| इस्पात राष्ट्र की वृद्धि और विकास त्वरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसका उपयोग धातु उत्पाद, वैद्युत मशीनरी, परिवहन उपकरण, कपड़ा आदि के विनिर्माण में मूल सामग्री के रूप में किया जाता है और इस प्रकार से यह मानव सभ्यता का आधार माना जाता है। यह बड़े और प्रौद्योगिकीय रूप से विकसित उद्योग का उत्पाद है, जिसका सामग्री प्रवाह और आय सृजन की दृष्टि से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संबंध मजबूत है। दूसरे शब्दों में इस्पात का उत्पादन और प्रति व्यक्ति खपत देश के सकल घरेलू उत्पादन में मुख्य योगदानकर्ता है और इसके आर्थिक और औद्योगिक विकास का संकेतक है। लौह अयस्क, मैंग्नीज अयस्क और क्रोम अयस्क इस्पात उद्योग के लिए महत्वपूर्ण कच्ची सामग्री हैं। उनकी पर्याप्त मात्रा और गुणवत्ता में समय पर उपलब्धता, दीर्घावधिक आधार पर क्षेत्रक के त्वरित और सुव्यवस्थित विकास के लिए पूर्वापेक्षित है।
भारत तीन वर्ष पहले आठवें स्थान से उठ कर वर्ष 2006 में विश्व के पांचवें सबसे बड़े कच्चे इस्पात के उत्पादक देश के रूप में उभरा है। यहां प्रचुर मात्रा में लौह और कोयले के अयस्क की खानें हैं। इस्पात उत्पादन की लागत अन्य देशों की तुलना में अपेक्षाकृत कम है। इसने प्रत्यक्ष अपचयित लौह या स्पंज लौह के विश्व भर में सबसे बड़े उत्पादक का स्थान बनाए रखा है। स्पंज लौह का उत्पादन वर्ष 2002-03 में 7.86 मिलियन टन की तुलना में वर्ष 2006-07 में 18.35 मिलियन टन के स्तर तक पहुंचने के लिए 22 प्रतिशत के सीएजीआर पर बढ़ा है। जबकि, भारत के विषय में अनुमान है कि यह वर्ष 2015 तक विश्व में इस्पात का सबसे बड़ा उत्पादक बन जाएगा। यह भी संभावना है कि वर्ष 2011-12 तक इस्पात उत्पदन क्षमता 124 मिलियन पहुंच जाए।
- देश में नए अत्याधुनिक इस्पात संयंत्र की स्थापना जो बाहरी सहायता पर कम निर्भर करते हैं
- पुराने संयंत्रों में निरंतर आधुनिकीकरण तथा बाधाओं को दूर करना और प्रौद्योगिकी उन्नयन
- कोक की दर और विद्युत खपत की दृष्टि से संयंत्रों की ऊर्जा क्षमता में सुधार
- बेहतर गुणवत्ता की कच्ची सामग्री का उपयोग जैसे कि आयातित कोकिंग कोयला वैश्विक स्रोत से अभिगमन
- कच्ची सामग्री का अनुकूलतम प्रक्रियान्वयन जैसे कोयला धोना, लौह अयस्क का लाभ उठाना और सिन्टर आदि।
अर्थव्यवस्था का वैश्विक समेकन, साथ ही मूल संरचना, रियल एस्टेट और ऑटो मोबाइल जैसे क्षेत्रों की उठती मांग, जो देश के अंदर और बाहर दोनों स्थानों पर है, इसने भारतीय इस्पात को सबसे तेजी से आगे बढ़ता उद्योग बना दिया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अप्रैल - दिसम्बर 2007 की अवधि के दौरान पिछले वर्ष की संगत अवधि की तुलना में इसके उत्पादन, खपत और निर्यात में क्रमश: 6.6 प्रतिशत, 12.3 प्रतिशत और 9.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई। अवधि (अप्रैल-दिसम्बर 2007) के दौरान तैयार इस्पात के आयात में पिछले वर्ष की संगत अवधि से 68.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई। खपत में वृद्धि की गति ने इस प्रकार उत्पादन से वृद्धि की है और अब देश इस्पात का निवल आयातक बन गया है।
इस तालिका में वर्ष 2002-03 के से तैयार इस्पात और कच्चे इस्पात के उत्पादन, खपत, आयात और निर्यात को दर्शाया गया है :
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(मिलियन टन में) |
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मदें |
2002-03 |
2003-04 |
2004-05 |
2005-06 |
2006-07 |
2007-08*
(अप्रैल - दिसम्बर) |
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मिश्रधातु इस्पात सहित तैयार इस्पत |
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उत्पादन |
37.166 |
40.709 |
43.513 |
46.566 |
52.529 |
40.117 |
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खपत |
30.677 |
33.119 |
36.377 |
41.433 |
46.783 |
36.992 |
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आयात |
1.663 |
1.753 |
2.293 |
4.305 |
4.927 |
5.325 |
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निर्यात |
4.517 |
5.207 |
4.705 |
4.801 |
5.242 |
3.850 |
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| कच्चा इस्पात |
उत्पादन |
34.707 |
38.727 |
43.437 |
46.460 |
50.817 |
39.608 |
* अनंतिम
(स्रोत : वार्षिक रिपोर्ट 2007-08; इस्पात मंत्रालय)
'इस्पात मंत्रालय' भारत में लौह और इस्पात उद्योग के सम्पूर्ण विकास के लिए नोडल प्राधिकरण है। यह सुविधाकारक की भूमिका निभाता है, जो उदारीकृत परिदृश्य में नए और मौजूदा इस्पात संयंत्रों को विस्तृत निदेशन और सहायता देता है। इसके मुख्य क्रियाकलापों में निम्नलिखित शामिल हैं :-
- उद्योग के विकास के लिए समन्वयन करना और योजना बनाना इसमें मिलों की पुनर्बहाली, मिश्रित इस्पात और लौह मिश्रण उद्योग, रीफ्रैक्टरीज आदि सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रकों में शामिल हैं।
- लौह और इस्पात, लौह मिश्रण और रीफ्रैक्टरीज के उत्पादन, मूल्य निर्धारण, वितरण, आयात और निर्यात के संबंध में नीतियां बनाना।
- लौह अयस्क, मैग्नीज अयस्क, क्रोम अयस्क और रीफ्रैक्टरीज जिसकी आवश्यकता मुख्य रूप से इस्पात उद्योग के लिए होती है;
- इस्पात उद्योग द्वारा अपेक्षित अवसंरचनात्मक और संबंधित सुविधाओं की पहचान करना ताकि इसके भावी विकास में उनके अभाव से को विघ्न उत्पन्न न हो ;
- मौजूदा परिदृश्य और इस्पात उद्योग के विकास में शामिल प्रौद्योगिकीय मुद्दों पर विशेष बल देते हुए वित्तीय संस्थाओं और बैंकों के समक्ष प्रस्तुति देना।
अनेकानेक सरकारी क्षेत्र के उपक्रम (पीएसयू) उद्योग के विस्तार और विकास के लिए मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य कर रहे हैं। जो निम्नललिखित हैं :-
वर्ष 1991 से सरकार द्वारा आरंभ किए गए आर्थिक सुधार में सामान्य तौर पर औद्योगिक विकास में नया आयाम जोड़ दिया है और विशेष रूप से इस्पात उद्योग में। तदनुसार भारत सरकार द्वारा समय-समय पर अनेकानेक नीति परिवर्तनों की घोषणा की गई है। मुख्य नई औद्योगिक नीति है जिसने लौह और अयस्क क्षेत्र को निम्नलिखित के द्वारा निजी निवेश के लिए खोल दिया हैं :- (i) सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों की सूची से इसे हटाना; और (ii) अनिवार्य लाइसेंसिंग से इसे छूट देना। लोहे और स्टील उच्च प्राथमिकता वाले उद्योग बनाएगए हैं। मूल्य और वितरण नियंत्रण हटा दिए गए हैं तथा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में शत प्रतिशत की अनुमति (स्वचालित मार्ग के तहत) दी गई है, जिसका उद्देश्य उद्योग को दक्ष और प्रतिस्पर्द्धी बनाना है। व्यापार नीति को उदार बनाते हुए लोहे तथा स्टील के मदों के आयात और निर्यात को मुक्त रूप से अनुमति दी गई है और इन पर मात्रात्मक प्रतिबंध लगभग नहीं हैं। उच्चतम आयात प्रशुल्क दरें औसतन 100 प्रतिशत से घटाकर 30 प्रतिशत की गई थी, जिन्हें तब से 5 प्रतिशत तक कम किया गया है।
इसी समय से निजी क्षेत्र इसी समय से निजी क्षेत्र स्टील उद्योग के उत्पादन और वृद्धि में महत्वपूर्ण तथा प्रभावशाली भूमिका निभाता आया है। वे न केवल प्राथमिक और द्वितीयक स्टील की उत्पादन क्षमता को बढ़ाते हैं, बल्कि गुणवत्ता, नवाचार और लागत प्रभावशीलता के संदर्भ में पर्याप्त मूल्यवर्धन में भी योगदान देते हैं। अप्रैल - दिसम्बर 2007 के दौरान निजी क्षेत्र की स्टील कंपनियों ने स्टील के 38.08 मिलियन टन कुल उत्पादन में लगभग 67 प्रतिशत का योगदान देश को दिया। स्टील के बड़े उत्पादकों में शामिल हैं टाटा स्टील लि.; एस्सार स्टील होल्डिंग्स लि.; जिंदल स्टील एण्ड पावर लि. (जेएसपीएल); इस्पात इंडस्ट्रीज़ लि. (आईआईएल); भूषण पावर और स्टील लि.; आदि इसके साथ अपेक्षाकृत छोटी और मध्यम इकाइयां जैसे कि स्पंज आयरन संयंत्र, रि-रोलिंग मिलें, विद्युत आर्क भट्टियां, छोटी ब्लास्ट भट्टियों वाली इकाइयां, प्रेरण भट्टियां, कोल्ड रोलिंग मिलें और कोटिंग इकाइयां।
अन्य नीतिगत उपाय जैसे कि व्यापार शीर्ष में रुपए की परिवर्तनीयता, विदेशी वित्तीय बाजारों से संसाधनों की उगाही की अनुमति और मौजूदा कर संरचना के यौक्तीकरण को भी भारतीय इस्पात उद्योग से लाभ हुआ है। सरकार ने स्टील क्षेत्र की क्षमता में पर्याप्त वर्धन की कल्पना की है, विशेष रूप से स्पंज आयरन क्षेत्र से। इसने विद्युत आर्क भट्टी वाली इकाइयों (छोटे स्टील संयंत्र) की स्थापना के लिए भी लाइसेंस प्रदान किए हैं, जो देश में इस्पात उत्पादन का 30 प्रतिशत है, जहां मृदु स्टील के साथ मिश्रित स्टील का भी उत्पादन किया जाता है। इसके अलावा यह सुनिश्चित करने के सभी प्रयास किए गए है कि इस क्षेत्र से छोटे पैमाने के उद्योगों की आवश्यकताओं, अभियांत्रिकी वस्तुओं के निर्यातकों और देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र के साथ उन सभी कार्यनीतिक क्षेत्रों को भी लाभ होगा जैसे कि रक्षा और रेलवे।
मंत्रालय द्वारा की गई दूसरी महत्वपूर्ण पहल 2005 में 'राष्ट्रीय इस्पात नीति' की घोषणा रही है जिसने क्षेत्रक के और अधिक विकास के लिए सरकार की अभिकल्पना निर्धारित की है। नीति का मुख्य लक्ष्य विश्व स्तरीय आधुनिक और सक्षम इस्पात उद्योग का विकास करना, विविध प्रकार की इस्पात की मांगों की पूर्ति करना है। यह वैश्विक प्रतिस्पर्धा हासिल करने पर बल देना है न केवल लागत की दृष्टि से गुणवत्ता और उत्पाद मिश्रण की दृष्टि से अपितु सक्षमता और उत्पादकता की वैश्विक बेंचमार्क की दृष्टि से भी। यह वर्ष 2019-20 तक प्रतिवर्ष 2004-05 के 38 मीट्रिक टन के स्तर की तुलना में 110 मिलियन टन देशी इस्पात उत्पादन बढ़ाना चाहता है। इसका निहितार्थ समग्र वार्षिक वृद्धि 7.3 प्रतिशत प्रति वर्ष होगी।
घरेलू और विदेशी निवेशकों ने देश में स्टील की क्षमता स्थापित करने में गहरी दिलचस्पी दिखाई है। संभावित निवेशकों में मौजूदा सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र के निर्माता, प्रतिष्ठित विदेशी निर्माता, अग्रगामी समेकन में जाने वाले स्पंज आयरन के निर्माता और साथ ही छोटी रोलिंग मिलें, जो पश्चगामी समेकन पाने के लिए प्रयासरत हैं तथा इनके अलावा अन्य अनेक। नवीनतम सूचना के अनुसार 5.15 लाख करोड़ रु. से अधिक के निवेश से लगभग 243 मिलियन टन की आशयित क्षमता के साथ विभिन्न राज्यों में 194 समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं। ओडिशा, झारखण्ड और कर्नाटक, पश्चिम बंगाल तथा छत्तीसगढ़ राज्यों में बड़ी निवेश योजनाओं के साथ वास्तविक उत्पादन 2019-20 तक 110 मिलियन टन वार्षिक स्टील उत्पादन से अधिक हो सकता है, जिसकी संकल्पना राष्ट्रीय इस्पात नीति में की गई है।
विश्व बाजार में भारतीय इस्पात कंपनियों की बढ़ती मौजूदगी व्यापक दायरे के निर्यात वस्तुओं के साथ जिसमें प्रौद्योगिकीय रूप से जटिल उत्पाद शामिल है, जो इस उद्योग क वर्धित प्रतिस्पर्द्धा का सूचक है। उनके पास सक्षम और सुदृढ़ आधार हैं जिसमें प्रति व्यक्ति खपत का स्तर बढ़ रहा है जो देश में विशाल औद्योगिकरण का संवर्धन कर रहा है तथा लोगों का जीवन स्तर सुधार रहा है। इसके अतिरिक्त अनुसंधान, डिजाइन और विकास क्रियाकलापों में वृद्धि हुई है, जो मोटे तौर पर मौजूदा लौह और इस्पात संयंत्रों द्वारा किए जाते हैं, राष्ट्रीय अनुसंधान प्रयोगशालाओं, अकादमी संस्थाओं आदि के द्वारा किए जाते हैं। लौह और इस्पात निर्माण प्रक्रियाओं, कच्ची सामग्रियों का उन्नयन, उत्पाद विकास उत्पादकता में वृद्धि तथा ऊर्जा खपत में कटौती के क्षेत्रों में उल्लेखनीय सुधार किया गया है। ये सभी दर्शाते हैं कि क्षेत्रक में असंख्य निवेश अवसर मौजूद हैं, घरेलू और विदेशी दोनों निवेशकों के लिए। |