अपनी लंबी तट रेखा, विशाल जलाशयों आदि के कारण भारत के पास अंतर्देशीय तथा समुद्री दोनों संसाधनों से मत्स्य के लिए व्यापक संभावनाएं हैं। यह संसार में मत्स्य का चौथा सबसे बड़ा उत्पादक है। यह अंतर्देशीय मत्स्य का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक भी है। सकल घरेलू उत्पाद में मत्स्य क्षेत्रों का योगदान लगभग 1.4 प्रतिशत 1950 में 0.75 मिलयन टन से, मत्स्य क्षेत्र का उत्पादन 6.4 मिलियन टन हो गया है जिसका मूल्य 3,20,000 रु. मिलियन है और लगभग 70,000 मिलियन रु. का निर्यात होता है। 4,000 तटीय ग्रामों और इससे भी अधिक भीतरी ग्रामों में रहने वाले लगभग 10 मिलियन लोग अपनी आजीविका कमाने के लिए मत्स्य क्षेत्रों पर निर्भर करते हैं।
भारत में खारे पानी और पानी की जल कृषि के विकास के लिए भारी गुंजायश है। कृषि के लिए उपलब्ध कुल क्षेत्र में से स्वच्छ जल के केवल 30 प्रतिशत क्षेत्र और खारे जल के 10 प्रतिशत का ही उपयोग किया जाता है। भारी उत्पादन, खपत और निर्यात ने इस क्षेत्र को भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग बना दिया है। मत्स्य क्षेत्रों के विकास में मुख्य जोर निम्नलिखित पर दिया गया है: उत्पादन एवं उत्पादकता का इष्टतमीकरण, मत्स्य उत्पादों के निर्यात को बढ़ाना, रोजगार पैदा करना, और मछुआरों के कल्याण तथा उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार करना। लक्ष्य यह है मत्स्य उत्पादन को 60 लाख एमटी के वर्तमान स्तर से बढ़ाकर 2020 तक लगभग 95 लाख एमटी कर दिया जाए।.
इतना ही नहीं मत्स्य क्षेत्र में संसाधन की सुविधाएं बढ़ाकर, विशेषत: घरेलू उपयोग के लिए, मत्स्य किसान अपने उत्पाद से अधिक आय प्राप्त कर सकते हैं और देश के दूरस्थ इलाकों के उपभोक्ता भी सरलता से पोषक आहार पा कर लाभान्वित हो सकते हैं। इसके लिए, मत्स्य संसाधन क्षेत्र के क्षमता उपयोग की दर को बढ़ाना होगा, क्योंकि देश के मत्स्य संसाधन क्षेत्र में व्यवसाय के अनेक अवसर विद्यमान हैं।
उदारीकृत नीति के साथ, मत्स्य संसाधन क्षेत्र अधिक विदेशी निवेश को आकर्षित कर रहा है। पिछले वर्षों के दौरान, समुद्री उत्पादों के संसाधन के लिए काफी मूल संरचना सुविधाएं विकसित की गई हैं। खाद्य संसाधन उद्योग मंत्रालय मत्स्य संसाधन यूनिट स्थापित करने / प्रौद्योगिकी उन्नयन / आधुनिकीकरण के लिए वित्तीय सहायता देता है। 2006-07 के दौरान (दिसंबंर 2006 तक), 17 मत्स्य संसाधन यूनिटों को सहायता दी गई है।
डिब्बा-बंद और हिमशीतित रूपों में उत्पाद का संसाधन लगभग सारा का सारा निर्यात के लिए किया जाता है। कुल मिलाकर, लगभग 393 शीतन यूनिट हैं, 13 कैनिंग यूनिट, 160 बर्फ बनाने के यूनिट, 12 मत्स्य चूर्ण यूनिट और लगभग 476 (यथा 30-11-99 को) शीत संग्रहण यूनिट भी। निर्यात के लिए संसाधित मत्स्य उत्पाद हैं : पारंपरिक ब्लॉक हिमशीतित उत्पाद; व्यक्तिगत द्रुत हिमशीतित उत्पाद आईक्यूएफ); कीमा मत्स्य उत्पाद यथा मत्स्य सॉसेज, केक, कटलेट, पेस्ट, सुरिमि, संव्यूतित उत्पाद और शुष्क मत्स्य; आदि। परंतु, पारंपरिक ब्लॉक हिमशीतित द्रव्य की अपेक्षा विदेशी बाजारों में संसाधित आईक्यूएफ समुद्री उत्पादों का अधिक दाम मिलता है। निर्यात के लिए उपयुक्त विभिन्न आईक्यूएफ उत्पाद हैं : श्रिम्प, लॉब्स्टर, कैटलफिश, क्लैम और फिश फिलेट। इससे पता चलता है कि उत्पादन और संसाधन की दृष्टि से मत्स्य क्षेत्र में निवेश के अनेक अवसर उपलब्ध हैं।
मत्स्य संसाधन क्षेत्र में विदेशी इक्विटी की अनुमति है। और, न्यूनतम 20 प्रतिशत मूल्य वर्धन वाली मत्स्य संसाधन परियोजनाएं 100 प्रतिशत निर्यात अभिमुखी यूनिटों के रूप में स्थापित की जा सकती हैं। सभी मदों का मुक्त रूप से निर्यात किया जा सकता है, 300 ग्राम से कम वजन वाले सिल्वर पॉम्फ्रेट्स को छोड़ कर।
परंतु, भारत के भरपूर मत्स्य संसाधनों का बहुत कम उपयोग हो रहा है और यह स्पष्ट रूप से माना जा रहा है कि इस क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने के लिए बहुत संभावना हैं।
तथापि, मत्स्य क्षेत्र राज्य का विषय है और इसके विकास के लिए मूल उत्तरदायित्व राज्य सरकारों का है। देश के विभिन्न राज्यों और/या संघ राज्य क्षेत्रों में मात्स्यिकी को बढ़ावा देने के लिए असंख्य अवसर विद्यमान हैं। उनमें से कुछ हैं:-
1. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह : अपनी लंबी तटरेखा और अनन्य तथा बिरले समुद्री आवास के कारण द्वीप समूह का पारिस्थितिक तंत्र एवं भौगोलिक अवस्थिति मत्स्यन और समुद्री क्षेत्र के लिए (मुख्यत: सागर खेती गतिविधियां) व्यापक समुद्री संभावना उपलब्ध कराती है। मत्स्यन और समुद्री उद्योग के लिए भरपूर अवसर उपलब्ध हैं। द्वीप समूह की अनुमानित समुद्री संभावना 2.44 लाख टन हैं, जिसका प्रयोग लगभग नहीं हुआ है। द्वीप समूह का अनन्य पारिस्थितिक तंत्र विविध जातियों की संभावना उपलब्ध कराता हैं जिन्हें पकड़ा, कृषित, संसाधित और अच्छे दाम पर बेचा जा सकता है। और, महासागर का विशाल प्रसार समुद्री पादपों, मोतियों, सीपों, शंबुओं आदि की औद्योगिकी स्तर की खेती के लिए अवसर उपलब्ध कराता है। किंतु, संसाधन मूल संरचना, कोल्ड चेन और परिवहन समर्थन की कमी के कारण यह क्षेत्र अपनी संभावना को पूरा नहीं कर पाया। अत:, पर्यावरणी मुद्दों और विविधीकृत विकेंद्रित आपूर्ति श्रृंखला की संभावना को ध्यान में रखते हुए अवसर खोजने के प्रयास किए जा रहे हैं।
2. असम: असम मुख्यत: मत्स्य उपभोगी राज्य है। यहां मत्स्य की मांग बहुत अधिक है। असम का हिप्सोग्राफिक स्वरूप और नदी तंत्र जलीय संसाधनों का समृद्ध भंडार उपलब्ध कराते हैं जिनमें मत्स्य के उत्पादन के लिए बहुत संभावना है। असम के मत्स्य संसाधन में महत्वपूर्ण नदी बेसिन शामिल हैं, अर्थात् ब्रह्मपुत्र, बराक और उनकी सहायक नदियां। शीतल और ऊष्ण दोनों जलों के मत्स्य उत्पादन की संभावना हैं। दो प्रमुख नदी तंत्रों, अनेक बीलों, झीलों, तालाबों / पोखरों तथा दलदलों वाले इस राज्य में मत्स्य के मूल्यवान संसाधन हैं। इन जल संसाधनों के सर्वागीण विकास के लिए संभावना की पहचान, सही नियोजन और क्रम निर्धारण की जरूरत हैं।
3. छत्तीसगढ़: राज्य के पास मत्स्य कृषि के लिए नदी, जलाशयों, पोखरों तथा तालाबों के रूप में व्यापक और विविध प्राकृतिक जल क्षेत्र उपलब्ध है। मत्स्य कृषि के लिए लगभग 1.58 लाख हेक्टर औसत जल क्षेत्र उपलब्ध है। राज्य में दो प्रमुख नदी तंत्र हैं, अर्थात् महानदी तथा गोदावरी और उनकी सहायक नदियां जो 3573 कि.मी. का नेटवर्क बनाती हैं। लगभग 90 प्रतिशत जल क्षेत्र मत्स्य कृषि के अंतर्गत लाया जा चुका है। मत्स्य क्षेत्र को एक शाक्तिशाली आय एवं रोजगार जनक माना जाता है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और सस्ते तथा पोषक आहार का स्रोत हैं। राज्य में 1.50 लाख से अधिक मछुआरे अपनी आजीविका के लिए मात्स्यिकी और जलकृषि पर निर्भर करते हैं। राज्य के सामाजिक-आर्थिक विकास में मत्स्य क्षेत्र का महत्वपूर्ण स्थान है। यह मूलत: मछुआरों के सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से कमजोर और पिछड़े समुदायों की जरूरत पूरी करता हैं।
4. केरल: केरल सरकार मत्स्य क्षेत्र को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है, क्योंकि:- (i) यह क्षेत्र, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, दस लाख से अधिक लोगों को रोजगार और आय उपलब्ध कराता है; (ii) यह आबादी के काफी बड़े हिस्से की प्रोटीन की आवश्यकता को पूरा करता है; और (iii) यह राज्य के कोष में काफी राजस्व उपलब्ध कराता है, विशेषत: विदेशी मुद्रा में। अत: इसने अनेक परियोजनाएं तथा कार्यक्रम शुरू किए हैं - उत्पादन बढ़ाने के लिए, मत्स्य धन के संरक्षण तथा चिरस्थायी उपयोग सुनिश्चित करने के लिए, मत्स्य और झींगे की कृषि को बढ़ावा देने के लिए, मत्स्य के अवतरण हेतु मत्स्यन पत्तनों तथा सुविधाओं के विकास के लिए, मत्स्य के विपणन हेतु सुविधाओं को सुदृढ बनाने के लिए, मछुआरों के उत्थान तथा कल्याण के लिए। केरल में मत्स्य क्षेत्र के महत्व और एक समुद्री राज्य के रूप में केरल की विशिष्ट स्थिति पर राष्ट्रीय नीतियों में विचार किया जाना हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में राज्य की स्थिति बनाए रखने के लिए जरूरी है कि मत्स्य संसाधन प्रौद्योगिकी में हाल की प्रवृत्तियों का समावेश किया जाएं। सरकार मत्स्य नीति, पर भी विचार कर रही हैं जो अगले पच्चीस वर्षों के लिए प्रस्तावित इस क्षेत्र में कार्य योजनाओं तथा कल्याण गतिविधियों का ब्लू प्रिंट हैं।
5. गोवा : मत्स्यन इस राज्य की पारंपरिक और महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि है। गोवा भारत के पश्चिमी तट पर स्थिति है। इसकी 100 कि.मी. से अधिक लंबी तटरेखा है और 250 कि.मी के अंतर्देशीय जलमार्ग हैं, अत: यह समुद्री संपदा में समृद्ध हैं। झींगे, महत्वपूर्ण विदेशी मुद्रा अर्जक, बांगडा सारडीन आदि गोवा तट पर प्रचुरता से उपलब्ध हैं। बांगड़े का लवण संसाधन, मत्स्य मांस, मत्स्य तेल, मत्स्य का निर्जलन आदि जैसे मत्स्य संसाधनों पर आधारित लघु पैमाने के अनेक यूनिट स्थापित किए जा रहे हैं। मत्स्यन गतिविधि ने राज्य में डिब्बा-बंदी हिमशीतन और अन्य मत्स्य संसाधन यूनिटों को भी बढ़ावा दिया हैं।
6. लक्षद्वीप : अपने सुंदर पुलिनों और प्रदूषण-रहित परिवेश के कारण लक्षद्वीप जल क्रीडाओं, मत्स्यन आदि जैसी गतिविधियों के लिए एक महान पर्यटक स्थल बन गया है। इस संघ राज्य क्षेत्र के लोग अपनी आजीविका के लिए मुख्यत: कृषि पर निर्भर करते हैं। मत्स्यन लोगों का एक मुख्य सहारा है। नारियल की खेती के साथ, यह लक्षद्वीप के लोगों की आय का मुख्य स्रोत बन गया हे। लक्षद्वीप की 132 कि.मी. की तटरेखा है और 4,200 वर्ग कि.मी. का लैगून क्षेत्र है। द्वीप के इर्द गिर्द का सागर अत्यंत उत्पादी है। मत्स्य की प्रति व्यक्ति उपलब्धता में इन द्वीपों का देश में पहला स्थान हैं। 2004 के दौरान, संघ राज्य क्षेत्र में 10,300 टन मत्स्य का अवतरण हुआ। मुख्य मत्स्य उद्योग स्किप जैक ट्यूना पर विकसित किया गया है। लक्षद्वीप के गिर्द सागर के संसाधनों की अनुमानित संभावना लगभग 1 लाख टन ट्यूना और इतना ही मात्रा शार्क की हैं।
7. ओडिशा : यह राज्य कृषि-आधरित और खाद्य संसाधन उद्योगों को सर्वोच्च प्राथमिकता देता हैं। सरकार ने कृषि में निवेश बढ़ाने के उद्देश्य से एक कृषि नीति बनाई है जिसमें मात्स्यिकी तथा मत्स्य संसाधन पर विशेष ध्यान दिया गया है। व्यापक अप्रयुक्त / अल्पप्रयुक्त जलाशय संसाधनों का उपयोग करके राज्य में मत्स्य का उत्पादन बढ़ाने की दृष्टि से 'राज्य जलाशय मात्स्यिकी नीति' भी घोषित की गई है। इस नीति के उद्देश्य हैं:-
- मत्स्यन समुदायों के विशेष संदर्भ के साथ लाभकारी ग्रामीण रोजगार पैदा करना;
- संरक्षण और चिरस्थायी मत्स्य उत्पादन दोनों के लिए क्रमबद्ध प्रबंधन नीतियों का समावेश करना;
- निजी क्षेत्र से अधिक निवेश आकर्षित करना;
- जलाशय मात्स्यिकी के विशेष संदर्भ के साथ मत्स्य क्षेत्र के लिए उद्यम को प्रेरित करना;
- जलाशय मात्स्यिकी के संचालन में उन्नत प्रौद्योगिकी शुरू करके पारंपरिक विधियों को बदलना;
- मछुआरों / मछुआ महिलाओं में जलाशय संचालन और संगठनात्मक दृढ़ीकरण की कुशलता विकसित करना;
- राज्य के लिए अच्छा खासा राजस्व पैदा करना।
8. पुडुचेरी : कृषि संसाधन उद्योग का एक महत्वपूर्ण घटक समुद्री उत्पाद संसाधन हैं। पुडुचेरी की लंबी तटरेखा उसके मत्स्य क्षेत्र की वृद्धि और विकास के लिए भरपूर अवसर उपलब्ध कराती हैं। श्रिम्प की कृषि और कर्कट की खेती में बहुत गुंजायश-विद्यमान है। आधुनिक मत्स्यन पत्तन थेंगाइथिट्टू, पुडुचेरी, करूकलचेरी और कराइकल में हैं।