| शिक्षा एक अति महत्वपूर्ण निवेश और मानव संसाधन विकास में एक अनिवार्य तत्व है। प्रत्येक अर्थव्यवस्था में इसे हमेशा से सम्मानजनक स्थान दिया गया है। इसका अभिप्राय है लोगों की पढ़ने लिखने और समझने की क्षमता। इसका मूलभूत पहलू ज्ञान, विवेक और संस्कृति है। यह व्यक्ति की अंतनिर्हित क्षमता और योग्यताओं को निखारने में सहायता करती है। सुपरिभाषित शिक्षा प्रणाली आर्थिक विकास, सामाजिक परिवर्तन और आधुनिकीकरण और देश की अखंडता की कुंजी हे। यह अर्थव्यवस्था के विभिन्न वर्गों के लिए जनशक्ति विकसित करता और यह ऐसा आधार है जिस पर नवपरिवर्तन, अनुसंधान और विकास पुष्पित और पल्लवित होते हैं। इस प्रकार से शिक्षा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक लक्ष्य हासिल करने में देश की सहायता करती है। यह स्वास्थ्य, स्वच्छता, जनसांख्यिकीय रूपरेखा, उत्पादकता और जीवन की गुणवत्ता में सुधार को प्रभावित करता है।
स्वतंत्रता से भारत सरकार के लिए निरक्षरता का उन्मूलन एक मुख्य राष्ट्रीय चिन्ता का विषय है। भारत के संविधान के तहत, आरंभ में शिक्षा राज्य का विषय था, अर्थात यह राज्य की विशिष्ट जिम्मेदारी थी। परन्तु 1976 के 42वें संशोधन अधिनियम ने इसे राज्य सूची से समवर्ती सूची में रख दिया है। इस कदम ने केन्द्रीय और राज्य दोनों सरकारों को समवर्ती सूची में रख दिया है। यह कदम केन्द्रीय और राज्य दोनों सरकारों को समवर्ती रूप से क्षेत्राधिकार देता है। जबकि शिक्षा में राज्यों की भूमिका और जिम्मेदारी मोटे तौर पर अपरिवर्तित रही हैं, केंद्रीय सरकार ने शिक्षा की राष्ट्रीय और एकीकृत विशेषता के प्रवर्तन, सभी क्षेत्रों के लिए गुणवत्ता और स्तर बनाए रखने जिसमें शिक्षण व्यावसाय तथा शिक्षा की अपेक्षाओं का देश में निगरानी और अध्ययन शामिल है, के लिए बड़ी जिम्मेदारी ली है। दूसरे शब्दों में इसका लक्ष्य सभी स्तरों के शिक्षा पिरामिड में सक्षम जनशक्ति आधार का विकास करने, अनुसंधान और विकसित अध्ययन की पूर्ति तथा शिक्षा के अंतरराष्ट्रीय पहलुओं में उत्कृष्टता का संवर्धन करना था।
केंद्रीय स्तर पर, मानव संसाधन विकास मंत्रालय देश में शिक्षा के सभी पहलुओं पर कार्य करने के लिए नोडल संगठन है। इसमें दो विभाग हैं अर्थात :-
(i) स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग; और (ii) उच्च शिक्षा विभाग। पहला विभाग ऐसे क्षेत्रों से संबंधित है जैसे प्रारंभिक शिक्षा का सार्वभौमिकीकरण, पूर्ण वयस्क साक्षरता हासिल करना, माध्यमिक शिक्षा के लिए बढ़ती मांग को पूरा करना, तथा सभी स्तरों पर शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाना और शिक्षुओं की उपलब्धि का संवर्धन करना। जबकि दूसरे विभाग के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं :-
- शिक्षा संबंधी राष्ट्रीय नीति का निर्धारण करना और इसके क्रियान्वयन का पर्यवेक्षण करना
- विश्वविद्यालय/उच्च शिक्षा और तकनीकीय शिक्षा का अलाभकारी समूहों पर विशेष संकेन्द्रण करते हुए आयोजनागत विकास (जिसमें पहुंच का विस्तार और गुणात्मक सुधार शामिल है) जैसे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, बालिका अल्पसंख्यक और अपंग व्यक्ति।
- योग्य छात्रों को छात्रवृत्ति
- शिक्षा के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय संयुक्त राष्ट्र शिक्षा, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) सहित।
मंत्रालय की अनेक नीतिगत पहलों में सबसे उल्लेखनीय राष्ट्रीय शिक्षा नीति है जिसको सर्वप्रथम 1968, में तैयार किया गया तब और 1986 में और इसके बाद 1992 में इसमें सुधार किया गया। नीति में शिक्षा में एकरूपता, वयस्क शिक्षा को जन आन्दोलन बनाने तथा सार्वभौमिक पहुंच प्रदान करने, प्रारंभिक शिक्षा में प्रतिधारण और गुणवत्ता प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली की कल्पना की गई है। यह बालिकाओं की शिक्षा गति तय करने वाले स्कूलों की स्थापना जैसे प्रत्येक जिला में नवोदय विद्यालय, माध्यमिक शिक्षा का व्यावसायीकरण, ज्ञान का संवर्धन और उच्च शिक्षा में अन्तर संकाय अनुसंधान, राज्यों में और अधिक मुक्त विश्वविद्यालय आरंभ करना, अखिल भारत तकनीकी शिक्षा परिषद को सुदृढ़ करना, खेल-कूद को प्रोत्साहन देना, शारीरिक शिक्षा, योग और प्रभावी मूल्यांकन प्रविधि अपनाया जाना आदि पर विशेष बल देता है। दूसरे शब्दों में नीतिगत दस्तावेज में सभी क्षेत्रकों में शिक्षा का सुधार और विस्तार जिसमें तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा का समेकन शामिल है, वंचित, भाषाविज्ञान समूहों और अल्प संख्यकों के लिए अधिकारपूर्ण स्थान प्राप्त करना; और अभिगम्यता में विसंगति को मिटाना
भारतीय शैक्षिक ढांचा में मुख्य रूप से तीन अवस्थाएं होती है, अर्थात :-
- प्रारंभिक शिक्षा
प्रारंभिक शिक्षा प्रणाली में 6-14 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चे, जो कक्षा I-VIII, में पढ़ते हैं, कक्षा I-V (6-11 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए) प्रारंभिक स्कूल स्तर पर और कक्षा VI-VIII (11-14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए) ऊपरी प्राथमिक विद्यालय अवस्था पर। यह देश के विकास कार्यक्रम का सबसे अधिक प्राथमिकता वाले क्षेत्र हैं, जिसका दृढ़ संकल्प सब के लिए शिक्षा का लक्ष्य हासिल करना है। इसको हासिल करने के लिए बहुत से उपाय किए जाते रहे हैं जैसे कि :-
- भारत के संविधान में संशोधन जिसमें शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाया गया है (धारा 21 क के तहत), जो यह अभिकल्पना करता है कि राज्य को छह से चौदह वर्ष के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा मुहैया कराना होगा।
- स्थानीय निकायों के माध्यम से शिक्षा की योजना बनाना, पर्यवेक्षण और प्रबंधन का विकेन्द्रीकरण।
- वयस्क साक्षरता के लिए सामाजिक रूप से प्रेरणा देना और
- बहुत अधिक पिछड़े क्षेत्रों में या जनसंख्या के अनभिगम्य वर्ग में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों के लिए अनौपचारिक और वैकल्पिक शिक्षा के अवसरों की व्यवस्था।
प्रारंभिक शिक्षा में प्रमात्रात्मक और गुणात्मक सुधार लाने के लिए किए गए कार्यक्रम/और योजनाएं निम्नलिखित हैं :-
- सर्वशिक्षा अभियान (एसएसए) - राष्ट्रीय कार्यक्रम है जिसे निम्नलिखित उद्देश्यों से शुरू किया गया हैं :-
(i) 6-14 वर्ष की आयु में बच्चों को स्कूलों/ईजीएस (शिक्षा गारंटी स्कीम) केन्द्र/सेतु पाठ्यक्रम में होना है।
(ii) वर्ष 2007 तक सभी लिंग और सामाजिक श्रेणी के अंतरों को प्राथमिक अवस्था में पाटना और प्रारंभिक शिक्षा स्तर पर वर्ष 2010 तक।
(iii) वर्ष 2010 तक सार्वभौमिक प्रतिधारण और
(iv) संतोषजनक गुणवत्ता की प्रारंभिक शिक्षा पर संकेन्द्रण जिसमें जीवन के लिए शिक्षा पर बल दिया जाता है। सर्व शिक्षा अभियान में 12.3 लाख अधिवासों के 19.4 करोड़ बच्चों तक पहुंचने के लिए सभी राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों (यूटी) को शामिल किया जाता है। सितम्बर 30, 2007 के अनुसार उपलब्धियों में 1,70,320 विद्यालय भवनों का निर्माण, 7,13,179 अतिरिक्त कक्षा कक्षों का निर्माण, 2,18,075 शौचालयों का निर्माण, 6.64 करोड़ बच्चों को मुफ्त पाठ्य पुस्तकों का वितरण और 1,86,985 नए विद्यालय (31.03.07 तक) खोलने के अलावा 8.10 लाख शिक्षकों की नियुक्ति करना शामिल है।
- दोपहर का भोजन (मिड डे मील) - यह एक सबसे बड़ा स्कूल के बच्चों को भोजनखिलाने का कार्यक्रम है, जिसकी शुरूआत प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमिकीकरण की गति तेज करने के लिए तथा प्राथमिक अवस्था में बच्चों की पोषण स्थिति में सुधार लाने के लिए की गई है। इसके तहत पकाया हुआ दोपहर का भोजन 450 कैलोरी के पोषक तत्वों और 12 ग्राम प्रोटीन के साथ सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और स्थानीय निकाय के प्राथमिक स्तर में अध्ययन करने वाले बच्चों को दिया जाता है। जबकि उच्च प्राथमिक चरण के लिए पौषणिक मान 700 कैलोरी और 20 ग्राम प्रोटीन निर्धारित किया गया है। सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन ए की सिफारिश भी इस कार्यक्रम के तहत की गई है। पौषणिक मानक को पूरा करने के लिए केन्द्रीय सरकार की ओर से प्रति प्राथमिक विद्यालय बालक / बालिका / विद्यालय दिवस 100 ग्राम की दर से और प्रति उच्च प्राथमिक विद्यालय बालक / बालिका / विद्यालय दिवस 150 ग्राम की दर से अनाज प्रदान किया जाता है।
- जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (डीपीईपी) - I से V कक्षा को शामिल करते हुए प्राथमिक शिक्षा का पुनर्जीवित करने की मुख्य पहल के रूप में शुरू किया गया। इसमें अभिगम्यता, धारणीयता और सीखने में सुधार की उपलब्धि को सार्व भौमिक बनाने के लिए तथा सामाजिक समूहों के बीच विसंगति को कम करने के लिए समग्रता का मार्ग अपनाया जाता है। डीपीईपी अपने सर्वोच्च बिन्दु पर 18 राज्यों में 273 जिलों पर प्रचालनरत कार्यक्रम था। वर्तमान में डीपीईपी ओडिशा तथा राजस्थान के 17 जिलों में प्रचालनरत है।
- प्रारंभिक शिक्षा में बालिकाओं की शिक्षा के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनपीईजीईएल) - इसकी शुरूआत बालिकाओं के लिए शिक्षा बढ़ाने के उद्देश्य से की गई है। यह प्रत्येक बस्ती में 'आदर्श बालिका अनुकूल विद्यालय' के विकास की व्यवस्था करता है जिसमें अधिक गहन सामुदायिक अभिप्रेरणा और बालिकाओं के स्कूलों में नामांकन का पर्यवेक्षण करना शामिल है। इसके तहत 35,252 आदर्श विद्यालय खोले गए हैं तथा 25,537 प्रारंभिक बाल्यावस्था केन्द्रों को सहायता दी गई है।
- कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (केजीबीवी) योजना - अनु. जाति, अनु. जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों एवं अल्पसंख्यक बहुल्य समुदायों की बालिकाओं को लिए उच्च प्राथमिक स्तर पर आवासीय विद्यालयों की स्थापना करने के लिए आरंभ की गई है। इसके तहत इन समुदायों की न्यूनतम 75 प्रतिशत लड़कियों को स्थान का आरक्षण दिया जाता है और 25 प्रतिशत लड़कियां गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों की होती है।
सर्व शिक्षा अभियान और मध्यान्ह भोजन योजना के सघन कार्यान्वयन से विद्यालय से बाहर रहने वाले बच्चों की संख्या में 6 से 14 वर्ष के आयु समूह की कुल आबादी में 5 प्रतिशत से कम हो गई है अर्थात 2001-02 में 4.4 करोड़ से घटकर 2006 में 70 लाख रह गई है। प्राथमिक स्तर पर सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) 2004-05 में 97.82 प्रतिशत से बढ़कर 2006-07 में 110.86 प्रतिशत हो गया है। इसी प्रकार, उच्च प्राथमिक अवस्था में यह 2005-06 में 59.17 प्रतिशत से बढ़कर 2006-07 में 64.72 प्रतिशत हो गया है।
- माध्यमिक शिक्षा
माध्यमिक शिक्षा देश के विकास में प्रारंभिक और उच्च शिक्षा के बीच कड़ी का कार्य करके बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बच्चे का परिदृश्य जैसी माध्यमिक शिक्षा वह ग्रहण करता/करती है उस पर बहुत अधिक निर्भर करता है। बच्चे को शिक्षा की नींव प्रदान करने के अतिरिक्त यह उसे उज्जवल भविष्य के लिए तैयार करने में भी महत्वपूर्ण है। माध्यमिक शिक्षा जिसका ढांचा 2+2 है, कक्षा IX-X से प्रारंभ होता है और उच्च माध्यमिक कक्षाएं XI-XII. तक होती है। यह 14-18 वर्ष की आयु वर्ग में युवा व्यक्तियों को उच्च शिक्षा और कार्य में प्रवेश के लिए तैयार करती है।
मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन बहुत से संगठन माध्यमिक शिक्षा की सहायता करते हैं, जो निम्नलिखित हैं :-
माध्यमिक विद्यालयों और उच्च माध्यमिक विद्यालयों की संख्या जो 1950-51 में 7,416 थी वह वर्ष 2004-05 में बढ़कर 1,52,049 हो गई है। कुल संगत नामांकन वर्ष 1950 - 51 में 1.5 मिलियन से बढ़कर वर्ष 2004 - 05 में 37.1 मिलियन हो गया। जबकि सकल नामांकन का अनुपात (जीईआर) जो माध्यमिक अवस्था में कुल नामांकन दर्शाता है (IX-XII कक्षा) संगत आयु वर्ग में कुल जनसंख्या के समानुपात में स्थायी रूप से बढ़कर गई है जा वर्ष 1990-91 में 19.3 प्रतिशत था वह वर्ष 2004-05 में 39.91 प्रतिशत हो गया है। त्वरित वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकीय परिवर्तन के साथ माध्यमिक विद्यालय प्रमाणपत्र धारक की उत्पादकता और औसत अर्जन, जो कक्षा VIII तक अध्ययन किया है उस व्यक्ति की तुलना में उल्लेखनीय रूप से अधिक है।
- उच्च शिक्षा
भारत के पास विश्व में सबसे बड़ी उच्च शिक्षा प्रणाली है। उच्च/विश्वविद्यालय शिक्षा में सामान्य तौर पर 18-24 वर्ष के आयु वर्ग के विद्यार्थी शामिल हैं। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, वार्षिक छात्रों के नामांकन में वर्ष 1997-98 में 7.26 मिलियन से बढ़कर वर्ष 2004-05 में 10.48 मिलियन हो गया है। उसी अवधि के दौरान छात्राओं का नामांकन 2.45 मिलियन से बढ़कर 4.04 मिलियन हुआ है जो कुल नामांकन का 40.4 प्रतिशत है। देश में उच्च शिक्षा के भीतर तीन मुख्य स्तर हैं, जो निम्नलिखित हैं :-
(i) स्नातक/ स्नातक पूर्व स्तर (ii) मास्टर/ स्नातकोत्तर स्तर और (iii) डॉक्टरल/डॉक्टरल पूर्व स्तर व्यावसायिक/डिप्लोमा पाठ्यक्रम भी स्नातक पूर्व और स्नातकोत्तर स्तरों पर उपलब्ध हैं। विश्वविद्यालयों/महाविद्यालयों तथा शिक्षा के अन्य उच्च संस्थानों में विभिन्न पाठ्यक्रमों के तहत नामांकन 2005-06 में 11.34 मिलियन था जबकि पिछले वर्ष 10.50 मिलियन रहा। इसमें छात्राओं की संख्या 4.58 मिलियन 40.39 प्रतिशत रही।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) संसद के अधिनियम के द्वारा भारत में विश्वविद्यालय/उच्च शिक्षा के समन्वयन निर्धारण और स्तर के रख-रखाव करने के लिए भारत सरकार की सांविधिक निकाय के रूप में की गई है। यह न केवल विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को सहायता अनुदान देता है अपितु उन उपायों के संबंध में केंद्रीय और राज्य सरकारों को सुझाव देता है जो उच्च शिक्षा के विकास के लिए अनिवार्य हैं। यूजीसी का मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है। पूरे देश में प्रभावी क्षेत्रवार कवरेज को सुनिश्चित करने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने भी पुणे, हैदराबाद, कोलकाता, भोपाल, गुवाहाटी, और बैंगलोर में क्षेत्रीय केन्द्रों की स्थापना द्वारा अपने प्रचालनों का विकेन्द्रीकरण किया है। यूजीसी के विभिन्न उद्देश्य इस प्रकार हैं। :-
- विश्वविद्यालयी शिक्षा का संवर्धन और समन्वयन करना।
- विश्वविद्यालयों में शिक्षण, परीक्षा और अनुसंधान का मानक निर्धारित करना।
- शिक्षा के न्यूनतम स्तर संबंधी विनियम बनाना।
- महाविद्यालयीन और विश्वविद्यालय शिक्षा के क्षेत्र में विकास की निगरानी करना।
- संघ और राज्य सरकारों और उच्च शिक्षण संस्थाओं आदि के बीच महत्वपूर्ण कड़ी का कार्य करना।
यूजीसी के पास 'व्यावसायिक परिषद' है जो पाठ्यक्रमों को मान्यता देने, व्यावसायिक संस्थाओं का संवर्धन और स्नातक पूर्व कार्यक्रमों के लिए अनुदान देना और विभिन्न पुरस्कार देने के लिए उत्तरदायी हैं। इनमें से कुछ निम्नलिखित हैं :-
अनेक राज्य सरकारों ने अपने संबंधित राज्यों में राज्य उच्च शिक्षा परिषदों की भी स्थापना की है। ये परिषदें राज्यों में उच्च शिक्षा के विकास के लिए समन्वित कार्यक्रम तैयार करती है। वे उच्च शिक्षा संस्थाओकं के प्रयासों और निवेशों को समेकित करने का प्रयास करती हैं। उदाहरण के लिए :- आंध्र प्रदेश राज्य उच्चतर शिक्षा परिषद; केरल राज्य उच्चतर शिक्षा परिषद; उत्तर प्रदेश राज्य उच्चतर शिक्षा परिषद; आदि।
वर्तमान में 24 केन्द्रीय विश्वविद्यालय, 251 राज्य विश्वविद्यालय; 103 मानद विश्वविद्यालय; 5 संस्थान राज्य विधान के तहत स्थापित किए गए और राष्ट्रीय महत्व के 33 राष्ट्रीय संस्थान केन्द्रीय विधान द्वारा स्थापित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त 20,677 महाविद्यालयों सहित 2166 महिला महाविद्यालय हैं।
- वयस्क शिक्षा
'वयस्क शिक्षा' को उच्च महत्व दिया गया है क्योंकि बगैर निरक्षरता को पूरी तरह देश से नहीं हटाया जा सकता है। तदनुसार, राष्ट्रीय साक्षरता मिशन (एनएलएम) 15-35 वर्ष के आयु वर्ग में निरक्षरों को कार्यात्मक साक्षरता देने के लिए स्थापित किया गया है जो सबसे अधिक उत्पादक आयु वर्ग है ओर इसमें कर्मगारों का मुख्य वर्ग है। मिशन साक्षरता को पढ़ने, लिखने और गणित और उन्हें अपने दिन प्रति दिन के जीवन में लागू करने की क्षमता के रूप में पारिभाषित करता है। इस प्रकार से इसका लक्ष्य सीधे तौर पर साक्षता में आत्म निर्भरता और कार्यात्मक साक्षरता की संख्यात्मकता से परे है। मिशन का मोटे तौर पर लक्ष्य वर्ष 2007 तक 75 प्रतिशत साक्षरता दर का स्थायी आरंभिक स्तर हासिल करना है। मिशन के मुख्य कार्यक्रमों में निम्नलिखित शामिल हैं :-
- 'संपूर्ण साक्षरता अभियान' जिसका लक्ष्य निरक्षरों को बुनियादी शिक्षा मुहैया कराना है।
- 'साक्षरता पश्च कार्यक्रम' इसका लक्ष्य नए साक्षरों के लिए साक्षरता कौशल की पुनर्बहाली करना है।
- 'शिक्षा कार्यक्रम जारी रखना' इसका मुख्य लक्ष्य बड़े पैमाने पर समुदाय के लिए जीवन पर्यन्त शिक्षा की सुविधाएं मुहैया कराना है।
देश के कुल 600 जिलों में से 597 जिलों को वयस्क शिक्षा कार्यक्रम के तहत एनएलएम द्वारा कवर किया गया है। वर्तमान में लगभग 95 जिलों में संपूर्ण साक्षरता अभियान, 174 जिलों में पश्चात साक्षरता कार्यक्रम और 328 जिलों में शिक्षा जारी रखने का कार्यक्रम चलाया जा रहा है।
'जन शिक्षण संस्थान (जेएसएस)' या इंस्टीट्यूट ऑफ पीपल्स एजुकेशन की योजना भी है, जिसकी शुरूआत बहुसंयोजक या बहु पहलू वयस्क शिक्षा कार्यक्रम के रूप में की गई है जिसका लक्ष्य व्यावसायिक कौशल और जीवन की गुणवत्ता आने लाभानुभोगियों को सुधारना था। योजना का उद्देश्य शहरी / ग्रामीण जनसंख्या, विशेषकर नए साक्षरों, अर्ध साक्षर, अनु. जाति, अनु. जनजाति, महिला और बालिकाओं, झुग्गी - झोंपडियों के निवासियों, प्रवासी कामगारों आदि के लिए सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़े और शैक्षिक रूप से अलाभ प्राप्त समूहों के लिए शैक्षिक, व्यावसायिक और व्यावसायिक विकास करना है। वर्तमान में देश में 221 जेएसएस हैं। वे असंख्य व्यावसायिक कार्यक्रम चलाते हैं जिसकी विभिन्न कौशल के लिए अलग-अलग अवधि है। लगभग 380 व्यावसायिक पाठ्यक्रम इन संस्थानों द्वारा प्रस्तावित किए जाते हैं। ट्रेड/पाठ्यक्रम जिनके लिए प्रशिक्षण दिया जाता है उनमें कटाई, सिलाई और परिधान बनाना, बुनाई और कढ़ाई, सौन्दर्य वर्धन और स्वास्थ्य देखभाल, हस्तशिल्प, कला, चित्रांकन और चित्रकारी, इलेक्ट्रोनिक साफ्टवेयर की मरम्मत आदि शामिल हैं। लगभग 16.89 लाख व्यक्तियों को 2006-07 के दौरान आयोजित व्यावसायिक कार्यक्रमों एवं अन्य गतिविधियों द्वारा लाभ मिला है।
- तकनीकी शिक्षा
''तकनीकी शिक्षा'' देश के सशक्त मानव संसाधन विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कुशल जन शक्ति के सृजन में सहायता देती है, औद्योगिक उत्पादकता को बढ़ावा देती है और जीवन की गुणवत्ता में सुधार आता है। यह अभियांत्रिकी, प्रौद्योगिकी, प्रबंधन, वास्तुकला, टाउन प्लानिंग, भैषजिकी, अनुप्रयुक्त कला और हस्तशिल्प, होटल प्रबंधन तथा केटरिंग प्रौद्योगिकी के पाठ्यक्रमों और कार्यक्रमों को कवर करता है। यह मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में बांटा गया है। जिनके नाम हैं केन्द्रीय सरकार द्वारा निधिकृत संस्थान; राज्य सरकार / राज्य द्वारा निधिकृत संस्थान; और स्वयं वित्त पोषित संस्थान। वर्ष 2007-08 में 52 केन्द्रीय निधिकृत संस्थान हैं जो तकनीकी और विज्ञान शिक्षा प्रदान करते हैं, इसके अलावा शीर्ष स्तरीय अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) और वास्तुकला परिषद (सीओए)।
वर्ष 2005-06 के दौरान कोलकाता और पुणे में विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान के दो भारतीय संस्थान (आईआईएसईआर) स्थापित किए गए और 2006-07 में मोहाली में तीसरा संस्थान बनाया गया। ग्यारहवीं योजना के दौरान भोपाल और तिरुवनंतपुरम में दो और विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान भारतीय संस्थान बनाने का अनुमोदन दिया गया है। तकनीकी शिक्षा को और अधिक व्यापक आधारित बनाने के लिए ग्यारहवीं योजना में केन्द्रीय निधिकृत तकनीकी शिक्षा संस्थानों में बड़े विस्तार की संकल्पना की गई है, जैसेकि : (i) आठ नए आईआईटी स्थापित करना, जिनमें से 4 बिहार, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश में होंगे; (ii) सात अन्य आईआईएम स्थापित करना, जिनमें से 2007-08 के दौरान शिलांग में राजीव गांधी भारतीय प्रबंध संस्थान पहले ही स्थापित किया गया है; (iii) विभिन्न विशिष्ट प्रक्षेत्र हिस्सों में सूचना प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग पर फोकस सहित 20 नई आईआईआईटी की स्थापना करना।
इसलिए वर्षों से साक्षरता, स्कूल में नामांकन, स्कूलों का नेटवर्क और उच्च शिक्षा की संस्थाओं का विस्तार जिसमें तकनीकी शिक्षा भी शामिल है, की दृष्टि से उल्लेखनीय प्रगति हासिल की गई है। साक्षरता दर वष्र 1951 में 18.43 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2001 में 64.84 प्रतिशत हो गई है। भारत की जनगणना 2001 के अनुसार पुरुष साक्षरता 75.26 प्रतिशत है और महिला साक्षरता 53.67 प्रतिशत है। व्यावसायीकरण और रोजगारोन्मुखी पाठ्यक्रमों पर अधिक बल देते हुए पाठ्यक्रमों की पुनरीक्षा करने के सभी प्रयास किए जा रहे हैं, इसमें मुक्त अभिगम्यता प्रणाली के विस्तार और विविधीकरण, प्रशिक्षक प्रशिक्षणों का पुनर्गठन तथा नए सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का अधिकाधिक उपयोग जैसे कम्प्यूटर आदि शामिल हैं। इस प्रकार से शिक्षा क्षेत्रक के विकास, विविधीकरण और निवेश के प्रचुर अवसर मौजूद हैं। यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अर्थव्यवस्था में सभी मंचों पर राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में शिक्षा अंतिम गारंटी है।
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