| छोटे इंजीनियरिंग उद्योग राष्ट्र के समग्र औद्योगिक विकास के लिए सबसे बड़ा वर्ग है। यह मध्यस्थ यूनिट हैं जिसकी मांग विभिन्न प्रकार के अन्त प्रयोक्ता उद्योगों पर निर्भर करती है जैसाकि विद्युत, खनन, तेल और गैस, उपभोक्ता चीजें ऑटोमोटिव और सामान्य विनिर्माण क्षेत्रक/दूसरे शब्दों में इस उद्योग के अंतर्गत शामिल उत्पाद का उपयोग मुख्यत: पूंजी माल / भारी इंजीनियरिंग उद्योग के निवेश के रूप में किया जाता है। बहुत अधिक श्रमोन्मुखी होने के कारण अर्थव्यवस्था में छोटे इंजीनियरिंग उद्योग अपार रोजगार में अवसर सृजित करता है। विशेषकर उस क्षेत्र में जहां कुशल और अर्ध कुशल श्रम की आपूर्ति की भरमार है।
भारत का सुदृढ़ इंजीनियरिंग और पूंजी माल का आधार है। यह छोटे इंजीनियरिंग माल का मुख्य निर्यातक है जिसमें विस्तृत पैमाने के मद शामिल हैं जैसाकि फोर्जिंग फास्टनर्स, बेयरिंग्स, इस्पात के पाइप और ट्यूब, डायग्नोस्टिक चिकित्सा उपकरण आदि। सुविकसित और सुदृढ़ छोटे इंजीनियरिंग क्षेत्रक की उपस्थिति भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत अधिक महत्वपूर्ण है और यह देश में लगभग सभी उत्पादकता और व्यापार क्रियाकलापों का आधार है। भारतीय हल्के अभियांत्रिकी उद्योग का आकलन लगभग 7 बिलियन अमेरिकी डॉलर किया गया है। इस उद्योग के प्रमुख आपूर्तिकार ऐसी कंपनियां हैं जो उन्हें कच्ची सामग्रियां जैसे इस्पात, एल्युमिनियम आदि की आपूर्ति करते हैं।
भारत में, औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अधीन छोटे इंजीनियरिंग उद्योग के विकास के लिए एक नोडल एजेंसी है अर्थात उनकी प्रगति पर नियमित अंतराल में निगरानी करता है और अपेक्षानुसार संगत नीतिगत प्रोत्साहनों का सुझाव देता है। विभाग सामान्य रूप से सम्पूर्ण औद्योगिक क्षेत्रक के विकास के लिए और विशेष रूप से कुछ चुनिंदा उद्योग जैसे छोटे इंजीनियरिंग उद्योग, चमड़ा, रबर, छोटे मशीन टूल्स आदि के लिए संवर्धनात्मक और विकासात्मक उपायों को तैयार करने और क्रियान्वयन करने के लिए जिम्मेदार है। यह समग्र औद्योगिक नीति और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश नीति के निर्माण और प्रवर्तन तथा देश में एफडीआई अन्तर्वाह का संवर्धन करने में लगा हुआ है। यह भारत में निवेश माहौल और अवसरों के बारे में सूचना का प्रचार-प्रसार करने और संभावित निवेशकों को विभिन्न नीतियों और प्रक्रियाओं के बारे में सुझाव देकर निवेश संवर्धन में सक्रिय भूमिका निभाता है।
छोट इंजीनियरिंग विविधीकृत उद्योग है जिसके असंख्य विशिष्ट उप-क्षेत्रक हैं :-
- रोलर बेयरिंग उद्योग :- बेयरिंग का उपयोग गतिशील पुर्जों के बीच घर्षण कम करने में होता है और लगभग सभी मशीनों में और क्षेत्रकों के बीच इसका अनुप्रयोग किया जाता है जैसे कि ऑटोमोबाइल्स, इलेक्ट्रिक मोटर, डीजल इंजन, औद्योगिक मशीनरी और मशीन टूल्स आदि। उनमें सामान्यत: आंतरिक रिंग, बाहय रिंग, रोलिंग तत्व, केज और सील होते हैं और सामान्यत: दो आकृतियों में होते हैं अर्थात बॉल या रोलर। बॉल बेयरिंग उद्योग का सबसे बड़ा वर्ग है और मात्रा की दृष्टि से यह कुल बाजार के आकार के लगभग आधे भाग का योगदान करता है। रोल चार मूल शैली में होते हैं अर्थात बेलनाकार, सूई, टेपर्ड और गोलाकार। ऑटोमोबाइल क्षेत्रक उद्योग की 35 प्रतिशत है, उद्योग का शेयर 12 प्रतिशत हैं बाजार (प्रतिस्थापन) के बाद शेयर 40 प्रतिशत और शेष 13 प्रतिशत खपत अन्य उद्योगों द्वारा होता है। वर्ष 2006-07 के लिए बॉल तथा रोलर बियरिंग के अनुमानित आयात और निर्यात आंकड़े क्रमश: 835.3 करोड़ रु. और 1920.6 करोड़ रु. थे। जबकि इसी वर्ष के दौरान बॉल और रोलर बियरिंग का उत्पादन क्रमश: 327.9 मिलियन था। वर्ष 2007-08 के दौरान (दिसम्बर 2007 तक) यह 218.87 मिलियन नग रिपोर्ट किया गया था। जबकि बियरिंग उद्योग का लाइसेंस हटा दिया गया है और अब यह स्वचालित मार्ग के तहत शत प्रतिशत एफडीआई की पात्रता रखता है।
- वेल्डिंग उपकरण और उपभोज्य :- पारम्परिक रूप से वेल्डिंग को विनिर्माण के साधन के रूप में उपयोग किया गया है। परन्तु कुछ वर्षों से इसे क्लेडिंग, हार्ड सर्फेसिंग, कटिंग में प्रभावी रूप से उपयोग किया जाता है और पुरानी मशीनरी तथा उपकरणों के रखरखाव और सुधार के अनेक अनुप्रयोगों में इनका इस्तेमाल किया जाता है। उद्योग की मांग ऑटो मोबाइल, इस्पात और भारी अभियांत्रिकी क्षेत्र पर निर्भर करती है। संगठित क्षेत्र में स्वचालित और अर्ध स्वचालित वेल्डिंग उपकरणों एवं उच्चतर अंत इलेक्ट्रोड की उपस्थिति प्रभुत्वकारी है जबकि असंगठित क्षेत्र में मुख्यत: हाथ से की जाने वाली धातु आर्क वेल्डिंग उपकरण और अल्प अंत इलेक्ट्रोड खण्ड में कार्य किया जाता है।
- चिकित्सा उपकरण और उपभोज्य:- यह उद्योग देश के स्वास्थ्य देखभाल प्रदाय प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। अर्थव्यवस्था के उदारीकरण और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के साथ चिकित्सा सर्जिकल उपस्करों की मांग स्थायी रूप से बढ़ी है। इसने देशी उत्पादन और निर्यात में वृद्धि त्वरित किया है। वर्तमान समय की स्वास्थ्य देखभाल पूर्ण रूप से इलेक्ट्रो चिकित्सा उपकरणों पर आधारित हो गया है और ये चिकित्सा व्यावसायियों के लिए अपरिहार्य बन गए हैं विशेषकर निदान, उपचार और रोगी की निगरानी और स्वास्थ्य देखभाल के लिए। देशी विनिर्माता वर्तमान में विस्तृत किस्म के इलेक्ट्रो चिकित्सा उपकरण का विनिर्माण करने की स्थिति में आ गए हैं जैसे कि इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफ मशीन, एक्स-रे स्कैनर, सीटी स्कैन, शॉर्ट वेव फिजियोथेरेपी यूनिट, इलेक्ट्रो सर्जिकल यूनिट, ब्लड रसायन विश्लेषक आदि। तथापि, जटिल उपस्कर जैसाकि नाभिकीय चुम्बकीय रेसोनेंस स्कैनर मल्टी चैनल मॉनीटर आदि का उत्पादन वर्तमान में देश में नहीं किया जा रहा है। अधिकांश चिकित्सा उपकरण विनिर्माता यूनिट लघु औद्योगिक क्षेत्रक में हैं। वर्ष 2005-06 के लिए गैर एसएसआई क्षेत्र में उत्पादन 301.5 करोड़ रु. है। वर्ष 2007-08 (दिसम्बर 2007 तक) के दौरान उत्पादन 245.60 करोड़ था।
- लौह कास्टिंग :- यह उद्योग विश्व में सबसे बड़ा है। इंजीनियरिंग उद्योगों की वृद्धि और विकास के लिए महत्वपूर्ण है चूंकि यह ऑटोमोबाइल, औद्योगिक मशीनों, विद्युत संयंत्रों रसायन और उर्वरक, सीमेंट संयंत्र आदि के लिए अनिवार्य मध्यस्थ का गठन करता है। इन कास्टिंग के व्यापक दायरे पर इंजीनियरिंग अनुप्रयोग के मद्देनजर और निर्यात की अधिक क्षमता को देखते हुए अतिरिक्त क्षमता की स्थापना करने के लिए उल्लेखनीय संभावना है विशेषकर उच्च अंत अनुप्रयोगों के लिए। वर्ष 2006-07 के लिए ढलाई उद्योग के अनुमानित निर्यात एवं आयात आंकड़े क्रमश: 1978.6 करोड़ रु. और 47.5 करोड़ रु. थे। इसी वर्ष के दौरान संगठित क्षेत्र में इस्पात की ढलाई और सीआई ढलाई का उत्पादन 7.79 लाख टन था। वर्ष 2007-08 (दिसम्बर 2007 तक) के दौरान यह 5.72 लाख टन बताया गया था। उद्योग से लाइसेंस हटा दिया गया है और यहां 100 प्रतिशत एफडीआई तक स्वत: अनुमोदन अर्हक है।
- प्रक्रिया नियंत्रण उपकरण :- इस उद्योग में भौतिक रसायन और जैव वैज्ञानिक विशेषताओं की निगरानी के लिए अपेक्षित व्यापक दायरे के उपकरण और प्रणालियां शामिल हैं। उच्च लागत, बड़े और जटिल प्रक्रिया वाले उद्योगों जैसे उर्वरक, इस्पात, विद्युत संयंत्र, शोधक, पेट्रो रसायन सीमेंट और अन्य प्रक्रियान्वयन उद्योगों में उनका महत्व उल्लेखनीय है। उनकी आवश्यकता प्रक्रिया मानदंडों की माप और नियंत्रण के लिए होती है जैसे दबाव, तापमान, आर्द्रता, स्तर, प्रवाह आदि में उद्योग के विभिन्न क्षेत्रों में होती है। प्रक्रियान्वयन नियंत्रण प्रणाली की वर्तमान प्रौद्योगिकी माइक्रो प्रोसेसर आधारित केंद्रीयकृत नियंत्रण प्रणाली है। भावी प्रौद्योगिकी उपस्करों में सेंसिंग और प्रतिक्रिया समय में कमी करने और बेहतर ऑटोमेशन नियंत्रण के लिए है अर्थात हस्त्य हस्तक्षेप के बिना। वर्ष 2005-06 के लिए गैर एसएसआई क्षेत्रक में उत्पादन 232.8 करोड़ रुपए दर्ज किया गया। 108 करोड़ रुपए का निर्यात लगभग 836.9 करोड़ रुपए के आयात की तुलना में 2005-06 के दौरान किया गया। उद्योग से लाइसेंस समाप्त कर दिया गया है और यह 100 एफडीआई स्वत: मार्ग के अधीन का अर्हक है।
- जोड़ रहित इस्पात पाइप और ट्यूब :- वे अब आकार में होते हैं पतले, छोटे, सटीक पतला और अन्य विशेष पाइप तथा वे अलग-अलग रूप के होते हैं जैसाकि होट रोल्ड कोल्ड ड्राउन, मुड़ा हुआ, रोटो रोल्ड आदि। उनका अनुप्रयोग वायुयान, मिसाइल नाभिकीय विद्युत संयंत्र और घर्षण रोधी बेयरिंग आदि में होता है। अल्ट्रा उच्च क्षमता और क्षय रोधी विशेषता इन्हें तेल और गैस उद्योग के लिए पूर्ण बनाते हैं, वाष्प बॉयलर, रसायन और अन्य प्रक्रियान्वयन उद्योग, पाइप लाइन, उच्च और सुपर महत्वपूर्ण वाष्प परिस्थिति में संस्थापन आदि के लिए उपयुक्त बनाते हैं। तेल क्षेत्रक सीमा पाइप की कुल आवश्यकता का 60 प्रतिशत का योगदान करता है। बेयरिंग्स और बॉयलर क्षेत्रक लगभग 30 प्रतिशत मांग के लिए योगदान करता हैं। उद्योग 14 इंच बाहय परिधि का ट्यूब का विनिर्माण करने की क्षमता रखता है। विद्युत क्षेत्रक में होने वाले स्थायी विकास से और ऑटोमोबाइल क्षेत्रकों से बेयरिंग की मांग बढ़ने से इन दो क्षेत्रकों के पक्ष में मांग पैटर्न परिवर्तित हो सकता है। वर्ष 2006-07 के लिए जोड़ रहित इस्पात पाइपों और ट्यूब के उद्योग के अनुमानित निर्यात और आयात आंकड़े क्रमश: 1192.4 करोड़ रु. और 2646.5 करोड़ रु. थे। उद्योग के लाइसेंस हटा दिया गया है और 100 प्रतिशत तक विदेशी इक्विटी, स्वत: मार्ग के अधीन इस मद के विनिर्माण के लिए अनुमत है।
- वैधुत रोधी वेल्ड इस्पात पाइप और ट्यूब :- वास्तविक प्रयोक्ता ग्राहकों की आवश्यकता पर आधारित ईआरडब्ल्यू इस्पात पाइप और ट्यूब विभिन्न गुणवत्ता के होते हैं, दीवार की विभिन्न मोटाई और तैयार पाइप की परिधि के होते हैं। ईआरडब्ल्यू इस्पात पाइप का विनिर्माण करते समय उच्च गुणवत्ता का निरन्तर कास्ट पूरी तरह भट्ठे में पका हुआ, नियंत्रण-रोल्ड, सूक्ष्म ग्रेन और निम्न कार्बन इस्पात का उपयोग होता है। उच्च निष्पादन वाले ईआरडब्ल्यू इस्पात पाइप और ट्यूब में उच्च क्षय रोधी क्षमता, उच्च विरूपता, उच्च क्षमता और उच्च कठोरता होती है। इन पाइपों का उपयोग घेरा लगाने लाइनिंग पाइप, ऑयल कंट्री टबुलर्स, स्काफोल्डिंग, जल और गैस ले जाने, ढांचागत, इंजीनियरिंग प्रयोजनों आदि में किया गया है। तेल और गैस उद्योगों में अधिक मांग, मूल संरचना और ऑटोमोबाइल उपयोग के कारण ईआरएसडब्ल्यू पाइपों के उत्पादन में बहुत अधिक वृद्धि हुई है। एसएसआई क्षेत्रक में बड़ी संख्या में यूनिट हैं। उद्योग से लाइसेंस हटा दिया गया है और यह 100 प्रतिशत तक एफडीआई के स्वत: अनुमोदन के लिए अर्हक है।
- निमज्जित आर्क वेल्ड पाइप :- दो प्रकार के एसएडब्ल्यू पाइप होते हैं अर्थात देशान्तरीय और कुण्डलीदार वेल्डेड एसएडब्ल्यू पाइप। देशान्तरीय एसएडब्ल्यू पाइप वहां पसंद किया जाता है जहां पाइप की मोटाई 25 मिलीमीटर से अधिक होती है और यह उच्च दाब वाली गैस पाइप लाइन में इसकी तरजीह दी जाती है। जबकि कुण्डलीदार वेल्डेड एसएडब्ल्यू एसएडब्ल्यू पाइपों की लागत देशान्तरीय पाइपों की तुलना में कम होती है। देश में एसएडब्ल्यू पाइपों की कुल संस्थापित क्षमता लगभग 6.5 लाख टन है। तेल और गैस परिवहन एवं पानी के परिवहन के कारण देश में एसएडब्ल्यू पाइपों की मांग बहुत अधिक है। वर्ष 2006-07 के लिए एसएडब्ल्यू पाइप उद्योग के अनुमानित निर्यात और आयात आंकड़े क्रमश: 2903.8 करोड़ रु. और 3844.2 करोड़ रु. थे। इस उद्योग की निर्यात क्षमता बहुत अच्छी है। इसके लाइसेंस समाप्त कर दिया गया है और 100 प्रतिशत तक विदेशी इक्विटी स्वत: मार्ग के अधीन इस मद के विनिर्माण के लिए अनुमत है।
- औद्योगिक फास्टनर :- भारत में फास्टनर उद्योग को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता हैं अर्थात उच्च तनन और हल्के इस्पात फास्टनर जिसमें मुख्य रूप से नट, बोल्ट, स्टड्स रिवेट्स और स्क्रू शामिल हैं। उच्च तनन और विशेष प्रकार के फास्टनर को छोड़कर सभी प्रकार के फास्टनर एसएसआई के लिए आरक्षित हें। हल्के इस्पात फास्टनर मुख्य रूप से असंगठित क्षेत्रकों द्वारा विनिर्मित होते हैं जबकि उच्च तनन फास्टनर के लिए उम्दा प्रौद्योगिकी की आवश्यकता होती है और इस क्षेत्र में संगठित क्षेत्रक की कम्पनियां प्रबल होती हैं। फास्टनर का उपयोग लगभग सभी इंजीनियरिंग और रसायन उद्योगों में किया जाता है। ऑटोमोबाइल उद्योग में कुल मांग का बड़ा हिस्सा जाता है। उपभोक्ता टिकाऊ वस्तु और रेल उच्च तनन फास्टनर के दूसरे मुख्य प्रयोक्ता हैं। वर्ष 2006-07 के लिए औद्योगिक फास्टनर उद्योग के अनुमानित निर्यात और आयात आंकड़े क्रमश: 886.9 करोड़ और 819.5 करोड़ रु. थे। इसी वर्ष के लिए संगठित क्षेत्र में नट और बोल्ट का उत्पादन 90.629 टन रहा है। वर्ष 2007-08 के दौरान (दिसम्बर 2007 तक) यह 66,772 टन बताया गया था। इस क्षेत्रक में और अधिक निर्यात की संभावना है। फास्टनर उद्योग का लाइसेंस समाप्त कर दिया गया है और यह स्वत: मार्ग के अधीन 100 प्रतिशत एफडीआई के लिए अर्हक हैं।
- इस्पात फोर्जिंग उद्योग :- फोर्जिंग दबाव का उपयोग करते हुए धातु की प्लास्टिक अवस्था पर मनचाहा आकृति देने के लिए कार्य का उत्पाद है। धातु को आकृति देना आधुनिक प्रविधि के द्वारा ग्रेन ढांचा को परिष्कृत करता है इसकी अंतनिर्हित क्षमता का विकास करता है, यांत्रिकी विशेषता को सुधारता और ढांचागत समानता का उत्पादन करता है जो छिपे हुए आंतरिक दोषों से मुक्त करता है। फोर्जिंग विभिन्न प्रविधियों के द्वारा उत्पादित होते हैं जिसमें ओपन डाई फोर्जिंग, क्लोज्ड डाई फोर्जिंग और नीयर नेट आकृति/प्रीसीजन फोर्जिंग शामिल हैं। भारतीय फोर्जिंग उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था के विनिर्माण क्षेत्र में प्रमुख योगदान देता है। फोर्जिंग की मांग का मुख्य प्रेरक ऑटोमोबाइल उद्योग है। लगभग कुल फोर्जिंग उत्पादन का 65 प्रतिशत इस क्षेत्रक में प्रयुक्त होता है। अन्य उद्योग जो फोर्जिंग का उपयोग करते हैं, उनमें रेल, रक्षा, तेल की खोज, सीमेंट, इस्पात उद्योग और अन्य इंजीनियरिंग उद्योग शामिल हैं। भारत का फोर्जिंग उद्योग न केवल फोर्जिंग की लगभग समग्र मांग पूरी करता है अपितु यह बहुत बड़ा निर्यातक भी है और भारत के निर्यात में महत्वपूर्ण योगदान देता है। देशी उद्योग में लगभग 10 बड़े यूनिटें हैं इसके बाद बड़ी संख्या में मध्यम, छोटे और बहुत छोटे यूनिट हैं। वर्ष 2006-07 के लिए फोर्जिंग उद्योग के अनुमानित निर्यात और आयात आंकड़े क्रमश: 1123.1 करोड़ और 1533.5 करोड़ रु. थे। इसी वर्ष के लिए संगठित क्षेत्र में स्टाम्पिंग और फोर्जिंग का उत्पादन 4,16,566 टन रहा है। वर्ष 2007-08 के दौरान (दिसम्बर 2007 तक) यह 3,52,662 टन बताया गया था। उद्योग से लाइसेंस समाप्त कर दिया गया है और यह 100 प्रतिशत का एफडीआई स्वत: मार्ग के तहत का अर्हक है।
- साइकिल उद्योग :- भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा साइकिल उत्पादक है। इसने विगत हाल में असंख्य विनिर्माताओं और साइकिल निर्यातकों में अत्यधिक वृद्धि देखी है। आज भारतीय साइकिल विनिर्माण और साइकिल पुर्जें उद्योग स्वीकार है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी गुणवत्ता स्तरों को ख्याति प्राप्त है। अधिकांश साइकिल संघटक और भारत में साइकिल के पुर्जें फ्री व्हील और सिंगल पीस साइकिल हब का विनिर्माण लघु क्षेत्रकों द्वारा किया जाता है। बड़े यूनिटों को साइकिल फ्रेम उनके उपभोग के लिए चेन और रीम का उत्पादन करने की अनुमति है। भारतीय साइकिल, साइकिल के हिस्से पुर्जें और साइकिल के उप-साधनों के निर्यात की उल्लेखनीय संभावना है। वर्ष 2006-07 के लिए बाइसाइकिल के अनुमानित आयात और निर्यात आंकड़े क्रमश: 133.7 करोड़ रु. और 31.7 करोड़ रु. थे। संगठित क्षेत्र में सभी प्रकार की बाइसाइकिलों का कुल उत्पादन 105.98 लाख नग उसी वर्ष के दौरान किया गया। वर्ष 2007-08 के दौरान (दिसम्बर 2007 तक) यह 81.13 लाख नग बताया गया था। उद्योग से लाइसेंस समाप्त कर दिया गया है और यह 100 प्रतिशत के एफडीआई की अनुमति दी गई है।
सरकार द्वारा इन सभी उप-क्षेत्रकों के समग्र विस्तार के लिए की गई पहलें और उपाय, इनमे नए निजी यूनिटों की स्थापना के परिणाम स्वरूप छोटे इंजीनियरिंग उद्योग में अधिक विकास हुआ है। देश में लगभग सभी मुख्य औद्योगिक समूहों में क्षेत्रक के उपयोग की वृद्धि होने तथा मूल संरचना विकास जैसे विद्युत, रेल, सड़क आदि के लिए नई परियोजनाएं आरंभ होने के कारण यह प्रवृत्ति जारी रही है। छोटे इंजीनियरिंग उद्योग विभिन्न तैयार उत्पाद के विनिर्माण और लोगों का जीवन स्तर सुधारने में महत्वपूर्ण है। इसमें देश के विकास की गति त्वरित करने की अपार क्षमता है और इस प्रकार से विश्व भर के निवेशकों के लिए यह असंख्य अवसर प्रदान करता है। |