उद्यमी को न केवल अपने व्यापार की स्थापना करने के लिए निरंतर निधियों के प्रवाह की आवश्यकता होती है अपितु सफल संचालन तथा नियमित उन्नयन की भी आवश्यकता होती है। औद्योगिक यूनिट के आधुनिकीकरण के लिए भी इसकी आवश्यकता होती है। इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए सरकार (केंद्रीय और राज्य दोनों स्तरों पर) बैंकों और वित्त संस्थाओं की स्थापना करना, विभिन्न नीतियों और योजनाएं बनाना आदि जैसे अनेक कदम उठाए हैं। ऐसे सभी उपाय विशिष्ट रूप से लघु और मध्यम उद्यमों के संवर्धन और विकास पर संकेद्रित हैं।
सरकारी क्षेत्र के बैंक औद्योगिक क्षेत्र के मुख्य वित्त पोषण सहायता के स्रोत हैं। वे ऋण, अग्रिम, हुंडियों पर बट्टा, परियोजना वित्त पोषण, मियादी ऋण निर्यात वित्त पोषण आदि के रूप में कंपनियों को ऋण सहायता मुहैया कराते हैं। ऐसे बैंकों के कुछ उदाहरण हैं :-
- भारतीय स्टेट बैंक (एस बी आई) यह व्यापक दायरे में वित्तीय उत्पाद और सेवाएं मुहैया कराता है जो किसी व्यापार या बाजार आवश्यकता की पूर्ति कर सकते हैं। यह कॉर्पोरेट जगत द्वारा सामना की जाने वाली सभी वित्तीय चुनौतियों के लिए एकीकृत समाधान प्रदान करने हेतु विभिन्न रास्ते अपनाता है। इसकी विभिन्न निधियन योजनाएं हैं :-
बैंक ग्रामीण और अर्ध शहरी शाखाओं के नेटवर्क के माध्यम से कृषकों की वित्तीय सहायता भी करता है। इन विशिष्ट शाखाओं की स्थापना देश के विभिन्न भागों में ऋण के माध्यम से कृषि के विकास के लिए विशेष रूप से की गई है। उनकी योजनाओं में अनेकानेक वार्षिक क्रियाकलाप शामिल किए गए हैं जैसे फसल ऋण, बागवानी के लिए वित्त पोषण, फार्म प्रक्रमीकरण योजनाएं, भूमि विकास योजनाएं, लघु सिंचाई परियोजनाएं, कार्षिक मियादी ऋण आदि।
- बैक ऑफ बड़ौदा यह विभिन्न प्रकार के उत्पाद और सेवाएं प्रदान करता है जो व्यापार उद्यमों की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करता है विशेषकर लघु यूनिटों के लिए बैंक द्वारा ऋण और अग्रिम से संबंधित विभिन्न योजनाओं में निम्नलिखित शामिल हैं:-
- आंध्रा बैंक में भी उद्यम की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अनेकानेक ऋण योजनाएं तैयार की गई हैं। ये विशेष रूप से कॉर्पोरेट और कार्षिक क्षेत्र की पूर्ति करती है। इसके कुछ महत्वपूर्ण निधियन विकल्पों में निम्नलिखित शामिल हैं :-
लघु उद्योगों को उद्यम चलाने तथा इसके विविधीकरण और आधुनिकीकरण के लिए निरंतर ऋण समर्थन की आवश्यकता होती है। ऐसे उद्योगों के लिए संकेन्द्रित वित्तीय सहायता आवश्यकता को मानते हुए भारत सरकार ने राज्य सरकारों के साथ वृद्धि और विकास के लिए योजनाओं और निधियों सहित अनेकानेक नीतिगत पेकेज तैयार किए हैं। केंद्रीय सरकार के इन अधिकांश कार्यक्रमों का क्रियान्वयन दो मुख्य संगठनों के माध्यम से किया जाता है।
- लघु उद्योग विकास संगठन (सिडो) यह देश में लघु उद्योग के संवर्धन और विकास के लिए एक शीर्ष निकाय है। इसके मुख्य क्रियाकलापों में निम्नलिखित शामिल हैं :-
- लघु उद्योगों के लिए नीतियां और कार्यक्रम बनाने में सरकार को सलाह देना
- लघु उद्योगों की समय समय पर गणना/सर्वेक्षण करना और क्षेत्रक की वृद्धि और विकास के लिए महत्वपूर्ण मानदण्डों/संकेतकों संबंधी आंकड़े/रिपोर्ट तैयार करना
- अन्य केंद्रीय मंत्रालयों, योजना आयोग, राज्य सरकारों, वित्त संस्थाओं और लघु उद्योग के विकास से संबंधित अन्य संगठनों के साथ निकट संपर्क रखना
- बड़े और मझोले उद्योगों के अनुषंगी के रूप में लघु उद्योगों के साथ संपर्क सुसाध्य बनाना।.
- प्रशिक्षण और कौशल उन्नयन्न के माध्यम से मानव संसाधन आधार का विकास करना।.
अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए ऋण सुविधाएं प्रदान करने, प्रौद्योगिकी सहायता सेवाएं और विपणन सहायाता आदि मुहैया कराने के लिए सिडो ने व्यापक दायरे में योजनाएं तैयार की है :-
- राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम लि. (एनएसआईसी), इसकी स्थापना देश में लघु उद्योगों के संवर्धन, उनकी सहायता और विकास करने के उद्देश्य से की गई है। यह लघु उद्योगों को विशेष रूप से आवश्यकता आधारित योजनाओं के माध्यम से सहायता करता रहा है, जो विपणन सहायता, ऋण सहायता, प्रौद्योगिकी सहायता और अन्य सहायता सेवाएं मुहैया कराता है।
- विपणन सहायता योजनाएं :- लघु उद्यमों के विकास और उत्तरजीविता के लिए चुस्त-दुरुस्त विपणन महत्वपूर्ण है। एन एस आई सी लघु उद्योगों के उत्पादों का संवर्धन करने में सुसाध्यकर्ता के रूप में कार्य करता है और इसने लघु उद्यमों को उनके विपणन में सहायता करने के लिए अनेकानेक योजनाएं तैयार की है।
- ऋण सहायता योजनाएं :- एनएसआईसी विभिन्न क्षेत्रों में लघु उद्यमों की ऋण आवश्यकताएं सुलभ उपलब्ध कराती है। इनमें निम्नलिखित शामिल है:-
- उपकरण का वित्त पोषण:- किराया खरीद और मियादी ऋण उपकरण की खरीद के लिए के माध्यम से।
- कच्ची सामग्री की खरीद के लिए वित्त पोषण:- प्रतिस्पर्धी दर पर मूल कच्ची सामग्री की थोक खरीद, विरल कच्ची सामग्री का आयात आदि को सुसाध्य बनाने के द्वारा। एन एस आई सी आयातों के मामले में सभी प्रक्रियाओं, प्रलेखन और ऋण पत्र निर्गम की भी देख रेख करता है।
- विपणन क्रियाकलापों के लिए वित्त पोषण:- जैसाकि आंतरिक विपणन, निर्यात और हुण्डी बट्टा आदि।
- बैकों के साथ सिंडीकेट बैंक के माध्यम से वित्त पोषण:- वाणिज्यिक बैंकों के साथ कार्यनीतिक गठबंधन करके ताकि लघु उद्यमों की निधि आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। यह इच्छुक लघु उद्यमों के ऋण आवेदनों को बैंकों को अग्रेषित करने की व्यवस्था करता है।
- लघु उद्योगों के लिए निष्पादन और ऋण की दर का निर्धारण:- ताकि लघु उद्यमों को अपने विद्यमान प्रचालनों की खूबियों और कमियों को जानने में और तद्नुसार उपचारात्मक उपाय करने में समर्थ बनाया जा सके। एनएसआईसी योजना का संचालन आई सी आर ए, ओ एन सी आर ए, डन्स एवं ब्राड स्ट्रीट (डी एण्ड बी) क्रिसील, फिच, केयर और स्मेरा के माध्यम से करता है।
- प्रौद्योगिकी सहायता योजना:- एन एस आई सी लघु यूनिटों के लिए विभिन्न सहायता सेवाएं अपने तकनीकी सेवा केंद्रों और विस्तार केंद्रों के माध्यम से देता है। प्रदत्त सेवाओं में नए तकनीक के अनुप्रयोग संबंधी सलाह, प्राधिकृत प्रयोगशालाओं द्वारा सामग्री परीक्षण
राज्य स्तर पर विभिन्न राज्य वित्त निगम वित्त निगम (एस एफ सी) की स्थापना संबंधित राज्य सरकारों द्वारा औद्योगिक यूनिटों को वित्तीय सहायता मुहैया कराने के लिए की गई हैं। इस प्रयोजन के लिए इन संस्थाओं ने समय-समय पर अनेक निधियां और योजनाएं चालई गई हैं। देश में 18 राज्य वित्त निगमें (एस एफ सी) हैं। उदाहरण के लिए :-
- केरल वित्त निगम (के एफ सी), का निगमीकरण राज्य वित्त निगम अधिनियम 1951 के तहत किया गया, जो औद्योगिक वित्त पोषण के क्षेत्र में प्रवृत्ति निर्धारक है। यह उद्यमों की अपेक्षाओं के लिए उपयुक्त वित्तीय सहायता प्रदान करने के द्वारा विकास और केरल के औद्योगिकीकरण में मुख्य भूमिका निभाता आया है। इसके मुख्य लक्ष्य नए औद्योगिक यूनिटों की स्थापना करने के लिए मियादी ऋण सहायता देना अथवा लघु या मझोले क्षेत्रकों में मौजूदा यूनिटों के विस्तार/विविधीकरण/आधुनिकीकरण की लागतों को पूरा करने के लिए ऋण सहायता प्रदान करना है। इसके कुछ मुख्य योजनाओं में निम्नलिखित शामिल हैं:-
- मध्य प्रदेश वित्त निगम यह मध्य प्रदेश राज्य में प्रथम संस्था है जो लघु और मझोले उद्योगों को वित्तीय सहायता प्रदान करने में रत है। सहायता निधियों के व्यापक दायरे के रूप में और गैर विधि सेवाओं/योजनाओं के रूप में दी गई है। निधि आधारित योजनाएं राज्य के भीतर व्यापारी उद्यमों की स्थापना करने के लिए उपलब्ध हैं जबकि गैर निधि आधारित योजनाएं पूरे देश में उपलब्ध हैं।
निधि आधारित योजनाओं में निम्नलिखित शामिल हैं :-
- मियादी ऋण
- उपकरण वित्त पोषण
- परिसंपत्ति ऋण
- अल्पावधिक ऋण
- कार्यशील पूंजी
- ऋण की पुन:पूर्ति
- विपणन कार्यकलापों हेतु वित्त पोषण
- मिश्रित ऋण
- एस एस आई के लिए हेतु वित्तपोषण पूंजी आर्थिक सहायता
गैर निधि आधारित योजनाओं में निम्नलिखित हैं :-
- सार्वजनिक निर्गम का मूल्यांकन
- ऋण समूहन
- कॉर्पोरेट सलाहकार सेवाएं
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