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Entrepreneurship in Agriculture & Allied Sectors
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Agriculture कृषि क्षेत्र
Agriculture बागवानी और संबद्ध क्षेत्र
Agriculture पशुपालन तथा डेयरी
Agriculture मत्स्यिकी
Agriculture रेशम उत्‍पादन
   
 
Entrepreneurship in Agriculture & Allied Sectors
Promotion of Agriculture & Allied Sectors
पशुपालन तथा डेयरी :
वर्तमान स्थिति
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पशु पालन और डेयरी विकास क्षेत्र भारत के सामाजिक आर्थिक विकास में महत्त्‍वपूर्ण भूमिका निभाता हैं। लाखों लोगों के लिए सस्‍ता पोषक आहार उपलब्‍ध कराने के अतिरिक्‍त, यह ग्रामीण क्षेत्र में लाभकारी रोजगार पैदा करने में मदद करता है, विशेष रूप से भूमि‍हीन मजदूरों, छोटे तथा सीमांत किसानों तथा महिलाओं के लिए और इस प्रकार उनके परिवार की आय बढ़ाता है। सूखा, अकाल तथा अन्‍य प्राकृतिक आपदाओं जैसी प्रकृतिकी विभीषिकाओं के प्रति पशुधन सर्वोत्तम बीमा हैं।

भारत के पास पशुधन तथा कुक्‍कुट के विशाल संसाधन हैं जो ग्रामीण लोगों की सामाजिक आर्थिक दशाएं सुधारने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संसार में भैंसों के संदर्भ में भारत का पहला स्‍थान है, पशुओं तथा बकरियों में दूसरा, भेड़ों में तीसरा, बत्तखों में चौथा, मुर्गियों में पांचवां और ऊंटों की संख्‍या में छढा। संसार में भैंसों की कुल संख्‍या का 57 प्रतिशत भारत में हैं।

पशुपालन क्षेत्र स्‍व-रोजगार के भरपूर अवसर उपलब्‍ध कराता हैं। राष्‍ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन के नवीनतम सर्वेक्षण के अनुसार (जुलाई 2004 - जून 2005 एनएसएस 61 वां दौर), पशुपालन क्षेत्र में रोजगार का अनुमान प्रमुख स्थिति में 11.44 मिलियन था और सहायक स्थिति में 11.01 मिलियन, जो देश की कुल कार्यकारी आबादी का 5.50 प्रतिशत हैं। पशुपालन क्षेत्र में लगे हुए 22.45 मिलियन लोगों में से 16.84 मिलियन महिलाएं हैं। पशुपालन और मात्स्यिकी क्षेत्रों में कुल 23.68 मिलियन लोग लगे हुए हैं जो देश में कुल कार्य बल का लगभग 5.8 प्रतिशत हैं।

केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन (सीएसओ) के आकलनों के अनुसार, पशुधन और मत्स्यिकी क्षेत्रों को मिलाकर उत्‍पादन का मूल्‍य, वर्तमान कीमतों पर, 2006-07 के दौरान 2,50,761 करोड़ रु. था (2,10,629 करोड़ रु. पशुधन क्षेत्र के लिए और 40,312 करोड़ रु. मत्स्यिकी के लिए)। यह कृषि तथा संबंधित क्षेत्र से कुल 7,90,979 करोड़ रु. के उत्‍पादन के मूल्‍य का लगभग 31.7 प्रतिशत हैं। 2006-07 के दौरान कुल जीडीपी में इन क्षेत्रों का योगदान 5.26 था।

पशुधन क्षेत्र न केवल दूध, अंडों, मांस आदि के रूप में आवश्‍यक प्रोटीन तथा पोषक मानव आहार उपलब्‍ध कराता है बल्कि अखाद्य कृषि उपोत्‍पादों के उपयोग में भी महत्त्‍वपूर्ण भूमिका निभाता हैं।

पशुधन कच्‍ची सामग्री के उपोत्‍पाद उपलब्‍ध कराता है यथा खाल तथा चमड़ा, रक्‍त, अस्थि, वसा आदि। 2006-07 के दौरान अकेले दूध का योगदान (1,44,386 करोड़ रु.) धान ( 85.032 करोड़ रु.), गेहूं (66,791 करोड़ रु.) और ईख (28,488 करोड़ रु.) से अधिक था। केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन (सीएसओ) के आकलनों के अनुसार, 2006-07 के दौरान मांस समूह से उत्‍पादन का मूल्‍य, वर्तमान कीमतों पर, 34,310 करोड़ रु. था। पशुधन, कुक्‍कुट तथा संबंधित उत्‍पादों से 2006-07 के दौरान निर्यात की कुल आय 5213.80 करोड़ रु. थी।

दसवीं योजना के दौरान विभाग ने निम्‍नलिखित प्रमुख उपलब्धियां की :
  • भारत रिंडरपेस्‍ट संक्रमण और संसर्गज गोजातीय प्‍लूरो निमोनिया (सीबीपीपी) रोग से मुक्‍त हो गया।
  • विश्‍व में दुग्‍ध उत्‍पादन में भारत का पहला स्‍थान बना हुआ हैं।
  • भारत विश्‍व में तीसरा सबसे बड़ा अंडा उत्‍पादक हैं।
  • जीडीपी में इन क्षेत्रों का योगदान 2006-07 के दौरान 5.26 प्रतिशत था।
  • पशुधन बीमा की नई योजना शुरू की गई।
भारत विश्‍व में दुग्‍ध का सबसे बड़ा उत्‍पादक बना हुआ हैं। पशुधन की उत्‍पादकता बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा किए गए अनेक उपायों के फलस्‍वरूप नौवीं योजना के अंत में (2001-02) दुग्‍ध का उत्‍पादन बढ़कर 84.4 मिलियन टन के स्‍तर पर पहुंच गया जबकि 1990-91 में यह 53.9 मिलियन टन था। 2006-07 के दौरान भारत का दुग्‍ध उत्‍पादन 100.9 मिलियन टन था (जम्‍मू और कश्‍मीर के अनंतिम आकलनों को लेकर)।

अब भारत संसार में मत्‍स्‍य का तीसरा सबसे बड़ा उत्‍पादक है और स्‍वच्‍छ जल के मत्‍स्‍य का दूसरा सबसे बड़ा उत्‍पादक। वर्ष 2006-07 के दौरान मत्‍स्‍य का कुल उत्‍पादन 68.69 लाख टन था। उसी वर्ष के दौरान मत्‍स्‍य बीज का उत्‍पादन 31688.01 मिलियन फ्राई था।

गत वर्षों के दौरान देश में कुक्‍कुट विकास में क्रमिक प्रगति हुई हैं। नौवीं योजना के अंत में (2001-02) अंडों का उत्‍पादन 38.7 बिलियन था जबकि 1990-91 में यह 21 बिलियन था। वर्ष 2006 के लिए फाओस्‍टेट डाटा के अनुसार 2005-06 में 46.2 बिलियन अंडों के उत्‍पादन के साथ भारत संसार में तीसरे स्‍थान पर हैं। 2006-07 के दौरान भारत का अंड उत्‍पादन 51 बिलियन था (जम्‍मू और कश्‍मीर के अनंतिम आकलनों को लेकर)।

नौवीं योजना के अंत में (2001-02) ऊन का उत्‍पादन 49.5 मिलियन कि.ग्रा था जबकि 1990-91 के दौरान यह 41.20 मिलियन कि.ग्रा था। 2005-06 के दौरान ऊन का उत्‍पादन 44.9 मिलियन कि.ग्रा था 2006-07 के दौरान भारत का ऊन का उत्‍पादन 45.1 मिलियन कि.ग्रा था (जम्‍मू और कश्‍मीर के अनंतिम आकलनों को लेकर)।

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