कृषि और सहकारिता विभाग, कृषि मंत्रालय भारत में नोडल अभिकरण है जो पौध रोपण फसलों के विभिन्न पक्षों के साथ कार्य करता है। यह न केवल राष्ट्रीय नीतियों, योजनाओं तथा इस क्षेत्र में उद्यमशीलता को प्रोत्साहन देने के कार्यक्रमों के निर्धारण में शामिल है बल्कि यह विविध पौध रोपण फसलों के उत्पादन तथा उत्पादकता को प्रोत्साहन देने के लिए राज्य सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों को पूरकता एवं सहायता प्रदान करता है।
पुन: केन्द्रीय पौधरोपण फसल अनुसंधान संस्थान (सीपीसीआरआई) का गठन पौधरोपण फसलों पर अनुसंधान आयोजित करने के लिए भारत में एक अग्रणी संस्थान के रूप में किया गया है। इसकी स्थापना 1916 में की गई थी किन्तु आगे चलकर इसे 1970 के दौरान भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के अधिदेश के तहत लाया गया। इसका आरंभिक अधिदेश नारियल, सुपारी, कोकोआ, पाम तेल, काजू और मसालों की फसल के पालन पर था। जबकि पुन: संरचना की प्रक्रिया के परिणाम स्वरूप मसालों, काजू और पाम तेल के लिए अलग अलग अनुसंधान संस्थान / केन्द्र स्थापित किए गए किन्तु इन संस्थानों के साथ सीपीसीआरआई की सशक्त संबद्धता जारी रही। संस्थान का मुख्य उद्देश्य नारियल, सुपारी और कोकोआ के लिए मूलभूत तथा अनुप्रयुक्त अनुसधान के लिए उपयुक्त उत्पादन, सुरक्षा एवं संसाधन प्रौद्योगिकियों का विकास करना है। इसके अन्य उद्देश्य इस प्रकार हैं :
- पौधरोपण फसलों के लिए आनुवांशिक संसाधनों के एक राष्ट्रीय संग्राहालय के रूप में कार्य करना।
- अभिभावक लाइनों और प्रजननकर्ताओं के भण्डार उत्पादित करना।
- इकाई क्षेत्र से उत्पादकता और आय को बढ़ाने के प्राकृतिक संसाधनों के अधिक प्रभावी उपयोग के माध्यम से फसल / कृषि प्रणालियों पर आधारित उन्नत पाम का विकास करना।
- सभी संबंधित व्यक्तियों से अधिदेश फसलों पर सूचना का संग्रह, संकलन और प्रसार
- देश के अंदर अधिदेश फसलों पर अनुसंधान का समन्वय और पाम पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना के तहत अनुसंधान कार्यक्रमों का निष्पादन।
- विकास संबंधी विभागों के सहयोग के माध्यम से सीपीसीआरआई में किसानों के लिए विकसित प्रौद्योगिकियों का अंतरण।
कृषि मंत्रालय के अधीन 'नारियल विकास मंडल (सीडीबी)', भी है, जो उत्पादकता में वृद्धि एवं उत्पाद विविधीकरण पर फोकस सहित देश में नारियल पैदावार तथा उद्योग के समेकित विकास के लिए उत्तरदायी है। मंडल का मुख्यालय केरल में कोची नामक स्थान पर तथा क्षेत्रीय कार्यालय कर्नाटक के बैंगलोर, तमिलनाडु के चैन्नई और बिहार के पटना में है। ओडिशा के भुवनेश्वर, पश्चिम बंगाल के कोलकाता, असम के गुवाहाटी, त्रिपुरा के अगरतला और आंध्र प्रदेश के हैदराबाद तथा अंडमान और निकोबार द्वीप के संघ राज्य क्षेत्र में पोर्ट ब्लेयर स्थानों पर 6 राज्य केन्द्र हैं। मंडल के प्रबलन क्षेत्र इस प्रकार हैं :- (i) गुणवत्तापूर्ण पौधरोपण सामग्री के उत्पादन को बढ़ाना; (ii) नारियल के लिए और अधिक क्षेत्रफल को लेकर भावी उत्पादन संभाव्यता का सृजन; (iii) मौजूदा नारियल स्वामित्वों के उत्पादन में सुधार लाना; (iv) प्रमुख पीड़कों और रोगों के समेकित प्रबंधन को प्रोत्साहन देना; और (v) उत्पाद विविधीकरण और उप उत्पाद उपयोगिता को प्रोत्साहन देकर नारियल उद्योग को सुदृढ़ बनाना।
नारियल मंडल के मुख्य कार्य इस प्रकार हैं :-
- नारियल उद्योग के विकास के उपाय अपनाना
- नारियल उगाने और उद्योग में संलग्न व्यक्तियों को तकनीकी सलाह देना
- नारियल के तहत आने वाले क्षेत्रफल के विस्तार हेतु वित्तीय तथा अन्य सहायता देना
- नारियल और इसके उत्पादों के संसाधन के लिए आधुनिक प्रौद्योगिकियों को अपनाने का प्रोत्साहन देना।
- नारियल और इसके उत्पादों के लिए प्रोत्साहन मूल्य पाने के उपाय अपनाना।
- नारियल और इसके उत्पादों के विपणन में सुधार के लिए उपायों की सिफारिश।
- नारियल और इसके उत्पदों के आयातों तथा निर्यातों के विनियमन हेतु उपायों की सिफारिश।
- नारियल और इसके उत्पादों के ग्रेड, विशिष्टियों और मानकों को निर्धारित करना।
- नारियल के उत्पादन में वृद्धि के लिए उपयुक्त निधिकरण योजनाएं और नारियल की गुणवत्ता तथा उत्पादकता में सुधार।
- नारियल तथा इसके उत्पादों पर कृषि, प्रौद्योगिकी, औद्योगिक या आर्थिक अनुसंधान में सहायता, प्रोत्साहन, प्रवर्तन और निधिकरण।
- नारियल तथा इसके उत्पादों पर आंकड़े जमा करना और इन्हें प्रकाशित करना।
- नारियल और इसके उत्पादों पर प्रचार गतिविधियां करना तथा पुस्तकें और पत्रिकाएं प्रकाशित करना।
पुन: भारतीय चाय बोर्ड है, जिसकी स्थापना वित्त तथा उद्योग मंत्रालय, के तहत भारत में चाय उद्योग के सशक्त विकास को प्रोत्साहन देने के लिए की गई है। चाय बोर्ड के मुख्य कार्यों में शामिल हैं इसके संवर्धन, निर्माण, विपणन के लिए वित्तीय तथा तकनीकी सहायता प्रदान करना; चाय के आयातों को प्रोत्साहन देना; चाय उत्पादन की वृद्धि के लिए अनुसंधान और विकास गतिविधियों में सहायता देना तथा चाय की गुणवत्ता में सुधार के साथ छोटे स्तर पर चाय उगाने वालों को वित्तीय एवं तकनीकी सहायता तथा प्रोत्साहन प्रदान करना।
भारतीय कॉफी बोर्ड एक स्वायत्त निकाय है जो वाणिज्य तथा उद्योग मंत्रालय के अधीन कार्य करता है और भारत में कॉफी उद्योग के एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है। यह बोर्ड भारतीय कॉफी के अनुसंधान, विकास, विस्तार, गुणवत्ता उन्नयन, बाजार की सूचना और घरेलू तथा बाह्य प्रवर्तन पर केन्द्रित है।
वाणिज्य तथा उद्योग मंत्रालय के तहत रबर बोर्ड, है जो भारत में रबर उद्योग के विकास में सक्रिय रूप से संलग्न है, यह विभिन्न गतिविधियां करता है जैसे कि रबर के क्षेत्र में वैज्ञानिक, तकनीकी और आर्थिक अनुसंधान में सहायता तथा प्रोत्साहन देना; रबर उगाने वालों को तकनीकी सलाह प्रदान करना और उगाने वालों को पौध रोपण तथा संवर्धन की उन्नत विधियों के बारे में प्रशिक्षण देना।
इसके अलावा काजू और कोकोआ विकास निदेशालय एक राष्ट्रीय अभिकरण है जो भारत में काजू और कोकोआ के समग्र विकास में प्राथमिक रूप से संलग्न है। निदेशालय निम्नलिखित प्रमुख उद्देश्यों के साथ कार्य करता है :-
- देश में काजू और कोकोआ पर विभिन्न विकास कार्यक्रमों का निर्धारण और निष्पादन।
- राज्यों में विकास कार्यक्रमों के प्रभावी कार्यान्वयन की निगरानी।
- देश में काजू और कोकोआ उत्पादन, विपणन तथा अन्य संबद्ध कार्यक्रमों की आयोजना और निष्पादन के लिए विकास तथा अनुसंधान हेतु एक फीड बैक अभिकरण के रूप में कार्य करना।
- सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की भूमि पर काजू के विकास के लिए बंजर भूमि का उपयोग करना।
- विकास कार्यक्रमों के निष्पादन में सामने आने वाली कठिनाइयों को दूर करने के लिए तकनीकी परामर्श और सुझाव प्रदान करना।
- विकास कार्यक्रमों की समीक्षा, उत्पादन के संदर्भ में उन्नत तकनीकों को अपनाने एवं उनके प्रसार के कदम उठाने का दायित्व लेना, संसाधन और विपणन, आपूर्ति के स्रोतों को अभिज्ञात करना तथा निवेश आवश्यकताओं के विशिष्ट संदर्भ में परियोजना की आवश्यकताओं को पूरा करना तथा आवश्यकताओं का आकलन।
- फसल, क्षेत्र उत्पादन, मूल्य रुझान, विपणन और निर्यात, आयात और आंतरिक परिस्थितियों के कारोबार निष्पादन पर डेटा बैंक के रूप में कार्य करना।
- फसल विकास, विपणन तथा उप उत्पाद उपयोगिता के विभिन्न पक्षों की सिफारिश, पर्यवेक्षण और निगरानी के लिए एक सलाहकार निकाय के रूप में कार्य करना।
- वस्तुओं के विपणन में सुधार हेतु सहायता देना।
- राज्यों तथा केन्द्रीय संस्थानों के साथ नजदीकी समन्वय बनाए रखना।
- पत्रिका, विवरणिका आदि प्रकाशित करने एवं गोष्ठियों और प्रदर्शनियों में भाग लेने जैसे सघन प्रचार उपाय करना।
भारतीय काजू निर्यात प्रवर्तन परिषद (सीईपीसी) की स्थापना भी काजू की गिरी और काजू के छिलके के तरल को भारत से निर्यात करने के प्रोत्साहन उद्देश्य सहित काजू उद्योग की सक्रिय भागीदारी से भारत सरकार द्वारा 1955 में की गई थी। अपने आरंभ से ही परिषद द्वारा विभिन्न कार्यों के निष्पादन हेतु अनिवार्य संस्थागत रूपरेखा प्रदान की जाती है जो काजू की गिरी और काजू के छिलके के तरल के निर्यात को सघन बनाने के साथ प्रोत्साहन देता है। यह विदेशी आयातकों के साथ काजू गिरी के सदस्य निर्यातकों को अनिवार्य समन्वय प्रदान करता है। यह संविदात्मक बाध्यताओं के पूरा करने में हुई भिन्नता और / या गुणवत्ता में निर्यातकों / आयातकों के मामले में शिकायतों को सौहार्द पूर्ण रूप से सुलझाता है।