स्थावर सम्पदा क्षेत्र में रिहायशी आवासन, वाणिज्यिक कार्यालय खुदरा बिक्री केंद्र, व्यापारिक स्थल जैसे थिएटर, होटल तथा रेस्तरां, औद्योगिक भवन जैसे कारखाने तथा सरकारी भवन शामिल है। इसमें भूमि तथा रिहायशी एवं गैर रिहायशी भवनों का क्रय तथा विकास, शामिल है। स्थावर सम्पदा क्षेत्र के क्रियाकलापों में आवास तथा निर्माण क्षेत्र भी शामिल है।
भारत में रियल एस्टेट और निर्माण का कार्य 16 बिलियन अमेरिकी डॉलर (2006) (राजस्व द्वारा) का उद्योग है। यह एक प्रमुख रोज़गार संचालक है जो कृषि के बाद केवल दूसरे स्थान पर सबसे बड़ा नियोक्ता है। ऐसा पृष्ठ तथा अग्र सम्पर्कों की श्रृंखला के कारण है जो क्षेत्र के अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों के साथ है। किंतु अन्य अधिक एशियाई तथा पश्चिम बाजारों की तुलना के भारतीय स्थावर सम्पदा बाजार की विशिष्टताएं अपेक्षाकृत लद्यु आकार, अच्छे उत्कृष्ट स्थल की निम्नतर उपलब्धता तथा उच्चतर कीतमे हैं।
शहरी भूमि की आपूर्ति को अधिकांशत: राज्य के स्वामित्वाधीन विकास निकाय जैसे दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) तथा आवास बोर्ड नियंत्रित करते हैं जिससे बहुत सीमित स्थान खाली रह जाता है जिसे प्रत्येक शहर में कुछेक प्रमुख प्रतिभागी नियंत्रित करते हैं।
सम्पदा निदेशालय शहरी विकास मंत्रालय, भारत सरकार का एक संबद्ध कार्यालय है। यह दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चेन्नै के महानगरों तथा पांच अन्य शहरों नामत: शिमला, चंडीगढ़, गाजियाबाद, फरीदाबाद तथा नागपुर में भारत सरकार के विभिन्न संगठनों के कार्यालय भवनों तथा साथ ही सरकारी कर्मचारियों के लिए रिहायशी आवास के प्रशासन तथा प्रबंधन के लिए उत्तरदायी है।
सीआरईडीए (भारत के स्थावर सम्पदा विकासकर्ता संघ का परिसंघ) सम्पूर्ण भारत में संगठित स्थावर सम्पदा विकासकर्ताओं/भवन निर्माताओं का शीर्षस्थ निकाय है। 20 राज्यों / शहर के स्तर के संघों, नामत: आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली-एनसीआर, गोवा, गुजरात, झारखण्ड, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल भारत के 18 से अधिक राज्यों में फैले हैं, 3500 से अधिक सदस्य विकासकों के साथ सीआरईडीएआई के सदस्य हैं जो देश में संगठित निजी राज्य / शहरों का 60 प्रतिशत से अधिक बनाते हैं।
स्थावर सम्पदा को शासित करने वाले केंद्रीय कानूनों में निम्न शामिल हैं :-
हालांकि प्रत्येक राज्य की अपनी स्वयं की कानूनी नियामवली है, जो आयोजित विकास को शासित करती है, प्रत्येक राज्य में प्रवृत दो कानून स्टाम्प शुल्क तथा किराया कानून हैं।
इस क्षेत्र ने भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के साथ बर्द्धित महत्व अधिग्रहीत कर लिया है। इस क्षेत्र में घटनाक्रम खुदरा, आतिथ्य, मनोरंजन उद्योगों, आर्थिक सेवाओं तथा सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) समर्थित सेवाओं, इत्यादि में घटनाक्रमों द्वारा तथा विपर्ययेन प्रभावित होते हैं।
स्थावर सम्पदा में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश जनवरी 2002 से अनुमत किया जा रहा है। इससे पहले, केवल अनिवासी भारतीयों तथा विदेशी मूल के व्यक्तियों को ही आवास तथा स्थावर सम्पदा क्षेत्रकों में निवेश करने की अनुमति दी जाती थी। अनिवासी भारतीयों को छोड़कर अन्य विदेशी निवेशकों को केवल एकीकृत टाउनशिप तथा बस्तियों के विकास में किसी पूर्णतया से अथवा स्थानीय भागीदार के साथ किसी संयुक्त उद्यम कम्पनी के माध्यम से निवेश करने की अनुमति दी गई थी।
भारत ने इस क्षेत्र को विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के लिए 2005 में पूर्ण रूपेण खोल दिया। तथापि, बाद में जारी किए गए मानदंडों द्वारा पूर्णतया स्वामित्वाधीन अनुषंगी कम्पनियों के लिए 10 मिलियन डालर का तथा संयुक्त उद्यमों के लिए 5 मिलियन डालर का न्यूनतम पूंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया। इसके अतिरिक्त सरकार द्वारा न्यूनतम क्षेत्र अपेक्षा भी अधिरोपित की गई। वर्तमान में, स्थावर सम्पदा क्षेत्र में विदेशी संस्थागत निवेश (एफआईआई) अनुमत नहीं है।
भारत का स्थावर सम्पदा क्षेत्र में अभूतपूर्व उछाल परिलक्षित हो रहा है। समर्थकारी विनियामक परिवर्तन, उच्च औद्योगिक वृद्धि अपेक्षाकृत सहज वित्तपोषण विकल्प तथा इक्विटी बाजारों में सुस्थिर वृद्धि स्थावर सम्पदा निवेश क्रियाकलाप में उछाल में परिणामी हुई है। इस के साथ मिल कर सरकार द्वारा विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की नीतियों में छूट देने से स्थावर सम्पदा पर आकर्षक निवेश विकल्प बन गई है।