कृषि उत्पादन में कमी को रोकने के उद्देश्य से सरकार द्वारा हाल के वर्षों में अनेक महत्वपूर्ण प्रवर्तन किए गए हैं। इनमें से कुछ महत्वपूर्ण प्रवर्तन है :
- भारत निर्माण;
- राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम;
- राष्ट्रीय बागबानी मिशन;
- संस्थागत ऋण का किसानों तक प्रसार;
- राष्ट्रीय मधुमक्खी बोर्ड की स्थापना;
- राष्ट्रीय वर्षा-पोषित क्षेत्र प्राधिकरण की स्थापना;
- राष्ट्रीय मत्स्य उद्योग विकास बोर्ड (एनएफडीबी) की स्थापना;
- जल संभर विकास और सूक्ष्म सिंचाई कार्यक्रम;
- कृषि विपणन में सुधार और बाजार के इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास;
- सहकारी क्षेत्र का पुनरूज्जीवन;
- लघु किसान कृषि-व्यवसाय कन्सोर्टियम द्वारा जोखिम पूंजी भागीदारी के माध्यम से कृषि-व्यवसाय का विकास;
- कृषि विस्तार सेवाओं के लिए सुधार और समर्थन;
- राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन;
- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन;
- राज्यों को कृषि में अधिक निवेश के लिए प्रोत्साहित करने हेतु राष्ट्रीय कृषि विकास योजना;
- समेकित खाद्य कानून;
- गोदाम विकास और विनियमन के लिए विधायी ढांचा;
- पादप विविधता संरक्षण और कृषक अधिकार (पीपीवीएफआर) अधिनियम, 2001;
- राष्ट्रीय बांस मिशन; और
- सामान्य सेवा केंद्रो (सीएससी) और आईटी प्रवर्तनों के माध्यम से ज्ञान संयोजकता।
राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई)
यह राज्य सरकारों को अपनी राज्य योजनाओं में कृषि में निवेश का हिस्सा बढ़ाने को प्रेरित करने के लिए बनाई गई थी। इसका उद्देश्य है कि कृषि तथा संबंधित क्षेत्रों का सकल विकास सुनिश्चित करके ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना की अवधि के दौरान कृषि क्षेत्र में 4 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि प्राप्त की जाए। यह राज्य योजना की स्कीम है और स्कीम के अंतर्गत सहायता इस बात पर निर्भर करती है कि कृषि तथा संबंधित क्षेत्रों पर किए गए आधार रेखा प्रतिशत खर्च से ऊपर कृषि तथा संबंधित क्षेत्रों के लिए राज्य के बजट में कितनी राशि उपलब्ध कराई गई है। आरकेवीवाई के अंतर्गत निधियां केद्रीय सरकार द्वारा राज्यों को 100 प्रतिशत अनुदान के रूप में उपलब्ध कराई जानी हैं। स्कीम के मुख्य उद्देश्य हैं :
- राज्यों को कृषि तथा संबंधित क्षेत्रों में सार्वजनिक निवेश बढ़ाने के लिए प्रेरित करना।
- कृषि तथा संबंधित क्षेत्रों की स्कीमों के नियोजन तथा क्रियान्वयन में राज्यों को लचीलापन और स्वायत्तता उपलब्ध कराना।
- कृषि-जलवायवी परिस्थितियों, प्रौद्योगिकी तथा प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर जिलों तथा राज्यों के लिए योजनाओं का निर्माण सुनिश्चित करना।
- सुनिश्चित करना कि स्थानीय जरूरतों/फसलों/प्रथमिकताओं को बेहतर निरूपित किया जाए।
- ध्यान केंद्रित करके प्रमुख फसलों की लब्धि में अंतरालों को कम करने का लक्ष्य प्राप्त करना।
- किसानों को प्रतिफल अधिकतम करना।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम)
यह एक केंद्र द्वारा समर्थित योजना है। इसका उद्देश्य है कि ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना की अवधि के अंत तक गेहूं चावल तथा दालों के उत्पादन में उत्पादन के आधार स्तरों से क्रमश: 10,8 और दो मिलियन टन की वृद्धि की जाए। मिशन का लक्ष्य उपर्युक्त फसलों के खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि निम्नलिखित उपायों से करने का है : क्षेत्र का प्रसार तथा उत्पादकता वृद्धि; मृदा की उर्वरता और उत्पादकता की बहाली; रोजगार के अवसर पैदा करना; और लक्षित जिलों के किसानों को आत्मविश्वास बहाल करने के लिए खेत स्तर की अर्थव्यवस्था को बढाना। इसे देश के 16 राज्यों के 305 जिलों में कियान्वित किया जा रहा है।
एनएफएसएम की विभिन्न गतिविधियां हैं : उन्नत उत्पादन प्रौद्योगिकी की प्रदर्शन, उच्च उत्पादी किस्मों तथा संकरों के उत्तम बीजों का वितरण, नवमोचित किस्मों को लोकप्रिय बनाना, सूक्ष्म पोषकों के लिए समर्थन और प्रशिक्षण तथा मास मीडिया अभियान, सर्वोत्तम निष्पादन करने वाले जिलों के लिए पुरस्कारों सहित। पहचाने गए जिलों को कोई भी स्थानीय क्षेत्र-विशिष्ट नीति अपनाने की छूट दी जाती है जो जिले के कृषि विकास के लिए तैयार की गई सामरिक अनुसंधान एवं विस्तार योजना (एसआरईपी) में शामिल है।
किसानों के लिए राष्ट्रीय नीति, 2007
भारत सरकार ने राष्ट्रीय किसान आयोग की सिफारिशों को ध्यान में रख कर और राज्य सरकारों से परामर्श के बाद 'किसानों के लिए राष्ट्रीय नीति, 2007' अनुमोदित कर दी है। किसानों के लिए राष्ट्रीय नीति ने, अन्य बातों के साथ, खेती क्षेत्र के विकास के लिए एक संपूर्ण दृष्टिकोण की व्यवस्था की है।
इस नीति का मुख्य केंद्र समग्र रूप से परिभाषित 'किसान' है, न कि केवल कृषि के संदर्भ में। उस दृष्टि से यह एक कृषि नीति से बहुत अधिक व्यापक है। अन्य बातों के साथ इसका उद्देश्य यह है कि किसानों की निवल आय में काफी सुधार करके खेती की आर्थिक व्यवहार्यता को सुधारा जाए। यह कहने की जरूरत नहीं कि उपयुक्त कीमत नीति, जोखिम घटाने के उपायों आदि के अतिरिक्त उत्पादकता में वृद्धि, लाभकारिता, संस्थागत समर्थन, और भूमि, जल तथा समर्थन सेवाओं के सुधार पर जोर दिया गया है।
किसानों के लिए राष्ट्रीय नीति के मुख्य लक्ष्य हैं :
- किसानों की निवल आय में काफी वृद्धि करके खेती की अार्थिक व्यवहार्यता में सुधार करना और यह सुनिश्चित करना कि कृषि की प्रगति इस आय में वृद्धि द्वारा मापी जाए।
- संरक्षण में एक आर्थिक बाजी बना कर खेती की प्रमुख प्रणालियों की उत्पादकता, लाभकारिता तथा स्थिरता में चिरस्थायी वृद्धि के लिए अनिवार्य भूमि, जल, जैव-विविधता तथा आनुवंशिक संसाधनों की रक्षा और सुधार करना।
- समर्थन सेवाएं विकसित करना जिसमें शामिल है बीजों, सिंचाई, शाक्ति, मशीनरी एवं उपकरणों, उर्वरकों और किसानों के लिए पर्याप्त मात्रा में उचित कीमत पर ऋण की व्यवस्था।
- किसान परिवारों की आजीविका तथा आय सुरक्षा और राष्ट्र के स्वास्थ्य तथा व्यापार सुरक्षा के बनाए रखने के लिए फसलों, खेतों के पशुओं, मत्स्य तथा वन के वृक्षों की जैव-सुरक्षा को सुदृढ करना।
- किसानों की आय बढाने के लिए उपयुक्त कीमत और व्यापार नीति तंत्र उपलब्ध कराना।
- किसानों की समय से और पर्याप्त क्षतिपूर्ति के लिए उचित जोखिम प्रबंधन उपाय उपलब्ध कराना।
- भूमि सुधार में बचे हुए काम को पूरा करना और व्यापक संपदा एवं जलजीविय सुधार शुरू करना।
- खेत की सभी नीतियों तथा कार्यक्रमों में मानव और लिंग आयाम को मुख्य धारा में लाना।
- चिरस्थायी ग्रामीण आजीविकाओं पर स्पष्ट ध्यान देना।
- ग्रामीण भारत में समुदाय-केंद्रित खाद्य, जल तथा ऊर्जा सुरक्षा प्रणालियों को आगे बढ़ाना और हर बच्चे, महिला तथा पुरूष के स्तर पर पोषण की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
- ऐसे उपायों का समावेश करना जो खेती में तथा उच्च मूल्य वर्धन के लिए खेती के उत्पादों के संसाधन में युवाओं को आकर्षित करने और बनाए रखने में मदद कर सकें, उसे बौद्धिक दृष्टि से प्रेरक और आर्थिक दृष्टि से लाभकारी बना कर।
- भारत को जैव प्रौद्योगिकी और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) के माध्यम से विकसित चिरस्थायी कृषि उत्पादों तथा प्रक्रमों के लिए अपेक्षित निवेशों के उत्पादन तथा आपूर्ति में एक वैश्चिक आउटसोर्सिंग हब बनाना।
- कृषि पाठ्यक्रम तथा शैक्षणिक क्रियाविधियों में परिवर्तन करना ताकि खेत और गृह विज्ञान का हर स्नातक उद्यमी बन सके और कृषि शिक्षा को लिंग संवेदी बनाना।
- किसानों के लिए एक सामाजिक सुरक्षा प्रणाली बनाना और लागू करना।
- खेत के घरानों के लिए गैर-खेत रोजगार हेतु यथेष्ठ मात्रा में उपयुक्त अवसर उपलब्ध कराना।