| राष्ट्र का विकास और सम्पन्नता इसके खनिज संसाधनों की खोज, विकास और प्रबंधन पर निर्भर करता है। खनिज देश के औद्योगिक विकास के लिए महत्वपूर्ण कच्ची सामग्री और मूल्यवान प्राकृतिक संसाधनों का निर्माण करते हैं। प्रतिस्पर्द्धा में वृद्धि विश्व भर में उदारीकरण और वैश्वीकरण के कारण खनिजों के लिए बाजार विविधता और प्रमात्रा दोनों की दृष्टि से विकसित हुए हैं।
खनिज और खनन उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य भाग है भारत में खनिज संसाधनों की भरमार है। देश की त्वरित विकास दर खनन क्षेत्रक की तेजी से वृद्धि की वारंटी देता है जिस पर विनिर्माण क्षेत्रक में अधिकांश मूल उद्योग निर्भर करते हैं। खनिजों को निष्कर्षण और विकास अन्य प्राकृतिक संसाधनों से गहराई से परस्पर जुड़े हुए हैं जैसे भूमि, जल, वायु और जंगल। इसलिए इस मूल्यवान संसाधन का प्रबंधन और इसका अनुकूलतम और मितव्ययिता उपयोग राष्ट्रीय महत्व के विषय हैं।
भारतीय कानून में तीन प्रकार के खनिज रियायतों को मान्यता दी गई है। वे हैं :-
- सर्वेक्षण की अनुमति (आरपी) - क्षेत्रीय, हवाई, भू-भौतिकी या भू-रसायन सर्वेक्षण और भूगर्भ विज्ञानी मैपिंग के द्वारा प्रारंभिक खनिज संभावना के लिए दी जाती है।
- पूर्वेक्षण लाइसेंस (पीएल) - खोज, स्थान निर्धारण और खनिज भंडार प्रमाणित करने के प्रयोजन के लिए कार्य करने के लिए दिया जाता है।
- खनन पट्टा (एमएल) - किसी खनिज की छंटनी करने के लिए कार्य करने के लिए दिया जाता है। खनन क्षेत्रक में मुख्य अवसर अधिशेष वस्तुओं के विकास और उत्पादन में है जैसे कि लौह अयस्क और बॉक्साइट, माइका, पोटाश, कुछ निम्न स्तर के अयस्क, छोटे स्वर्ण भंडारों का खनन, हीरा, प्लेटिनम समूह के धातु और अन्य दुर्लभ धातुओं का खनन आदि।
भारत के संविधान के अंतर्गत खनिज संसाधनों का प्रबंधन केंद्रीय सरकार और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है यह क्रमश: संघ सूची और राज्य सूची की दृष्टि से है। केंद्रीय सरकार राज्य क्षेत्र के अंतर्गत सागर के नीचे या भारत के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र के भीतर खनिजों का मालिक है जबकि राज्य सरकारें संबंधित राज्य की सीमा के भीतर स्थित खनिजों के मालिक होते हैं। केन्द्रीय सरकार राज्य सरकारों के साथ परामर्श करके खनिज प्रशासन में मूल समानता सुनिश्चित करने के लिए तथा खनिज संसाधनों के विकास की गति बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय नीतिगत लक्ष्यों के अनुरूप खान और खनिजों के विनियमन के लिए कानूनी उपाय तैयार करती है।
केंद्रीय स्तर पर 'खान मंत्रालय' खनिजों और खनन क्षेत्रक के सम्पूर्ण विकास और विस्तार के लिए नोडल एजेंसी हैं। यह सभी खनिजों के सर्वेक्षण और खोज के लिए जिम्मेदार हैं (प्राकृतिक गैस, पेट्रोलियम और आण्विक खनिजों को छोड़कर); अलौह धातुओं के खनन और धातु कार्यों के लिए जैसे एल्युमिनियम, ताम्बा, जिंक, सीसा, सोना, निकेल आदि 'खानों और खनिजों के प्रशासन के लिए (विनियमन और विकास) अधिनियम, 1957' सभी खानों और खनिजों के संबंध में (कोयला, प्राकृतिक गैस और पेट्रोलियम को छोड़कर)। वर्तमान में मंत्रालय के दो अधीनस्थ कार्यालय हैं, अर्थात:-
- भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण (जीएसआई), कोलकाता - यह विश्व का एक सबसे बड़ा सर्वेक्षण संगठन है और देश का सबसे बड़ा वैज्ञानिक संगठन। यह मंत्रालय के महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में कार्य करता आ रहा है। यह खनिज संसाधनों तथा उनके विकास और प्रबंधन में योगदान के संबंध में मूल और विशेषीकृत सूचना मुहैया कराता है। यह निरन्तर क्षेत्रक के बारे में आंकड़ों का संग्रहण, संश्लेषण और अध्ययन करते रहता है तथा राष्ट्रीय भू-गर्भ वैज्ञानिक सूचना और जानकारी का परिमार्जन करता है। ऐसा आंकड़ा आधार व्यापक दायरे के वास्तविक प्रयोक्ताओं के लिए सटीकता के मूल स्रोत और विशेषीकृत भू-गर्भ विज्ञानी स्रोत है इसके अंतर्गत सरकारी/अर्ध सरकारी एजेंसियां, बहु-राष्ट्रीय और निजी संगठन जो संसाधनों की खोज, अनुसंधान और शिक्षा आदि में लगे हुए हैं, शामिल हैं।
- भारतीय खान ब्यूरो (आईबीएम), नागपुर - यह देश में खनिज संसाधनों के वैज्ञानिक विकास के संवर्धन में लगा हुआ है। खनिजों का सरंक्षण और खानों में पर्यावरण की रक्षा, कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, आण्विक खनिज और छोटे खनिजों को छोड़कर उनकी रक्षा करता है। यह विनियामक कार्य करता है अर्थात खनिज संरक्षण और विकास नियमावली, 1988 को लागू करना, खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के संगत प्रावधानों को लागू करना, खनिज रियायत नियमावली, 1960 और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 और उनके अधीन बनाए गए नियमों का प्रवर्तन करना। यह खनिज संसाधनों के भू-गर्भ विज्ञानी मूल्यांकन के लिए खनन उद्योग को परामर्शी सेवाएं मुहैया कराता है, खनन परियोजनाओं के लिए तकनीकी व्यवहार्य रिपोर्ट प्रदान करता है इसमें लाभकारी संयंत्र भी शामिल हैं। यह खानों और खनिजों के डाटा बैंक के रूप में कार्य करता है और सांख्यिकीय पत्रिका का प्रकाशन करता है।
मंत्रालय के अधीन सार्वजनिक क्षेत्र प्रतिष्ठान (पीएसयू) इस प्रकार हैं:-
- नेशनल एल्युमिनियम कंपनी लि. (नालको), भुवनेश्वर
- हिन्दुस्तान कॉपर लि., कोलकाता और
- मिनरल एक्सप्लोरेशन कॉर्पोरेशन लि. (एमईसीएल), नागपुर
जबकि ऐसे तीन अनुसंधान संस्थान हैं, जो इस मंत्रालय के स्वायत्त निकाय हैं, जैसे कि:- जवाहर लाल नेहरु एल्युमिनियम रिसर्च डेवलपमेंट एण्ड डिजाइन सेंटर (जेएनएआरडीडीसी), नागपुर; नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ रॉक मेकेनिक्स (एनआईआरएम), कोलार और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ माइनर्स हेल्थ (एनआईएमएच), नागपुर। मंत्रालय का विज्ञान और प्रौद्योगिकी कार्यक्रम भू विज्ञान के विषयों को शामिल करता है, अन्वेषण, खनन और पर्यावरण, बायोलीचिंग, बेनेफिकेशन, रॉक मेकेनिक्स तथा भूमि नियंत्रण और गैर लौह धातु कर्म। वर्तमान वर्ष के दौरान 15 नई परियोजनाएं विचार हेतु प्राप्त की गई है तथा 6 परियोजनाएं जारी हैं।
खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957, (एम एम आर डी अधिनियम) और खान अधिनियम, 1952, उनके अधीन बनाए गए नियमों और विनियमों के साथ भारतीय में खनन क्षेत्रक को नियंत्रित करने वाले मूल कानूनों को निर्माण करते हैं। एम एम डी आर अधिनियम, 1957 पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस को छोड़कर सभी खानों के विनियमन और सब खनिजों के विकास के लिए कानूनी ढांचा निर्धारित करता है। अधिनियम और नियमों के प्रावधानों की समय-समय पर समीक्षा की जाती है और देश में औद्योगिक और सामाजिक-आर्थिक विकास को शासित करने वाली नीतियों के साथ सामंजस्य किया जाता है।
केन्द्रीय सरकार ने आण्विक खनिजों और छोटे खनिजों को छोड़कर खनिजों के संबंध में पूर्वेक्षण लाइसेंस और खनन पट्टा प्रदन करने को विनियमित करने के लिए खनिज रियायत नियमावली 1960 बनाया है। जबकि राज्य सरकारों ने छोटे खनिजों के संबंध में नियमावली बनाया है। केन्द्रीय सरकार में खनिज संरक्षण और विकास नियमावली, 1988 खनिजों के संरक्षण और क्रमबद्ध विकास के लिए बनाया गया है। ये कोयला, आण्विक खनिजों और छोटे खनिजों को छोड़कर सभी खनिजों के लिए प्रयोज्य हैं।
वर्ष 1991 में भारत सरकार द्वारा आरंभ किए गए सुधारों के अनुसरण में मंत्रालय ने वर्ष 1993 में राष्ट्रीय खनिज नीति बनाया है और यह निवेशकों को अनेकानेक प्रोत्साहन और रियायतें प्रान करता है। नीति निजी निवेश को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता को भली-भांति मानती हैं जिसमें विदेशी प्रत्यक्ष निवेश और खनिज क्षेत्रक में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी को आकर्षित करने के लिए शामिल हैं। खनिज नीति के मूल उद्देश्य निम्नलिखित हैं :-
- भूमि और तटीय इलाकों में खनिज सम्पदा के अभिचिन्हांकन के लिए खोज
- राष्ट्रीय और सामरिक बातों को दृष्टिगत करते हुए खनिज संसाधनों का विकास करना और उनकी पर्याप्त आपूर्ति और वर्तमान की आवश्यकताओं और भावी अपेक्षाओं के मद्देनजर सर्वोत्तम उपयोग सुनिश्चित करना।
- देश की आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए खनिज उद्योग के सुचारू एवं निर्विघ्न विकास के लिए आवश्यक संबंध का संवर्धन करना।
- खनिजों में अनुसंधान और विकास का संवर्धन करना।
- खनिज उद्योग की जनशक्ति की आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए मानव संसाधन विकास के लिए उपयुक्त शैक्षिक और प्रशिक्षण सुविधाओं की स्थापना सुनिश्चित करना।
- उपयुक्त रक्षात्मक उपायों के द्वारा वन, पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर खनिज विकास के प्रतिकूल प्रभाव को कम करना।
- देश में खनन के लिए निवेश माहौल सुधारना और
- सभी संबंधित व्यक्ति की सुरक्षा और स्वास्थ्य को अहम मानते हुए खनन कार्य करना सुनिश्चित करना।
राष्ट्रीय खनिज नीति के लक्ष्यों का विस्तार करते हुए एम एम डी आर अधिनियम , 1957 में 1994 और 1999 में दो बार संशोधन किया गया है। खनिज रियायत नियमावली, 1960 (एम सी आर) और खनिज संरक्षण और विकास नियमावली, 1988 (एम सी डी आर), एम एम डी आर अधिनियम, 1957 में भी परिवर्तन किया गया है। संशोधित खनन कानूनों की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं :-
- भारत में पंजीकृत खनन क्षेत्रक कम्पनियों में विदेशी इक्विटी धारिता पर कोई प्रतिबंद नहीं है।
- खनिज रियायत की कार्यवधि की स्थिरता अधिक है चूंकि खनन पट्टे की कम से कम अवधि बीस वर्ष है और अधिकतम अवधि तीस वर्ष है। खनन पट्टे का नवीकरण बीस वर्ष से कम अवधि के लिए किया जा सकता है और अधिकतम (एम एम डी आर अधिनियम) की पहली अनुसूची के भाग ग में विनिर्दिष्ट खनिजों के संबंध में दोबारा बीस वर्ष से कम अवधि के लिए नवीकरण किया जा सकता है। अधिनियम की पहली अनुसूची के भाग क और ख में विर्निदिष्ट खनिजों के संबंध में ऐसा नवीकरण केन्द्रीय सरकार की पूर्व स्वीकृति से दिया जा सकता है। पूर्वेक्षण लाइसेंस की अवधि अब तीन वर्ष के लिए है जिसकी आगे दो वर्ष के लिए नवीकरण करने की संभावना है।
- तेरह खनिज जैसे लौह अयस्क, मैंगनीज अयस्क, क्रोम अयस्क, सल्फर, सोना, हीरा, ताम्बा, सीसा, जिंक, मोलीब्डेनम, टंगस्टन, निकेल और प्लेटिनम समूह के खनिज जो सार्वजनिक क्षेत्रक द्वारा दोहन किए जाने के लिए विशिष्ट रूप से आरक्षित थे उन्हें अब निजी क्षेत्रक द्वारा दोहन करने के लिए खोल दिया गया है।
- वर्ष 1999 के संशोधन के साथ सर्वेक्षण कार्य की अभिकल्पना, जो एक ऐसी अवस्था के रूप में विशिष्ट कार्य है और वास्तविक पूर्वेक्षण कार्य के पहले किया जाता है, आरंभ किया गया था। सर्वेक्षण अनुमति की अवधि तीन वर्ष की है। सर्वेक्षण अनुमति धारक को पूर्वेक्षण लाइसेंस प्रदान करने के लिए अधिमानी अधिकार प्राप्त होता है।
- 1994 में एम एम डी आर अधिनियम, 1957 की पहली अनुसूची में शामिल की गई खनिजो की सूची से पन्द्रह खनिजों को हटा दिया गया था। 1999 में और संशोधन करने के साथ-साथ चूना पत्थर खनिज को पहली अनुसूची से हटा दिया गया था और केन्द्रीय सरकार की अनुमति की आवश्यकता खनन पट्टा, पूर्वेक्षण लाइसेंस और सर्वेक्षण अनुमति जो गैर ईंधन और गैर आण्विक दस खनिजों के संबंध में है, के लिए है। ये खनिज हैं एस्बेस्टस, बॉक्साइट, क्रोम अयस्क, तांबा अयस्क, सोना, लौह अयस्क, सीसा, मैग्नीज अयस्क, बहुमूल्य पत्थर और जिंक।
- राज्य सरकारों को खनिज रियायत देने का अधिकार दिया गया है ऐसे क्षेत्रों के लिए भी जो ठोस और संयुक्त नहीं है। उन्हें दो या अधिक समीपवर्ती खनन पट्टे को मिलाने की भी अनुमति देने का अधिकार दिया गया है।
- खनिज रियायत के अनुप्रयोगों संबंधी निर्णय की सूचना के लिए समय सीमाएं निर्धारित की गई हैं जैसे कि सर्वेक्षण अनुमति के लिए 6 माह, पूर्वेक्षण लाइसेंस के लिए नौ माह और खनन पट्टा के लिए बारह माह आदि।
यह नीतिगत रूपरेखा और इसके परिणामस्वरूप हुए संशोधन ने क्षेत्र को खोला है और घरेलू तथा विदेशी निवेश का प्रवाह बढ़ाया है। खनन क्षेत्र में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) नीति पिछले 2 वर्षों के दौरान धीरे धीरे उदार बनाई गई है। हीरों तथा कीमती पत्थरों के अन्वेषण और खनन के लिए एफडीआई सीमा स्वचालित मार्ग के तहत शत प्रतिशत तक बढ़ाई गई है। साथ ही खनन क्षेत्र में सभी गैर परमाणु और गैर ईंधन खनिजों के लिए एफडीआई अब स्वचालित मार्ग के माध्यम से शत प्रतिशत तक पूरी तरह खोल दिया गया है, जिसमें हीरे तथा कीमती पत्थर शामिल हैं।
सर्वेक्षण परमिट की संकल्पना आरंभ करने के बाद 31.12.2007 तक 3,62,217.322 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल को शामिल करते हुए 263 सर्वेक्षण परमिट प्रदान किए गए है, जिसमें से 56 सर्वेक्षण परमिट वर्ष 2007-2008 के दौरान 76482.58 वर्ग किलो मीटर के लिए प्रदान किए गए थे। वे राज्य जिनके लिए सर्वेक्षण परमिट अनुमोदित किए गए हैं इस प्रकार है राजस्थान (48), आंध्र प्रदेश (47), कर्नाटक (43), छत्तीसगढ़ (29), ओडिशा (24), मध्य प्रदेश (41), उत्तर प्रदेश (14),गुजरात (4), झारखण्ड (3), पश्चिम बंगाल (3), हरियाणा (1), केरल (1), अरुणाचल प्रदेश (1), महाराष्ट्र (3), मणिपुर (1)।
जबकि धातुओं खनिजों के लिए मांग वृद्धि, घरेलू तथा वैश्विक, लगातार कीमतों को आगे बढ़ा रही है। भारत में गैर ईंधन खनिजों के लिए थोक बिक्री मूल्य सूचकांक (आधार वर्ष 1993-94=100) अगस्त 2007 में 429.8 रहा और अगस्त 2006 में इसका संगत सूचकांक 424.5 था। थोक बिक्री मूल्य सूचकांक में शामिल किए गए खनिजों में बॉक्साइट, क्रोमाइट, लौह अयस्क, मेग्नीज़ अयस्क, एज़बेस्टस, बेराइट, डोलोमाइट, फेल्स्पार, फायर क्ले, फ्लोराइट, जिप्सम, केओलिन (चीनी मिट्टी) लाइम्स स्टोन, मेग्नेसाइट, ओकर, फोस्फोराइट, सिलिका रेत, स्टीटाइट और वर्मी कुलाइट हैं। धात्विक खनिजों के लिए थोक बिक्री मूल्य सूचकांक अगस्त 2007 में 622.7 की तुलना में अगस्त 2006 के दौरान 618.2 और खनिजों के लिए अगस्त 2007 में 125.2 और अगस्त 2006 में 118.7 था।
खोज और खनन में तथा उत्पादकता में आने वाले विघ्नों को हटाने के लिए अधिकाधिक निवेश प्रोत्साहित करने के लिए सदस्य, योजना आयोग, श्री अनवारूल होडा की अध्यक्षता में एक 'उच्च स्तरीय समिति' बनाई गई है। इस समिति का लक्ष्य राष्ट्रीय खनिज नीति की समीक्षा करना और एम एम डी आर अधिनियम में संभावित संशोधनों की सिफारिश करना है ताकि बेहतरीन अंतरराष्ट्रीय प्रचालनों के लिए अपनाए गए खनन संहिता के विकास के लिए विश्व अर्थव्यवस्था की वर्तमान अपेक्षाओं के साथ ताल-मेल बनाया जा सके, विलंब कम करने के लिए खनिज रियायत प्रदान करने के लिए प्रक्रियाओं को चुस्त-दुरुस्त करने और सरल बनाने खनन कार्यकलाप आदि के लिए मूल संरचना मजबूत किया जा सके। समिति के अवलोकनार्थ कुछ अन्य निबंधन निम्नलिखित हैं :-
- खनिजों की खोज और दोहन में सरकारी और निजी क्षेत्रक में निवेश की प्रोत्साहन देने के लिए परिवर्तनों का सुझाव देना।
- वन (संरक्षण) अधिनियम 1980 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 के अध्याधीन खनिज की खोज और खनन परियोजनाओं के लिए मंजूरी देने हेतु प्रक्रियाओं की समीक्षा करना उनको त्वरित करने के लिए सुझाव देना।
- भारतीय खनन क्षेत्रक की महत्वपूर्ण आवश्यकताओं को प्राथमिकता देना और इन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए निवेश सुकर बनाने के उपायों की अनुशंसा करना।
- खनिज रियायत प्रदान करना के लिए शर्त के रूप में राज्य के भीतर मूल्य वर्धन करने के लिए खनिज सम्पदा से परिपूर्ण राज्यों की नीतियों के निहितार्थ की जांच करना और इस संबंध में उपयुक्त अनुशंसा करना।
- खनिज क्षेत्रक से राजस्व बढ़ाने के लिए उपायों की जांच करना और
- निवेश प्रवाह प्रेरित करने वाले किसी अन्य मुद्दों की जांच करना और क्षेत्रक में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी को कार्य में लगाना।
इन सभी प्रोत्साहनों और उपायों के परिणाम स्वरूप खजिन उत्पादन का सूचकांक, ईंधन तथा परमाणु खनिजों के अतिरिक्त (आधार वर्ष 1993-94=100) वर्ष 2007-08 के दौरान 170.39 रहने की आशा है जबकि 2006-07 के दौरान इसमें 4.4 प्रतिशत वृद्धि के साथ यह 163.12 रहा। खजिन उत्पादन का कुल मूल्य (परमाणु खनिजों के अलावा) वर्ष 2007-08 के दौरान 99,533.10 करोड़ रु. आकलित किया गया है। इसी वर्ष के दौरान ईंधन खनिज मदों का अनंतिम मूल्य 68,229.40 करोड़ रु. (कुल मूल्य का 69 प्रतिशत), धात्विक खनिजों को 19,755.66 करोड़ रु. (कुल मूल्य का 20 प्रतिशत); और गैर धात्विक खनिजों, (अल्प खनिजों सहित) का मूल्य 11,548.04 करोड़ (कुल मूल्य का 11 प्रतिशत) था।
निर्यात के अनंतिम मूल्य और खनिजों तथा अयस्कों के आयात वर्ष 2006-07 के दौरान क्रमश: 80,912 करोड़ रु. और 3,05,028 करोड़ रु. थे। हीरा (अधिकांशत: कटा हुआ) वर्ष 2006-07 के दौरान निर्यात का प्रमुख मद था, जिसने 59.2 प्रतिशत का योगदान दिया और इसके बाद 21.8 प्रतिशत के योगदान के साथ लौह अयस्क, 5.8 प्रतिशत योगदान के साथ ग्रेनाइट, 2.3 प्रतिशत के योगदान के साथ एल्युमिना, कीमती और अर्ध कीमती पत्थरों से 1.10 प्रतिशत एवं क्रोमाइट का योगदान 0.98 प्रतिश था। भवन और स्मारक के पत्थर, एमरेल्ड, कोयला (लिग्नाइट सहित), संगमरमर और बॉक्साइट अन्य महत्वपूर्ण खनिज थे जिनका निर्यात वर्ष 2006-07 के दौरान किया गया था। जबकि पेट्रोलियम, कच्चा वर्ष 2006-07 के दौरान खनिज आयात का मुख्य घटक था, जिसने आयस्कों और खनिजों के आयात के कुल मूल्य में 69.9 प्रतिशत का योगदान दिया, जिसके बाद हीरा (बिना कटा हुआ) 10.8 प्रतिशत के साथ था। कोयला, कोक, तांबा अयस्क और सांद्रित, रॉक फॉस्फेट, सल्फर और लौह अयस्क दो अन्य महत्वपूर्ण खनिज हैं, जिन्हें इसी वर्ष निर्यात करना आरंभ किया गया।
इस प्रकार से खनिज भारतीय औद्योगिक ढांचा के अभिन्न अंग हैं। वे आधुनिक तकनीकों का उपयोग करते हुए विभिन्न सतही और उप-सतही खनिज भंडारों की खोज और पड़ताल करने के असंख्य अवसर प्रदान करते हैं। वे मूल्य वर्धित उत्पादों के निर्माण के लिए विश्व भर के निवेशकों के लिए उपयोगी हैं। इसलिए खनन की वैज्ञानिक प्रविधियों के जरिए उपलब्ध खनिज संसाधनों का लाभकारी और मितव्ययिता उपयोग करके बेहतर उपयोगिता हासिल करना अति महत्वपूर्ण है। यह भी ध्यान में रखना अनिवार्य है कि देश की वर्तमान और भावी आवश्यकता पर ध्यान दिया जाए और वैश्विक चुनौती का सामना करने के लिए मूल और सामरिक खनिजों की देशी उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सभी संभव कदम उठाए जाएं।
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