कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है क्योंकि रोजगार तथा आजीविका पैदा करने में इसका बहुत बड़ा योगदान है। यह पचास करोड़ से अधिक लोगों को सहारा देती है और 52 प्रतिशत कार्यबल को रोजगार उपलब्ध कराती है। 2006 - 07 में राष्ट्र के सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान लगभग 18.5 प्रतिशत था। यह अनेक औद्योगिक उत्पादों, विशेषत: उर्वरकों, पीड़कनाशियों, कृषि उपकरणों तथा विभिन्न उपभोक्ता वस्तुओं के लिए कच्ची सामग्री का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी है।
भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 328.7 मिलियन हेक्टर है जिसमें से 141 मिलियन हेक्टर निवल बुआई वाला क्षेत्रफल है और 190 मिलियन हेक्टर सकल सस्य क्षेत्रफल है। निवल सिंचित क्षेत्रफल 57 मिलियन हेक्टर है जिसकी सस्य गहनता 134 प्रतिशत है। देश की कुल सिंचाई क्षमता 1991-92 में 81.1 मिलियन हेक्टर थी जो बढ़कर 2006-07 में 102.8 मिलियन हेक्टर हो गई।
कृषि में उत्पादकता वृद्धि बहुत हद तक पूंजी निर्माण पर निर्भर करती है, सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों से। कुल पूंजी निर्माण के अनुपात के रूप में कृषि में सकल पूंजी निर्माण (जीसीएफ) में निरंतर गिरावट आई है। तथापि, इस क्षेत्र में सकल घरेलू उत्पाद के संदर्भ में कृषि में जीसीएफ में सुधार देखा गया है - 2000-01 में 9.6 प्रतिशत से 2006-07 में 12.5 प्रतिशत तक।
2006-07 में खाद्यान्न का समग्र उत्पादन 217.3 मिलियन टन होने का अनुमान था। 1950-51 और 2006-07 के बीच खाद्यान्न के उत्पादन में 2.5 प्रतिशत की औसत वार्षिक दर से वृद्धि हुई, जब कि इसी अवधि के दौरान जनसंख्या में औसत वृद्धि 2.1 प्रतिशत रही। फलस्वरूप, खाद्यान्न के मामले में भारत लगभग आत्मनिर्भर हो गया और 1976-77 से 2005-06 के दौरान कोई आयात नहीं हुआ, यदा-कदा को छोड़ कर।
2006-07 में खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि मुख्यत: गेहूं में 6.5 मिलियन टन (9.3 प्रतिशत) और दालों में 0.8 मिलियन टन (6 प्रतिशत) अधिक उत्पादन के कारण हुई। 2005-06 में उत्पादन की तुलना में तिलहन के उत्पादन में कमी आई (3.7 मिलियन टन या 13 प्रतिशत)।
तथापि, खाद्येतर फसलों, विशेषत: ईख, कपास तथा पटसन (मैस्टा सहित) का उत्पादन 2006-07 में लक्ष्यों से भी अधिक हुआ और पिछले वर्ष प्राप्त स्तरों से भी।
वर्ष 2006-07 के दौरान (30 सितंबर 2006 तक), कृषि निर्यात का मूल्य 28,157.52 करोड रूपए था, जबकि अप्रैल-सितंबर 2005 के दौरान यह 21673.25 करोड रूपए था। अप्रैल-सितंबर 2006 के दौरान कुल निर्यात में कृषि निर्यात का हिस्सा 10 प्रतिशत से अधिक था। अप्रैल-सितंबर 2005 के दौरान कृषि आयात में कमी आई। उसी अवधि के दौरान भारत के कुल आयात में कृषि आयात का हिस्सा 3.70 प्रतिशत से घट कर 2.88 प्रतिशत रह गया।
चीन और यूएसए के बाद भारत संसार में उर्वरकों का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है एनपीके पोषकों के संसार के कुल उत्पादन/उपभोग में इसका हिस्सा क्रमश: लगभग 11.4 और 11.9 प्रतिशत है। उवर्रकों की प्रति हेक्टर खपत 1991-92 में 69.8 कि.ग्रा से 3.3 प्रतिशत की औसत दर से बढ़कर 2006-07 में 113.3 किग्रा हो गई है।
केवल आत्म-निर्भरता के लिए ही नहीं, बल्कि लोगों की खाद्य तथा पोषण की जरूरतों को पूरा करने के लिए, ग्रामीण क्षेत्रों में आय तथा धन का न्योयोचित वितरण करने के लिए और गरीबी घटाने तथा जीवन स्तर सुधारने के लिए भी कृषि का तीव्र विकास जरूरी है। कृषि विकास का अन्य क्षेत्रों पर अधिकतम सोपानी प्रभाव पड़ता है, इसके लाभ सारी अर्थव्यवस्था पर और आबादी के विशाल खण्ड पर फैलते हैं।