पशुपालन, डेयरी और मात्स्यिकी विभाग भारत में पशुधन के सुधार एवं विकास के लिए अनेक योजनाएं चलाता रहा है। उनमें से कुछ नीचे लिखे अनुसार हैं :
पशुओं और भैंसों के प्रजनन के लिए राष्ट्रीय परियोजना (एनपीसीबीबी)
यह भारत सरकार द्वारा अक्तूबर 2000 में 10 वर्ष की अवधि के लिए शुरू की गई थी, पांच-पांच वर्ष के दो चरणों में। पहले चरण के लिए 402 करोड़ रु. आबंटित किए गए थे और दूसरे चरण के लिए 775.87 करोड़ रु.। इसमें प्राथमिकता के आधार पर देशज नस्लों के आनुवांशिक उन्नयन और विकास की कल्पना की गई हैं।
योजना के उद्देश्य हैं :
- किसानों के द्वार पर अत्यंत उन्नत कृत्रिम गर्भाधान सेवा की व्यवस्था करना;
- प्रजनन योग्य सभी मादा पशुओं तथा भैंसों को 10 वर्ष की अवधि के भीतर कृत्रिम गर्भाधान या उच्च गुणता वाले सांडों द्वारा प्राकृतिक सर्विस के माध्यम से क्रमश: व्यवस्थिति प्रजनन के अंतर्गत लाना;
- देशज पशु तथा भैंस नस्लों के लिए नस्ल सुधार कार्यक्रम शुरू करना ताकि उनके आनुवंशिक गुणों और उनकी उपलब्धता में सुधार हो सके।
योजना के घटक है :
- औद्योगिक गैस निर्माताओं से आपूर्ति लेकर द्रव नाइट्रोजन के भंडारण तथा आपूर्ति को सुकर बनाना और उसके लिए थोक परिवहन तथा भंडारण प्रणालियों स्थापित करना;
- उच्च आनुवांशिक गुणता वाले उत्तम सांडों का समावेश;
- द्वार पर ए.आई. उपलब्ध कराने के लिए निजी मोबाइल ए.आई. सेवा को प्रोत्साहित करना;
- वर्तमान स्थिर सरकारी केंद्रों को मोबाइल केंद्रों में बदलना;
- शुक्राणु केंद्रों, वीर्य बैंकों तथा प्रशिक्षण संस्थाओं में सांडों तथा सर्विसों का उत्तम नियंत्रण एवं प्रमाणन;
- ए.आई. की पहुंच से बाहर वाले क्षेत्रों में प्रजनन प्रणालियों का अध्ययन;
- वर्तमान ए.आई. कार्यकर्ताओं को पुनश्चर्या प्रशिक्षण, ग्रामीण बेरोजगार युवाओं को आधारभूत प्रशिक्षण, व्यवसायियों को प्रशिक्षण और किसान अभिमुखी कार्यक्रमों का आयोजन; और
- आनुवांशिक निवेशों और द्रव नाइट्रोजन के उत्पादन तथा आपूर्ति के पबंधन का काम किसी विशेषज्ञ स्वायत्त और व्यावसायिक राज्य क्रियान्वयन एजेंसी को सौंप कर संस्थागत पुन: संरचना।
पशुधन बीमा योजना
यह 100 प्रतिशत केंद्र द्वारा समर्थित योजना है। इसे देश भर के 100 चुने गए जिलों में 10 वीं पंचवर्षीय योजना के 2005-06 तथा 2006-07 और ग्यारहवीं योजना के 2007-08 वर्षों के दौरान अग्रता के आधार पर क्रियान्वित किया गया है। योजना के अंतर्गत, संकर और उच्च उत्पादी पशुओं तथा भैंसों का बीमा उनके अधिकतम वर्तमान बाजार मूल्य पर किया जाता है। बीमे के प्रीमियम में केंद्र सरकार द्वारा 50 प्रतिशत की इमदाद की गई। शेष 50 प्रतिशत प्रीमियम हितभोगियों द्वारा वहन किया गया।
यह योजना दो उद्देश्यों को ध्यान में रखकर बनाई गई थी - किसानों तथा पशुपालकों को मृत्यु के कारण उनके पशुओं की संभावित हानि के प्रति सुरक्षा तंत्र उपलब्ध कराना और लोगों को पशुधन के बीमे के लाभ दर्शाना तथा पशुधन एवं उनके उत्पादों में गुणात्मक सुधार लाने के अंत्य लक्ष्य के साथ उसे लोकप्रिय बनाना।
यह योजना गोवा को छोड़कर सभी राज्यों में अपने-अपने राज्य के राज्य पशुधन विकास बोर्ड के माध्यम से लागू की गई थी। लक्षित समूह या हितभोगियों में शामिल हैं किसान (बड़े / छोटे / सीमांत) और पशु पालक जिनके पास संकर और उच्च उत्पादी पशु और भैंसे हों।
गहन डेयरी विकास कार्यक्रम (आईडीडीपी)
'नॉन-ऑपरेशन फ्लड, पहाड़ी तथा पिछड़े क्षेत्रों में दुग्ध, दुग्ध उत्पादन और विकास परियोजना की समेकित डेयरी उपलब्धता' (आईडीडीपी) नाम से यह योजना 1993-94 में 100 प्रतिशत सहायता अनुदान के आधार पर शुरू की गई थी। योजना के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित थे:
- दुधारु पशुओं का विकास;
तकनीकी निवेश सेवाओं की व्यवस्था करके दुग्ध के उत्पादन को बढ़ाना;
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लागत प्रभावी विधि से दूध की प्राप्ति, संसाधन तथा विपणन;
दुग्ध उत्पादकों को लाभकर कीमत सुनिश्चित करना;
रोजगार के अधिक अवसर पैदा करना;
अपेक्षाकृत अधिक असुविधाग्रस्त क्षेत्रों के वासियों की सामाजिक,
पोषण और आर्थिक स्थिति में सुधार करना।
मार्च 2005 में योजना में संशोधन किया गया था। संशोधित योजना का नाम 'गहन डेयरी विकास कार्यक्रम' (आईडीडीपी) रखा गया। यह पहाड़ी तथा पिछड़े क्षेत्रों में और उन जिलों में भी लागू की जा रही हैं जिन्हें ऑपरेशन फ्लड़ कार्यक्रम के अंतर्गत डेयरी विकास गतिविधियों के लिए 50.00 लाख रु. से कम मिले।
संशोधित योजना के अंतर्गत निधि सीधे क्रियान्वयन एजेंसियों (राज्य दुग्ध परिसंघों / संघों) को दी जाती है और परियोजनाएं, राज्य दुग्ध परिसंघों/संघों की निपुणता तथा व्यावसायिकता को देखते हुए, उन द्वारा क्रियान्वित की जाती हैं।
योजना शुरू होने से 31.12.2007 तक 25 राज्यों और एक संघ राज्य क्षेत्र के 206 जिलों में 480.05 करोड़ रु. की कुल लागत की 84 परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं। इन परियोजनाओं से 31.12.2007 तक 24,520 गांवों में लगभग 14.97 लाख किसानों को लाभ हुआ है और प्रतिदिन 17.65 लाख लीटर से अधिक दूध प्राप्त हुआ है। 2007-08 के दौरान, राजस्थान और तमिलनाडु में दो नई परियोजनाएं भी अनुमोदित की गई हैं। चालू वर्ष के दौरान (31 दिसंबर 2007 तक) 25.63 रु. की राशि का मोचन किया जा चुका हैं।
उत्तम और स्चच्छ उत्पादन के लिए मूल संरचना को सुदृढ करना
विभाग ने 10 वीं योजना के दौरान 30.00 करोड़ रु.की लागत के साथ केंद्र द्वारा सर्थित एक नई योजना शुरू की, अर्थात् 'उत्तम और स्वच्छ दुग्ध उत्पादन के लिए मूल संरचना को दृढ करना'। अक्तूबर 2003 में शुरू हुई इस योजना का मुख्य उद्देश्य देश में ग्राम स्तर पर उत्पादित कच्चे दूध की गुणता में सुधार करना है। योजना के अंतर्गत किसानों को दुहने की उत्तम रीतियों पर प्रशिक्षण देने का प्रावधान है। यह योजना राज्य सरकारों / संघ राज्य क्षेत्रों को विभिन्न घटकों अर्थात किसान सदस्यों का प्रशिक्षण, डिटर्जेंट, स्टेनलेस बर्तन, वर्तमान प्रयोशाला सुविधाओं का दृढ़ीकरण आदि के लिए 100 प्रतिशत सहायता अनुदान के आधार पर चलाई जा रही है। थोक दुग्ध शीतकों के रूप में ग्राम स्तर पर दुग्ध शीतन सुविधाएं स्थापित करने के लिए निधि का अनुपात भारत सरकार और संबंधित सहकारी संस्था / संघ के बीच 75:25 है। 2005-06 के दौरान योजना का विलय आईडीडीपी में कर दिया गया।
सहकारी संस्थाओं को सहायता
1999-2000 के दौरान शुरू की गई केंद्रीय क्षेत्र की योजना 'सहकारी संस्थाओं को सहायता' का उद्देश्य जिला स्तर पर रूग्ण डेयरी सहकारी संघों और राज्य स्तर पर सहकारी परिसंघों को पुनरूज्जीवित करना है। पुनर्वास योजना एनडीडीबी द्वारा संबंधित राज्य दुग्ध परिसंघ / जिला दुग्ध संघ के परामर्श से बनाई जाती है। पुनर्वास की हर योजना को उसके अनुमोदन की तिथि से सात वर्ष की अवधि के भीतर क्रियान्वित करना होता हैं।
यह योजना भारत सरकार और संबंधित राज्य सरकारों के बीच 50:50 बांटने के आधार पर चलाई जा रही है। आरंभ से अब तक विभाग ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ हरियाणा, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र, असम, नागालैंड, पंजाब, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में दुग्ध संघों के 32 पुनर्वास प्रस्ताव अनुमोदित किए हैं जिनकी कुल लागत 197.37 करोड़ रु. है और 31 दिसंबर, 2007 तक केंद्र का हिस्सा 98.68 करोड़ रु. हैं।
डेयरी / कुक्कुट जोखिम पूंजी निधि
10 वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 25.00 करोड़ रु. की लागत से केद्रीय क्षेत्र की एक नई योजना 'डेयरी/कुक्कुट जोखिम पूंजी निधि' शुरू की गई थी। इसमें अनेक उपाय शामिल हैं यथा ग्राम स्तर पर दुग्ध संसाधन, लागत प्रभावी विधि से पास्चुरीकृत दूध का विपणन, गुणता उन्नयन और आधुनिक उपस्कर तथा प्रबंधन कुशलताओं का प्रयोग करके वाणिज्यिक पैमाने को संभालने के लिए पारंपरिक प्रौद्योगिकी का उन्नयन, और ग्रामीण किसानों के बीच कुक्कुट, कृषि के लिए पक्षियों की नई जातियों तथा अल्प निवेश प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहित करना।
इस योजना के अंतर्गत, बैक-योग्य परियोजनाओं के माध्यम से एक योजनाबद्ध प्रस्ताव के अधीन ग्रामीण / शहरी हितभोगियों को सहायता दी जाती है। योजना के अंतर्गत पात्र हितभोगी हैं: खेतीहर किसाना / व्यक्तिगत उद्यमी और असंगठित तथा संगठित क्षेत्र के सभी खंडों के समूह, सहकारी संस्थाओं व गैर-सरकारी संगठनों सहित, देश के किसी भी भाग से। योजना नाबार्ड के माध्यम से चलाई जा रही हैं।