भारत में सुधार की पुन:स्थापना और फलस्वरूप आर्थिक उदारीकरण ने उद्यमियों को बढ़ती प्रतिस्पर्धा के दौर पर ला खड़ा किया है। तब से भारतीय कंपनियों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए सरकार द्वारा अनेकानेक उपाय किए गए हैं। एक महत्वपूर्ण सुधार उपायों की नीति श्रम क्षेत्रक सुधारों के संबंध में है। परन्तु अत्यन्त विवादस्पद मुद्दा इस क्षेत्रक में समाधान करना बाकी है, वह है निर्गम नीति। चूंकि कंपनियां लचीली निर्गम नीति की पर विवाद कर रही हैं जबकि श्रम संगठन ऐसे कदमों के विरुद्ध हैं चूंकि इससे उनकी नौकरी की सुरक्षा समाप्त होने का डर है। परन्तु फर्मों के प्रवेश और विस्तार के लिए उदा नीति केवल तब लाभदायक होगी यदि इसके साथ अव्यावहारिक फर्मों के निर्गम के लिए यौक्तिक नीति भी हो। प्रतिस्पर्धा प्रवृत्त करने और संसाधन के उपयोग का विस्तार करने के लिए यह अनिवार्य शर्त है।
एग्जिट शब्द उद्योग में प्रविष्टि का अपभ्रंश शब्द है। यह औद्योगिक यूनिटों के उद्योग छोड़ने या हटने या दूसरे शब्दों में बंद करने का अधिकार या क्षमता है। निर्गम नीति प्रवृत्त करने के प्रस्ताव पहली बार 1991 में किया गया जब ऐसा महसूस किया गया था कि श्रम बाजार के लचीला हुए बिना सक्षम औद्योगीकरण हासिल करना कठिन है। ऐसी नीति की आवश्यकता आधुनिकीकरण, प्रौद्योगिकीय उन्नयन, पुनर्गठन तथा औद्योगिक यूनिटें बंद होने के परिणामस्वरूप हुई। ऐसी नीति नियोक्ताओं को कर्मगारों को एक यूनिट से दूसरे में अंतरित करने और अधिक श्रम की छंटाई करने के लिए अनुमत करेगी। भारत में औद्यागिक विवाद अधिनियम,1947 नियोक्ताओं की छंटाई द्वारा, प्रतिष्ठान बंद करने के द्वारा अधिक कर्मचारियों को कम करने संबंधित मामले में प्रतिबंधित बंद करने के द्वारा अधिक कर्मचारियों को कम करने संबंधित मामले में प्रतिबंधित करता है और छंटाई प्रक्रिया में बहुत अधिक कानूनी औपचारिकताएं एंव जटिल प्रक्रियाएं शामिल हैं। श्रम बल की छंटाई और कम करने संबंधी किसी भी योजना का ट्रेड यूनियनों द्वारा कड़ा विरोध किया जाता है।
व्यावहारिक औद्योगिक निर्गम नीति विकसित करने के लिए मुख्य मुद्दा कर्मगारों के वैध हितों की रक्षा करना है यह सरकारी और निजी दोनों क्षेत्र में लागू होता है। इसलिए सरकार की नीति यह रही है कि यदि यूनिटों का पुनर्गठन करके और श्रमिकों का पुनर्प्रशिक्षण एवं पुन:तैनाती करके आर्थिक रूप से व्यावहारिक बनाई जाए तो इसको करने के अथक प्रयास किए जाने चाहिए केवल ऐसी यूनिटों के मामले में जहां भी श्रम पर यूनिट बंद होने के प्रतिकूल प्रभाव को कम करने के लिए अनेकानेक विकल्पों जैसे सामाजिक सुरक्षा नेट, बीमा योजनाएं और अन्य कर्मचारी के लिए लाभदायक योजनाएं तथा कर्मचारियों को छटाई का लाभ का भुगतान करने के लिए निधि का सृजन किया जा रहा है। पुन: स्थापित किए गए कुछ उपाय निम्नलिखित हैं :-
- अति महत्वपूर्ण उपाय स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना शुरू कला है। इसकी शुरूआत इस समस्या का समाधान करने के लिए वैकल्पिक कानूनी समाधान के रूप में की गई थी। विद्यमान कर्मचारी क्षमता को समग्र रूप से कम करने की व्यवस्था करने हेतु अत्यन्त मानवीय तकनीकी है। यह औद्योगिक यूनिटों में नियुक्त श्रम बल की छंटाई करने के लिए कंपनियों द्वारा प्रयुक्त की जाने वाले तकनीकी है। यह आम प्रविधि हो बन गई है जो अधिक श्रम शक्ति कम करने के लिए उपयोग किया जाता है और इस तरह से संगठन के निष्पादन में सुधार किया जाता है। यह उदार कर शुक्र भुगतान है जिसके द्वारा कंपनी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के लिए कर्मचारियों को दिया जाता है। यह गोल्डन हैंडशेक के रूप में भी जाना जाता है चूंकि यह छंटाई करने का स्वर्णिम मार्ग है।
वीआरएस नियोक्ताओं को सरकारी उपक्रमों के नियोक्ताओं सहित अधिशेष श्रम शक्ति हटाने के लिए स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति योजना की पेशकश करना अनुमत करती है इस तरह से कंपनी छोड़ने के लिए कर्मचारी पर किसी प्रकार का दबाव नहीं डला जाता है। इन योजनाओं का यूनियनों द्वारा जोरदार विरोध भी नहीं किया जाता है चूंकि इसकी स्वैच्छिक प्रकृति होती है और इसमें कोई जबरदस्ती नहीं की जाती है। इसकी शुरूआत सरकार और निजी दोनों क्षेत्रकों में की गई थी। सरकारी क्षेत्र के उपक्रम को तथापि, वीआरएस की पेशकश और क्रियान्वयन करने के पहले सरकार का अनुमोदन प्राप्त करना होता है।
व्यापारिक फर्म निम्नलिखित परिस्थितियों के अधीन स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना लागू कर सकती है :-
- व्यापार में मंदी के कारण।
- बहुत अधिक प्रतिस्पर्धा के कारण जब तक इसका आकार छोटा न किया जाए प्रतिष्ठान अव्यावहारिक हो जाता है।
- विदेशी सहयोगियों के साथ संयुक्त उद्यम के कारण।
- उत्तरदायित्व लेने और आमेलन करने के कारण
- उत्पाद/प्रौद्योगिकी का लुप्तप्राय होने के कारण।
अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए "व्यापार का प्रबंधन" के हमारे खंड से संपर्क करें।
- कामगारों के हितों की रक्षा करने के लिए सरकार ने वर्ष 1992 में नेशनल रिन्यूअल फंड की स्थापना की है। नेशनल रिन्यूअल फंड के उद्देश्य और विस्तार निम्नानुसार थे :- (क) आधुनिकीकरण, तकनीकी उन्नयन और औद्योगिक पुनर्संरचना के परिणामस्वरूप उभर रहे कर्मचारियों को पुन:प्रशिक्षण देने और फिर से नियुक्त करने में उसकी लागत को कवर करने में सहायता प्रदान करना। (ख) सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में पुनर्संरचना अथवा औद्योगिक इकाइयों के बंद होने के कारण प्रभावित कर्मचारियों के यदि आवश्यक हो, तो मुआवजा स्वरूप राशि मुहैया कराना (ग) औद्योगिक पुनर्संरचना के परिणामस्वरूप मजदूरों की जरूरतों के लिए निवल सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने के मद्देनजर संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में रोजगार सृजन स्कीमों के लिए राशि मुहैया कराना।
नेशनल रिन्यूअल फंड के दो संघटक थे :-
- नेशनल रिन्यूअल ग्रांट (एनआरजीएफ) कमजोर यूनिटों के बंद होने अथवा पुनर्रुद्धार से उत्पन्न होने वाले मजदूरों की तत्काल होने वाली जरूरतों को पूरा करने से संबंधित कार्य करता है। औद्योगिक उपक्रमों के पुनर्रुद्धार करने और तकनीकी उन्न्यन औद्योगिक उपक्रमों के पुनर्रुद्धार करने और तकनीकी उन्नयन, आधुनिकीकरण, पुनर्निर्माण के कारण प्रभावित कर्मचारियों को सेवा में रखने और उन्हें परामर्श देने के लिए पुन:प्रशिक्षण और पुन:तैनाती से संबंधित अनुमोदित योजनाओं के लिए निधियों का वितरण किया जाता है। इन विधियों का उपयोग निम्नलिखित के लिए किया जाता है। औद्योगिक उपक्रमों और इसके मार्गों में यौक्तिकीकरण द्वारा प्रभावित कर्मचारियों को क्षतिपूर्ति का भुगतान करना। संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों के लिए अनुमोदित रोजगार सृजन योजनाओं हेतु रोजगार सृजन तिथि (ईजीएफ) अनुदानों का वितरण करना किया। इसमें निम्नलिखित योजनाएं शामिल थीं :- (क) औद्योगिक पुनर्गठन द्वारा प्रभावित क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सृजित करने हेतु विशेष कार्यक्रम का निर्माण किया गया।(ख) पारिभाषित क्षेत्रों में असंगठित क्षेत्रकों के लिए रोजगार सृजन योजनाएं।
यद्यपि यह निधि समाप्त कर दी गई परन्तु सरकार लगातार इस दिशा में प्रयास कर रही है।
- केंद्रीय सरकारी क्षेत्रक उद्यमों (सीपीएसयू) के यौक्तिकीकृत कर्मचारियों के परामर्श, पुन:प्रशिक्षण, पुन:तैनाती (सीआरआर) की स्कीम
स्कीम का उद्देश्य और विस्तार केंद्रीय सरकारी क्षेत्रक उद्यमों के यौक्तिकीकृत कर्मचारियों के परामर्श, पुन:प्रशिक्षण, पुन:तैनाती की व्यवस्था करना, जो केंद्रीय पीएसई में आधुनिकीकरण प्रौद्योगिकी उन्नयन और श्रम शक्ति पुनर्गठन के परिणामस्वरूप बेकार हो गए हैं। इसमें तीन मुख्य घटक शामिल हैं।
- परामर्श : यह विस्थापित कर्मचारियों के पुनर्वास कार्यक्रम की बुनियादी पूर्वापेक्षा है। विस्थापित कर्मचारियों को अपने और अपने परिवार दोनों के लिए नौकरी से हाथ धोने और इसके परिणामस्वरूप चुनौतियों का सामना करने के कारण उनके द्वारा उठाई जाने वाली पीड़ा से निजात पाने के लिए मनोवैज्ञानिक परामर्श की आवश्यकता होती है। उसे नए बाजार अवसरों के प्रति जागरूक होने की आवश्यकता होती है जिससे कि वह अपनी बुद्धि और विशेषज्ञता के आधार पर उपयुक्त आर्थिक क्रियाकलाप आरंभ कर सके।
- पुनर्प्रशिक्षण : यह कर्मचारियों के पुनर्वास के लिए उन्हें यौक्तिकीकृत बनाने में सहायता करता है। प्रशिक्षुओं की नए कार्यकलाप प्रारंभ करने और अपनी नौकरी चली जाने के बाद उत्पादकता प्रक्रिया में पनु: प्रवेश करने के लिए आवश्यक कौशल/विशेषज्ञता/अभिमुखीकरण प्राप्त करने में सहायता करेगा।
- पुन:तैनाती : उत्पादन प्रक्रिया में ऐसे यौक्तिकीकृत कर्मचारियों में से परामर्श और पुन:प्रशिक्षण द्वारा की जाती है। कार्यक्रम के अंत में वे स्व रोजगार के वैकल्पिक व्यवसाय करने के लिए समर्थ होने चाहिए। यद्यपि इसकी कोई गारंटी नहीं हो सकती कि यौक्तिकीकृत कर्मचारी को वैकल्पिक रोजगार का आश्वासन दिया जाए तथापि अभिचिन्हांकित नोडल प्रशिक्षण एजेंसी तथा संबंधित केंद्रीय सरकारी क्षेत्रक उपक्रमों से नया व्यवसाय शुरू करने के लिए उन्हें सहायता दी जा सकती है। इस योजना की पुन:स्थापना सरकारी उद्यम विभाग द्वारा की गई थी और इसको अपने सीआरआरसैल के जरिए योजना क्रियान्वित करने की जिम्मेदारी दी गई है।
इस योजना की पुन: स्थापना लोक उद्योग विभाग द्वारा की गई थी और इसे अपने सीआरआर प्रकोष्ठ के जरिए योजना कार्यान्वित करने की जिम्मेदारी दी गई। सीआरआर योजना के लिए विभिन्न कार्यकलाप करने हेतु बहुत से नोडल प्रशिक्षण अभिकरणों की स्थापना की गई है जिनके अनेकानेक कर्मचारी सहायता केंद्र पूरे देश में योजना के तहत प्रशिक्षण की जरुरतों को पूरी करने के लिए स्थित हैं।
|