| उपलब्ध भू-संसाधन पर जनसंख्या का बढ़ता दबाव उच्च कृषि उत्पादकता को आवश्यक बना देता है जिसे उर्वरक पोषक का गहन उपयोग द्वारा हासिल किया जा सकता है। उर्वरक को सामान्य तौर पर कोई सामग्री (ऑर्गनिक या गैर ऑर्गनिक प्राकृतिक या सिन्थेटिक) जो पौधों का एक या अधिक अनिवार्य रसायन तत्व की आपूर्ति करता है, के रूप में पारिभाषित किया जाता है। व्यापक तौर पर सोलह तत्वों को पौध विकास के लिए अनिवार्य के रूप मे अभिचिन्हांकित किया गया है जिनमें से नौ की आवश्यकता वृहद मात्रा में होती है और सात की आवश्यकता सूक्ष्म मात्रा में होती है।
प्राथमिक और द्विपक्षीय पोषकों की आवश्यकता वृहद मात्रा में होती है। 'प्राथमिक पोषक' में नाइट्रोज, फास्फोरस, और पोटेशियम शामिल हैं। भारतीय मृदा में नाइट्रोजन और फासफोरस की कमी है। इसलिए इन तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए रसायन उर्वरकों का उपयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए अमोनियम सल्फेट, अमोनिया क्लोराइड, अमोनिया नाइट्रेट, कैल्सियम, अमोनिया नाइट्रेट, यूरिया आदि नाइट्रोजन के स्रोत हैं। कैल्सियम, मैग्नेशियम और सल्फर द्वितीयक पोषक कहलाते हैं और इनकी पौध वृद्धि के लिए प्राथमिक पोषक की तुलना में कम मात्रा में आवश्यकता होती है। परन्तु द्वितीयक पोषक में किसी प्रकार की कमी निम्न स्तर पर ऊपज प्रतिसिद्ध करने द्वारा प्राथमिक पोषकों की क्षमता घटा देते हैं। इसलिए अनुकूलतम परिणाम हासिल करने के लिए फसलों के लिए प्राथमिक पोषकों के अभाव द्वितीयक पोषकों की आपूर्ति करना आवश्यक है। लौह, जिंक, मैंग्नीज, बोरोन, ताम्बा, मोलीब्डेनम और क्लोरीन, सूक्ष्म पोषकों के समूह हैं जिनकी आवश्यकता पौधों को कम मात्रा में होती है। गहन फसलीकरण सभी पोषकों का दोहन करता है जिसमें मृदा से सूक्ष्म पोषक शामिल हैं
भारत में, उर्वरक विभाग उत्पादन की निगरानी, आयात और उर्वरक का वितरण तथा देशी और आयातित उर्वरकों को लिए वित्तीय सहायता का प्रबंधन करने के साथ-साथ उर्वरक उद्योग की योजना बनाने, संवर्धन और विकास करने से संबंधित नोडल संगठन है। विभाग को चार प्रभागों में विभाजित किया गया हैं :-
- उर्वरक परियोजना और योजना
- उर्वरक का आयात परिवहन और वितरण
- प्रशासन और
- वित्त एवं लेखा
इसके अलावा इसके प्रशासनिक नियंत्रण में दस सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (पीएसयू) हैं, एक बहु राज्यीय सहकारी संस्था (कृषिक भारतीय को ऑपरेटिव लि. - कृभकों) और एक संयुक्त क्षेत्र कंपनी (इंडियन पोटाश लि. - आईपीएल) है।
जहां तक उर्वरक के उत्पादन का संबंध है, भारतीय उर्वरक उद्योग लगभग सभी रसायन उर्वरक की मांग पूरी करने द्वारा, कृषि क्षेत्रक के विकास में मुख्य भूमिका निभाया है। वर्तमान में देश में 56 बड़े आकार की उर्वरक इकाइयां हैं जो नाइट्रोजन और फॉस्फेट / जटिल उर्वरकों की व्यापक परास का निर्माण करती है। इनमें से 30 इकाइयों द्वारा यूरिया का उत्पादन किया जाता है, 21 इकाइयों में डीएपी और जटिल उर्वरक बनाए जाते हैं, 5 इकाइयों में अल्प विश्लेषण प्रत्यक्ष नाइट्रोजन युक्त उर्वरक बनाए जाते हैं तथा साथ इकाइयों में एक उप उत्पद के रूप में अमोनियम सल्फेट बनाया जाता है। इसके अलावा लगभग 72 छोटी और मध्यम स्तर की इकाइयां हैं जो एकल सुपर फॉस्फेट (एसएसपी) बनाती है। इसके परिणाम स्वरूप भारत विश्व में 120.61 लाख मिलियन टन नाइट्रोजन एवं 56.59 लाख मिलियन टन फॉस्फेट की अनुमानित संस्थापित क्षमता के साथ तीसरा सबसे बड़ा उर्वरक उत्पादक है ( 30.01.2008 के अनुसार)। देश में उर्वरक उत्पादन क्षमता का त्वरित निर्माण को अनुकूल नीतिगत माहौल के परिणामस्वरूप हासिल किया गया है जो सार्वजनिक, सहकारिता और निजी क्षेत्रको में बड़ा निवेश सुकर बनाता है।
विभिन्न फसलों के लिए अपेक्षित तीन मुख्य पोषकों में से मुख्य रूप से नाइट्रोजन के लिए देशी कच्ची सामग्री उपलब्ध होती हैं। इसलिए सरकार की नीति का लक्ष्य देशी फीड स्टॉक उपयोग पर आधारित नाइट्रोजन उर्वरक के उत्पादन में अधिकाधिक आत्मनिर्भरता हासिल करना है।
जबकि फास्फेट के मामले में कच्ची सामग्री की कमी किसी भी डिग्री की आत्मनिर्भरता हासिल करने में विघ्न उत्पन्न करते हैं। इसलिए एक मिश्रित नीति को अपनाया गया है जिसमें तीन विकल्पों का अनुकूलम शामिल हैं :- i) ii) आयातित मध्यस्थ जैसे अमोनिया और फासफोरिक एसिड; और iii) तैयार उर्वरक का आयात जैसे डीअमोनिया फासफेट (डी ए पी) और बहुत ही विरल मोनो अमोनिया फासफेट (एम ए पी) और नाइट्रोजन फासफेट पोटाश (एन पी के) मिश्रण। वर्ष 2006-07, के दौरान मोटे तौर पर फॉस्फेट युक्त उर्वरक की 77 प्रतिशत आवश्यकता प्रथम दो विकल्पों से पूरी की जाती है। जबकि तैयार उर्वरक के आयात की हिस्सेदारी बढ़ गई है।
परन्तु पोटाश उर्वरक के संबंध में देश में पोटाश का कोई दोहन करने योग्य ज्ञात भंडार नहीं है और इन उर्वरकों की समस्त आवश्यकताएं आयात के माध्यम से पूरी की जाती हैं। पोटाश, पोटाशिक तत्व वाले मिश्रित उर्वरक के मामले में भी यह पूर्ण रूप से आयात पर आधारित है।
उर्वरक के उत्पादन के अतिरिक्त यह उतना ही महत्वपूर्ण है कि उर्वरक किसानों को सही समय पर और खरीद सकने योग्य मूल्य उपलब्ध कराया जाएं ताकि स्थायी कृषि संबंधी विकास और संतुलित पोषण अनुप्रयोग का संवर्धन किया जा सके। इस लक्ष्य के साथ यूरिया (यह एकमात्र नियंत्रित उर्वरक है) की बिक्री एक समान सांविधक रूप से अधिसूचित बिक्री मूल्य पर होती है और विनियंत्रित फास्फेटिक और पोटाश उर्वरकों की बिक्री संकेतात्मक अधिकतम खुदरा मूल्य पर होती है। क्योंकि सांविधिक रूप से अधिसूचित बिक्री मूल्य और संकेतात्मक एमआरपी सामान्यत: संबंधित विर्माता यूनिट की उत्पादन लागत से कम होती है इस अंतर का भुगतान सब्सिडी या विनिर्माताओं को रियायत के रूप में किया जाता है। विनिर्माताओं को यह सहायता 'यूरिया यूनिट के लिए नई मूल्य निर्धारण योजना के तहत' और 'विनियंत्रित फासफेटिक और पोटाश उर्वरक के लिए रियायत योजना के तहत' दी जाती है। क्योंकि देशी और आयातित दोनों उर्वरकों का उपभोक्ता मूल्य एक समान। निर्धारित किया जाता है अत: वित्तीय सहायता आयातित यूरिया और विनियंत्रित फासफेटिक और पोटासिक उर्वरकों पर दी जाती है। इसके अतिरिक्त बेहतर परिवहन, प्राथमिकता फसलों और राज्य सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट क्षेत्रों के लिए विनियमित आपूर्तियों के माध्यम से उपलब्ध आपूर्तियों के वितरण को दुरुस्त बनाने के लिए विशेष उपाय किए गए हैं।
देश में उर्वरकों की कीमत, व्यापार, गुणवत्ता और वितरण को विनियमित करने के लिए ‘अनिवार्य वस्तु अधिनियम (ई सी ए) के अधीन जारी ‘उर्वरक नियंत्रण आदेश’ के द्वारा सरकार उर्वरकों की गुणवत्ता सुनिश्चित करती है। राज्य सरकारें एफ सी ओ के विभिन्न प्रावधानों को क्रियान्वित करने के लिए कार्यकारी एजेंसियां हैं। आदेश में ऐसे किसी भी उर्वरक के विनिर्माण, आयात और बिक्री को प्रतिसिद्ध किया जाता है जो निर्धारित मानक पर खरे नहीं उतरते हैं। 'फरीदाबाद में केन्द्रीय उर्वरक गुणवत्ता नियंत्रण और प्रशिक्षण संस्थान' और इसके 3 क्षेत्रीय केन्द्रों की स्थापना आयातित और देशी उर्वरकों का निरीक्षण और विश्लेषण करने राज्य प्रवर्तन एजेंसियों और विश्लेषकों को गुणवत्ता नियंत्रण संबंधी सुझाव और प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए की गई है। एफ सी ओ में इसे और अधिक प्रयोक्ता अनुकूल बनाने और प्रभावी प्रवर्तन सुनिश्चित करने के लिए हाल ही में संशोधन किया गया है। सभी उर्वरकों पर यूरिया सहित अधिकतम खुदरा मूल्य का मुद्रण करना अब अनिवार्य बना दिया गया है इसके साथ-साथ विनिर्माण का उर्वरक के आयात का माह और और वर्ष के मुद्रण को भी अनिवार्य बना दिया गया है।
जैव-उर्वरक के उपयोग का संवर्धन करने के लिए संयंत्र पोषक का पर्यावरण सरकारी अनुकूल और सस्ता स्रोत के रूप में ‘जैव उर्वरक के विकास और उपयोग पर एक राष्ट्रीय परियोजना, छठी योजना के दौरान सरकार द्वारा शुरू की गई है और इसे अक्तूबर 2004 में से ‘ऑर्गनिक फार्मिंग संबंधी राष्ट्रीय परियोजना (एन सी ओ एफ)' की नई केन्द्रीय क्षेत्रक योजना के अंतर्गत रखा गया है। इसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय ऑर्गनिक फार्मिंग केन्द्र और क्षेत्रीय ऑर्गनिक फार्मिंग केन्द्र की स्थापना जैव-उर्वरक के संवर्धन, विस्तार, प्रशिक्षण और प्रदर्शन के लिए की गई है। उपलब्ध सूचना के अनुसार देश में विभिन्न प्रकार के जैव उर्वरकों के 18,000 टन की वार्षिक उत्पादन क्षमता के साथ लगभग 125 जैव उर्वरक उत्पादन इकाइयां हैं।
इसके अतिरिक्त सरकार एक नई योजना 'राष्ट्रीय ऑर्गनिक फार्मिंग' का अक्तूबर 2004 से क्रियान्वयन कर रही है जिसका परिव्यय 57.05 करोड़ रु. है यह देश में ऑर्गनिक फार्मिंग के उत्पादन, संवर्धन, विपणन विकास के लिए है। योजना के मुख्य संघटकों में निम्नलिखित शामिल हैं :-
- ऑर्गनिक उत्पादन का प्रमाणीकरण प्रणाली आरंभ करना
- सेवा प्रदाओं के माध्यम से क्षमता निर्माण
- फलों, सब्जियों और अपशिष्ट काम्फेस्ट यूनिटों, जैव उर्वरक उत्पादन, वर्मी कल्चर के लिए हैचरी जैसे ऑर्गनिक निवेश के उत्पादन के लिए उत्पादन यूनिटों का वाणिज्यीकरण के लिए वित्तीय सहायता और
- ऑर्गनिक फार्मिंग का संवर्धन, विस्ता और बाजार विकास।
ऐसे सभी प्रयासों के परिणामस्वरूप रसायन उर्वरकों की खपत (पोषक की दृष्टि से) ने मोटे तौर पर बढ़ती प्रवृत्ति दर्शाया है। आज भारत विश्व में तीसरा सबसे बड़ा उर्वरक उपभोक्ता है। प्रमुख उर्वरकों जैसे कि यूरिया, डीएपी और एनएपी की खपत वर्ष 2006-07 के दौरान क्रमश: 244.84, 69.24 और 23.93 लाख मिलियन टन है। पोषक तत्वों की संदर्भ में (एन, पी और के) में उर्वरकों की वार्षिक खपत 2006-07 में 216.52 लाख मिलियन टन हो गई जबकि यह 1951-52 में 0.7 लाख मिलियन टन थी। उर्वरकों की प्रति हेक्टेयर खपत वर्ष 1991 में 69.8 किलो ग्राम से 3.3 प्रतिशत की औसत दर पर बढ़ कर 2006-07 में 113.3 किलो ग्राम हो गई है। उर्वरकों का अखिल भारतीय औसत खपत स्तर वर्ष 2005-06 में 104.5 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़ कर 2006-07 में 112.76 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर हो गया है। राज्यों में काफी भिन्नता देखी गई है। प्रति हेक्टेयर खपत आंध्र प्रदेश में 219.48 किलो ग्राम, पंजाब में 209.59 किलो ग्राम और तमिलनाडू में 186.68 किलो ग्राम है, जबकि यह खपत राजस्थान, उडीसा, झारखण्ड, मध्य प्रदेश आदि में अपेक्षाकृत कम है। यह खपत कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में केवल 5 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर है। उर्वरकों के उपयोग का यह पैटर्न देखते हुए भारत सरकार द्वारा उर्वरक पोषक तत्वों के संतुलित और समेकित उपयोग को बढ़ावा दिया जाता है।
|