बाजार सहबद्ध विनियम दर, सुस्थापित वित्तीय बाजार, स्थिर नीति नियंत्रक कार्य और प्रशिक्षित जनशक्ति की उपलब्धता ने भी भारत में नई क्षमताओं और ऑटो उद्योग में पूंजी प्रवाह के बढ़ाया है। इन सभी ने न केवल ऑटो कम्पनियों में प्रतिस्पर्धा बढ़ाई है और इसके परिणामस्वरूप प्रतिस्पर्धा लागत पर भारतीय उपभोक्ताओं के लिए बहुल चयन दिया है अपितु उद्योग की उत्पादकता में उल्लेखनीय सुधार सुनिश्चित किया है, जो भारतीय विनिर्माण क्षेत्रक में सबसे अधिक है।
भारी उद्योग विभाग, भारी उद्योग और सरकारी उद्यम मंत्रालय के अधीन भारत में ऑटोमोबाइल उद्योग की वृद्धि और विकास करने के लिए मुख्य अभिकरण है। विभाग उद्योग को, नीतिगत पहलों, टैरिफ और व्यापार के पुनर्गठन के लिए उपयुक्त हस्तक्षेप, प्रौद्योगिकी सहयोग का संवर्धन और उन्नयन तथा अनुसंधान एवं विकास के द्वारा अपनी विस्तार योजना हासिल करने में सहायता करता है विभाग भारी इंजीनियरी उद्योग, मशीन के पुर्जे के उद्योग, भारी वैद्युत उद्योग, औद्योगिक मशीनरी आदि के विकास से भी संबंधित है।
ऑटोमोबाइल क्षेत्र में 2006-07 के दौरान 13.56 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2007-08 के दौरान (अप्रैल-दिसम्बर) उद्योग द्वारा 3.49 प्रतिशत की घोषणा की गई है। ऑटो मोबाइल निर्यात ने 2003-04 के दौरान एक बिलियन अमेरिकी डॉलर का आंकड़ा पार कर लिया और यह 2006-07 में बढ़कर 2.76 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया। उद्योग में अपनी यात्री कार के उत्पादन में वर्ष 2006-07 में 15 प्रतिशत का निर्यात किया, 10 प्रतिशत वाणिज्यिक वाहनों का निर्यात , 26 प्रतिशत तीन पहिया वाहनों और 7 प्रतिशत दो पहिया वाहनों का निर्यात किया गया। इसी पकार वर्ष 2006-07 के दौरान ऑटो पुर्जा उद्योग की उच्च वृद्धि जारी रही और यह वर्ष के दौरान उत्पादन में 21 प्रतिशत की वृद्धि के साथ भारतीय अभियांत्रिकी उद्योग का सबसे तेजी से विकास करने वाला क्षेत्र बन गया। इस उद्योग में वर्ष के दौरान 2.9 बिलियन अमेरिकी डॉलर (12,643 करोड़ रु.) के निर्यात सहित 15 बिलियन अमेरिकी डॉलर (64,500 करोड़ रु.) से अधिक का कुल कारोबार किया। उद्योग में निवेश भी इस वर्ष के दौरान 4500 करोड़ रु. से अधिक हो गया, क्योंकि उद्योग ने क्षमता वर्धन में निवेश जारी रखा और नए हरित क्षेत्र स्थल मांग के साथ बढ़ते गए। उद्योग निर्यात की वृद्धि का ऑटो पुर्जा वाला घटक 2006-07 में 15 प्रतिशत था। जबकि कुल आयात 3.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर (14,644 करोड़ रु.) रहा। गुणवत्ता और उत्पादकता के मोर्चे पर ऑटो पुर्जा उद्योग ने 95 प्रतिशत से अधिक कंपनियों को आईएसओ 9000 प्रणाली मानकों के अनुसार प्रमाणित किया है और 70 प्रतिशत से अधिक कंपनियां आईएसओ / आईएस16949 मानकों के अनुसार प्रमाणित हैं। इसमें 11 डेमिंग पुरस्कार विजेता कंपनियां अधिकतम 11 होने की विशेषता भी है।
ऑटो क्षेत्रक में और अधिक त्वरित और स्थायी विकास करने के लिए विभाग ने अनेकानेक नीतिगत उपाय और प्रोत्साहनों की पहल की है। इनमें से सबसे अधिक महत्वपूर्ण 'ऑटो नीति' 2002 की घोषणा है, जिसका लक्ष्य भारत में वैश्विक प्रतिस्पर्द्धी ऑटोमोटिव उद्योग और वर्ष 2010 तक अर्थव्यवस्था में इसके योगदान को दोहरा करना है। नीति का लक्ष्य क्षेत्रक के लिए विकास की दिशा निर्धारित करना और उसमें अनुसंधान और विकास का संवर्धन करना है ताकि निरंतर प्रौद्योगिकी उन्नयन तथा बेहतर डिजाइनिंग क्षमताओं को निर्माण किया जा सके। यह निम्न नि:सरण ईंधन ऑटो प्रौद्योगिकी और उपयुक्त ऑटो ईंधन की उपलब्धता पर बल देता है ताकि :-
- क्षेत्रक को औद्योगिक विकास और रोजगार और देश में उच्च डिग्री का मूल्य वर्धन हासिल करने के लिए लिवर के रूप में उन्नत बनाना
- ऑटो संघटकों के लिए वैश्विक स्रोत के रूप में उभरना
- लघु, खरीदने में समर्थ सवारी कारों के लिए अंतरराष्ट्रीय विनिर्माण केन्द्र के रूप में स्थापित करना और विश्व में ट्रैक्टरों और दो पहिए के विनिर्माण का मुख्य केन्द्र बनाना
- भारतीय अर्थव्यवस्था और स्थानीय उद्योग के लिए कम से कम जोखिम पर खुले व्यापार के लिए संतुलित पारगमन सुनिश्चित करना
- उद्योग का आधुनिकीकरण करना और देशी डिजाइन अनुसंधान और विकास सुकर बनाना
- भारत का सॉफ्टवेयर उद्योग को ऑटोमोटिव प्रौद्योगिकी में परिवर्तित करना
- वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों से चलित वाहनों के विकास में सहायता देना
- अंतरराष्ट्रीय स्तर के समकक्ष घरेलू सुरक्षा और पर्यावरणीय स्तरों का विकास करना।
इस क्षेत्र में दूसरा मील का पत्थर रहा है नेशनल ऑटोमोटिव टेस्टिंग एण्ड आर एण्ड डी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट (एनएपीआरआईपी) का आरंभ किया जाना जिसका लक्ष्य है ऑटोमोबाइल क्षेत्रक में मुख्य वैश्विक क्षमता का सृजन करना और विश्व अर्थव्यवस्था के साथ इसकी अखंडता को सुकर बनाना। यह अत्याधुनिक परीक्षण, वैधीकरण और अनुसंधान और विकास मूल संरचना का देश में अंतरराष्ट्रीय स्तर हासिल करने के लिए ऑटोमोटिव उद्योग के वृद्धि और विकास के प्रयासों की सहायता करने की दृष्टि से विकास करना चाहता है। एनएटीआरआईपी देश के तीन ऑटोमोटिव केन्द्रों में 1,718 करोड़ रु. के कुल निवेश से भारत में स्तरीय अनुसमर्थन सुविधाओं की स्थापना करना परिकल्पित करता है। ये हैं उत्तरी भारत में मनेसर, दक्षिणी भारत में चेन्नै और पश्चिमी भारत में पुणे और अहमदाबाद। मोटे तौर पर परियोजना के उद्देश्य हैं :-
- सरकार को वैश्विक वाहन सुरक्षा, उत्सर्जन और निष्पादन स्तर प्रारंभ करने में समर्थ बनाने के लिए अति महत्वपूर्ण रूप से आवश्यक ऑटोमोटिव परीक्षण और वैधीकरण मूल संरचना का सृजन करना
- देश में उच्च डिग्री का मूल्य वर्धन हासिल करके और रोजगार क्षमता बढ़ाकर भारत में विनिर्माण गहन करना
- ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग से आईटी और इलेक्ट्रोनिकी में भारत की क्षमता अभिसरण सुकर बनाना
- विकास और उच्च प्रौद्योगिकी संचालित भारी उत्पादन, खरीदने में समर्थ और वैश्विक रूप से स्वीकार्य ऑटोमोटिव उत्पाद सुकर बनाने द्वारा और उनके निर्यात की विघ्न बाधाओं को दूर करके इस क्षेत्र में भारत के विस्तार को बढ़ाना
- ऑटोमोटिव उद्योग के लिए मूल उत्पाद परीक्षण, वैधीकरण और विकास मूल संरचना की अपंग अभाव को दूर करना।
इसके अतिरिक्त, 2006-16 की अवधि के लिए 'ऑटोमोटिव मिशन योजना (एएमपी)' की घोषण एक मुख्य कदम है जो भारत को वैश्विक ऑटोमोटिव केन्द्र बनाने के लिए लिया गया है। मिशन योजना का लक्ष्य ऑटोमोबाइल और ऑटो संघटकों के डिजाइन और विनिर्माण के लिए विश्व में मनपसंद जगह के रूप में उभरना है जिसकी आय का लक्ष्य 145 बिलियन अमेरिकी डॉलर पर पहुंचना है (जो जीडीपी का 10 प्रतिशत से अधिक है) और 2016 तक 25 मिलियन लोगों को अतिरिक्त रोजगार प्रदान करना है। इसमें वर्तमान 169000 करोड़ रु. के स्तर से ऑटोमोटिव उद्योग के उत्पादन में वृद्धि की कल्पना की गई है जो वर्ष 2016 तक 600000 करोड़ रु. तक पहुंच जाएगा। मिशन का लक्ष्य ऑटोमोटिव उद्योग को पर्यवेक्षण करना है अर्थात क्षेत्रक का वर्तमान परिदृश्य, राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में इसकी व्यापक भूमका, अर्थव्यवस्था के अन्य संघटकों के साथ इसका संबंध तथा इसकी भावी विकास संभावनाएं। यह भारतीय घरेलू बाजार में ऑटोमोबाइल में सुधार लाने, ऑटोमोबाइल परीक्षण और प्रमाणीकरण में विश्व स्तरीय सुविधाएं प्रदान करना तथा समान कार्य क्षेत्र में विनिर्माताओं के बीच अच्छी प्रतिस्पर्द्धा सुनिश्चित करना है।
भारतीय ऑटो उद्योग के लिए भावी चुनौतियां लक्ष्य प्राप्त करने में ऑटोमोटिव मिशन योजना में मुख्य रूप से तकनीकी और मानवीय क्षमताओं की दृष्टि से आपूर्ति आधार का विकास करना, मिव्ययिता मान हासिल करना और विनिर्माण लागत कम करना, तथा मूल संरचनात्मक बाधाओं से निजात पाना है। इसमें घरेलू मांग की पूर्ति करना और निर्यात एवं अंतरराष्ट्रीय व्यापार के अवसरों का भी दोहन करना है। इन सब में सरकार की भूमिका, मूल संरचना सृजन सुकर बनाना, देश की क्षमताओं का संवर्धन करना अनुकूल और पूर्वानुमान योग व्यापार माहौल बनाना, निवेश आकर्षित करना और विकास का संवर्धन करना है। जबकि उद्योग की भूमिका विश्व स्तरीय गुणवत्ता मानक के उत्पादों की डिजाइन और विनिर्माण करना है, लागत प्रतिस्पर्द्धा की स्थापना करना, श्रम और पूंजी दोनों की उत्पादकता में सुधार लाना, मान और अनुसंधान और विकास बढ़ाने की क्षमता प्राप्त करना तथा संभावित बाजारों में भारत के उत्पादों को उतारना है।
ऐसे सभी पहलें निर्दिष्ट करती हैं कि भारतीय ऑटोमोटिव उद्योग अर्थव्यवस्था के सूर्योदय क्षेत्रक के रूप में उभरकर सामने आया है। यह न केवल बढ़ती घरेलू मांगों को पूरा कर रहा है अपितु धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पैठ बना रहा है। यह निरंतर अपने आप को पुनर्गठित कर रहा है और अपना वैश्विक विकास हासिल करने और अपनी क्षमताओं को मूर्त रूप देने के लिए नए प्रौद्योगिकियों को आत्मसात कर रहा है। यह अनेकानेक लाभों से सम्पूरित है जैसे कम लागत और उच्च कौशल की जनशक्ति, वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्द्धी ऑटो अनुषंगी उद्योग; स्थापित परीक्षण और अनुसंधान एवं विकास केन्द्र, सबसे कम लागत पर इस्पात का उत्पादन आदि। उद्योग अपार निवेश अवसर प्रदान करता है। इसने ऑटो विनिर्माताओं में अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धा, तथा त्वरित बढ़ते यातायात के मद्देनजर सुरक्षा के मानदण्डों सहित वाहनों की गुणवत्ता स्तर का सामना करने के लिए आत्म विश्वास जगाया है। विभिन्न नीतिगत प्रोत्साहन, जिसमें ऑटो मिशन योजना का समयबद्ध क्रियान्वयन के साथ-साथ विश्वस्तरीय परीक्षण, प्रारंभन और प्रमाणीकरण सुविधाओं की स्थापना शामिल हैं, जो भारतीय ऑटोमोटिव उद्योग को विश्व के नए उभरते ऑटोमोटिव गंतव्यों के बीच विशिष्ट पहचान बनाना सुनिश्चित करेंगे।
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