| स्वास्थ्य हमेशा से देश में उच्च प्राथमिकता का क्षेत्र रहा है। इसे आर्थिक और सामाजिक विकास की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण संघटक माना गया है। इसका तत्पर्य सरलतम रूप से रोगों का अभाव नहीं है बल्कि यह पूर्ण रूप से शारीरिक सामाजिक और सामाजिक खुशहाली की स्थित है। साफ-सफाई और स्वच्छता, पोषण और सुरक्षित पेय जल अच्छे स्वास्थ्य के मूल निर्धारण हैं। संकेतक जैसे शिशु मृत्यु और मातृत्व मृत्यु दर, जीवन जीने की आयु और पोषण का स्तर, जन्म दर और मृत्यु संक्रमक और असंक्रमक रोगों की घटनाओं के साथ अर्थव्यवस्था में स्वास्थ्य की स्थिति को परिलक्षित करता है। समुचित और सुपरिभाषित स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं की मौजूदगी न केवल स्वास्थ्य उत्पादकता कार्य बल और सामान्य कल्याण संवर्धन के लिए महत्वपूर्ण है अपितु जनसंख्या स्थिरीकरण के लक्ष्य को हासिल करने और लोगों का जीवन स्तर बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण है।
वर्षों से भारत ने विशाल स्वास्थ्य अवसंरचना और जनशक्ति का निर्माण किया है जिसके पास व्यापक किस्म के अस्पताल और दवाखाना की स्थापना विभिन्न स्तरों पर की जा रही है और निजी और सरकारी दोनों क्षेत्रकों द्वारा चलाए जा रहे हैं। उनका प्रबंधन योग्यप्राप्त डॉक्टरों और प्रशिक्षित नर्सों के द्वारा किया जाता है। स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं की पहुंच में विस्तार इस क्षेत्र में प्रौद्योगिकीय विकास के साथ जनसंख्या में स्वास्थ्य सूचकांकों में स्थायी सुधार किया है ओर मृत्यु दर में बहुत कमी आई है। भारत सरकार की साझा न्यूनतम कार्यक्रम की अनिवार्यता के तहत स्वास्थ्य एक मुख्य प्रबल क्षेत्र है जिसमें प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में विशेष बल दिया जा रहा है।
भारत में स्वास्थ्य क्षेत्रक का विभाजन केन्द्र औरा राज्यों के बीच बंटा हुआ है। सार्वजनिक स्वास्थ्य, अस्पताल, साफ-सफाई आदि जैसे मदें संविधान की राज्य सूची के अंतर्गत आती हैं जबकि राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक शाखा विस्तार वाली मदें जैसे जनसख्ंया नियंत्रण और परिवार कल्याण, चिकित्सा शिक्षा, खाद्य अपमिश्रण की रोकथाम, औषधियों के विनिर्माण में गुणवत्ता नियंत्रण आदि को समवर्ती सूची में शामिल किया गया है।
केन्द्रीय स्तर पर स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय देश में स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्रक की वृद्धि और विकास के लिए नोडल प्राधिकरण है। यह स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के क्षेत्र में, मुख्य संक्रमण रोगों की रोकथाम और नियंत्रण, पारम्परिक और देशी दवाइयों की पद्धतियों का संवर्धन के क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न कार्यक्रमों क्रियान्वयन के लिए महत्वपूर्ण और जिम्मेदार है। यह राज्यों को मौसमी रोगों के फैलाव और महामारी फैलने से रोकने में वित्तीय और तकनीकी सहायता द्वारा सहायता करता है। मंत्रालय में निम्नलिखित विभाग हैं:- (i) स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग; (ii) आयुर्वेद योग और प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्यापैथी विभाग (आयुश); और (iii) स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग का लक्ष्य प्रभावी और समयबद्ध तरीके से उच्च गुणवत्ता की उमदा स्वास्थ्य देखभाल सेवाएं मुहैया कराना है, संक्रमक और असंक्रमक रोगों के संकट का सामना करना विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में और उन क्षेत्रों में जहां रोगों की घटना अधिक होती है। यह देश में परिवार कल्याण से संबंधित सभी क्रियाकलापों, कार्यक्रमों और नीतियों की देखभाल करता है जिसमें जनसंख्या स्थिरीकरण, माता और बच्चे की देखभाल, परिवार नियोजन के लिए शिक्षा से संबंधित बहुत से उपाय शामिल है। स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय विभाग का संबद्ध कार्याकलय है और चिकित्सा और जनस्वास्थ्य से संबंधित मामलों पर तनीकी सलाह देता है तथा सह विभिन्न स्वास्थ्य योजना के क्रियान्व्यन में शामिल है।
जबकि आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा, सिद्ध और होम्योपैथी भारतीय दवाई पद्धति का संवर्धन और प्रचार करने के लिए नीतियों की डिज़ाइना करना तैयार करना और विदेश दोनों में और क्रियान्वयन करने के लिए जिम्मेदार है। देश में दवाइयों और स्वास्थ्य देखभाल की छह प्रणालियां हैं। ये निम्नलिखित हैं आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध योग, प्राकृतिक चिकित्सा और होम्योपैथी। विभाग के मुख्य लक्ष्य निम्नलिखित हैं :-
- पारम्परिक औषध के क्षेत्र में देश के लिए वैश्विक नेतृत्व प्राप्त करना
- भारतीय औषध पद्धति और देश में होम्योपैथी कॉलेजों में शैक्षिक स्तर का उन्नयन
- भारतीय औषध पद्धति और होम्योपैथी औषध के लिए फार्माकोपाएल मानक विकसित करना
- अच्छे स्वास्थ्य का संवर्धन करना और स्वास्थ्य देखभाल की पहुंच का विस्तार करना
- शिक्षकों और उपचारियों की गुणवत्ता सुधारना
- खरीदने में समर्थ आयुश सेवाएं और औषध सुनिश्चित करना जो सुरक्षित और पर्याप्त हैं
- कच्ची औषध की उपलब्धता सुकर बनाना जो मौलिक हैं और जिनमें अनिवार्य तत्व निहित हैं।
- स्वास्थ्य देखभाल प्रदाय प्रणाली में आयुश कार्यक्रमों को और राष्ट्रीय को एकीकृत करना
- आयुश में पुन: अभिमुखी और अनुसंधान को प्राथमिकता देना
वर्ष 2007 में मंत्रालय के तहत एक नया विभाग ''स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग'' का सृजन किया गया है, जिसके निम्नलिखित कार्य आबंटन हैं :
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मूलभूत, अनुप्रयुक्त और क्लिनिकल अनुसंधान के प्रवर्तन और समन्वय सहित चिकित्सा, स्वास्थ्य, जैव चिकित्सा और चिकित्सा व्यवसाय से संबंधित क्षेत्रों में क्लिनिकल परीक्षण और प्रचालनात्मक अनुसंधान और आधुनिकतम क्षेत्रों एवं इनसे संबंधित सूचना के प्रबंधन में मूल संरचना, जन शक्ति के विकास के माध्यम से शिक्षा;
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चिकित्सा और स्वास्थ्य अनुसंधान में नैतिकता के मुद्दों सहित अनुसंधान शासन मुद्दों पर मार्गदर्शन प्रदान करना और प्रोत्साहन देना;
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चिकित्सा, जैव चिकित्सा और स्वास्थ्य अनुसंधान संबंधी क्षेत्रों में सार्वजनिक निजी भागीदारी का अंतर क्षेत्रीय समन्वय और प्रोत्साहन;
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चिकित्सा और स्वास्थ्य से संबंधित क्षेत्रों में उन्नत प्रशिक्षण सहित भारत और विदेश में इस प्रशिक्षण के लिए अध्येतावृत्ति प्रदान करना;
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चिकित्सा और स्वास्थ्य अनुसंधान में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ भारत और विदेश में संबंधित क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों से संबंधित कार्य;
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महामारियों और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए तकनीकी समर्थन;
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नए और अतिविशिष्ट वाहकों के बड़े स्तर पर फैलने की जांच पड़ताल और इनकी रोकथाम के लिए साधनों का विकास;
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वैज्ञानिक संस्थाओं और संघों, सहायतार्थ तथा धार्मिक एंडोवमेंट से संबंधित चिकित्सा और स्वास्थ्य अनुसंधान क्षेत्र के मामले;
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विभाग को सौंपे गए विषयों से संबंधित क्षेत्रों में केन्द्र और राज्य सरकारों के अधीन संगठनों तथा संस्थानों के बीच समन्वय और चिकित्सा तथा स्वास्थ्य में विशेष अध्ययनों को प्रोत्साहन;
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भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (देश में चिकित्सा अनुसंधान की आयोजना, संगठन, कार्यान्वयन और समन्वय के लिए शीर्ष निकाय)
मंत्रालय ने देश में विभिन्न राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों का क्रियन्वयन किया है अर्थात्:-
- राष्ट्रीय वाहक जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम
- राष्ट्रीय फायलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम
- राष्ट्रीय कोढ़ उन्मूलन कार्यक्रम
- संशोधित राष्ट्री टीबी नियंत्रण कार्यक्रम
- राष्ट्रीय अंधता नियंत्रण कार्यक्रम
- राष्ट्रीय आयोडीन डिफीसीएन्सी डिसोर्डर कंट्रोल कार्यक्रम
- राष्ट्रीय मन: स्वास्थ्य कार्यक्रम
- रष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम
- राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण कार्यक्रम
- सार्वभौमिक इम्यूनाइजेशन कार्यक्रम
- राष्ट्रीय बधिरता निवारण एवं नियंत्रण कार्यक्रम
- मधुमेह, सीवीडी और आघात के निवारण और नियंत्रण पर पायलट कार्यक्रम
- राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण कार्यक्रम
स्वास्थ्य राष्ट्र का निर्माण करने के लिए और इसकी जनता को रोकथाम, संवर्धनात्मक और उपचारात्मक स्वास्थ्य देखभाल सेवाएं देने के लिए मंत्रालय अनेक नीतिगत पहलें और उपाय कर रहा है। सबसे महत्वपूर्ण 2002 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति तैयार करना है जिसका लक्ष्य देश की आम जनसंख्या के बीच अच्छे स्वास्थ्य का स्वीकार्य स्तर हासिल करना है। नीतिगत दस्तावेजों में सभी संक्रमण रोगों को नियंत्रित करने के लिए स्वास्थ्य संबंधी निवेश बढ़ाने के लिए कुछ लक्ष्यों की परिकल्पना की गई है और आम जनता के लाभ के लिए द्वितीयक और तृतीयक स्वास्थ्य देखभाल का विस्तार और सुदृढ़ीकरण करना है। इसमें स्वास्थ्य देखभाल की सभी पहलुएं शामिल हैं और उन्हें बढ़ाने की आवश्यकताओं पर बल देता है अधिक समान स्वास्थ्य देखभाल सेवा राष्ट्रीय स्तर पर सुकर बनाने के लिए जन स्वास्थ्य का पुनर्संगठन की पहलें, जन स्वास्थ्य अवसंरचना का सक्षम परिदाय स्वास्थ्य देखभाल व्यावसायियां की शिक्षा, स्वास्थ्य अनुसंधान, खाद्य और औषधियों के लिए गुणवत्ता मानक का प्रवर्तन; महिला स्वास्थ्य आदि शामिल है:-
- रोग प्रबंधन रक्षा और पूर्ण उपचार, संदर्भित सेवाओं का सुदृढ़ीरण महामारी के लिए तैयार रहना और त्वरित प्रक्रिया
- एकीकृत वेक्टर प्रबंधन (संचरण जोखिम की कमी) चुनिंदा उच्च संभावित क्षेत्रों में आंतरिक अवशिष्ट का छिड़काव, कीटनाशक उपचारित मच्छरदानी का उपयोग, लार्वा खाने वाली मछली का उपयोग, शहरी क्षेत्रों में लार्वा रोधी उपाय जिसमें जैव लार्वा नाशक और लघु पर्यावरणीय इंजीनियरिंग शामिल है।
- सहायक हस्तक्षेप जिसमें व्यावहार परिवर्तन संचार, सरकारी निजी भागीदारी और अन्तर क्षेत्रक मिलन, क्षमता निर्माण के माध्यम से मानव संसाधन विकास, कार्यात्मक अनुसंधान जिसमें औषध प्रतिरोधी और कीटनाशक आदि शामिल है।
इस दिशा में एक अन्य बड़ा कदम वर्ष 2005-12 की अवधि के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) को आरंभ करना है ताकि देश में मूलभूत स्वास्थ्य परिचर्या आपूर्ति प्रणाली में पर्याप्त सुधार लाया जा सके। एनआरएचएम का मुख्य उद्देश्य वहनीय, अधिगम्य, प्रभावी और विश्वसनीय प्राथमिक स्वास्थ्य परिचर्या सुविधाएं प्रदान करना है, जो विशेष रूप से दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों में आबादी के निर्धन और संवदेनशील वर्गों तथा सबसे गरीब घरों तक भी पहुंच सके। इसका लक्ष्य प्रत्यायित सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (आशा) के एक केडर के सृजन द्वारा ग्रामीण स्वास्थ परिचर्या सेवाओं में अंतराल को पाटना, स्वास्थ्य परिचर्या पर सार्वजनिक व्यय को बढ़ाना (वर्तमान सकल घरेलू उत्पाद के 0.9 प्रतिशत को सकल घरेलू उत्पाद के 2-3 प्रतिशत तक ले जाना); स्वास्थ्य मूलसंरचना में क्षेत्रीय असंतुलन को कम करना; कार्यक्रम को जिला स्तर तक विकेन्द्रित करना, ताकि अंतर और अंतरा क्षेत्रीय संकेन्द्रण में सुधार लाया जा सके और संसाधनों के प्रभावी उपयोग को प्रोत्साहन दिया जा सके; प्रबंधन और वित्तीय कार्मिकों को जिला स्वास्थ्य प्रणाली में प्रेरित करना; साथ ही सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों को कार्यात्मक अस्पतालों के रूप में प्रचालित करना ताकि देश के प्रत्येक ब्लॉक में भारतीय जन स्वास्थ्य मानकों को पूरा किया जा सके। इस मिशन के स्थूल लक्ष्य इस प्रकार हैं :-
- शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) और मातृत्व मृत्यु दर (एमएमआर) में कमी।
- जन स्वास्थ्य सेवाओं की सार्वभौमिक पहुंच जैसाकि महिला स्वास्थ्य, बाल स्वास्थ्य जल, साफ-सफाई और स्वच्छता, प्रतिरक्षण और पोषण।
- संचारी और गैर संचारी रोगों की रोकथाम और नियंत्रण स्थानीय रूप से होने वाले रोगों सहित।
- एकीकृता व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल की पहुंच।
- जनसंख्या स्थिरीकरण और जनसांख्यिकीय संतुलन।
- स्थानीय स्वास्थ्य परम्परा और मुख्य धारा आयुश को पुनर्जीवित करना।
- स्वास्थ्य जीवन शैली का संवर्धन।
- मंत्रालय के विद्यमान कार्यक्रमां का क्रियान्वयन।
वर्तमान में पूरे देश में एनआरएचएम प्रचालनरत है, जिसमें उन 18 राज्यों पर विशेष फोकस है, जहां दुर्बल जनस्वास्थ्य सूचकांक और / या मूलसंरचना है। ये 18 राज्य हैं अरुणाचल प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखण्ड, जम्मू और कश्मीर, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, मध्य प्रदेश, नागालैंड, ओडिशा, राजस्थान, सिक्किम, त्रिपुरा, उत्तरांचल और उत्तर प्रदेश। एनआरएचएम को पिछले वर्षों में अपार सफलता मिली है। यहां 5.5 लाख से अधिक आशा या संपर्क कार्यकर्ता घरों को स्वास्थ्य सुविधाओं से जोड़ते हैं। कुल 1.75 लाख ग्राम स्वास्थ्य और स्वच्छता समितियों को कार्यात्मक बनाकर सामुदायिक स्वामित्व और योजना को स्वास्थ्य के क्षेत्र में सक्रिय बनाया गया है। विभिन्न स्तर पर रोगी कल्याण समितियां स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए समेकित कोष और वार्षिक अनुरक्षण अनुदान की संरक्षक बन गई हैं।
शहरी निर्धनों की स्वास्थ्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन पर एक मिशन दस्तावेज जनवरी 2008 में अनुमोदित किया गया है। प्रस्तावित मिशन का लक्ष्य 1.0 लाख और इससे अधिक आबादी वाले 429 शहरों में शहरी उपेक्षित निर्धनों की प्राथमिक स्वास्थ्य आवश्यकताओं को संबोधित करना है। इसे वर्ष 2008-09 से आरंभ करते हुए प्रथम वर्ष में 100 शहरों में आरंभ किया जाना है तथा यह ग्रामीण क्षेत्रों में एनआरएचएन द्वारा की गई गतिविधियों की पूर्ति करेगा। कार्यक्रम के लक्ष्य मौजूदा सार्वजनिक प्रणालियों को युक्तिसंगत बनाने, पहुंच के विस्तार के लिए सार्वजनिक - निजी भागीदारी और सामुदाय आधारित स्वास्थ्य बीमा उपायों के जरिए प्राप्त किए जाएंगे।
इसके अतिरिक्त मंत्रालय समय-समय पर सर्वेक्षण करता आया है जैसे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेखण (एनएफएचएस) और जिला स्तरीय घर सर्वेक्षण (डीएलएचएस) ताकि इसके विभिन्न स्वास्थ्य और कल्याणकारी कार्यक्रमों के प्रभाव का मूल्यांकन किया जा सके। उदाहरण के लिए एनएफएचएस बड़े पैमाने का बहुल चक्र सर्वेक्षण है जो पूरे भारत में घर के प्रतिनिधि सैम्पल में किया जाता है। यह भारत के लिए उर्वरता, शिशु और बाल मृत्यु, परिवार, नियोजन का प्रचालन, मातृत्व और बाल स्वास्थ्य, प्रजनन स्वास्थ्य, पोषण, एनेमिया, परिवार नियोजन सेवाओं का उपयोग और स्वास्थ्य की गुणवत्ता के लिए राज्य और राष्ट्रीय सूचना मुहैया कराता है। अब तक तीन बार सर्वेक्षण किया गया है ताकि भारत में व्यापक जनसांख्यिकीय आंकड़ाधार का सृजन किया जा सके। एनएफएचएस का प्रत्येक अनुवर्ती चक्र के दो विशिष्ट लक्ष्य हैं :-
- नीति और कार्यक्रम के प्रयोजन से मंत्रालय और एजेंसियों के लिए अपेक्षित स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर अनिवार्य आंकड़ा मुहैया कराना और
- महत्वपूर्ण उभरते स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मुद्दों संबंधी सूचना प्रदान करना।
प्रथम एनएचएफएस (एनएफएचएस-1) का आयोजन वर्ष 1992-93 के दौरान किया गया था, जिसके बाद 1998-99 के दौरान जिसके दौरान एनएचएफएस-2 का आयोजन किया गया तथा 2005-06 के दौरान एनएचएफएस-3 का आयोजन मंत्रालय द्वारा नोडल एजेंसी के रूप में इंटरनेशल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज (आईआईपीएस), मुम्बई के साथ आयोजित किया जा रहा है। इसमें न केवल मां और बच्चे के स्वास्थ्य, परिवार नियोजन, टीकाकरण, उर्वरता और बाल मृत्युदर जैसे पक्षों को शामिल किया जाता है बल्कि इससे अनेक नए उभरने वाले मुद्दों पर भी जानकारी दी जाती है, जिनमें शामिल है -
- प्रसव पूर्व मृत्यु, परिवार कल्याण में पुरुषों का शामिल होना, किशोर प्रजनन स्वास्थ्य, उच्च जोखिम वाले यौन आचरण, परिवारिक जीवन की शिक्षा, सुरक्षित इंजेक्शन ट्यूबर क्योबोसिस और मलेरिया
- आठ शहरों (चेन्नई, दिल्ली, हैदराबाद, इंदौर, कोलकाता, मेरठ, मुम्बई और नागपरु) में स्लम में रहने वालों और गैर स्लम निवासियों के बीच परिवार कल्याण और स्वास्थ्य की स्थिति
- राष्ट्रीय स्तर पर वयस्क महिलाओं और पुरुषों के लिए एचआईवी प्रचार और छह में से प्रत्येक एचआईवी प्रचारित राज्य अर्थात आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महराष्ट्र, मणिपुर, नागालैंड और तमिलनाडु के लिए।
सभी 29 राज्यों में सर्वेक्षण किया गया है और प्रत्येक राज्य के लिए मुख्य मेट्रोपोलिटन क्षेत्रों हेतु और चुनिंदा शहरों में स्लम और गैर स्लम क्षेत्रों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सर्वेक्षण संकेतकों का अनुमान लगाया गया है।
मंत्रालय ने आयुश के क्षेत्र में विनियामक और विकास क्रियाकलाप करने के लिए एक व्यापक संस्थागत ढांचा भी विकसित किया है:-
- विनियामक ढांचा में दो सांविधिक निकाय हैं अर्थात केन्द्री भारतीय औषध परिषद (आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी के लिए) और केन्द्रीय होम्योपैथी परिषद (सीसीएच) जो शिक्षा का न्यूनतम स्तर निर्धारित करने के लिए चिकित्सा योग्यता की मान्यता की सिफारिश करने, व्यावसायियों का पंजीकरण और नैतिक संहिता निर्धारित करने के लिए हैं।
- अनेक राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान जैसे कि राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान, जयपुर, राष्ट्रीय होमियोपैथी संस्थान, कोलकाता, राष्ट्रीय प्राकृतिक विज्ञान संस्थान, पुणे, राष्ट्रीय यूनानी पद्धति चिकित्सा संस्थान, बैंगलोर, राष्ट्रीय मोरारजी देसाई योग संस्थान, दिल्ली, राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ, नई दिल्ली है। इन संस्थानों का लक्ष्य शिक्षा के उच्च स्तर का नियमन और विकास, भारतीय आयुर्विज्ञान प्रणालियों के सभी पक्षों का शिक्षण, प्रशिक्षण और अनुसंधान करना है।
- आयुष विभाग दो शीर्ष प्रयोगशालाओं का प्रचालन करता है, जिनके नाम हैं फार्माकोपियल लैबोरेटरी फॉर इंडियन मेडीसिन (पीएलआईएम) और होमियोपैथिक फार्माकोपिया प्रयोगशाला (एचपीएल), ये दोनों गाजियाबाद में स्थित हैं तथा आयुर्विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान कार्य करती हैं।
- इंडियन मेडिसीन फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईएमपीसीएल) विभाग के अंतर्गत सार्वजनिक क्षेत्र का एक उपक्रम क्लासीकल आयुर्वेद और यूनानी औषध का निर्माण करता है।
- द नेशनल मेडिसीनल प्लैंट बोर्ड औषधीय पौधों से संबंधित सभी मामलों का समन्वयन करता है, जिसमें संरक्षण, नियमित कटाई, किफायती उत्पादन, अनुसंधान और विकास, प्रक्रियान्वयन, और इस क्षेत्रक की रक्षा करने, इसका विकास करने और बनाए रखने के लिए कच्ची सामग्री का विपणन के लिए नीतियां और कार्य योजना बनान शामिल हैं। इसके मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं :-
- देश के भीतर और विदेशों दोनों में औषधीय पौधों से संबंधित मांग/आपूर्ति की स्थिति का मूल्यांकन
- औषधीय पौधों के विकास से संबंधित योजनाओं और कार्यक्रमों से संबंधित नीतिगत मामलों के संबंध में मंत्रालयों/विभागों/संगठनों/राज्य/संघ राज्य क्षेत्र की सरकारों को
सुझाव देना।
- औषधीय पौधों की पहचान, वस्तु सूचीकरण और प्रमात्राकरण
- औषधीय पौधों का एक्स सीटू/इन-सीटू संवर्धन
- संग्राहकों और उत्पादकों के बीच सहकारिता प्रयासों का संवर्धन तथा उनको अपने उत्पादों का भंडारण, परिवहन और प्रभावी विपणन करने में सहायता देना।
- वैज्ञानिक, प्रौद्योगिकीय और किफायती अध्ययन करना एवं प्रदान करना
- इससे संबंधित पेटेंट अधिकारों की रक्षा और बौद्धिक सम्पदा अधिकारों यदि की रक्षा प्रोत्साहित करना।
- एक औषध नियंत्रण कक्ष है जो औषध के लाइसेंसिंग और विनियमन और गलत तरीके से ब्रांडेड/अपमिश्रित और नकली आयुर्वेदिक, यूनानी और सिद्ध औषधियों एवं अन्य संबंधित मामलों पर कार्य करता है। यह पारस्परिक ज्ञान अंकीय पुरस्तकालय (टीकेडीएल) और बौद्धिक सम्पदा के अधिकारों से संबंधित मामलों पर भी कार्य करता है।
- चार अनुसंधान परिषद हैं नामत :-
- केन्द्रीय आयुर्वेद और सिद्ध अनुसंधान परिषद (सीसीआरएस)
- केन्द्रीय यूनानी औषध अनुसंधान परिषद (सीआरयूएम)
- केन्द्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद (सीसीआरएच) और
- केन्द्रीय योग और प्राकृतिक चिकित्सा अनुसंधान परिषद (सीसीआरवाईएन)
ये परिषदें संबंधित औषध प्रणालियों में अनुसंधान के लिए शीर्ष निकाय हैं और इनका पूर्णरूपेण वित्तपोषण भारत सरकार द्वारा किया जाता है। ये संबंधित प्रणालियों के विभिन्न क्षेत्रों में मूलभूत और सहबद्ध दोनों में वैज्ञानिक अनुसंधान के मार्गदर्शन, विकास और समन्वयन जैसे पहलें जारी रखते हैं। उनकी अनुसंधान क्रियाकलापों की यह सुनिश्चित करने के लिए समीक्षा की गई है कि वे विनिर्दिष्ट समय अवधि के भीतर अर्थपूर्ण अनुसंधान करते हैं वह भी निर्धारित मानदंडों के अधीन और शिक्षा विदों, अनुसंधानकर्ताओं शरीर शात्रियों, विनिर्माताओं और आम जनता के लाभ के लिए अनुसंधान के निष्कर्षों का प्रचार करे हैं।
इन उपायों के परिणाम स्वरूप भारत में कच्ची मृत्युदर, कच्ची जन्मदर, संपूर्ण उर्वरता दर और शिशु मृत्युदर में गिरावट के प्रति एक प्रभावशाली जनांकिकी संक्रमण अर्जित किया है। उपलब्ध सूचना के अनुसार कच्ची जन्म दर 1951 में प्रति हजार आबादी पर 40.8 जन्म से गिरकर 1991 में 29.5 और पुन: 2006 में 23.5 हो गई है। इसी प्रकार कच्ची मृत्यु दर में तेजी से आई गिरावट के परिणाम स्वरूप यह आंकड़ा 1951 में प्रति हजार आबादी 25.1 मृत्यु से घट कर 1991 में 9.8 और पुन: 2006 में 7.5 हो गया है। कुल उर्वरता दर (बच्चों की औसत संख्या जो 15-40 वर्ष की आयु की महिलाओं द्वारा पैदा किए जाते हैं) 1981 में 6.0 से घट कर 2005 में 2.9 रह गई है। मातृ मृत्युदर भी 1992-93 में प्रति लाख जीवित जन्म 437 से घटकर 2001-03 में 301 हो गई है। शिशु मृत्यु दर, जो 1981 में 110 थी, 2006 में प्रति हजार जीवित जन्म 57 हो गई है। जबकि बाल मृत्यु दर 1972 में 57.3 से घटकर 2005 में 17.3 रह गई है। जहां तक परिवार नियोजन का संबंध है, वर्ष 2002-04 में आयोजित जिला स्तरीय घरेलू सर्वेक्षण (डीएलएचएस) से पता लगता है कि 45.7 प्रतिशत पात्र दम्पत्ति वर्तमान में परिवार नियोजन की किसी एक विधि का उपयोग करते हैं जबकि 1981 में यह संख्या 22.8 प्रतिशत थी। वर्ष 2006-07 के दौरान देश में नामांकित विभिन्न परिवार नियोजन की विधियों को स्वीकार करने वाले व्यक्तियों की कुल संख्या 46.19 मिलियन थी। दिनांक 1.4.07 के अनुसार पूरे देश में लगभग 7.25 पंजीकृत प्रेक्टिशनर, 3204 अस्पताल और 21437 आयुष डिस्पेंसरियां थीं। परन्तु चूंकि भारत में एक मुख्य सामाजिक सेवा क्षेत्र स्वास्थ्य है अत: देश में स्वास्थ्य परिचर्या आपूर्ति प्रणाली में सुधार लाने के लिए और अधिक प्रयासों तथा प्रोत्साहनों की जरूरत है ताकि लोगों के सामान्य जन कल्याण को प्रोत्साहन दिया जा सके।
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