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Industry & Services सूक्ष्‍म लघु और मध्‍यम उद्यम
   
 
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सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्यम:
नीतियां और प्रोत्‍साहन
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सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्योग मंत्रालय नीतियों बनाने, कार्यक्रम और योजनाएं तैयार करने, उनका क्रियान्‍वयन और संबंधित समन्‍वयन करने भारत में लघु उद्योगों के संवर्धन और विकास के लिए नोडल मंत्रालय है। मंत्रालय की भूमिका राज्‍यों को लघु क्षेत्रकों के विकास के लिए उनके प्रयासों में बढ़ती उदारीकृत अर्थव्‍यवस्‍था में उनकी प्रतिस्‍पर्द्धा बढ़ाकर सहायता करना है। इसकी सहायता संबद्ध कार्यालय और दो सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों द्वारा की जाती है, अर्थात :-

  • सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्यम - विकास संगठन (एमएसएमई -डीओ) :-विकास आयुक्‍त (सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्यम) के कार्यालय को (जिसे पहले विकास आयुक्‍त (एसएसआई) का कार्यालय भी कहा जाता था) अब इसे सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्यम - विकास संगठन (एमएसएमई -डीओ) कहा जाता है। यह सरकार को देश में सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्यम (एमएसएमई) के लिए नीतियों तथा कार्यक्रमों के निर्धारण, समन्‍वय, कार्यान्‍वयन और निगरानी में सहायता देने वाला शीर्ष निकाय है। एमएसएमई - डीओ द्वारा सामान्‍य सुविधाओं, प्रौद्योगिकी सहायता सेवाओं, विपणन सहायता, उद्यम शीलता विकास सहायता आदि की व्‍यापक परास प्रदान की जाती है।

  • राष्‍ट्रीय लघु उद्योग निगम लिमिटेड (एसएसआईसी) :- इसकी स्‍थापना सरकार द्वारा देश में सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्यमों के विकास का संवर्धन करने, सहायता पोषण करने की दृष्टि से की गई थी उनके प्रचालनों की वाणिज्यिक पहलू पर विशेष बल देना इसका लक्ष्‍य है। यह कच्‍ची सामग्री की अधिप्राप्ति, उत्‍पाद विपणन, क्रेडिट दर निर्धारण, प्रौद्योगिकी प्राप्‍त करने, विकसित प्रबंधन प्रचालनों को अपनाने आदि के क्षेत्रों में एमएसएमई को सहायता करने के लिए अनेक योजना का क्रियान्‍वयन करता है।


  • खादी और ग्राम उद्योग आयोग (केवीआईसी) :- इसकी स्‍थापना रोजगार के अवसर ग्रामीण क्षेत्रों में प्रदान करने के लिए खादी तथा ग्राम उद्योग को प्रोत्‍साहन तथा इसके विकास में संलग्‍न एक संवैधानिक संगठन के रूप में खादी और ग्राम उद्योग आयोग अधिनियम, 1956 के तहत की गई थी।


  • जूट बोर्ड :- यह एक संवैधानिक निकाय है जिसकी स्‍थापना भारत में जूट उद्योग को प्रोत्‍साहन देने एवं इसके विकास के साथ इस उद्योग में कार्यरत कामगारों की रहने की परिस्थितियों में सुधार लाने के लिए जूट उद्योग अधिनियम, 1953 के तहत की गई थी।

उद्यम संबंधी राष्‍ट्रीय आयोग असंगठित क्षेत्रक (एनसीईयूएस) में स्‍थापित किया गया है जिससे कि व्‍यापक दायरे के असंगठित सूक्ष्‍म और लघु उत्‍पादकता यूनिटों की उत्‍पादकता क्षमता को प्रभावित करने वाले मुद्दों का समाधान किया जा सके।

इसके अलावा लघु स्‍तर के क्षेत्र में उद्यम शीलता के विकास के लिए प्रशिक्षण मॉड्यूल के विकास, अनुसंधान करने और परामर्शी सेवाएं प्रदान करने के लिए तीन राष्‍ट्रीय स्‍तर के 'उद्यमशीलता विकास संस्‍थान (ईडीआई)' हैं। इनमें निम्‍नलिखित शामिल हैं :-

“सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्यम विकास (एम एस एम ई डी) अधिनियम, 2006” भारत में प्रथम एकल व्‍यापक विधान है, जिसमें सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्योग शामिल हैं। अधिनियम के अंतर्गत शब्‍द 'मध्‍यम क्षेत्र' और 'सूक्ष्‍म उद्यम' को पहली बार पारिभाषित किया गया है। उद्योग की अभिकल्‍पना 'उद्यम' शब्‍द तक व्‍यापक की गई है। उद्यमों को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है अर्थात विनिर्माण/सामान का उत्‍पादन, जो किसी भी उद्योग के संबंध में हो, में लगे हुए उद्यम, और ऐसे उद्यम जो सेवाएं प्रदान करने/देने में लगे हुए हैं। शब्‍द उद्यम को संयंत्र और मशीनरी/उपकरण (भूमि को भवन को छोड़कर) में निवेश की दृष्टि से पारिभाषित किया गया है। तदनुसार सूक्ष्‍म, लघु और मध्‍यम उद्यम की परिभाषा इस प्रकार है :-

  मशीनरी/उपकरण (भूमि और भवन को छोड़कर) में निवेश
  विनिर्माण उद्यम सेवा उद्यम
सूक्ष्‍म 25 लाख रु. तक 10 लाख रु. तक
लघु 25 लाख से अधिक और 5 करोड़ तक 10 लाख से अधिक और 2 करोड़ तक
मध्‍यम 5 करोड़ रु. से अधिक और 10 करोड़ रु. तक 2 करोड़ रु. से अधिक और. 5 करोड़ रु. तक

लघु उद्यमों की रक्षा करने, सहायता करने और संवर्धन करने और उन्‍हें स्‍व सहायता में सहायता करने के लिए भी सरकारी द्वारा बहुत से रक्षात्‍मक और संवर्धनात्‍मक नीतिगत उपाय किए गए हैं। संवर्धनात्‍मक उपायों में निम्‍नलिखित शामिल हैं :- (i) औद्योगिक विस्‍तार सेवाएं; (ii) ऋण सुविधाओं के संबंध में संस्‍थागत सहायता; (iii) प्रशिक्षण सुविधाओं की व्‍यवस्‍था; (iv) हायर परचेस पर मशीनरी की आपूर्ति; (v) घरेलू विपणन तथा निर्यात के लिए सहायता; (vi) प्रौद्योगिकीय उन्‍नयन के लिए तकनीकी परामर्श और वित्तीय सहायता; आदि।

आरक्षण नीति सरकार की क्षेत्रक के लिए अति महत्‍वपूर्ण नीति हैं। इसके दोहरा लक्ष्‍य हैं लघु क्षेत्रक में उपभोक्‍ता वस्‍तुओं के उत्‍पादन में वृद्धि और लघु उद्योगों की स्‍थापना करने द्वारा रोजगार के अवसरों का विस्‍तार करना। एसएसआई क्षेत्रक में विशिष्‍ट विनिर्माण के लिए मदों का आरक्षण की व्‍यवस्‍था उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 में सांविधिक रूप से की गई है। मदों के आरक्षण के लिए बहुत अधि‍क विचार-विमर्श गुणवत्ता पहले से समझौता किए बिना इनका लघु क्षेत्रक में बनाए जाने की इसकी उपयुक्‍तता और व्‍यावहार्यता है। परन्‍तु क्षेत्रक को प्रौद्योगिकीय उन्‍नयन, निर्यात का संवर्धन और अर्थव्‍यवस्‍था स्‍केल प्रदान करने के‍ लिए मदों का समय-समय पर आरक्षण किया जाता है। आरक्षण के मुद्दे/उत्‍पाद का अनारक्षण की आरक्षण संबंधी सलाहकार समिति द्वारा सतत आधार पर जांच की जाती है जिसका गठन अधिनियम के तहत किया गया है। वर्ष 2006-07 के दौरान लघु उद्योगों में विनिर्माण के लिए 180 मदों से आरक्षण हटा दिया गया है। दिनांक 13 मार्च 2007 को 125 मदों को अनारक्षित किया गया और 8 फरवरी 2009 को 79 अन्‍य मदों को अनारक्षित किया गया। वर्तमान में सूक्ष्‍म और लघु स्‍तर के क्षेत्र में विशिष्‍ट रूप से निर्मित किए जाने वाले मदों की कुल संख्‍या 35 है।

लघु क्षेत्रकों के लिए ऋण की भूमिका को समझते हुए आरंभिक दिनों से ही संकेन्द्रित ऋण नीति लाई गई है। प्राथमिकता क्षेत्रक उधार इसका अति महत्‍वपूर्ण संघटक है। इसके तहत बैंकों को यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि उनके कुल उधार का निश्चित प्रतिशत प्राथमिकता क्षेत्रक को दिए जाएं जिसमें उद्योग शामिल हैं। औद्योगिक व्‍यवस्‍था के भाग के रूप में भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) की स्‍थापना शीर्ष पुन: वित्तपोषण बैंक के रूप में की गई है। सावधि ऋण राज्‍य वित्त निगमों (एसएफसी) और अनुसूचित बैंकों द्वारा प्रदान किया जाता है।

क्षेत्रक के लिए अन्‍य महत्‍वपूर्ण नीतियां निम्‍नलिखित से संबंधित हैं :- (i) उत्‍पाद शुल्‍क; (ii) विदेशी प्रत्‍यक्ष निवेश अनुमोदन; और श्रम कानून

इसके अतिरिक्‍त, निम्‍नलिखित की पहुंच सुकर बनाने के उद्देश्‍य से सरकार द्वारा अनेक योजनाएं और कार्यक्रम चलाए गए हैं :- (i) वित्त संस्‍थानों से पर्याप्‍त ऋण; (ii) प्रौद्योगिकी उन्‍नयन और आधुनिकीकरण के लिए निधियां; (iii) एकीकृत मूल संरचनात्‍मक सुविधाएं; (iv) आधुनिक परीक्षण सुविधाएं और गुणवत्ता प्रमाणन प्रयोगशालाएं; (v) आधुनिक प्रबंधन प्रचालन उद्यमी विकास और उपयुक्‍त प्रशिक्षण सुविधाओं आदि के द्वारा कौशल उन्‍नयन। घोषित योजनाओं में निम्‍नलिखित शामिल हैं :- लघु उद्योग विकास संगठन भी क्षेत्रक के लिए अनेक योजना चलाता है :- राष्‍ट्रीय लघु उद्योग निगम लिमिटेड (एनएसआईसी) योजना लघु उद्योगों के लिए निम्‍न से संबंधित है :-
  • बिल वित्तपोषण
  • कार्यात्‍मक पूंजी वित्तपोषण
  • निर्यात विकास वित्तपोषण
  • उपकरण पट्टा योजना
  • कच्‍ची सामग्री अधिप्राप्ति सहायता
  • विपणन सहायता कार्यक्रम और निर्यात सहायता
  • भंडार खरीद कार्यक्रम
  • एकल बिन्‍दु पंजीकरण योजना और अन्‍य सेवाएं

^ ऊपर

राष्‍ट्रीय असंगठित क्षेत्रक उद्यम आयोग (एन सी ई यू एस)
जूट बोर्ड
खादी और ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी)
सिडबी की मुख्‍य योजनाएं
एस एस आई नीति विवरण
लघु उद्योग और छोटे क्षेत्रक के लिए व्‍यापक नीतिगत पैकेज
लघु क्षेत्रक के लिए राज्‍यों और संघ राज्‍य क्षेत्रों की नीतियां
लघु उद्यम सूचना और संसाधन नेटवर्क (एस ई एन ई टी)
सिडो द्वारा बारम्‍बार पूछे गए प्रश्‍न
 
 
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