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Entrepreneurship in Agriculture & Allied Sectors
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Agriculture कृषि क्षेत्र
Agriculture बागवानी और संबद्ध क्षेत्र
Agriculture पशुपालन तथा डेयरी
Agriculture मत्स्यिकी
Agriculture रेशम उत्‍पादन
   
 
Entrepreneurship in Agriculture & Allied Sectors
Promotion of Agriculture & Allied Sectors
रेशम उत्‍पादन:
वर्तमान स्थिति
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रेशम, जो अद्वितीय शान वाला एक प्राकृतिक रूप से उत्‍पादित पशु रेशा है, को सही अर्थों में कपड़ों की रानी कहा जाता है। इसकी विशेषताएं इसकी अतुल्‍य विशिष्‍टताएं जैसे प्राकृतिक चमक, रंजक हेतु अंतर्हित स्‍वाभाविकता, चटकीले रंग, उच्‍च शोषणता, कम भार, तथा उत्‍कृष्‍ट पहनावा इत्‍यादि है।

रेशम के कीड़ों की विभिन्‍न प्रजातियों से प्राप्‍त वाणिज्यिक महत्‍व के रेशम की पांच प्रमुख किस्‍में है। भारत के पास रेशम की इन सभी किस्‍मों का उत्‍पादन करने की अद्वितीय सुभिन्‍नता है। रेशम की पांच किस्‍मों को दो व्‍यापक श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:-

शहतूत रेशम

यह रेशम के कीड़े बाम्बिक्‍स मोरी एल से प्राप्‍त होता है जो अनन्‍य रूप से शहतूत के पौधों पर पोषण करता है। विश्‍व में उत्‍पादित वाणिज्यिक रेशम की प्रपुंज मात्रा इस किस्‍म से प्राप्‍त होनी है। भारत में, प्रमुख शहतूत रेशम उत्‍पादक राज्‍य कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु तथा जम्‍मू और कश्‍मीर हैं जो मिलकर देश के कुल शहतूत के कच्‍चे रेशम के 92 % का उत्‍पादन करते हैं।

वन्‍य रेशम या शहतूत भिन्‍न रेशम (रेशम की सभी अन्‍य किस्‍में इस श्रेणी के अंतर्गत आती है)

  1. टेम्‍परेट टस्‍सर रेशम : यह एंथ्रिया मिलिटा नामक रेशम की कीड़े द्वारा बनाया जाता है जो मुख्‍यत: असन तथा अर्जुन के खाद्य पौधों पर पोषण करते है। टस्‍सर एक तांबे के रंग की खुरदरी रेशम है जिसका प्रयोग मुख्‍यत: फर्निशिंग्‍स तथा इंटीरियर के लिए किया जाता है। भारत में, प्रमुख टस्‍सर रेशम उत्‍पादक राज्‍य झारखण्‍ड, छत्तीसगढ़ तथा ओडिशा, महाराष्‍ट्र पश्चिम बंगाल तथा आंध्र प्रदेश हैं।
  2. ट्रॉपिकल टस्‍सर रेशम या ओक टस्‍सर रेशम : यह एंथ्रिया प्रोली जे नामक रेशम के कीड़े द्वारा उत्‍पादित टस्‍सर की परिष्‍कृत किस्‍म है जो ओक के प्राकृतिक भोज्‍य पौधों पर पोषण करता है। भारत में इसका उत्‍पादन मुख्‍यता भारत की उप-हिमालयी बेल्‍ट ने होता है जिसमें मणिपुर, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, असम, मेघालय तथा जम्‍मू और कश्‍मीर के राज्‍य शामिल है।
  3. मूगा रेशम : यह अर्ध घरेलूकृत मल्‍टीवोल्टिन रेशम के कीड़े एंथ्रिया असमेन्सिस से प्राप्‍त एक स्‍वर्णिक पीले रंग का रेशम है। ये रेशम के कीड़े सोम तथा सोलू पौधों के सुगंधित पत्तों पर पोषण करते हैं। मूगा रेशम असम का गौरव है तथा राज्‍य की परम्‍परा तथा संस्‍कृति का एक अखंड भाग है।
  4. इरी रेशम (अथवा एंडी या इरेंडी) : यह घरेलूकृत रेशम के कीड़े फिलोसमिया रिसिनी का उत्‍पाद है जो मुख्‍यत केस्‍टर के पत्तों पर पोषण करता है। यह रेशम की अन्‍य किस्‍मों से भिन्‍न खुले सिरों वाले कोकूनों से बुना गया मल्‍टीवोल्टिन रेशम है। भारत में, इस पद्धति का प्रयोग मुख्‍यत: असम सहित पूर्वोत्तर राज्‍यों में किया जाता है। यह बिहार, पश्चिम बंगाल तथा ओडिशा में भी पाया जाता है। इरी कल्‍चर मुख्‍यत: प्रोटीन समृद्ध प्‍यूपा के लिए व्‍यवहार में लाई जाने वाली एक घरेलू गतिविधि है जो जनजातीय लोगों का प्रिय भोजन है। परिणामत: इरी कोकून खुले मुंह वाले होते है तथा इन्‍हें बुना जाता है। रेशम का प्रयोग स्‍वदेशी रूप से इन जनजातीय लोगों द्वारा अपने स्‍वयं के प्रयोग हेतु चादरें (ओढ़नी) तैयार करने के लिए किया जाता है।

भौगोलिक रूप से, एशिया विश्‍व में रेशम का मुख्‍य उत्‍पादक है तथा यह कुल वैश्विक उत्‍पादन के 95% से अधिक का उत्‍पादन करता है। किन्‍तु इसका प्रपुंज भाग चीन, भारत, जापान, ब्राज़ील तथा कोरिया में उत्‍पादित किया जाता है। भारत को विश्‍व में दूसरे प्रमुख कच्‍चे रेशम के उत्‍पादक का दर्जा दिया गया है। यह विश्‍व के कुल कच्‍चे रेशम के उत्‍पादन में लगभग 18% का योगदान करता है।

उत्‍पादित रेशम की किस्‍मों में से, शहतूत रेशम की प्रमात्रा 89.45% है जिसके पश्‍चात इरी टस्‍सर तथा मूगा का क्रमश: 8.04%, 1.89 तथा 0.62%, का योगदान है। लगभग 40-45% रेशम का उत्‍पादन चरखा से किया जाता है तथा लगभग 40-45% कुटीर बेसिनों से प्राप्‍त होती है तथा शेष 10% रेशम का स्रोत मल्‍टी - एंड रीलिंग है। अपनी प्रचुर रोजगार संभाव्‍यता के साथ यह स्थिति रेशम उद्योग तथा रेशम को भारतीय वस्‍त्र मानचित्र में अपरिहार्य बना देती है।

रेशम उद्योग सर्वाधिक श्रम गहन क्षेत्रों में से एक है जिसमें कृषि (रेशम उद्योग) तथा उद्योग दोनों के क्रियाकलाप संयोजित है। उत्‍पादन प्रक्रिया में अंतरनिर्भर, विशेषीकृत प्रचालनों की एक दीर्घ श्रृंखला अंर्तग्रस्‍त है जो जनसंख्‍या के एक बढ़े भाग को आजीविका के साधन उपलब्‍ध कराती है अर्थात रेशम के कीड़े के बीज उत्‍पादक, कृषक-सह-पालक, रीलर, टिरास्‍टर, बुनकर, रेशम अपशिष्‍ट के स्पिनर, व्‍यापारी इत्‍यादि। इसका प्रयोग देश भर के लगभग 53,814 ग्रामों के किया जाता है। यह लगभग 6 मिलियन लोगों को रोजगार उपलब्‍ध कराता है जिनमें से अधिकांश लघु तथा सीमांतीय किसान अथवा अति लघु तथा घरेलू उद्योग हैं जो मुख्‍यत: ग्रामीण क्षेत्रों में हैं।

रेशम तथा रेशम की वस्‍तुएं बहुत अच्‍छी विदेशी मुद्रा अर्जक हैं। भारतीय रेशमी वस्‍तुओं की अपनी सुभिन्‍नता तथा निम्‍न उत्‍पादन लागत के कारण अच्‍छी निर्यात संभाव्‍यता है। वर्ष 2007-08 के दौरान (सितम्‍बर 2007 तक), कुल रेशम निर्यात 1,376.91 करोड़ रुपए के थे। यह अनुमान लगाया गया है कि मार्च 2008 तक, कुल रेशम निर्यात के 3,500.00 करोड़ रुपए तक पहुंच जाने की संभावना है।

रेशम उद्योग अपनी निम्‍न निवेश, उच्‍च आश्‍वासित प्रतिफलों, अल्‍प गेस्‍टेशन अवधि आय के वर्धन हेतु प्रचुर अवसरों तथा पूरे वर्ष परिवार रोजगार सृजन के कारण सीमांतीय तथा लघु भूमि धारकों, दोनों के लिए उपयुक्‍त है। वस्‍तुत: यह महिलाओं का व्‍यवसाय है तथा महिलाओं के लिए है क्‍योंकि महिलाएं कार्यबल के 60% से अधिक का निर्माण करती है। तथा 80% रेशम की खपत महिलाएं करती हैं। रेशम-उद्योग में शामिल कार्य का स्‍वरूप जैसे पत्तों की कटाई, सिल्‍कवॉर्म का पालन, रेशम के धागे की स्पिनिंग अथवा रीलिंग तथा बुनाई का कार्य महिलाएं करती है।

यह एक उच्‍च आप सृजन उद्योग है जिसे देश के आर्थिक विकास का एक महत्‍वपूर्ण साधन माना जाता है।

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कपड़ा मंत्रालय
संश्लिष्‍ट तथा कला रेशम सिल्‍क अनुसंधान संघ
 
 
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