जब कोई उद्यमी लाभप्रद विकास करने और स्थायी आधार पर व्यवसाय का विस्तार करने में असफल रहता है तो उसे संगठन की पुनर्संरचना करने या उसे बंद करने का निर्णय लेना पड़ सकता है। इस प्रकार, उसे या तो कंपनी की पुनर्स्थापना करनी होगी। यदि कंपनी आर्थिक दृष्टि से सक्षम है अथवा आर्थिक रूप से असक्षम एकक को बंद करना होगा ताकि ऐसे एककों में लगे निवेशों को कहीं और तैयार उत्पादन कारी प्रयोग के लिए मुक्त किया जा सके।
किसी भी व्यवसाय संगठन को समापन या उसे बंद करने के लिए उद्यमी को इसके कर्मचारियों, ऋणदाताओं, शेयरधारकों इत्यादि के हितों का भी ध्यान रखना चाहिए।
भारत में सबसे महत्वपूर्ण विनियमन रुग्ण उद्योगों से संबंधित हैं। रुग्ण उद्योग वे उद्योग होते है जो कमोबेश स्थायी तौर पर धारा उठाते रहते हैं और उन्हें जल्दी समाप्त करने की संभावना नहीं होती। सामान्य रूप से, ऐसे एकक बंद हो जाते हैं या उनकी व्यापक पुनर्संरचना की जाती है। ताकि ऐसे प्रकार्य और कार्यकलाप समाप्त किए जा सकें जो विशेष रूप से हानिकर हैं। ऐसे स्थिति से निपटने के लिए, रुग्ण उद्योग कंपनी (विशेष उपबंध) अधिनियम,1985 अधिनियमित किया गया। इसका उद्देश्य औद्योगिक रुग्णता का पता लगाना और शीघ्र सुधारात्मक उपाय सुझाना था। इसलिए, औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड (बीआईएफआर) नामक एक अर्ध-न्यायिक संस्था स्थापित की गई जिसने आर्थिक दृष्टि से सक्षम एककों की पुनर्स्थापना या आर्थिक रूप से असक्षम एककों को बंद करने की प्रक्रिया तेज़ की। यह अधिनियम निरस्त कर दिया गया और इसके स्थान रुग्ण औद्योगिक कंपनी (विशेष उपबंध) निरसन अधिनियम,2003 , जिसने बीआईएफआर के स्थान पर राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) स्थापित करके पूरी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और अधिक सरल बना दिया।
निरन्तर चल रही सुधार प्रक्रिया के एक भाग के रूप में, सरकार एक व्यवहार्य निर्गम नीति के जरिए औद्योगिक एकक के समापन की प्रक्रिया में अधिक लोच लाने के प्रयास करती आ रही है। |