सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्रक पूरे विश्व में विकास संचालक के रूप में माने गए हैं। क्षेत्रक की विशेषताएं हैं निम्न निवेश की आवश्यकताएं, प्रचालनात्मक नम्यता, स्थानवार गतिशीलता और आयात स्थानापन्न। भारत में,
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (एम एस एम ई डी) अधिनियम, 2006 पहला एकल व्यापक विधान है जिसमें सभी तीनों खंडों को शामिल किया गया है :- (i) विनिर्माण उद्यम, उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 की पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी उद्योग से संबंधित विनिर्माण या उत्पादन में लगे हुए हैं। ये संयंत्र और मशीनरी में निवेश की दृष्टि से पारिभाषित किए जाते हैं; (ii) सेवा उद्यम, जो सेवा प्रदान करने या देने में लगे हुए हैं और उपकरणों में निवेश की दृष्टि से पारिभाषित किए जाते हैं।
भारत के पास ऊर्जावान सूक्ष्म और लघु उद्यम क्षेत्रक है जो वर्ष 2004-05 में लगभग 39 प्रतिशत विनिर्माण प्रतिफल और 34 प्रतिशत निर्यात में योगदान देने के द्वारा आर्थिक विकास बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह कृषि के बाद मानव संसाधन का दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता हैं, यह देश के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में लगभग 29.5 मिलियन लोगों को (2005-06) रोजगार प्रदान करता है। नए उद्यम को बढ़ाने की दृष्टि से उनका महत्व विदित है। यह इसलिए क्योंकि अधिकांश उद्यमी अपना व्यापार छोटे यूनिट से शुरू करते हैं जो उन्हें अपनी कौशल और योग्यता बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है, अनुभव प्राप्त करने सामान और सेवाओं में अपने विचारों का नवपरिवर्तन करने और परिवर्तित करने और अंतत: इसे बड़े यूनिट में बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है।
वर्षों से भारत में लघु क्षेत्रक की प्रगति साधारण उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन से बहुत से जटिल और सटीक उत्पादों के विनिर्माण तक हुई है जैसे इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रण सिस्टम, माइक्रोवेव संघटक, इलेक्ट्रो चिकित्सा उपकरण आदि। आर्थिक उदारीकरण और बाजार सुधार की प्रक्रिया ने इन उद्यमों का विस्तार बढ़ते स्तर और घरेलू एवं वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा तक किया है। उनके लिए सृजित महत्वपूर्ण चुनौतियों ने क्षेत्रक के लिए नए तरीके ईजाद किए हैं। इसके परिणाम स्वरूप निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाएं केन्द्रीय और राज्य दोनों स्तरों पर अधिकाधिक क्लस्टर विकास पहलें कर रहे हैं।
कलस्टरों की परिभाषा क्षेत्रक और भौगोलिक उद्यमों की सान्द्रता के रूप में दी जाती है विशेषकर लघु और मध्यम उद्यम जिनके सामने सामान्य अवसर और जोखिम हैं जो बाध्य अर्थव्यवस्थाओं को जन्म देते हैं, विशेषीकृत तकनीकी का पक्ष लेते हैं, प्रशासनिक और वित्तीय सेवाएं, स्थानीय उतपादन का संवर्धन करने के लिए अंतर फार्म सहयोग के विकास के लिए अनुकूल पृष्ठभूमि का सृजन करते हैं। क्लस्टरिंग और नेटवर्किंग ने लघु और मझोल उद्यमों को अपनी प्रतिस्पर्द्धा बढ़ाने मेंसहायता की है। भारत में लगभग 400 एसएमई क्लस्टर और लगभग 2000 अर्टिसन क्लस्टर हैं।
यह अनुमान किया जाता है कि ये क्लस्टर भारत से विनिर्मित निर्यात के 60 प्रतिशत का योगदान देते हैं। लगभग सम्पूर्ण कीमती पत्थर और जवाहरात निर्यात सूरत और मुम्बई के क्लस्टर से होते हैं। कुछ लघु उद्यम क्लस्टर इतने बड़े हैं कि वे चुनिंदा उत्पादों में भारत के कुल उत्पादन प्रतिफल का 90 प्रतिशत योगदान देते हैं। उदाहरण के लिए चेन्नै का क्लस्टर, आगरा और कोलकाता चमड़ा और चमड़ा उत्पाद के लिए सुप्रसिद्ध हैं।
सरकार मूल संरचनात्मक सहायता, प्रौद्योगिकी उन्नयन, क्रेडिट की अधिमानी पहुंच, क्षेत्रक में विशिष्ट विनिर्माण के लिए उत्पादों का आरक्षण के लिए नीतियों और अधिमानी खरीद नीति आदि के द्वारा क्षेत्रक को प्रोत्साहित और सहायता कर रही है। यह चिन्ह प्राप्त करने, बाजार में सहायता, तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और प्रौद्योगिकी उन्नयन आदि के द्वारा योजनाओं और प्रोत्साहनों का पैकेज प्रदान करता है।
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