वित्तीय क्षेत्र देश के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस क्षेत्र का मुख्य घटक वित्तीय संस्थाएं है। जो निवल बचतकर्ताओं से निवल उधारकर्ताओं अर्थात् उन लोगों से जो अपनी आमदनी से कम खर्च करते हैं, उन लोगों को जो अपनी आमदनी से अधिक खर्च करते हैं, को संसाधनों के अंतरतरण एक सरणी का काम करता है। वित्तीय संस्थाएं परम्परागत रूप से, अर्थव्यवस्था की दीर्घावधि निधियों का एक प्रमुख स्रोत रही हैं। ये संस्थाएं वाणिज्यिक क्षेत्र की विभिन्न जरुरतों को पूरा करने के लिए कई प्रकार के वित्तीय उत्पाद और सेवाएं प्रदान करती हैं। इसके अलावा, दो नए उद्यमियों, लघु एवं मध्यम फर्मो तथा पिछड़े इलाकों में स्थापित उद्योगों को सहायता प्रदान करती है। इस प्रकार, इन्होंने व्यापक औद्योगिक विकास को प्रोत्साहन देते हुए क्षेत्रीय विषमताओं को कम करने में मदद की है।
भारत सरकार ने, अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों को पर्याप्त मात्रा में ऋण मुहैया कराने के लिए देश की वित्तीय संस्थाओं का एक सुविकसित तंत्र तैयार किया है। इन वित्तीय संस्थाओं को उनके संचालनों के तहत भूभौतिकीय क्षेत्र के आधार पर मोटे तौर पर अखिल भारतीय संस्थाओं और राज्य स्तरीय संस्थाओं में वर्गीकृत किया गया है। राष्ट्रीय स्तर पर, ये ब्याज की उचित दरों पर दीर्घावधि और मध्यावधि ऋण प्रदान करती हैं। वे कंपनियों के ऋण पत्र (डिबेंचर) निर्गमों के लिए अभिदान करती है, शेयर के सरकारी निर्गम की हामीदारी करती है, ऋणों एवं आस्थगित भुगतानों की गारंटी देती हैं, आदि। यद्यपि राज्य स्तर की संस्थाएं मुख्य रूप से मध्यम और लघु उद्यमों के विकास से संबंधित हैं, लेकिन ये राष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं की भांति उसी तरह की वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं।
- राष्ट्रीय स्तर की संस्थाएं :-
राष्ट्रीय स्तर पर अनेक वित्तीय संस्थाएं स्थापित की गई हैं। ये उद्यमियों की कई तरह की वित्तीय जरुरतों को पूरा करती हैं। इनमें अखिल भारतीय विकास बैंक जैसे कि आई डी बी आई, सिडबी, आई एफ सी आई लि., आई आई बी आई, विशेष वित्तीय संस्थाएं जैसे कि आई वी सी एफ, आई सी आई सी आई उद्यम निधि लि; टी एफ सी आई, निवेश संस्थाएं जैसे कि एल आई सी, जी आई सी, यू टी आई, आदि शामिल हैं।.
- अखिल भारतीय विकास बैंक (ए आई डी बी):- इसमें वे विकास बैंक शामिल हैं जिनमें न केवल बड़े और मध्यम उद्यमों को ऋण प्रदान किया जाता है बल्कि ये लघु स्तर की औद्योगिक इकाइयों के प्रवर्तन और विकास में सहायता करते हैं।
- अखिल भारतीय विकास बैंक (आई डी आई बी):- इसकी स्थापना 1964 में देश में औद्योगिक विकास की एक शीर्ष वित्तीय संस्था के रूप में हुई। यह मध्यम और बड़े उद्योगों की प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार की वित्तीय सहायता के रूप में जरुरतों को पूरा करती है। प्रत्यक्ष सहायता परियोजना ऋणों, औद्योगिक प्रतिभूतियों की हामीदारी और प्रत्यक्ष अभिदान, सस्ते ऋणों, तकनीकी वापसी ऋणों आदि के जरिए प्रदान की जाती है। जबकि अप्रत्यक्ष सहायता औद्योगिक फर्मों को पुनर्वित्तीयकरण की सुविधाओं के रूप में प्रदान की जाती है।
- भारतीय औद्योगिक वित्त निगम लि. (आई एफ सी आई लि.):- यह मध्यम और बड़े उद्योगों का दीर्घावधि औद्योगिक ऋण प्रदान करने के मार्ग प्रशस्त करने के लिए आईएफसीआई अधिनियम के तहत वर्ष 1948 में स्थापित की गई पहली विकास वित्त संस्था थी। इसका उद्देश्य उद्योग को रुपया और विदेशी मुद्रा ऋणों के जरिए वित्तीय सहायता प्रदान करना, औद्योगिक फर्मों के स्टॉकों शेयरों बाण्डों, ऋणपत्रों के निर्गम की हामीदारी/उनमें अभिदान करना, आदि है। इसने मर्चेंट बैकिंग, ऋण व्यवस्था, पुन:स्थापना कार्यक्रम तैयार करने, सम्मेलनों और विलयों से संबंधित कार्यों, आदि के क्षेत्र में अपने कार्यकलापों को विविधता प्रदान की है।
- भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) :- भारत सरकार द्वारा इसकी स्थापना आई डी बी आई के पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी के रूप में अप्रैल, 1990 में की गई थी। यह अर्थव्यवस्था में लघु उद्योगों के संवर्धन, वित्त पोषण और विकास के लिए एक प्रमुख वित्तीय संस्था है। इसका उद्देश्य आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और संतुलित क्षेत्रीय विकास की प्रक्रिया में योगदान करने की दृष्टि से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एम एस एम ई) को समर्थ बनाना है।
- विशेष वित्तीय संस्थाएं (एस एफ आई):- ये ऐसी संस्थाएं हैं जिनकी स्थापना उद्यम पूंजी, ऋण रेटिंग और पट्टे, आदि के क्षेत्र में वाणिज्य और व्यापार की वित्त संबंधी बढ़ती जरुरतों को पूरा करने के लिए की गई है।
- आई एफ सी आई उद्यम पूंजी निधि लि. (आई वी सी एफ):- यह आई एफ सी आई लि. की एक सहायक कंपनी है जिसे पहले जोखिम पूंजी और प्रौद्योगिकीविद निगम लि. (आर सी टी सी) के नाम से जाना जाता था। नए उत्पाद/प्रक्रिया/प्रौद्योगिकी वाले उद्यमों को निधियन की सुविधा प्रदान करते हुए देश में उद्यम आधार को व्यापक बनाने के उद्देश्य से इसे आगे बढ़ाया गया। प्रारंभ में इसने अपनी 'जोखिम पूंजी योजना' के तहत प्रवर्तकों को सस्ते ऋणों के जरिए वित्तीय सहायता देनी शुरू की थी। वर्ष 1988, इसने नई प्रक्रियाओं, उत्पादों, बाजार अथवा सेवाओं के लिए स्वदेशी प्रौद्योगिकी के वाणिज्यीकरण के लिए परियोजनाओं को 'प्रौद्योगिकी वित्त एवं विकास योजना' के तहत भी वित्त प्रदान करना शुरू कर दिया। कुछ वर्षों से इसे प्रौद्योगिकी-उन्मुखी परियोजनाओं में निवेश करने का काफी अनुभव प्राप्त हो गया है।
- आई सी आई सी आई उद्यम निधि लि. :- जिसे पहले भारतीय प्रौद्योगिकी विकास एवं सूचना कंपनी लि. (टी डी आई सी आई) कहा जाता था, की स्थापना भारतीय यूनिट ट्रस्ट के साथ संयुक्त उद्यम के रूप में वर्ष 1988 में की गई। बाद में, यह आई सी आई सी आई की एक पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी बन गई। यह एक प्रौद्योगिकी उद्यम वित्त कंपनी है जिसे नई प्रौद्योगिकी उद्यमों के लिए परियोजना वित्त मंजूर करने के लिए स्थापित किया गया। जिन औद्योगिक इकाइयों को इसकी सहायता प्राप्त होती है वे कंप्यूटर, रसायन/पॉलीमर्स, औषधियों, निदान विद्या और टीकों, जैव-प्रौद्योगिकी, पर्यावरणिक इंजीनियरी, आदि के क्षेत्रों में हैं।
- भारतीय पर्यटन वित्त निगम लि. (टी एफ सी आई):- यह भारत सरकार द्वारा, देश के पर्यटन उद्योग के संवर्धन और विकास के लिए स्थापित एक विशेष वित्तीय संस्था है। यह, परम्परागत पर्यटन परियोजनाओं के अलावा गैर-परम्परागत पर्यटन परियोजनाओं जैसेकि मनोरंजन पार्क, रज्जुमार्ग (रोप वे), कार किराए पर देने संबंधी सेवाएं, अंतर्देशीय जल परिवहन के लिए नौकाएं, आदि के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करता
- निवेश संस्थाएं :- ये वित्तीय मध्यवर्तियों के रूप में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं जो विशेष रूप से, लघु बचतकर्ताओं और निवेशकों की जरुरतों को पूरा कर रही हैं। वे अपनी आस्तियां मुख्य रूप से विपणन योग्य प्रतिभूतियों में नियोजित करती हैं।
- भारतीय जीवन बीमा निगम (एल आई सी):- इसकी स्थापना वर्ष 1956 में भारत सरकार के एक पूर्ण-स्वामित्व वाले निगम के रूप में की गई थी। जीवन बीमा निगम अधिनियम,1956 , द्वारा इसका गठन जीवन बीमा निगम का ओर अधिक व्यापक रूप से विशेष रूप से ग्रामीण इलाकों तक, विस्तार करने के उद्देश्य से किया गया था। यह आधारभूत ढांचे की सुविधाओं जैसे कि आवास, ग्रामीण विद्युतीकरण, जलापूर्ति, मल-व्यवस्था, आदि के विकास के लिए भी सहायता प्रदान करता है। इसके अलावा, यह अन्य वित्तीय संस्थाओं को उनके शेयरों और बाण्डों, आदि में अभिदान करने के माध्यम से संसाधन संबंधी सहायता भी प्रदान करता है। भारतीय जीवन बीमा निगम विदेशों में भी व्यापार का संचालन करता है और इसके कार्यालय, फिज़ी, मॉरिशस और संयुक्त राष्ट्र में हैं। शाखा संचालनों के अलावा, निगम के बहरीन, नेपाल और श्री लंका में प्रसिद्ध स्थानीय साझेदारों के साथ संयुक्त रूप से विदेशी सहायक कंपनियां भी स्थापित की हैं।
- भारतीय यूनिट ट्रस्ट (यू टी आई):- बचतों और निवेश को प्रोत्साहन देने की दृष्टि से यू टी आई अधिनियम 1963, के तहत इसकी स्थापना एक निकाय कॉर्पोरेट के तौर पर की गई। यह यूनिटों की बिक्री के जरिए लघु निवेशकों की बचतें जुटाता है और मुख्य रूप से द्वितीयक पूंजी बाजार संचालनों के जरिए उन्हें कॉर्पोरेट निवेशों में सारणीबद्ध करता है। इस प्रकार इसका मुख्य लक्ष्य मध्यम और न्यून आय वर्गों की बचतों को बढ़ावा देना और इस योग्य बनाना है कि वे देश के तेज़ी से बढ़ते हुए औद्योगिकीकरण के लाभ उठा सकें। दिसम्बर, 2002 में, भारतीय यूनिट ट्रस्ट (उद्यम का अंतरण और निरसन) अधिनियम, 2002 पारित होने के साथ यू टी आई अधिनियम, 1963 को निरस्त कर दिया गया जिससे 1 फरवरी 2003 को यूटीआई दो कंपनियों यू टी आई-I और यू टी आई-II में विभाजित हो गया।
- भारतीय साधारण बीमा निगम (जी आई सी) :- साधारण बीमा और गैर-आजीवन बीमा के व्यापार के पर्यवेक्षण, नियंत्रण और संचालन के प्रयोजन के लिए साधारण बीमा व्यापार (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972 (जी आई बी एन ए), के अनुसरण में इसका गठन किया गया। प्रारंभ में जीआईसी की चार सहायक शाखाएं थीं, नामत:, राष्ट्रीय बीमा कंपनी लि. , दि न्यू इंडिया एश्युरेंस कंपनी लि. ,दि आरिएन्टल एश्युरेंस कंपनी लि. और यूनाइटिड इंडिया एश्युरेंस कंपनी लि. । लेकिन वर्ष 2000 में इन शाखाओं को जी आई सी से अलग करके ‘जी आई पी एस ए’ (साधारण बीमा सरकारी क्षेत्र संस्था) नामक संस्था का गठन किया गया।
- राज्य स्तर की संस्थाएं :- राज्य स्तर पर कई वित्तीय संस्थाएं स्थापित की गई हैं जो अखिल भारतीय संस्थाओं द्वारा प्रदान की गई वित्तीय सहायता की अनुपूर्ति करती हैं। ये अपने-अपने राज्यों में निवेश संवर्धन और औद्योगिक विकास के लिए कए उत्प्रेरक के रूप में कार्य करती है। इनमें मुख्य रूप से ' राज्य वित्त निगम' और 'राज्य औद्योगिक विकास निगम' शामिल है।
- राज्य वित्त निगम (एसएफसी) :- ये राज्य स्तर की वित्तीय संस्थाएं हैं जो संबंधित राज्यों में लघु और मध्यम उद्यमों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये सावधिक ऋणों, इक्विटी/डिबेंचरों में प्रत्यक्ष अभिदान, गारण्टियों, विनिमय हुण्डियों को भुनाने, और आधार/विशेष पूंजी, आदि के रूप में वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं। राज्य वित्त निगमों की स्थापना अधिक निवेश करने के लिए प्रोत्साहन देने, और अधिक रोजगार सृजित करने और उद्योगों के स्वामित्व आधार को व्यापक बनाने के उद्देश्य से की गई है। इन्होंने नए प्रकार के व्यापारी कार्यकलापों जैसे कि पुष्प कृषि, ऊतक संवर्धन, कुक्कुट पालन, वाणिज्यिक परिसरों और इंजीनियरी, विपणन आदि से संबंधित सेवाओं के लिए भी सहायता देना शुरू कर दिया है। देश में 18 राज्य वित्त निगम हैं :-
- आंध्र प्रदेश राज्य वित्त निगम (ए पी एस एफ सी)
- हिमाचल प्रदेश वित्त निगम (एच पी एफ सी)
- मध्य प्रदेश वित्त निगम (एम पी एफ सी)
- पूर्वोत्तर विकास वित्त निगम (एन ई डी एफ आई)
- राजस्थान वित्त निगम (आर एफ सी)
- तमिलनाडु औद्योगिक निवेश निगम लि.
- उत्तर प्रदेश वित्त निगम (यू पी एफ सी)
- दिल्ली वित्त निगम (डी एफ सी)
- गुजरात राज्य वित्त निगम (जी एस एफ सी)
- गोवा आर्थिक विकास निगम ( ई डी सी)
- हरियाणा वित्त निगम ( एच एफ सी )
- जम्मू और कश्मीर राज्य वित्त निगम ( जे के एस एफ सी)
- कर्नाटक राज्य वित्त निगम (के एस एफ सी)
- केरल वित्त निगम ( के एफ सी )
- महाराष्ट्र राज्य वित्त निगम (एम एस एफ सी)
- उड़ीसा राज्य वित्त निगम (ओ एस एफ सी)
- पंजाब वित्त निगम(पी एफ सी)
- पश्चिम बंगाल वित्त निगम (डब्ल्यू बी एफ सी)
- राज्य वित्त विकास निगम (एस आई डी सी) :- इनकी स्थापना कंपनी अधिनियम, 1956 के तहत राज्य सरकारों के एक पूर्ण-स्वामित्व वाले उद्यम के रूप में की गई। इनकी स्थापना अपने-अपने राज्यों में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने और छोटे उद्यमियों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से की गई है। ये निजी उद्यमियों अथवा पूर्ण-स्वामित्व वाली सहायक कंपनियों के सहयोग से संयुक्त क्षेत्र/सहायता प्राप्त क्षेत्र में मध्यम एवं बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं की स्थापना करने का कार्य भी करते हैं। ये कई तरह के संवर्धनात्मक कार्य भी कर रहे हैं जैसे कि संभाव्यता रिपोर्ट तैयार करना; उद्यम संबंधी प्रशिक्षण और विकास कार्यक्रम; तथा औद्योगिक क्षेत्रों/संपदाओं का विकास करना। देश में राज्य औद्योगिक विकास निगम निम्नलिखित है:-
- असम औद्योगिक विकास निगम लि. (ए आई डी सी)
- अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह समेकित विकास निगम लि. (ए एन आई आई डी सी ओ)
- आंध्र प्रदेश औद्योगिक विकास निगम लि. (ए पी आई डी सी)
- बिहार राज्य क्रेडिट एवं निवेश निगम लि. (बी आई सी आई सी ओ)
- छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक विकास निगम लि. (सी एस आई डी सी)
- गोवा औद्योगिक विकास निगम
- गुजरात औद्योगिक विकास निगम (जी आई डी सी)
- हरियाणा राज्य औद्योगिक और मूल संरचना विकास निगम लि (एच एस आई आई डी सी)
- हिमाचल प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम लि. (एच पी एस आई डी सी)
- जम्मू और कश्मीर राज्य औद्योगिक विकास निगम लि
- कर्नाटक राज्य औद्योगिक निवेश एवं विकास निगम लि. (के एस आई आई डी सी)
- केरल राज्य औद्योगिक विकास निगम लि. (के एस आई डी सी)
- महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम लि (एम आई डी सी)
- मणिपुर औद्योगिक विकास निगम लि. (एम ए एन आई डी सी ओ)
- मध्य प्रदेश राज्य औ़द्योगिक विकास निगम लि. (एम पी एस आई डी सी)
- नागालैंण्ड औद्योगिक विकास निगम लि. (एन आई डी सी)
- उड़ीसा औद्योगिक आधारभूत विकास निगम लि
- ओमनिबस औद्योगिक विकास निगम (ओ आई डी सी), दमन और द्वीव, दादरा तथा नगर हवेली
- पुडुचेरी औद्योगिक संवर्धन, विकास एवं निवेश निगम लि. (पी आई पी आई डी सी)
- उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम लि
- पंजाब राज्य औद्योगिक विकास निगम लि. (पी एस आई डी सी)
- राजस्थान ओद्योगिक विकास एवं निवेश निगम लि. (आर आई आई सी ओ)
- सिक्किम औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम लि. (एस आई डी आई सी ओ)
- तमिलनाडु औद्योगिक विकास निगम लि (टी आई डी सी ओ)
- उत्तरांचल राज्य आधारढांचा एवं औद्योगिक विकास निगम लि. (एस आई डी सी यूएल)
- त्रिपुरा औद्योगिक विकास निगम लि. (टी आई डी सी)
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