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मत्स्यिकी और जल कृषि क्षेत्र' भारतीय कृषि में सूर्य किरण के रूप में मान्यता प्राप्त है। यह असंख्य अनुषंगी उद्योगों के विकास को अभिप्रेरत करता और आर्थिक रूप से पिछड़े बड़े तब के लोगों के लिए जीविका का साधन है विशेषतया देश के मछुआरों के लिए। यह खाद्य आपूर्ति बढ़ाने, पर्याप्त रोजगार के अवसर का सृजन करने और पोषण स्तर बढ़ाने में सहायता करता है। इसकी बड़ी निर्यात क्षमता है और देश के लिए विदेशी मुद्दा अर्जन का बड़ा स्रोत है।
'पशु पालन और डेरी विभाग और मत्स्यिकी' भारत में मत्स्यिकी उद्योग के विकास के लिए मुख्य प्राधिकरण है। यह सीधे और राज्य सरकारों तथा संघ राज्य क्षेत्रों के प्रशासनों के द्वारा विभिन्न उत्पादन, इनपुट आपूर्ति तथा मूलसंरचना विकास कार्यक्रम और कल्याणोन्मुखी योजनाएं चलाता आ रहा है यह मत्स्यिकी क्षेत्र में उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के अलावा करता है। इसके अतिरिक्त खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय एक दूसरा मुख्य अभिकरण है जो भारत में मत्स्य प्रसंस्करण खण्ड के मजबूत विकास के लिए जिम्मेदार है।
तथापि, मत्स्यिकी मूल्य रूप से राज्य का विषय है और इसके विकास के लिए प्राथमिक जिम्मेदारी मुख्य रूप से राज्य सरकार की है। मुख्य बल मत्स्यिकी विकास में अनुकूलन उत्पादन और उत्पादकता, मत्स्य उत्पादों का निर्यात बढ़ाने, रोजगार का सृजन करने और मछुआरों के कल्याण और उनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति सुधारने पर है।
वर्षों से मत्स्यिकी उद्योग उभरकर तेजी से बढ़ रहा है। इसमें पकड़ने और कृषि दोनों शामिल हैं, अर्न्देशीय और समुद्री, जलकृषि, गेयर्स, नेवीगेशन, समुद्र विज्ञान, जल जीवशाला प्रबंधन, प्रजनन, प्रसंस्करण, समुद्री भोजन का निर्यात और आयात, विशेष उत्पाद और सह उत्पाद अनुसंधान और सहबद्ध क्रियाकलाप इसमें शामिल हैं। पूरे विश्व में उद्यमियों के लिए निवेश के अनेक अवसर मौजूद है।
परन्तु देश में मत्स्यिकी विकास को अनेक चुनौतियों और मुद्दों का सामना करना पड़ रहा है जैसाकि मत्स्य उत्पादन के अर्थ में मत्स्यिकी संसाधनों और उनकी क्षमता के मूल्यांकन का स्टीक डाटा, फिन और शेलफिश कृषि के लिए स्थायी प्रौद्योगिकी का विकास, अधिक उत्पादन, हरवेस्ट और पश्च हरवेस्ट कार्य फिशिंग पोतों के लिए लैंडिंग और बर्थिंग सुविधा और मछुआरों का कल्याण आदि।
इस प्रकार से इसकी उपलब्धि और क्षमता को देखते हुए इस सेक्टर में परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। मजबूत और टिकाऊ स्थिति की संसाधन आधार, यौक्तिक और प्रिएम्पटिव नीति, सार्वजनिक और निजी निवेश, अच्छा अभिशासन आदि सेक्टर के स्थायी विकास के लिए महत्वपूर्ण है। इसकी क्षमता का पूर्ण उपयोग मूलसंरचना निवेश, प्रौद्योगिकी गहनता, विविधीकरण और मूल्यवर्धन द्वारा हासिल किया जाता है। इसके केन्द्र में भारत में मत्स्य पालन कार्यकलाप संबंधी विभिन्न मुद्रों को पारस्परिक समझदारी और सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रों के बीच सहयोग से समयबद्ध तरीके से समाधान करने की आवश्यकता है।