| खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्रक अर्थव्यवस्था के सम्पूर्ण विकास के लिए अपरिहार्य है क्योंकि यह कृषि और उद्योग के बीच महत्वपूर्ण संबंध और सहकालिकता प्रदान करता है। यह कृषि को विविधीकृत करने और वाणिज्यीकरण करने में सहायता करता है, कृषकों की आय बढ़ाता है, कृषि खाद्य के निर्यात के लिए बाजार का सृजन करता है तथा अधिकाधिक रोजगार के अवसरों का सृजन करता है। ऐसे उद्योगों की मौजूदगी के द्वारा विस्तृत पैमाने पर खाद्य उत्पाद दूरस्थ स्थानों पर बेचा और वितरित किया जाता है। 'खाद्य प्रसंस्करण' शब्द को मुख्य रूप से विभिन्न प्रविधियों द्वारा जैसे ग्रेडिंग, छटनी और पैकेजिंग द्वारा कृषि या बागवानी उत्पाद में मूल्य वर्धन के रूप में पारिभाषित किया जाता है। दूसरे शब्दों में यह उनके स्वजीवन को बढ़ाने, गुणवत्ता में सुधार लाने तथा कार्यात्मक रूप से उन्हें अधिक उपयोगी बनाने की दृष्टि से प्रभावी तरीके से खाद्य तत्वों के विनिर्माण और संरक्षण की तकनीक है। इसमें उप-क्षेत्रकों से बड़े पैमाने पर उत्पाद शामिल हैं जिसमें कृषि, बागवानी, बागान, पशु पालन और मत्स्यिकी शामिल हैं।
भारतीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग उत्पादन, खपत, निर्यात और विकास संभावना की दृष्टि से विश्व में सबसे बड़ा उद्योग है। पहले खाद्य प्रसंस्करण मोटे तौर पर खाद्य संरक्षण, पैकेजिंग और परिवहन तक ही सीमित था जिसमें मुख्य रूप से नमकीन करना, दही जमाना, सूखाना, अचार बनाना आदि शामिल हैं। तथापि, वर्षों से नए बाजारों और प्रौद्योगिकियों के आने से क्षेत्रक ने अपने क्षेत्र का विस्तार किया है। इसने नए मदों का उत्पादन करना आरंभ कर दिया है जैसे खाने के लिए तैयार खाद्य, पेय, प्रसंस्करण और जमे हुए फल और सब्जी उत्पाद, समुद्री उत्पाद और मांस उत्पाद आदि। इसने विभिन्न खाद्य मदों के प्रसंस्करण के लिए कटाई पश्च मूल संरचना प्रतिष्ठानों को भी शामिल किया है, जैसे शीतल भंडारण सुविधाएं, फूड पार्क, पैकेजिंग केन्द्र, मूल्यवर्धित केन्द्र, विकिरण सुविधाएं और आधुनिकीकृत कसाईखाना।
भारतीय अर्थव्यवस्था का उदारीकरण और विश्व व्यापार तथा उपभोक्ता की बढ़ती सम्पन्नता ने खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्रक में विविधिकरण के लिए नए अवसर खोल दिए हैं और विकास के नए मार्ग खोल दिए हैं। प्रसंस्कृत और सुविधाजनक खाद्य की मांग शहरीकरण, जीवन शैली में बदलाव और लोगों की भोजन की आदत में परिवर्ततन के कारण स्थायी रूप से बढ़ रही है। तदनुसार भारतीय उपभोक्ता नए उच्च गुणवत्ता वाले खाद्य उत्पाद परोसे जा रहे हैं जिसका निर्माण अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी का उपयोग करके किया गया है।
भारत के पास सुदृढ़ कृषि उत्पादन आधार है जिसका कृषि अबोहवा की परिस्थितियां भिन्न-भिन्न हैं और 184 मिलियन हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है। यह विश्व में सबसे बड़ा खाद्य उत्पादक है और यहां व्यापक किस्म की फसलें, फल, सब्जी, फूल, मवेशी और समुद्री खाद्य की उपलब्धता है। उपलब्ध सूचना के अनुसार यह वार्षिक रूप से 90 मिलियन टन दूध का उत्पादन करता है (यह विश्व में सबसे अधिक है) 150 मिलियन टन फल और सब्जियां (दूसरा सबसे बड़ा) 485 मिलियन मवेशी (सबसे बड़ा); 204 मिलियन टन खाद्यान्न (तीसरा सबसे बड़ा); 6.3 मिलियन टन मछली (तीसरा सबसे बड़ा); 489 मिलियन कुक्कुट और 45,200 मिलियन अण्डे। इसके परिणामस्वरूप भारतीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग विश्व भर में निवेशकों के लिए आकर्षक केन्द्र बन गया है। वर्ष 2000-01 से 2007-08 (नवम्बर 2007 तक) की अवधि में खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में वर्षवार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का कुल अंतर्वाह इस प्रकार है।
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वर्ष |
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (करोड़ रु.) |
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2000-01 |
0198.13 |
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2001-02 |
1036.12 |
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2002-03 |
0176.53 |
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2003-04 |
0510.85 |
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2004-05 |
0174.08 |
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2005-06 |
0182.94 |
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2006-07 |
0441.00 |
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2007-08 (नवम्बर 2007 तक) |
0061.63 |
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महायोग |
2781.28 |
(स्रोत : वार्षिक प्रतिवेदन 2007-08, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय)
यद्यपि सरकारी निजी और सहकारिता क्षेत्रकों को उद्योग की प्रगति में अपनी अधिकारपूर्ण भूमिका निभानी है, 'खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय' देश में सुदृढ़ और ऊर्जावान प्रसंस्करण के विकास के लिए नोडल एजेंसी है। यह विशाल एकीकृत प्रसंस्करण क्षमता के विकास के लिए उद्योग को तकनीकी सुझाव और मार्गदर्शन देने तथा इसके विकास के लिए अनुकूल माहौल बनाने के लिए घरेलू और विदेशी निवेश आकर्षित करने हेतु सूची और सुविधाकारक का कार्य करता है। इसमें फलों, और सब्जियों, डेरी, दूध, कुक्कुट, मत्स्य, उपभोक्ता खाद्य, अन्न गैर मोलासे आधारित एल्कोहल पेय, शुद्धिकृत जल और मृदा पेय। मंत्रालय के उद्देश्य निम्नलिखित हैं :-
- कृषकों की आय बढ़ाने के लिए कृषि उत्पादों का उपयोग और मूल्यवर्धन करना।
- कृषि खाद्य उत्पादों के भंडारण, परिवहन और प्रसंस्करण के लिए मूल संरचना का विकास करने खाद्य प्रसंस्करण श्रृंखला में सभी अवस्थाओं में बर्बादी कम करना।
- घरेलू और विदेशी दोनों स्रोतों से आधुनिक प्रौद्योगिकी को कार्य में लगाना।
- प्राथमिक कृषि उत्पादों तथा प्रसंस्कृत उद्योग के अपशिष्ट और कृषि अवशेषों को सक्षमता पूर्वक उपयोग करना।
- उत्पाद और प्रक्रिया विकास और विकसित पैकेजिंग के लिए खाद्य प्रसंस्करण में अनुसंधान और विकास को प्रोत्साहित करना।
- मूल्यवर्धित निर्यातों का संवर्धन करने के लिए नीतिगत सहायता, संवर्धनात्मक पहलों और भौतिक सुविधाएं प्रदान करना।
- खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्रक से संबंधित प्रशुल्क और शुल्कों के यौक्तिकरण का संवर्धन करना।
- खेत से उपभोक्ता तक आपूर्ति श्रृंखला में सभी अंतरालों को भरने के लिए महत्वपूर्ण मूल संरचना का स़ृजन
सरकार ने क्षेत्रक को उच्च प्राथमिकता और शुल्कों के यौक्तिकरण का संवर्धन करना/और पहलें की है। इसने विभिन्न खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्रों में अनेकानेक राजकोषीय राहत और प्रोत्साहन प्रदान किया है तथा बड़ी संख्या में संयुक्त उद्यमों, विदेशी सहयोग, औद्योगिक लाइसेंस एवं 100 प्रतिशत निर्यातोन्मुखी यूनिट प्रस्तावों का अनुमोदन किया है। इस दिशा में कुछ महत्वपूर्ण कदम निम्नलिखित हैं :- (i) लघु उद्योग क्षेत्रक और एल्कोहल पेय के लिए आरक्षित मदों को छोड़कर उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 के तहत लाइसेंसिंग के क्षेत्र से अधिकांश प्रसंस्कृत खाद्य मदों को छूट दी गई है; (ii) खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को बैंकों द्वारा उधार देने के लिए प्राथमिकता क्षेत्रक की सूची में शामिल किया गया है ताकि उनके लिए सरलता से ऋण की उपलब्धता सुनिश्चित किया जा सके ; (iii) 100 प्रतिशत तक विदेशी इक्विटी के लिए स्वत: अनुमोदन अधिकांश प्रसंस्कृत खाद्य मदों के लिए उपलब्ध है (कुछ शर्तों के अधीन) ; (iv) बजट 2007-08 में, उत्पाद शुल्क खाद्य मिश्रणों के सभी प्रकारों पर समाप्त कर दिया गया है, जिसमें तैयार मिश्रण, सोया बड़ी (खाद्य पूरक) और खाने के लिए तैयार पैकिट बंद वस्तुएं और बिस्किट शामिल हैं; (v) सूर्यमुखी तेल (कच्चे) पर सीमाशुल्क को घटाकर 65% से 50% और सूर्यमुखी तेल (रिफाइंड) पर इसे घटाकर 75% से 60% कर दिया गया है; (vi) रिफाइंड खाद्य तेल के मामले में 4 प्रतिशत का विशेष अतिरिक्त कर 4 प्रतिशत समाप्त कर दिया गाय है; (vii) खाद्य प्रसंस्करण मशीनरी पर सीमा शुल्क को घटाकर 7.5% सेo 5% किया गया है; आदि ।
इसके अतिरिक्त खाद्य प्रसंस्करण उद्यम को अनेकानेक कानूनी अपेक्षाओं का अनुपालन करना है, इनमें से कुछ निम्नलिखित हैं :-
- फल उत्पाद आदेश (एफपीओ), 1955 - इसको अनिवार्य वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 3 के तहत लागू किया गया है, इसमें फल और सब्जी उत्पादों के विनिर्माण में साफ-सफाई और स्वच्छता के विनियमन की व्यवस्था करता है। इसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि स्वच्छ और अच्छी गुणवत्ता की मदों का विनिर्माण और विक्रय किया जाए। इसका कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा फल और सब्जी संरक्षण निदेशालय के माध्यम से किया जाता है। निदेशालय का दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चेन्नै और गुवाहाटी में स्थित पांच क्षेत्रीय कार्यालय है तथा लखनऊ में एक उप-कार्यालय है। इस आदेश के तहत निम्नलिखित मदों के लिए न्यूनतम आवश्यकता की लाइसेंसिंग प्रदान की गई है, अर्थात :- (i) परिसरों, अहातों और कार्मिकों की साफ-सफाई और स्वच्छ स्थिति; (ii) प्रसंस्करण के लिए प्रयुक्त होने वाला पानी; (iii) मशीनरी और उपकरण; और (iv) उत्पाद विशिष्टि। इसके अतिरिक्त संरक्षात्मक, मिश्रण और प्रदूषकों की भी विभिन्न उत्पादों के लिए विशिष्ठी दी गई है।
प्रौद्योगिकियों में हाल में हुए विकास और एफपीओ मानकों के साथ पीएफए, कोडेक्स, ईयू, एफडीए तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय खाद्य मानकों को सुमेलित करने के लिए मंत्रालय ने मौजूदा एफपीओ, 1955 की समीक्षा की पहल की है, जो वैज्ञानिक विकास एवं फल तथा सब्जी प्रसंस्करण उद्योगों के आधुनिकीकरण एवं इन्हें अभिशासित करने वाले नियमों के आधार पर संशोधनों का सुझाव देने पर लक्षित है।
- मांस खाद्य उत्पाद आदेश (एमएफपीओ), 1973 - यह अनिवार्य वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 3 के अंतर्गत लागू किया गया है इसका लक्ष्य उपभोक्ताओं को पूर्ण रूप से मांस खाद्य उत्पादों की आपूर्ति सुनिश्चित करना है। यह प्रसंस्करण से तैयार उत्पाद तक मांस पशु को मारने के पहले और मारने के पश्चात निरीक्षण करके मांस खाद्य उत्पादन का गुणवत्ता नियंत्रण का कार्य करता है ताकि मांस खाद्य उत्पादों के प्रसंस्करण की स्वच्छता स्थिति सुनिश्चित किया जा सके। इसका क्रियान्वयन पहले विपणन और निरीक्षण निदेशालय द्वारा किया जाता था परतु इसका प्रशासन मंत्रालय को अंतरित किया गया है। साफ सफाई, स्वच्छता, पैकिंग, मार्किंग और लेबलिंग अपेक्षाएं आदेश की अलग सूची में विनिर्दिष्ट हैं।
प्रौद्योगिकियों में हाल में हुए विकास और एमएफपीओ मानकों के साथ पीएफए, कोडेक्स, ईयू, एफडीए तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय खाद्य मानकों को सुमेलित करने के लिए मंत्रालय ने मौजूदा एफपीओ, 1973 की समीक्षा की पहल की है, जो वैज्ञानिक विकास एवं मांस उत्पाद मानकों के आधुनिकीकरण एवं इन्हें अभिशासित करने वाले नियमों के आधार पर संशोधनों का सुझाव देने पर लक्षित है।
- खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 (एकीकृत खाद्य कानून) को निम्नलिखित के निमित अधिनियमित किया गया है :-
- खाद्य संबंधी कानूनों को समेकित करना
- खाद्य सामग्री के लिए विज्ञान आधारित मानक रखने के लिए भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण स्थापित करना।
- मानव उपभोग के लिए खाद्य मदों की सुरक्षित और पूर्ण रूप से खाद्य की उपलब्धता सुनिश्चित करने की दृष्टि से विनिर्माण, भंडारण, वितरण, बिक्री और आयात को विनियमित करना और
- बेहतर मानक निर्धारण और नियमित पुन: तैनाती द्वारा प्रवर्तन के लिए मूल संरचना, जनशक्ति और परीक्षण सुविधाएं।
यह समेकित खाद्य नियम का लक्ष्य उत्पादित, प्रसंसाधित, बेचे या आयात किए गए खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और सुरक्षा में उपभोक्ता का विश्वास बढ़ाने का है। यह खाद्य नियमों और मानक स्थापित करने एवं इन्हें लागू करने वाले अभिकरणों की बहुगुणकता जैसी समस्याओं से निपटने के लिए हैं, जो उपभोक्ताओं, व्यापारियों, निवेशकों तथा निर्माताओं के बीच भ्रम पैदा करती है।
ऐसे प्रोत्साहनों और उपायों के परिणामस्वरूप उद्योग ने इसके अधिकांश खंडों में तेजी से विकास किया है। कुछ उप-क्षेत्रकों की वृद्धि और विकास को निम्नानुसार स्पष्ट किया जा सकता है।:-
- फल एवं सब्जी प्रसंस्करण क्षेत्र की संस्थापित क्षमता एक जनवरी 1993 को 11.08 लाख टन से बढ़ कर 1 जनवरी 2007 को 24.74 लाख टन और 1 जनवरी 2008 को 26.80 लाख टन हो गई है। प्रसंस्करण के लिए फल और सब्जियों की उपयोगिता कुल उत्पादन का 2.20 प्रतिशत अनुमानित है। विगत कुछ वर्षों की तुलना में खाने के लिए तैयार खाद्य और जमा हुआ फल एवं सब्जी उत्पादों, टमाटर उत्पादों, अचार, सुविधाजनक सब्जी मसाले पेस्ट, प्रसंस्कृत मशरूम और करीदार सब्जियों में सकारात्मक वृद्धि हुई है। वर्ष 2007-08 के दौरान (जनवरी 2008) तक मंत्रालय ने 70 फल और सब्जी प्रसंस्करण इकाइयों को 13.76 करोड़ रु. की वित्तीय सहायता प्रदान की है (पूर्वोत्तर राज्यों, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर तथा उत्तराखण्ड के अलावा) जो दूसरी और तीसरी किस्तों के रूप में दी गई है।
- मांस और मांस प्रसंस्करण क्षेत्रक भारत में मुर्गी का मांस तेजी से बढ़ता पशु आधारित प्रोटीन है। वर्ष 1991-2005 के दौरान 13 प्रतिशत की दर पर 1500 हजार टन का अनुमानित उत्पादन में वृद्धि हो रही है। भारत 500,000 मेट्रिक टन से अधिक मांस का निर्यात करता है जिसमें भैंस के मांस का मुख्य हिस्सा है। भारतीय भैंसों का मांस की इसकी नम्य विशेषता और ऑर्गनिक प्रकृति के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग मजबूत है। इसके निर्यातों में उल्लेखनीय वृद्धि करने की क्षमता है और इसलिए यह खाद्य प्रसंस्करण वर्ग में निर्यातकों के लिए अवसर प्रदान करता है। भारत विश्व में गोजातीय मांस का पांचवां सबसे बड़ा निर्यातक है। तथापि, घरेलू बाजारों के लिए तथा निर्यात बाजार के लिए मांस और मांस खाद्य उत्पादों की प्रसंस्करण के लिए अनिवार्य मूल संरचना का विकास करने के लिए मंत्रालय सहायता अनुदान के रूप में वित्तीय सहायता प्रदान कर रहा है। वर्ष 2007-08 के दौरान (दिसम्बर 2007 तक),इसने मांस और मांस खाद्य उत्पादों क निर्माण के लिए 9 परियोजनाओं को सहायता दी है।
- भारत का दुग्ध उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन/उपभोग का विशिष्ट तरीका है। दुग्ध उत्पादन की दृष्टि से इसका विश्व में पहला स्थान है। लगभग 70 मिलियन ग्रामीण घरों (प्रमुख रूप से छोटे और सीमान्त किसान और भूमिहीन श्रमिक) देश में दुग्ध उत्पादन में लगे हुए हैं। इसका उत्पादन 90 मिलियन टन है जो 4 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। यह मुख्य रूप से दुग्ध उत्पादकों को सहकारिता के रूप में संगठित करने, दुग्ध की प्राप्ति के लिए मूल संरचना का निर्माण करने, प्रसंस्करण और विपणन करने में ऑपरेशन फ्लड कार्यक्रम द्वारा किए गए पहलों तथा डेरी क्षेत्रक की व्यावहार्य आत्म निर्भर संगठित क्षेत्रक के रूप में बदलने के लिए कृषि मंत्रालय और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय द्वारा वित्तीय, तकनीकीय सहायता एवं प्रबंधन अन्तर्निवेश करने के कारण है। भारत में उत्पादित लगभग 35 प्रतिशत दुग्ध प्रसंस्कृत होता है (संगठित क्षेत्रक (बड़े डेरी संयंत्र) वार्षिक रूप से लगभग 13 मिलियन टन का प्रसंस्करण करता है, जबकि असंगठित क्षेत्रक लगभग 22 मिलियन टन का प्रसंस्करण प्रतिवर्ष करता है। संगठित क्षेत्रक में 676 डेरी संयंत्र सहकारिता में हैं, निजी और सरकारी क्षेत्रक में हैं जो भारत सरकार और राज्य सरकारों के साथ पंजीकृत हैं।
- लम्बी तट रेखा पर 8129 किलो मीटर, महाद्वीप शेल्फ क्षेत्रफल के 50600 वर्ग किलोमीटर, विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र के दो मिलियन वर्ग किलोमीटर और ब्रेकिश जल निकाय के 1.2 मिलियन हेक्टेयर से सम्पन्न भारत में एक समृद्ध मत्स्य संसाधन उपलब्ध है। समुद्री उत्पादों के प्रसंस्करण के लिए उल्लेखनीय मूल संरचना सुविधाएं का विकास वर्षों से किया गया हे। वर्तमान में 369 से भी अधिक फ्रीजिंग यूनिट हैं जिनकी प्रतिदिन की प्रसंस्करण क्षमता 10266 टन है जिसमें से 150 यूनिट ईयू को निर्यात करने के लिए अनुमोदित हैं। 499 यूनिट फ्रोजन मत्स्य के उत्पादन में लगे हुए हैं जिनकी कुल भंडारण क्षमता 134767 टन है। इसके अलावा यहां 12 सूरिमी इकाइयां, 5 केनिंग इकाइयां और 471 ऐसी इकाइयां हैं जो पूर्व प्रसंस्करण और सूखी मछली के भंडारण में संलग्न है। वर्ष 2007-08 के दौरान (31 दिसम्बर 2008 तक) 10 समुद्री भोजन प्रसंस्करण इकाइयों को 2.01 करोड़ रु. की सहायता प्रदान की गई है।
- भारत अनाज उत्पादन में आत्म निर्भर है। सभी मुख्य अनाज जैसे कि चावल, गेहूं, मक्का, बारली, छोटे अनाज जैसे ज्वार, बाजरा और रागी का देश में उत्पादन किया जाता है। दाल की मिलिंग और आटे की मिलिंग के क्षेत्र के लिए मंत्रालय द्वारा केन्द्रीत वृद्धि हेतु अनाज प्रसंस्करण उद्योगों को अनुदान के रूप में इनके गठन, विस्तार और आधुनिकीकरण के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। वर्ष 2007-08 के दौरान (दिसम्बर 2007 तक) दाल मिलिंग क्षेत्र में 13 प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं, जिन्हें 222.80 लाख रु. का अनुदान और आटा मिलिंग क्षेत्र में 17 प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं। जिसमें 572.54 लाख रु. शामिल हैं। पुन: भारत विश्व में तेल / वनस्पति उत्पादों का सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है जहां लगभग 15,000 तेल मिले, 600 विलायक निष्कर्षण इकाइयां और 250 वनस्पति इकाइयां हैं। भारतीय तिलहन क्षेत्र में 70,000 करोड़ रु. का घरेलू कारोबार और 16,000 करोड़ रु. का आयात / निर्यात करोबार है। भारत विश्व में वनस्पति तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक भी है, जिसका स्थान यूरोपीय संघ और चीन के बाद आता है।
- उपभोक्ता खाद्य उद्योग में पास्ता, ब्रेड, केक, पेस्ट्री, रस्क, बन, रोल, नूडल्स, कॉर्नफ्लेक्स, चावल के फ्लेक्स, खाने के लिए तैयार और पकाने के लिए तैयार उत्पाद, बिस्किट आदि शामिल हैं। ब्रेड तथा बिस्किट उपभोक्ता खाद्य पदार्थों का सबसे बड़ा खण्ड है। वर्ष 2007-08 के दौरान (10.12.07 तक ), 17.16 करोड़ रु.की राशि उपभोक्ता उद्योगों से संबंधित 93 खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों को वित्तीय सहायता के रूप में प्रदान की गई।
- भारत दुनिया में एल्कोहलिक पेय पदार्थों का सबसे बड़ा बाजार है। स्प्रिट और बियर की मांग लगभग 373 मिलियन केस के आस पास हाती है। यहां 12 संयुक्त उद्यम कंपनियां हैं जिनके पास 33919 किलो लीटर प्रति वर्ष की लाइसेंस प्राप्त क्षमता है और ये अनाज आधारित एल्कोहल युक्त पेय पदार्थों का उत्पादन करती हैं। यहां 56 इकाइयां भारत सरकार के लाइसेंस के तहत बियर का उत्पादन करती हैं। भारत में शराब का उद्योग मूल्यवर्धन तथा कृषि प्रसंस्करण क्षेत्र में रोजगार उत्पादन का अच्छा अवसर प्रदान करता है। मंत्रालय ने विंचूर, नासिक में एक शराब पार्क की स्वीकृति दी है।
इसके अलावा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय ने भारतीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों की वृद्धि के लिए संकल्पना 2015 के विषय में दस्तावेज को अंतिम रूप दिया है, जिसे ''कृषि व्यापार के प्रोत्साहन हेतु समेकित कार्यनीति और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र के लिए संकल्पना, कार्यनीति और कार्य योजना'' के नाम से जाना जाता है और यह इस क्षेत्र की वृद्धि के लिए मंत्रियों के समूह द्वारा की गई सिफारिशों पर आधारित है। इस कार्य नीति का उद्देश्य खराब होने योग्य खाद्य पदार्थों के प्रसंस्करण का स्तर वर्ष 2015 तक 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत करना, मूल्यवर्धन 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 35 प्रतिशत करना और वैश्विक खाद्य व्यापार को 1.6 प्रतिशत से बढ़ाकर 3 प्रतिशत तक करना है। फल और सब्जी के लिए प्रसंस्करण का स्तर क्रमश: 2010 और 2015 तक 2.2 प्रतिशत से बढ़ कर 10 प्रतिशत और 15 प्रतिशत कराना है। कार्यनीतिक हस्तक्षेप का उद्देश्य अभिज्ञात प्रबलन क्षेत्र खाद्य समूहों का विस्तृत मानचित्रण, अभिज्ञात लघु स्तर के उद्योग / बागवानी / मांस / डेयरी / समुदी क्षेत्र में मेगा फूड पार्कों की स्थापना, आपूर्ति श्रृंखला के साथ शीत श्रृंखला प्रक्रिया का विकास और अग्रगामी तथा पश्चगामी सहसंबंधों को सुदृढ़ बनाना, बूचड़ खानों का आधुनिकीकरण, संगठित खाद्य खुदरा बाजार के लिए मूल संरचना का विकास, क्षेत्र के लिए युक्ति संगत कर संरचना आदि तैयार करना है।
इन सभी प्रयासों ने उद्योग को वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्द्धी दौड़ में शामिल किया है। अधिकाधिक लोग मूल्यवर्धित उत्पादों का उपभोग कर रहे हैं। उद्योग के पास बहुत अधिक निर्यात के अवसर हैं और इसकी वृद्धि से कृषि उपज बढ़ाने, उत्पादकता बढ़ाने, रोजगार सृजित करने तथा देश भर में बहुत बड़ी संख्या में लोगों का जीवन स्तर ऊपर उठाने विशेषकर वे जो ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं, द्वारा अर्थव्यवस्था को अपार लाभ पहुंच सकती है। इस प्रकार के खाद्य प्रसंस्करण के विविध क्षेत्रों में असंख्य व्यापार के अवसर विद्यमान हैं।
परन्तु अधिक पैकिंग लागत, ताजा खाद्य के लिए लोगों की सांस्कृतिक अधिमान, कच्ची सामग्रियों का सिर्फ मौसम में उपलब्ध होने, पर्याप्त अवसंरचनात्मक सुविधाओं को अभाव और गुणवत्ता नियंत्रण प्रक्रम के कारण क्षेत्रक का अभी तक दोहन नहीं किया जा सका है। इसके परिणाम स्वरूप इसकी क्षमता को पूर्ण रूप से बढ़ाकर, अधिक प्रोत्साहन प्रदान करके तथा अधिक निवेश और निर्यातों के लिए अनुकूल माहौल बनाने के द्वारा क्षेत्रक को विविधिकृत करने की आवश्यकता है।
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