भारतीय कृषि ने काफी प्रगति कर ली है, फिर भी राष्ट्र तथा पोषण की सुरक्षा के लिए कुछ बातों की ओर ध्यान देने की जरूरत है आशा है कि 2020 तक हमारी आबादी 1.4 अरब हो जाएगी। बढ़ती हुई आबादी और बढ़ती हुई आय खाद्यान्नों तथा खाद्येत्तर फसलों के लिए अधिक मांग पैदा करेगी। अत:, भारतीय कृषि को 4 प्रतिशत प्रति वर्ष पर लक्षित उच्च वृद्धि दर स्थायी आधार पर प्राप्त करनी है। इस क्षेत्र के विकास की तीव्रता न केवल सकल घरेलू उत्पाद की समग्र वृद्धि को ऊपर उठाएगी, बल्कि यह वृद्धि को अधिक समावेशी भी बनाएगी।
क्योंकि बुआई वाले निवल क्षेत्र में वृद्धि बंद हो गई है, अत: कृषि उत्पादन में आगे की वृद्धि सकल सस्य क्षेत्रफल को बढाने (बहु सस्योत्पादन), क्षेत्र को सिंचाई के अंतर्गत लाने और उत्पादनकता के स्तरों में सुधार द्वारा लानी होगी।
देश के ग्रामीण क्षेत्रों में विकास रोजगार तथा आर्थिक समद्धि लाने के लिए कृषि क्षेत्र को सुचारू बाजारों की जरूरत है। बाजार तंत्र में गतिशीलता तथा दक्षता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किसानों के खतों के निकट सस्य-कर्तन-उपरांत तथा कोल्ड चेन मूल संरचना के विकास के लिए भारी निवेश अपेक्षित हैं।
भारतीय कृषि को उच्च-मूल्य फसलें अपना कर विविधता भी लानी है, उत्पादकता बढ़ानी है, मृदा के स्वास्थ्य को बहाल करना है और आधुनिक प्रौद्योगिकियों के अनुप्रयोग को बढ़ाना है, जैव प्रौद्योगिकी सहित।
कृषि में लगे व्यक्तियों का मानव संसाधन विकास जरूरी है, न केवल बेहतर प्रौद्योगिकी की अधिक व्यापकता के लिए बल्कि इसलिए भी कि इस क्षेत्र के अल्प-रोजगार मजदूरों के अन्य तीव्र विकासशील क्षेत्रों में खपने के लिए नई कुशलताएं जरूरी होंगी।
कृषि और सहकारिता विभाग 4 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि दर प्राप्त करने के लिए नीतियों पर काम कर रहा है। इनमें शामिल है: संभाव्यता वाले क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना, प्रदेश के अनुसार भिन्न-भिन्न नीतियां, सस्य विविधीकरण और प्राकृतिक संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन।
इस क्षेत्र को पुनरूज्जीवित करने के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के रूप में नए प्रवर्तन शुरू किए गए हैं। इन नए नीति निर्णयों से इस क्षेत्र को भरपूर लाभ होगा।
व्यापक क्षेत्रीय स्तर पर दीर्घकालीन नीति ढांचे को मजबूत करने और अंतर तथा अंतरा-क्षेत्रीय संपर्कों पर केंद्रित करने की जरूरत है। इसके अतिरिक्त, सिंचाई, उर्वरकों, बीजों की उच्च-उत्पादी किसमों के प्रयोग, उन्नत रीतियों को अपनाने में सुविधा के लिए समर्थन देने, और बाजार तक पहुंच के क्षेत्रों में सार्वजानिक कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में एक परिणाम अभिमुखी परिप्रेक्ष्य के निर्माण की जरूरत है।
कृषि में सार्वजनिक निवेश उस क्षेत्र की अपेक्षाओं के अनुरूप न हो पाया हो तो भी खाद्य तथा उर्वरकों की इमदाद ने कृषि क्षेत्र का समर्थन किया है। हो सकता है कि इन इमदादों को बेहतर लक्षित करने की जरूरत हो ताकि संसाधन आबंटन और उससे प्रतिफलों को अनुकूलतम किया जा सके।
न्योयोचित विकास के लिए खेती से आय को बढ़ाना भी जरूरी है। और, वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता तथा अन्न ईंधन एवं खाद्य तेलों की अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ने के साथ, घरेलू कीमत की स्थिरता और खाद्य सुरक्षा इस क्षेत्र के विकास पर निर्भर करती है इसके लिए जरूरी है कि आगे के और पीछे के संपर्कों का पता लगाया जाए जो कार्यान्वयन के हर स्तर पर उपलब्ध संसाधनों के संतुलित आबंटन एवं बेहतर उपयोग द्वारा उत्पादकता बढ़ाते हैं और प्रयुक्त संसाधन के हर यूनिट के लिए उत्पादन का परिमाणन किया जाए।