भारतीय रेशम पालन उद्योग वर्तमान में अनेक समस्याओं का सामना कर रहा है जिनसे इसकी संभाव्यता का पूर्ण उपयोग सीमित हो गया है। इनमें से कुछ समस्याएं नीचे दी गई हैं:-
अच्छी किस्म के बाइवोल्टाइन रेशम का उत्पादन : भारतीय रेशम का धागा निकृष्ट किस्म कर दे जो न केवल विश्व बाजार में हमारी प्रतिस्पर्द्धात्मकता को प्रभावित करता है बल्कि घरेलू बाज़ार में आयातित धागे को वरीयता दिए जाने में भी परिणामी हुआ दे। यद्यपि भारतीय प्रजातियों में अच्छे किस्म के बाइवोल्टाइन रेशम का उत्पादन करने की क्षमता है, समस्या निम्न के अभाव के कारण उत्पन्न होती हैं :-
- बेहतर प्रौद्योगिकियों अपनाने पर पर्याप्त जोर
- कठोर रोग नियंत्रण उपाय
- शहतूत के बाग को अपर्याप्त निविष्टियों के कारण उत्कृष्ट पत्ते
- समुचित माउंटेज
- कोकूनों के लिए ग्रेडिंग प्रणाली
- गुणताधारित कीमत निर्धारण प्रणाली के साथ साथ युवा सिल्कवॉर्मों का उपयोग
उत्पादन में गिरावट को नियंत्रित करना : ऐसा मिट्टी की उर्वरता को सुधारने के लिए क्षेत्र-विशिष्ट अनुसंधान शुरू करके किया जा सकता है। इससे अंतत: मृदा उत्पादकता बढ़ेगी, शहतूत तथा शहतूत भिन्न मेजबान पौधा पत्ते तथा सिल्कवॉर्म कोकून उत्पादन बढ़ेगा तथा साथ ही रेशम खाद्य पौधों की कृषि वाले क्षेत्र में गिरावट पर नियंत्रण होगा।
बाइवोल्टिन रेशम का उत्पादन बढ़ाना : बाइवोल्टिन धागा अपेक्षाकृत मजबूत होता है तथा इसका प्रयोग विद्युतकरघा उद्योग द्वारा किया जाता है। किन्तु भारत में उत्पादित रेशम का केवल 5 प्रतिशत बाइवोल्टिन है क्योंकि इसके उत्पादन के लिए काफी अधिक ध्यान दिया जाना तथा अधिक संसाधनों की आवश्यकता है। बहु वोल्टिन रेशम द्वारा चार से छ: फसलों के उत्पादन की तुलना में इसकी वर्ष में पैदावार केवल दो फसलों की होती है। कृषकों को भी बाइवोल्टिन रेशम धागे के उत्पादन की ओर अंतरण के लिए कोई प्रोत्साहन प्राप्त नहीं है क्योंकि बाइवोल्टिन तथा बहुवोल्टिन रेशम की विक्रय कीमत में बहुत अधिक अंतरण नहीं है।
इसके लिए उत्तरदायी अन्य कारक हैं : -
- अनुसंधान एवं विकास प्रयासों के जरिए विकसित प्रौद्योगिकी पैकेजों का अपर्याप्त अनुकूलन तथा प्रचुरता;
- शहतूत की खेती वाले क्षेत्रफल को बढ़ाने के लिए कोई प्रयास न किया जाना;
- खंडित तथा तदर्थ दृष्टिकोण;
- बीज उत्पादन, फार्मिंग तथा रीलिंग में निजी भागीदारी का प्रमुख रूप से सम्मिलित न होना;
- योजनाओं का प्रसार न होना;
- अनुपयुक्त अग्रगामी तथा पृष्ठ संबंधन; तथा
- सस्ते चीनी कच्चे रेशम तथा फैब्रिक की डम्पिंग।
उचित प्रोत्साहनों के जरिए कृषकों को मल्टीवोल्टिन रेशम से बाइवोल्टिन रेशम के उत्पादन की ओर अंतरित करने के लिए प्रोत्साहन दिए जाने की आवश्यकता है। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उत्पादन को जारी रखने के लिए हस्तकरघा क्षेत्र के लिए पर्याप्त मात्रा में मल्टीवोल्टिन उपलब्ध रहे।
किसानों तथा बुनकरों की आकांक्षाओं को संतुलित करना : रेशम उद्योग के उद्यमी चाहते हैं कि कच्चे रेशम के आयातों पर प्रतिबंध लगाया जाए तथा धागे पर डम्पिंग रोधी शुल्क कायम रहे। दूसरी ओर निर्यातक तथा बुनकर चाहते है कि डम्पिंगरोधी शुल्क को हटा लिया जाए ताकि उन्हें धागे की आश्वासित आपूर्ति प्राप्त हो तथा वे प्रतिस्पर्द्धी दरों पर अधिक रेशम उत्पादों का निर्यात करने में समर्थ हों। साथ ही, सूखे के कारण तथा सस्ती कीमतों पर चीनी रेशम को डम्प किए जाने के कारण कृष्ट क्षेत्रफल तथा कच्चे रेशम के उत्पादन में वर्ष 2002-04 के दौरान गिरावट आई है।
शहतूत - भिन्न रेशम उत्पादन को बनाना : देश में इसका उत्पादन अस्थिर बना हुआ है तथा वर्षानुवर्ष घटता बढ़ता रहता है। अपनी अद्वितीयता के कारण, भारत में शहतूत-भिन्न रेशम उत्पादन में मूल्यवर्धित निर्यातों की भारी संभाव्यता है।
गुणताधारित कीमत निर्धारण की आवश्यकता : रीलिंग क्षेत्र एक निविष्टि-आधारित क्रियाकलाप है तथा इस के प्रचालन तीन कारकों द्वारा अत्यधिक प्रभावित होते हैं नामत: कोकून की किस्म, कोकून की कीमत तथा कोकून की आपूर्ति, किन्तु गुणताधारित मूल्य निर्धारण के अभाव के कारण, गुणता नियंत्रण बहुत कम हुआ है।
इस तथ्य के मद्देनज़र कि कृषि योग्य क्षेत्रफल के विस्तार द्वारा देश में रेशम के उत्पादन को बढ़ाने की गुंजाइश बहुत कम हैं, उन्नत प्रौद्योगिकी तथा कुशल जनशक्ति के प्रयोग द्वारा उत्पादकता वर्धन के जरिए ऊर्ध्वस्थ विस्तार एकमात्र विकल्प है। वस्तुत:, नवीन रेशम उद्योग प्रौद्योगिकी के आविर्भाव ने न केवल उत्पादन जोखिमों (ड्रजरी) को कम कर दिया है बल्कि पारम्परिक प्रौद्योगिकी के सापेक्ष संभावी कोकीन उत्पादन / यूनिट क्षेत्रफल में भी वृद्धि की है।