रेशम पालन उद्योग के विकास में राज्य सरकारों की भूमिका पारम्परिक रूप से रेशम पालन क्रियाकलाप का विस्तार करने तथा ऋण सुविधाकरण सहित किसान स्तर विस्तार तथा अन्य सहायक सेवाओं की व्यवस्था करने की रही है।
भारत में प्रवृत्त अनुकूल जलवायु दशाओं के वरदान के कारण शहतूत की कृषि लगभग सभी राज्यों में की जाती है। किन्तु पारम्परिक रूप से रेशम पालन उद्योग कनार्टक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल तथा जम्मू और कश्मीर में प्रवृत्त है जहां से देश में शहतूत कच्चे रेशम के उत्पादन का प्रमुख अंश प्राप्त होता है। मूगा असम की संस्कृति से जुड़ा हुआ है तथा इसका एक स्वाधिकार है। हाल के वर्षों में, मूगा पालन का विस्तार अन्य राज्यों जैसे मिज़ोरम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, उत्तराखण्ड, आंध्र प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल में किया गया है। अब बढ़ती अनुभूति के परिणामस्वरूप, रेशम उद्योग का प्रचलन गैर पारम्परिक क्षेत्रों में भी हो रहा है।
रेशम उद्योग के विकास के लिए, राज्य सरकारे विभिन्न विकासात्मक योजनाओं को क्रियान्वित कर रही है जैसे आर्थिक सहायता प्राप्त दर पर किसानों को चौकी रेशम के कीड़ों की आपूर्ति, शहतूत के बागों का विकास तथा किसानों को उच्च उत्पादक शहतूत की पौध का वितरण; उत्कृष्य असंक्रमित सामग्री की आपूर्ति; किसानों का क्षमता निर्माण; पालन शेडों के निर्माण के लिए सहायता; औजारों तथा उपकरणों की आपूर्ति; रीलिंग इकाइयों की स्थापना के लिए प्रोत्साहन तथा विपणन सहायता, इत्यादि।
तदनुसार, राज्य सरकारों द्वारा पृथक 'रेशम उद्योग विभाग' स्थापित किए गए हैं जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं :-
हस्तकरघा, हस्तशिल्प, कपड़ा तथा खादी विभाग 1985 में बनाया गया था। यह विभाग हस्तकरघों, विद्युत करघों तथा कपड़ा क्षेत्र की सुमेल संवृद्धि विकसित करने की ओर लक्षित नीतियों तथा योजनाओं का विकास कर रहा है। यह राज्य में रेशम उद्योग, खादी, ग्रामोद्योगों, हस्तशिल्प तथा ताड़ उत्पाद उद्योग के विकास से भी संबंधित है। उक्त उद्योगों में लगे बुनकरों / कारीगरों के कल्याण के लिए विभिन्न योजनाएं विकसित की गई हैं।
मेघालय में रेशम उद्योग तथा बुनाई ग्रामीण क्षेत्रों में दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण कुटीर आधारित स्थिति अनुकूल उद्योग हैं। ये दोनों उद्योग राज्य के लोगों की सांस्कृतिक तथा समृद्ध विरासत को प्रतिबिम्बित करते हैं। रेशम उद्योग क्षेत्र के तहत महत्ता का क्षेत्र रेशम पालन कृषक स्तर पर प्रणालीबद्ध तथा आर्थिक रोपण के विकास द्वारा कोकून तथा रेशम उत्पादन को बढ़ावा देना है। ताकि एकीकृत इरी, शहतूत तथा मूगा विकास कार्यक्रम जैसी आवश्यकता आधारित योजनाओं के क्रियान्वयन के जरिए प्रति यूनिट क्षेत्रफल उत्पादकता को बढ़ाया जा सके। परिष्कृत विधियों के संबंध में कृषकों, रीलरों तथा स्पिनरों को प्रशिक्षण सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती है। तकनीकी कार्मिकों को सेवाकालीन प्रशिक्षण तथा स्व रोजगार हेतु शिक्षित बेरोज़गार युवाओं को प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
आंध्र प्रदेश में रेशम के कीड़े के कोकून की सभी चार लोकप्रिय किस्मों नामत: शहतूत, टस्सर, इरी तथा मूगा का उत्पादन होता है। एक पृथक रेशम उद्योग विभाग की स्थापना निम्न उद्देश्यों से की गई हैं :-
- अंतरराष्ट्रीय ग्रेडिड बाइवोल्टीन रेशम का उत्पादन तथा रेशम की आपूर्ति तथा मांग के बीच अंतर को पूरा करना
- बीज वर्धन की संगठित त्रिस्तरीय प्रणाली के जरिए बीज का उत्पादन
- तकनीकी सेवा केन्द्रों के जरिए किसानों को प्रौद्योगिकी का अंतरण
- उच्च उत्पादन किस्मों का विकास
- उत्पादकता तथा गुणता सुधार पर विशेष ध्यान
- मितव्ययी जल प्रबंधन प्रणाली
- चॉकी रेशम के कीड़ों की आपूर्ति हेतु निजी चॉकी पालन इकाइयों का संवर्धन
- पृथक पालन शेडों के निर्माण को संवर्धित करना
- कोकून बाजारों के जरिए किसानों को विपणन सुविधाएं प्रदान करना तथा विभिन्न मीडिया के जरिए विभिन्न कोकून बाजारों की कोकून दरों का प्रसारण करना
- क्षेत्र विशिष्ट तथा मौसम विशिष्ट प्रजातियों का विकास
- गैर फार्म क्षेत्र का विकास तथा गैर फार्म क्रियाकलानों अर्थात रीलिंग तथा ट्विस्टिंग विद वीविंग का एकीकरण
- टस्सर तथा इरी कोकूनों के उत्पादन में प्रमात्रात्मक उछाल हासिल करना।