| औषध और भैषज उद्योग राष्ट्र के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह विश्व में सबसे बड़ा और अति विकसित क्षेत्रक है जो विभिन्न औषधियों, दवाइयों और उनके मध्यस्थ तथा दूसरे भैषजीय निर्माण के स्रोत के रूप में कार्य करता है। यह गहन ज्ञानाधारित उद्योग होने के नाते विश्व भर के निवेशकों/कॉर्पोरेटों के लिए असंख्य व्यापार के अवसर प्रदान करता है। सुपरिभाषित और सुदृढ़ भैषज उद्योग की अस्तित्व अनुसंधान और विकासात्मक प्रयासों का संवर्धन और उनको कायम रखने के लिए और अर्थव्यवस्था में पहलें करने तथा किफायती कीमतों पर सबके लिए अच्छी गुणवत्ता वाली दवाइयां उपलब्ध कराने के लिए महत्वपूर्ण है। अर्थात यह व्यक्तियों स्वास्थ्य की स्थिति तथा समाज की स्वास्थ्य स्थिति संपूर्ण रूप से सुधार करना अनिवार्य है ताकि आर्थिक विकास और देश के क्षेत्रीय विकास के लिए सकारात्मक योगदान दिया जा सके।
भारतीय औषध और भैषज उद्योग ने वर्षों से मूल संरचना विकास, प्रौद्योगिकी आधार सृजन तथा उत्पाद के उपयोग की दृष्टि से तेजी से प्रगति की है। वैश्विक मंच पर मात्रा की दृष्टि से भारत का चौथा स्थान है और भैषज में उत्पादन के मूल्य की दृष्टि से तेरहवां स्थान है। भैषज उद्योग सभी मुख्य उपचारात्मक समूह के थोक औषध का उत्पादन करता आया है जिसके लिए जटिल विनिर्माण प्रक्रिया की आवश्यकता होती है तथा व्यापक दायरे के फार्मा मशीनरी और उपकरणों को उपयोग होता है। विभिन्न खुराक रूपों के लिए अच्छी विनिर्माण प्रचालनों का अनुपालन की सुविधाएं उत्कृष्ट रूप से विकसित किया है। इसके अलावा पेटेंट अधिनियम, 1970 (पेटेंट अधिनियमन (संशोधन) अधिनियम, 2005) से क्षेत्र के लिए नए रास्ते खुले हैं। नया पेटेंट विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) और बौद्धिक सम्पदा अधिकार के व्यापार से संबंधित करार के तहत बाध्यताओं की तरह ही भैषज क्षेत्रक के लिए उत्पाद पेटेंट के युग में प्रवेश किया है। इसके परिणामस्वरूप भारतीय भैषज उद्योग अनेकानेक क्षेत्रों में आत्मनिर्भर हो गया है और इसने और सुदृढ़ एवं प्रौद्योगिकीय रूप से विकसित अनुसंधान और विकास खंड का विकास किया है।
निम्नलिखित लाभकारी विशेषताओं की वजह से यह उद्योग निवेशों और व्यापार के लिए अनेकानेक अवसर प्रदान करता है :-
- थोक दवाओं के 70 प्रतिशत उत्पादन द्वारा आत्म निर्भरता का प्रदर्शन और देश के अंदर ही सूत्रणों की संपूर्ण आवश्यकता को पूरा करना;
- गुणवत्ता थोक औषध के उत्पादन और तैयार कने की कम लागत
- निम्न अनुसंधान और विकास लागत
- सुदृढ़ वैज्ञानिक, नवपरिवर्तनीय और तकनीकीय जन शक्ति
- उत्कृष्ट और विश्व स्तरीय प्रयोगशालाएं जो प्रक्रियान्वयन विकास और किफायती प्रौद्योगिकी के विकास में विशेषज्ञता प्राप्त हैं।
- फार्मा क्षेत्रक में व्यापार का बढ़ता संतुलन
- प्रजातिगत औषधों की प्राप्ति में सक्षम और किफायती स्रोत विशेषकर ऐसे औषधि जो आगामी कुछ वर्षों में पेटेंट से बाहर हो जाते हैं।
- जनसंख्या की विविधता को देखते हुए उपचारात्मक प्रयोगों के लिए उत्कृष्ट केन्द्र
- तेजी से विकसित होता जैव प्रौद्योगिकी उद्योग, जिसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपार क्षमता हैं
- इसकी एलोपैथिक दवाइयों के विनिर्माण और निर्यात की क्षमता के अतिरिक्त आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, योग, प्राकृतिक चिकित्सा और होम्योपैथी भी देश में प्रबल हैं।
इन सभी ऐसे कारकों से प्रेरणा प्राप्त करके भारत की पहचान भैषज में वैश्विक अग्रणी कारोबारी के रूप में हुई है। उद्योग के वार्षिक कारोबार के रूप में वर्ष 2006-07 के दौरान लगभग 17 बिलियन अमेरिकी डॉलर (68,000 करोड़ रु. से अधिक) की राशि का अनुमान है। भारतीय निर्यात अमेरिका, यूरोप, जापान और आस्ट्रेलिया सहित उच्च विनियमित बाजारों में दुनिया के लगभग 200 से अधिक देशों में निर्यात करता है। औषधियों और भैषजिकी के निर्यात का मूल्य वर्ष 2005-06 में 22,216 करोड़ रु. से बढ़ कर 2006-07 में 24,942 करोड़ रु. हो गया है। जबकि औषधीय तथा भैषजिकी उत्पादों का आयात वर्ष 2006-07 में 5867.3 करोड़ (अनंतिम) रहा है। यह अनुमान किया जाता है कि वर्ष 2010 तक निर्माण और थोक औषध उत्पादन में उद्योग की क्षमता 1,00,000 करोड़ रु. से अधिक हासिल करने की है। इसके अलावा भारतीय भैषजिकी कंपनियों की बढ़ती हुई संख्या को यूएसएफडीए (अमेरिका), एमएचआरए (यूके), टीजीए, ऑस्ट्रेलिया, एमसीसी, (दक्षिण अफ्रीका), हेल्थ कनाडा, आदि जैसी एजेंसियों से अपने संयंत्रों हेतु अंतरराष्ट्रीय विनियामक अनुमोदन प्राप्त हुए हैं। प्रजातिगत उत्पादन के लिए भारत के पास सबसे बड़ी संख्या में यूएसएफडीए अनुमोदित संयंत्र हैं। अब प्रमुख भारतीय कंपनियां संक्रमण रोधी, हृदय विकास संबंधी और केन्द्रीय तंत्रिका प्रणाली समूहों जैसे विशेष खण्डों में अमेरिका के संक्षिप्त नए औषधि अनुमोदन (एएनडीए) प्राप्त करना चाहती हैं।
भारत में इससे संबंधित प्राधिकरण रसायन और पेट्रो रसायन विभाग, है जो रसायन और उर्वरक मंत्रालय के अधीन है, जो औषध और भैषज उद्योग की आयोजना विकास और इसका विनियमन करने के लिए जिम्मेदार है। यह विभाग देश के भीतर उचित मूल्य पर जन सामान्य के उपभोग के लिए अच्छी गुणवत्ता की औषध/भैषज की बहुतायत में आपूर्ति सुनिश्चित करना चाहता है। इसका लक्ष्य अर्थव्यवस्था में रसायन, पेट्रोरसायन और औषध एवं भैषज क्षेत्रकों की नीतियां और कार्यक्रम बनाना एवं क्रियान्वित करना है।
विभाग के भैषज प्रभाग में संचालित किए जाने वाले मुख्य क्रियाकलाप भैषज उद्योग के विकास से संबंधित हैं, अर्थात इसका उत्पादन, निर्यात, आयात, अनुसंधान और विकास, मूल्य निर्धारण, शुल्क संबंधी मामले आदि। प्रभाग में एक निर्यात संवर्धन प्रकोष्ठ है जो भैषज के निर्यात संबंधी मामलों में नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करता है यह प्रकोष्ठ देश में भैषज के निर्यात और आयात का सांख्यिकीय आंकड़ा संगृहीत करता तथा अपने निर्यात को त्वरित करने के लिए संवर्धनात्मक क्रियाकलाप करता है।
प्रभाग का एक संबंध कार्यान्वयन है जिसे राष्ट्रीय भैषज कीमत निर्धारण प्राधिकरण कहा जाता है जो भैषज और अन्य संबंधित मामलों को मूल्य निर्धारण पुनरीक्षण करता है। इसका आशय यह है कि नियंत्रित थोक औषध के मूल्यों का निर्धारण/पुनरीक्षा करना इसका लक्ष्य हैं और देश में दवाइयों की कीमतें निर्धारित करना और कीमतों और दवाइयों की उपलब्धता प्रवर्तित करना है। यह उचित स्तर पर रखने के लिए विनियंत्रित औषधियों और निर्माण की कीमतों पर नजर रखता है औषध मूल्य नियंत्रण आदेश, 1995 के विभिन्न प्रावधानों के कार्यान्वयन का पर्यवेक्षण करता है। यह आदेश भारत भारत सरकार द्वारा अनिवार्य वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 3 के अधीन औषधियों की कीमतों को विनियमित करने के लिए जारी किया गया है। इसमें कीमत नियंत्रित औषध, औषधियों के कीमत निर्धारण की प्रक्रियाएं, सरकार द्वार निर्धारित मूल्यों के क्रियान्वयन की प्रविधि, प्रावधानों के उल्लंघन के लिए शास्तियां आदि शामिल हैं।
मोटे तौर पर एनपीपीए के कार्य निम्नलिखित हैं :-
- इसको दी गई शक्तियों के अनुसार औषध (कीमत नियंत्रण) अरदेश के प्रावधानों का क्रियान्वयन और प्रवर्तन
- प्राधिकरण के निर्णयों से उत्पन्न सभी कानूनी मामलों का निपटान
- औषध की उपलब्धता पर निगरानी रखना, कमी को अभिचिन्हांकित करना यदि कोई हो और उपचारात्मक कदम उठाना
- उत्पादन, निर्यातो और आयातों पर आंकड़ों का संग्रह / अनुरक्षण, वैयक्तिक कंपनियों की बाजार में हिस्सेदारी, कंपनियों की लाभ प्रदता, आदि जो थोक दवाओं और सूत्रणों के लिए है;
- औषध/भैषज के मूल्य निर्धारण के संबंध में उपयुक्त अध्ययनों को चलाना और/प्रायोजित करना
- सरकार द्वारा निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार प्राधिकरण के अधिकारियों और अन्य स्टाफ की भरती/नियुक्ति करना
- औषध नीति में परिवर्तन/पुनरीक्षण के संबंध में केन्द्रीय सरकार को सुझाव देना
- औषध मूल्य निर्धारण के संबंध में संसदीय मामलों में केन्द्रीय सरकार की सहायता करना
भैषज क्षेत्रक में पांच सरकारी क्षेत्र के उपक्रम हैं, नामत: :-
विश्व व्यापार करार के तहत उदारीकरण, वैश्वीकरण और भारत द्वारा की गई नई बाध्यताओं से देश में औषध और भैषज उद्योग को बहुत सी नई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। तदनुसार, उद्योग में अनुसंधान और विकास स्थितियों में सुधार करने के लिए विभाग ने अनेकानेक नीतिगत पहलें की है। मुख्य नीति औषध नीति है जो निम्नलिखित उद्देश्यों की प्राप्ति का लक्ष्य रखते हुए समय-समय पर घोषित और परिवर्तित की गई हैं :-
- अच्छी गुणवत्ता की अनिवार्य जीवन रक्षा और रोगनिरोधी दवाइयों की बहुतायत में उपलब्धता उचित मूल्य पर सुनिश्चित करना
- औषध और भैषज उत्पादन पर गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली एवं वितरण तथा उनके क्षेत्रीय उपयोग का संवर्धन सुदृढ़ करना
- देश की आवश्यकता के अनुरूप भारत के लिए रोगों, महामारी पर विशेष बल देते हुए समुचित तरीके से भैषज क्षेत्रक में अनुसंधान और विकास को प्रोत्साहित करना
- क्षेत्रक में व्यापार संबंधी बाधाओं को कम करके, किफायती गुणवत्ता उत्पादन के लिए देशी क्षमता सुदृढ़ करना और भैषज का निर्यात बढ़ाना
- भैषज उद्योग में नए निवेशों के प्रचार-प्रसार के लिए अनुकूल माहौल का सृजन करना और नई प्रौद्योगिकी और औषध को प्रारम्भ करना
इसी प्रकार से ऐसे उद्देश्यों को हासिल करने के लिए दूसरी नीति भी
बनाई गई है अर्थात 'भैषज नीति', 2002 में जिसका लक्ष्य औषध नीति में उल्लिखित के अलावा क्षेत्रक में नए प्रोत्साहन लाने है ताकि नीतिगत निवेशों को और अधिक भैषज उद्योग की त्वरित वृद्धि का संवर्धन कार्य में लगाया जाए और इसे अधिकाधिक अंतरराष्ट्रीय रूप से प्रतिस्पर्द्धी बनाने की दिशा में लगाया जाए। इस नीति की कुछ मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं :-
- औषध महानिदेशक (भारत) उनके सभी मध्यस्थ और निर्माण द्वारा स्वीकृत सभी थोक औषध के लिए औद्योगिक लाइसेंसिंग को हटाना, यह समय-समय पर निर्धारित संकल्पना के अधीन होगा, निम्नलिखित मामलों को छोड़कर -
- पुन:मिश्रित डीएनए प्रौद्योगिकी के उपयोग द्वारा उत्पादित थोक औषध
- सक्रिय सिद्धांतों के रूप में न्यूक्लिई एसिड की इन विवो उपयोग के लिए आवश्यक थोक औषध
- विशिष्ट उ़तक/कोशिका लक्षित निर्माण
- विदेशी निवेश 100 प्रतिशत तक अनुमत करना जो औद्योगिक नीति में समय-समय पर निर्धारित परिकल्पनाओं के अधीन, औषध महा नियंत्रक (भारत) उनके सभी मध्यस्थ और निर्माण, उपर्युक्त बिन्दु में उल्लिखित को छोड़कर जिन्हें औद्योगिक लाइसेंसिंग के अधीन रखा जाता है स्वीकृत सभी थोक औषध के मामले में स्वत: मार्ग के द्वारा
- औषध महा नियंत्रक (भात) उनके सभी मध्यस्थ द्वार स्वीकृत सभी थोक औषध के मामले में विदेशी प्रौद्योगिकी करार के लिए स्वत: अनुमोदन की उपलब्धता, पहले बिन्दु में निर्धारित विशेष प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
- औषधि के क्षेत्रक में अनुसंधान और विकास को गति प्रदान करने के उपाय निम्नानुसार हैं :-
- भैषज अनुसंधान और विकास सहायता निधि का गठन और औषध विकास संवर्धन बोर्ड की स्थापना
- विनिर्माताओं को, जो भारतीय पेटेन्ट अधिनियम, 1970 के अधीन पेटेन्ट की गई औषध का उत्पादन करता है और इसका उत्पादन और किसी स्थान पर नहीं किया जाता है, यदि देशी अनुसंधान और विकास द्वारा विकसित है, उस औषध के संबंध में उसे मूल्य नियंत्रण से छूट दी जा सकती है यह देश में उसके वाणिज्यिक उत्पादन आरंभ होने की तारीख से 15 वर्ष की अवधि तक इसकी छूट दी जाती है।
- विनिर्माता जो देशी अनुसंधान और विकास द्वारा प्रक्रियान्वित औषध का निर्माण देश में करता है और इसका पेटेन्ट भारतीय पेटेन्ट अधिनियम 1970 के तहत किया जाता है। उसे उस औषध के संबंध में मूल्य नियंत्रण से छूट दी जाती है यह उस पेटेन्ट की समाप्ति तक दी जाती है जो नए पेटेन्टकृत प्रक्रियान्वयन आदि के द्वारा देश में इसके वाणिज्यिक उत्पादन के आरंभ होने की तारीख से दी जाती है।
- मूल्य नियंत्रण की प्रणाली एकल मूल्य नियंत्रित औषध की सूची द्वारा संचालित किया जाता है जिसका चयन निर्धारित नीति और निर्माण प्रक्रिया जो इस पर आधारित है के मानदंडों के आधार पर किया जाता है जिसको देशी निर्माण प्रक्रिया के लिए 100 प्रतिशत उत्पादन पश्च खर्च अनुमत है और आयातित निर्माण प्रक्रिया के लिए 50 प्रतिशत अनुमत है।
- समय-समय पर मूल्यों की अधिकतम सीमा किसी भी निर्माण प्रक्रिया के लिए निर्धारित किया जा सकता है और यह सबके लिए बाध्यकारी होगा इसमें लघु यूनिट या प्रजातीय नामों से विपणन करने वाले शामिल हैं जिन्हें निर्धारित मूल्य का अनुपालन करना है।
- भैषज विज्ञान और प्रौद्योगिकी, शिक्षा और प्रशिक्षण में उत्कृष्टता हासिल करने के लिए राष्ट्रीय महत्व के संस्थान के रूप में 'राष्ट्रीय भैषज शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (एनआईपीईआर)' की स्थापना करना। अकादमियां और देशी भैषज उद्योग के लिए मानव संसाधन विकास की समस्याओं का समाना करने के अतिरिक्त संस्थान औषधि की खोज और भैषज प्रौद्योगिकी विकास के क्षेत्र में उद्योग एवं दूसरे तकनीकी संस्थानों के साथ सहयोग बढ़ाने की इच्छा रखता है।
विगत हाल में सरकार द्वारा किए गए नीतिगत उपायों के कारण इस क्षेत्रक में अनुसंधान और विकास के क्रियाकलाप न केवल प्रमात्रात्मक रूप से बढ़ा है अपितु गुणात्मक रूप से भी बढ़ा है। वर्तमान में कम से कम 10 भारतीय फार्मा कंपनियां नई दवाओं की खोज में कार्यरत हैं और कुछ कंपनियों में अपने बिक्री कारोबार की 5 प्रतिशत से भी अधिक राशि का व्यय अपने अनुसंधान और विकास कार्यों में किया है। अन्य प्रयास भी किए जा रहे हैं जैसे भैषज क्षेत्रक में अनुसंधान और विकास यूनिटों के लिए राजकोषीय प्रोत्साहन देना तथा नए औषध अणु उपचारात्मक अनुसंधान और नई औषध प्रदाय प्रणाली विकास संबंधी प्रक्रियाओं को दुरुस्त करना। इसके परिणामस्वरूप भारत मूल्य श्रृंखला के बीच वैश्विक भैषज कंपनियों के लिए सहयोगी और आउट सोर्सिंग का पसंदीदा स्थान बन रहा है
इसलिए, औषध और भैषज सभी औद्योगिक क्षेत्रों में सर्वाधिक विविधीकृत है। पारम्परिक दवाई प्रणाली का संचित ज्ञान और भारत की विशाल जैव-विविधता औषध उद्योग के लिए लाभ पहुंचाती है। तेजी से बदलना आर्थिक, व्यापार और बौद्धिक सम्पदा परिदृश्य, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रूप से इसके लिए बहुत सी चुनौतियां उत्पन्न करता है। इसमें वैश्विक रूप से अगुआ और प्रतिस्पर्द्धी शामिल है। यह उद्योग के तरीकों में परिवर्तन अनिवार्य कर देता है अर्थात केवल ज्ञात औषध के विनिर्माण से नवपरिवर्तन प्रक्रिया मार्ग द्वारा नए अणु की खोज और वाणिज्यिकरण की ओर प्रस्थान करना होगा। इसका आशय यह होगा कि भारतीय भैषज उद्योग को अधिकाधिक अनुसंधान और विकास पर बल देना है ताकि भारत विश्व भैषजिक बाजार में अपनी स्थिति बनाए रख सके और एक वैश्विक अग्रणी बनने की दिशा में आगे बढ़ सके। दूसरे शब्दों में कार्बनिक संश्लेषण और प्रक्रियान्वयन इंजीनियरिंग तथा किफायती प्रौद्योगिकी विकास में सबसे कम समय में, लागत प्रभावी औषध मध्यस्थ और थोक क्रियाकलापों के लिए गुणवत्ता से समझौता किए बगैर अपनी स्थिति बनाए रखने में समर्थ किया जा सके।
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