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भारत के मत्स्य उद्योग को बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय सरकार और राज्य सरकारों ने अनेक नीति प्रवर्तन तथा उपाय किए हैं। केंद्रीय स्तर पर, व्यापक समुद्री मत्स्यन नीति 2004 के रूप में एक महत्वपूर्ण नीति घोषित की गई है। उस नीति के उद्देश्य है :-
- एक उत्तरदायी तरीके से देश के समुद्री मत्स्य उत्पादन को एक चिरस्थायी स्तर तक बढ़ाना ताकि देश से समुद्री खाद्य के निर्यात में वृद्धि हो और जनता का प्रति व्यक्ति मत्स्य प्रोटीन अंतर्ग्रहण भी बढ़े।
- शिल्पी मछुआरों की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना जिनकी आजीविका मात्र इसी व्यवसाय पर निर्भर करती हैं;
- पारिस्थितिक अखंडता और जैव विविधता आदि पर उचित ध्यान देते हुए समुद्री मात्स्यिकी का चिरस्थायी विकास सुनिश्चित करना; आदि।
इस प्रकार यह नीति जीवन-निर्वाह स्तर के मछुआरों की रक्षा, सम्मान और प्रोत्साहन का समर्थन करती है। इसका उद्देश्य भारत के अमूल्य समुद्री धन के संरक्षण, प्रबंधन तथा चिरस्थायी उपयोग को बढ़ावा देना है।
पहले, समुद्री मत्स्यन नीतियां केवल गंभीर-सागर क्षेत्र की विकासात्मक आवश्यकताओं पर केंद्रित होती थीं और तटीय क्षेत्र से संबंधित ऐसे मुद्दों को उनके समुद्री राज्यों/ संघ राज्य क्षेत्रों पर छोड़ दिया जाता था। तटीय मत्स्य उद्योग के विकास के लिए राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को केंद्रीय और केंद्र द्वारा समर्थित योजनाओं के माध्यम से काफी सहायता तो दी जाती थी, फिर भी, इस क्षेत्र के लिए कोई समेकित नीति न होने के कारण राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति में बाधा आती थी। अत:, इस वर्तमान नीति में, सरकार चाहती है कि गभीर सागर में जाने वालों के साथ ही पारंपरिक तथा तटीय मछुआरों पर भी ध्यान केंद्रित किया जाए ताकि देश के सीमांतर्गत तथा सीमाबाह्य दोनों जल क्षेत्रों में समुद्री मत्स्य उद्योग का सामंजस्यपूर्ण विकास हो सके।
देश में मत्स्यन गतिविधियों के समेकित विकास के लिए, समय-समय पर, राज्य/यूटी स्तर पर भी मत्स्य उद्योग नीतियां बनाई गई हैं। उदाहरणत:, ओडिशा की राज्य जलाशय मत्स्यपालन नीति छत्तीसगढ़ की मत्स्यपालन नीति आदि।
मत्स्य क्षेत्र के विकास के लिए 'केंद्र द्वारा समर्थित' योजनाएं हैं:-
1. अंतर्देशीय मत्स्य उद्योग और जल कृषि के विकास की योजना -
यह केंद्र द्वारा समर्थित योजना है जो मछुआरों तथा मत्स्य क्षेत्र में लगे अन्य लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति सुधारने के उद्देश्य से शुरू की गई है। इसमें देश में विभिन्न रूपों में उपलब्ध मत्स्यन के सभी अंतर्देशीय संसाधन शामिल हैं यथा स्वच्छ जल, खारा जल, शीतल जल, जलाक्रांत क्षेत्र, जल कृषि के लिए नमकीन/क्षारीय मृदाएं, और प्रग्रहण मत्स्यन संसाधन (जलाशय/नदियां आदि)। इसे राज्य सरकारों/यूटी प्रशासनों के माध्यम से क्रियान्वित किया जा रहा है। इस प्रकार, इस योजना के अंतर्गत अनुमोदित घटक हैं :
- स्वच्छ जल कृषि का विकास - यह अंतर्देशीय क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योजना है, जिसे एक ही एजेंसी, अर्थात् फिश फार्मर्ज डेवलपमेंट एजेंसीज (एफएफडीए) द्वारा अपने-अपने राज्यों तथा संघ राज्य क्षेत्रों में क्रियान्वित किया जा रहा है। अब तक देश में 429 एफएफडीए का एक नेटवर्क स्थापित किया जा चुका है। 2006-07 तक, एफएफडीए के माध्यम से लगभग 7.21 लाख हेक्टर जल क्षेत्र वैज्ञानिक मत्स्य कृषि के अंतर्गत लाया गया। योजना के मुख्य उद्देश्य है: मत्स्य कृषि को लोकप्रिय बनाना, रोजगार के अवसर पैदा करना तथा जल कृषि की रीतियों में विविधता लाना और मत्स्य किसानों को सहायता उपलब्ध कराना ताकि प्रशिक्षित और सुव्यवस्थित मत्स्य किसानों का एक संवर्ग बन जाए जो पूरी तरह जल कृषि में लगा हो। अंतर्देशीय मत्स्य उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से मत्स्य किसानों को नए पोखरों के निर्माण, पोखरों तथा तालाबों के पुनरूद्धार/नवीकरण, पहले वर्ष के निवेश (मत्स्य बीज, उर्वरक, खाद आदि), समेकित मस्त्य कृषि, बहते हुए जल में मत्स्य कृषि मत्स्य बीज हैचारियों और मत्स्य आहार मिलों की स्थापना आदि के लिए इमदाद के रूप में सहायता दी जाती है। प्रगतिशील मत्स्य किसानों को मत्स्य की उत्पादकता और बढ़ाने के उद्देश्य से एअरेटर खरीदने के लिए भी सहायता दी जाती है। विकासात्मक गतिविधियों पर खर्चा भारत सरकार और राज्य सरकारों के बीच 75:25 के आधार पर बांटा जाता है। संघ राज्य क्षेत्रों के लिए केंद्र सरकार शत प्रतिशत निधि उपलब्ध कराती है।
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खारे पानी की जल कृषि का विकास - यह योजना देश के खारे पानी के विशाल क्षेत्र का उपयोग श्रिम्प के पालन के लिए करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। यह 39 खारा पानी मत्स्य किसान विकास एजेंसियों (बीएफडीए) के माध्यम से क्रियान्वित की जा रही है जो सभी तटीय राज्यों और अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के संघ राज्य क्षेत्र में स्थापित की गई हैं। यह मुख्यत: लघु पैमाने के क्षेत्र में श्रिम्प किसानों को तकनीकी, वित्तीय और विस्तार समर्थन उपलब्ध कराती है। 2006-07 के दौरान लगभग 312 हेक्टर का अतिरिक्त क्षेत्र श्रिम्प कृषि के अंतर्गत लाया गया और 500 मछुआरों को उन्नत रीतियों में प्रशिक्षित किया गया।
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पहाड़ी इलाकों में शीतल जल मत्स्य पालन और जल कृषि का विकास
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जलाक्रांत क्षेत्रों का जलकृषि संपदा में विकास
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अंतर्देशीय नमकीन / क्षारीय मृदाओं का जलकृषि और अंतर्देशीय प्रग्रहण संसाधनों (जलाशयों / नदियों आदि) के लिए उत्पादी उपयोग।
अंतिम तीन घटक संबंधित राज्यों/ संघ राज्य क्षेत्रों के मत्स्य पालन विभाग के माध्यम से क्रियान्वित किए जा रहे हैं।
2. समुद्री मत्स्य उद्योग, मूल संरचना और मत्स्य-संग्रहण के बाद की क्रियाओं के विकास की योजना-
इस योजना के अंतर्गत्, केंद्रीय सरकार समुद्री क्षेत्र के पूर्ण विकास के लिए राज्य/ संघ राज्य क्षेत्रों सरकारों के माध्यम से गरीब मछुआरों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती है। योजना मुख्यत: पारंपरिक शिल्पों के मोटरीकरण पर केंद्रित है, लघु मशीनीकृत क्षेत्र की सहायता के लिए ईंधन पर उत्पाद शुल्क में इमदाद देती है, सुरक्षित लैंडिंग, बर्थिंग तथा पोस्ट-हार्वेस्ट क्रियाओं आदि के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर स्थापित करती हैं। इसमें निम्नलिखित घटक है:-
- तटीय मत्स्य उद्योग का विकास - यह पारंपरिक मछुआरों की सामाजिक-आर्थिक दशा सुधारने के लिए शुरू की गई हैं। यह उप-घटकों के माध्यम से अपने विभिन्न उद्देश्यों को पूरा करती है, यथा:-
- उत्तम डिजाइन के मध्यवर्ती शिल्पों का समावेश : यह उचित डिजाइन वाली नौकाओं की यथेष्ठ संख्या की कल्पना करता है ताकि देश के अनन्य आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) की मत्स्यन संभावना का न्यायोचित ढंग से लाभ उठाया जा सके। नई पीढ़ी के इस शिल्प को अपनाने के लिए इसमें मछुआरों के समूहों को वित्तीय प्रोत्साहन देने का प्रावधान है। यह योजना राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) के माध्यम से क्रियान्वित की जा रही है। सहायता के लिए केवल सहकारी संस्थाएं/हितभोगियों के समूह ही पात्र होंगे। लगभग 18 मीटर लंबे संसाधन विशिष्ट मत्स्यन वाहनों के बहु-दिवसीय मध्यवर्ती वर्ग पर यह घटक 40.00 लाख रु. की यूनिट लागत से क्रियान्वित किया जाना है जिस पर लागत के 10 प्रतिशत के समतुल्य, किंतु 4.00 लाख रु. तक सीमित, इमदाद दी जाती है।
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पारंपरिक शिल्प का मोटरीकरण : इस योजना के अंतर्गत सरकार गरीब मछुआरों को अपने पारंपरिक शिल्प के मोटरीकरण के लिए और पारंपरिक मत्स्यन क्षेत्र के प्रौद्योगिकी उन्नयन के लिए भी इमदाद देती है। इसका उद्देश्य मछुआरों को अपना शारीरिक श्रम कम करने तथा मत्स्यन क्षेत्र और क्रिया की आवृत्ति भी बढ़ाने में मदद करना है जिससे शिकार की मात्रा और मछुआरों की आय में वृद्धि हो। योजना को इस संशोधन के साथ जारी रखा जा रहा है कि इमदाद का लाभ 8-10 एचपी की आउट बोर्ड मोटर (ओबीएम) के लिए दिया जाएगा और, इंजन की लागत का 50 प्रतिशत इमदाद के रूप में दिया जाता है, किंतु प्रति ओबीएम 20.000 रु. से अधिक नहीं, जो केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बराबर-बराबर बांटा जाता है। यूटी के मामले में, इमदाद की पूरी राशि केंद्र देता है। इसे राज्यों/राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) के माध्यम से भी क्रियान्वित किया जा रहा है।
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एचएसडी तेल पर मछुआरा विकास छूट : इस योजना में 20 मीटर से नीचे के मत्स्यन स्तरों द्वारा प्रयुक्त एचएसडी तेल पर केद्रीय उत्पाद शुल्क की प्रतिपूर्ति का प्रावधान है ताकि लघु यंत्रीकृत मत्स्यन नौका चालकों द्वारा किए गए प्रचालनिक खर्चे का प्रतिकार हो जाए। इस घटक के अंतर्गत 1.50 रु. प्रति लीटर की दर से एचएसडी तेल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क की इमदाद दी जाती है जो केंद्र तथा राज्यों के बीच 80:20 के आधार पर बांटी जाती है, और राज्यों (जिन्होंने एचएसडी तेल को बिक्री कर से पूरी तरह मुक्त कर दिया है) तथा संघ राज्य क्षेत्रों के मामले में पूरी तरह केंद्र द्वारा वहन की जाती है।
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समुद्र में मछुआरों की सुरक्षा : यह योजना एक ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) और 20 मीटर से कम लंबाई के लघु-मशीनीकृत मत्स्यन वाहनों पर एक वायरलेस सेट स्थापित करके सागर में मछली पकड़ते समय मछुआरों की सुरक्षा के मद्दे पर ध्यान देने के लिए शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य मछली पकड़ते समय चोट और/या जीवन, मत्स्यन नौकाओं तथा उपकरणों की हानि को रोकना है और बोर्ड पर आरंभिक चेतानवनी प्रणाली उपलब्ध कराना भी।
- गंभीर सागर मत्स्यन का विकास-इस योजना में मूलत: दो घटक है:-
- संसाधन विशिष्ट गभीर सागर मत्स्यन वाहन: यह घटक स्टर्न ट्रॉलर/श्रिम्प ट्रॉलर के प्रौद्योगिक हस्तक्षेप के रूप में मोनो-फिलामेंट लॉन्ग-लाइनिंग में परिवर्तन की कल्पना करता है ताकि वर्तमान ट्रॉलर बेडे और महासागरीय ट्यूना तथा संबंधित जातियों के न्यून उपयोग से निपटा जा सके।
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वीएमएस का समावेश: इस घटक के अंतर्गत, एक स्कोपिंग अध्ययन करने के बाद शुरू में 50 गभीर सागर मत्स्यन वाहनों के लिए वाहन निगरानी प्रणाली (वीएमएस) का समावेश किया गया हे। द कोस्ट गार्ड इसकी क्रियान्वयन एजेंसी है।
- मूल संरचना सुविधाओं का विकास इस योजना का उद्देश्य मत्स्य उद्योग क्षेत्र की मूल संरचना आवश्यकताओं को पूरा करना और समुद्री मत्स्य के उत्पादन तथा निर्यात को बढाना है इसमें निम्नलिखित शामिल है:-
- मत्स्यन पत्तनों और मत्स्य अवतरण केंद्रों की स्थापना : यह योजना पारंपरिक मत्स्यन वाहन, यंत्रीकृत मत्स्य वाहनों और गभीर सागर मत्स्यन वाहनों के सुरक्षित अवतरण तथा बर्थिंग के लिए मूल संरचना सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। योजना के अंतर्गत बनाई गई सुविधाएं मत्स्यन पत्तन और मत्स्य अवतरण केंद्र हैं जिसमें ब्रेकवाटर, वार्फ, जेटी, ड्रेजिंग, रीक्लेमेशन, क्वे, ऑक्शन हाल, स्लिदवे, वर्कशॉप, नेट मेंडिंग शेड और अन्य आनुषंगिक सुविधाएं शामिल हैं।
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ड्रेजर टीएसडी सिंधुराज का रखरखाव : हर मत्स्य पत्तन/मत्स्य अवतरण केंद्र में प्राकृतिक रूप से गाद जमा होती है। पत्तन/अवतरण केंद्रों के बेसिन को सुरक्षित नौवहन हेतु सही रखने के लिए आवधिक रखरखाव/निकर्षण जरूरी है। तदनुसार, जापानी सहायता अनुदान कार्यक्रम कें अंतर्गत 1248.00 मिलियन जापानी येन की सहायता के साथ एक ट्रेलिंग सक्शन हॉपर ड्रेजर 'टीएसडी सिंधुराज' प्राप्त किया गया है। उथले जल में निकर्षण के लिए यह अत्यंत उपयुक्त है। 2.00 से 2.50 मीटर ड्राफ्ट और 200 घन मीटर हॉपर क्षमता वाला ड्रेजर प्रति वर्ष लगभग 2.00 लाख घन मीटर गाद निकाल सकता है। ड्रेजर का प्रचालन तथा रखरखाव पत्तन विभाग, केरल सरकार द्वारा किया जाता है, जिसके लिए पूंजीगत रखरखाव लागत तथा बीमा आदि केंद्र द्वारा वहन किया जाता है।
- हार्वेस्ट उपरांत मूल संरचना का विकास - यह योजना मत्स्य किसानों को उनके उत्पाद के लिए लाभकर कीमत दिलाने और उपभोक्ताओं को उचित कीमत पर ताजा मछली उपलब्ध कराने के लिए सुविधाएं बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। इस घटक के अंतर्गत, राज्य मत्स्य उद्योग सहकारी संस्थाओं, सहकारी परिसंघ और प्राथमिक सहकारी संस्थाओं को फिश हैंडलिंग शैडों बर्फ संयंत्रों, शीत भंडारागारों, खुदरा दुकानों आदि के रूप में अपने विपणन मूल संरचना को सुदृढ करने में सहायता दी जाती है। इसके दो उप-घटक हैं : (i) मत्स्य परिरक्षण एवं भंडारण मूल संरचना विकसित करना; और (ii) विपणन मूल संरचना विकसित करना यथा खुदरा बिक्री किओस्क, जल-दुकानें, ऊष्मा रोधित/प्रशीतित वाहन, आईस-बॉक्स, मत्स्य प्रदर्शन केबिनेट, विसिकूलर आदि। यह कार्यक्रम एक अवस्थिति विशिष्ट तरीके से मछुआ-महिलाओं, गैर-सरकारी संगठनों, सहकारी संस्थाओं, संयुक्त क्षेत्रों, सरकारी उपक्रमो, और निगमों के स्वावलंबन समूहों के माध्यम से क्रियान्वित किया जाता है। निधीयन का स्वरूप है: सरकारी उपक्रमों / निगमों / परिसंघों को 100 प्रतिशत अनुदान रू. 1.00 करोड़ तक सीमित); उत्तर पूर्व (एनई) प्रदेश/पहाड़ी/ जनजातीय क्षेत्रों में गैर-सरकारी संगठनों / सहकारी संस्थाओं / संयुक्त क्षेत्र/ मछुआ-महिलाओं के समूह को 75 प्रतिशत अनुदान (रू. 0.75 करोड़ तक सीमित) और सामान्य क्षेत्रों में 50 प्रतिशत अनुदान (रू. 0.50 करोड़ तक सीमित); उत्तर पूर्व प्रदेश/ पहाड़ी/ जनजातीय क्षेत्रों में सहायता-प्राप्त क्षेत्र/ निजी क्षेत्र को 50 प्रतिशत अनुदान (रू. 0.40 करोड़ तक सीमित) और सामान्य क्षेत्रों में 25 प्रतिशत अनुदान (रू. 0.25 करोड़ तक सीमित)।
3. मछुआरों के लिए कल्याण कार्यक्रम, मत्स्य उद्योग प्रशिक्षण और विस्तार पर राष्ट्रीय योजना -
यह योजना मछुआरों को उनके कल्याण के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने हेतु और मत्स्य उद्योग क्षेत्र के लिए प्रशिक्षण तथा विस्तार समर्थन की व्यवस्था करने हेतु शुरू की गई है। यह मुख्यत: दो उप-योजनाओं में विभाजित है:-
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मछुआरों के कल्याण पर राष्ट्रीय योजना - यह योजना अपने तीन उप-घटकों के साथ मछुआरों के लिए कल्याण कार्यक्रम प्रवर्तित करना चाहती है:-
- आदर्श मछुआ ग्रामों का विकास : इस घटक का उद्देश्य मछुआरों के लिए आधारभूत नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराना है यथा आवास, पेय जल और सामुदायिक हाल का निर्माण। एक मछुआ ग्राम में 10 से कम घर नहीं होंगे। गांवों में हर 20 घरों के लिए एक नलकूप की दर से नलकूपों की व्यवस्था की जाएगी। मनोरंजन और सांझे कार्यस्थल के लिए, कम से कम 75 घरों वाला मछुआ ग्राम एक सामुदायिक हाल के निर्माण के लिए वित्तीय सहायता लेने का पात्र है। योजना के अंतर्गत यूनिट लागत है : एक मकान के लिए रू. 40,000 रू. नलकूप के लिए रू. 30,000 (उत्तर पूर्वी प्रदेश के लिए रू. 35,000) और सामुदायिक हाल के लिए रू. 1,75,000 खर्चा केंद्रीय और राज्य सरकार के बीच बराबर-बराबर बांटा जाता है। यूटी के मामले में खर्चा पूरी तरह केंद्र द्वारा वहन किया जाता है।
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सक्रिय मछुआरों के लिए सामूहिक दुर्घटना बीमा : इस घटक का उद्देश्य मत्स्यन में सक्रियता से लगे मछुआरों को बीमा सुरक्षा उपलब्ध कराना है। ऐसे सक्रिय मछुआरों का दुर्घटनावश मृत्यु या स्थायी पूर्ण अपंगत के प्रति एक वर्ष के लिए रू. 50,000/- का और स्थायी आंशिक अपंगता के प्रति रू. 25,000/- का बीमा होता है। बीमा किस्त की ऊपरी सीमा रू. 15/- प्रति व्यक्ति है।
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बचत-एवं-राहत : उद्देश्य यह है कि मछुआरों को मत्स्यन की मंदी अवधि के दौरान वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाए। हितभोगी को मंदी-रहित महीनों के दौरान अपनी आय का एक अंश जमा कराना होता है। समुद्री मछुआरों के लिए मासिक अंशदान 8 माह तक 75 /- रू. है और अंतर्देशीय मछुआरों के लिए 9 माल तक 50 रू. ।
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मत्स्य उद्योग प्रशिक्षण और विस्तार की योजना- इस योजना का मुख्य उद्देश्य यह है कि मत्स्य कर्मियों को प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे मत्स्य उद्योग के विस्तार के कार्यक्रम कुशलतापूर्वक चला सकें। योजना मछुआरों को अपनी कुशलता बढ़ाने के लिए सहायता उपलब्ध कराती है। यह योजना वर्ष 1999-2000 से चलाई जा रही है। राज्यों को 80 प्रतिशत केंद्रीय सहायता दी जाती है और संघ राज्य क्षेत्रों तथा अन्य संगठनों को 100 प्रतिशत। योजना के अन्य घटक हैं : यथेष्ट विस्तार सामग्री उपलब्ध कराने के लिए मैनुअल प्रकाशित करना, प्रौद्योगिकियों पर वीडियो फिल्म बनाना और इसका प्रचार, राष्ट्रीय महत्व की बैंठकें / कार्यशालाएं / संगोष्ठियां आदि आयोजित करना।
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मत्स्य क्षेत्र के लिए डाटाबेस और सूचना नेटवर्किंग के सुदृढीकरण की योजना-
यह योजना 100 प्रतिशत केंद्रीय सहायता से क्रियान्वित की जा रही है। इसके प्रमुख घटक हैं:-
- अंतर्देशीय मत्स्य क्षेत्रों पर प्रग्रहण निर्धारण सर्वेक्षण
- सूचना प्रौद्योगिकी नेटवर्किंग
- उपग्रह डाटा का प्रयोग करके भौगोलिक सूचना प्रणाली का विकास
- समुद्री मत्स्य क्षेत्रों के प्रमुख गुणों पर गणना
- समुद्री मत्स्य क्षेत्रों पर प्रग्रहण निर्धारण सर्वेक्षण
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