रुग्ण औद्योगिक एकक को ऐसे एकक या कम्पनी के रूप में परिभाषित किया गया है (जिसका अस्तित्व कम से कम पांच वर्ष से रहा हो) जिसकी किसी भी वित्तीय वर्ष कें अंत में हुई संचित हानियां इसके सम्पूर्ण निवल मूल्य के समतुल्य या अधिक रही हों। निवल मूल्य को सम्भार एवं व्यय घटाकर कम्पनी की प्रदत्त पूंजी तथा मुक्त प्रारक्षित भण्डार की कल राशि के रूप में आकलित किया जाता है। किसी औद्योगिक एकक को तब भी संभावित रुग्ण या कमजोर एकक माना जाता है यदि किसी वित्तीय वर्ष के अंत में इसने बिलकुल पूर्ववर्ती चार वित्तीय वर्षों में इसके औसत निवल मूल्य के 50 प्रतिशत के समतुल्य या उससे अधिक हानियां उठाई हो और तीन लगातार तिमाहियों में अपने ऋणदाताओं को ऋण अदायगी करने में ऐसी अदायगी के लिए लिखित मांग होने पर भी असफल रही हो।
किसी औद्योगिक एकक की रुग्णता के दो बुनियादी कारक निम्नलिखित हैं :-
- आंतरिक कारक जो संगठन के भीतर ही पैदा होते हैं। ये हैं :-
- कम्पनी के विभिन्न कार्यात्मक क्षेत्रों जैसे वित्त, उत्पादन, विपणन और कार्मिकों का कुप्रबंधन;
- एकक का गलत स्थान पर स्थित होना;
- मांग का अधिक अनुमान लगाना और गलत लाभांश नीति;
- परियोजनाओं का खराब कार्यान्वयन जो गलत नियोजन या प्रबंधकीय अक्षमता के कारण हो सकती है;
- तैयार माल और निवेश साधनों के संबंध में समान-सूची प्रबंधन खराब होना;
- संसाधनों का अनावश्यक विस्तार और अन्यत्र प्रयोग जैसे व्यक्तिगत फिजूलखर्च, अत्यधिक ऊपरी खर्च, अनुत्पादक अचल परिसम्पत्तियों का अधिग्रहण इत्यादि;
- बदलते माहौल के अनुरूप उत्पादनकारी तंत्र का आधुनिकीकरण करने, उत्पाद –योजना और विपणन योजना के अन्य घटकों को बदलने में असफल रहना;
- खराब श्रम प्रबंधन संबंध और कर्मचारियों का सहबद्ध मनोबल कम होना तथा कम उत्पादकता, हड़तालें, तालाबंदियां इत्यादि।
- बाहरी कारक जो संगठन से बाहर पैदा होते हैं। ये हैं :-
- बिजली की कटौती या कोयले अथवा तेल की कमी से उत्पन्न ऊर्जा संकट;
- आपूर्ति उद्योगों में उत्पादन संबंधी कर्मियों, प्राकृतिक कारणों से खराब कृषि उत्पादन, आयात स्थितियों में परिवर्तन इत्यादि के परिणामस्वरूप कच्चे माल की कमी के कारण इष्टतम क्षमता हासिल न कर पाना;
- परिवज्रन संबंधी बाधाओं जैसे अवसंरचनात्मक समस्याएं;
- ऋण संबंधी समस्याएं;
- बाजार में मंदी, प्रौद्योगिकीय परिवर्तन इत्यादि जैसी स्थितियां;
- अंतरराष्ट्रीय दबाव या परिस्थितियां इत्यादि।
औद्योगिक रुग्णता ऐसे सभी कारकों के मिल-जुले रूप के कारण पैदा हो सकती है। इसका अर्थव्यवस्था पर समग्र रूप से अनेक प्रतिकूल प्रभाव होते हैं। इनमें से कुछ का वर्णन नीचे किया गया हैं :-
- इससे सरकार को अत्यधिक राजस्व हानि होती है और इसका सरकारी व्यय बढ़ जाता है;
- इससे रुग्ण एकक में आवश्यक संसाधन और निधियां बंध जाती हैं। इससे बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के गैर-निष्पादनकारी परिसम्पत्तियों (एनपीए) में भी वृद्धि हो जाती है;
- इससे अर्थव्यवस्था में उत्पादन और उत्पादकता की हानि होती है;
- इससे अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी की समस्य और गंभीर हो जाती हैं;
- इससे औद्योगिक माहौल बिगड़ जाता है और कामगार प्रबंधन विवाद, हड़तालें, तालाबंदियां इत्यादि रूप सामने आते हैं;
- इससे देश में संगठित क्षेत्र के कार्यकरण में जनता का विश्वास डोल जाता है जिससे आगे देश में निवेश का समग्र माहौल प्रभावित होता है।
रुग्णता के उपर्युक्त परिणामों और विस्तार, क्षेत्र और उद्योग के संदर्भ में इसके बढ़ते प्रभाव क्षेत्र तथा परिणामस्वस्थ इसके दूरगामी सामाजिक आर्थिक प्रभावों को देखते हुए सरकार भारत में इस समस्या से निपटने के लिए अनेक उपाय और सुधारात्मक कार्रवाई कर रही है। सबसे महत्वपूर्ण उपाय रुग्ण औद्योगिक कम्पनी (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1985 (सिका) का अधिनियमन रहा हैं।
रुग्ण औद्योगिक कम्पनी (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1985
औद्योगिक रुग्णता से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण कानून रुग्ण औद्योगिक (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1985 (सिका) था। यह सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों के औद्योगिक उपक्रमों पर लागू होता है। "सिका" उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1956 की पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट उद्योगों से संबंधित है जो अधिनियम में निधारित अपवादों के अध्यधीन होगा। सिका में जिसमें उसके अंतर्गत बनाए गए नियम या योजनाएं भी शामिल है, विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 और शहरी भूमि (उच्चतम सीमा और विनियमन) अधिनियम, 1976 को छोड़कर अन्य कानूनों पर अभिभावी होने वाले उपबंध भी है।
सिका अधिनियम करने के पीछे बुनियादी आधार औद्योगिक एककों में रुग्णता का निर्धारण करना था। इसका एक लक्ष्य संभावित रूप से सक्षम एककों को पुनरूज्जीवित करने में तेज़ी लाना भी था, ताकि ऐसे एककों में किया गया निवेश लाभप्रद हो सके। साथ ही यह भी उद्देश्य था कि आर्थिक रूप से अक्षम एककों को बंद करना सुनिश्चित किया जाए जिससे ऐसे एककों में रूके हुए निवेशों को कहीं और उत्पादकारी प्रयोग में लगाया जा सके।
इस प्रकार, सिका के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं :-
- रुग्ण और संभवत: रुग्ण हो जाने वाली कम्पनियों को समय रहते पता लगाना।
- ऐसी कम्पनियों के संबंध में किए जाने वाले जरूरी निवारक, प्रशासक, सुधारात्मक एवं अन्य उपायों के विशेषज्ञ दल द्वारा शीघ्र-निर्धारण
- इस प्रकार तय किए गए उपायों और उनसे जुड़े या अनुषंगी सभी मामलों का शीघ्र प्रवर्तन करना।
सिका के महत्वपूर्ण उपबंध इस प्रकार हैं :-
- इनमें दो अर्ध-न्यायिक निकायों के गठन का प्रावधान किया गया, अर्थात औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड (बीआईएफआर) तथा औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण अपीली न्यायाधिकरण (एएआईएफआर)। बीआईएफआर का गठन शीर्ष बोर्ड के रूप में औद्योगिक रूग्णता का समाधान करने के लिए किया गया और इसे संभावित रुग्ण उपक्रमों के पुन:सुधार एवं पुनरूज्जीवन तथा आर्थिक रूप से अक्षम कम्पनियों को परिसमापन के लिए उपयुक्त उपाय करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। जबकि एएआईएफआर की गठन बीआईएफआर के विरूद्ध अपीलों की सुनवाई करने के लिए किया गया था।
- बीआईएफआर यदि यह उपयुक्त समझे यह निर्धारित करने के लिए जांच करेगा कि क्या कोई उद्योग निम्नलिखित स्थितियों में रुग्ण हुआ हैं :-
- यदि किसी रुग्ण औद्योगिक कम्पनी के निदेशक मण्डल ने अपनी कंपनी के संबंध में सुधारात्मक उपायों के निर्धारण हेतु बीआईएफआर को अपना संदर्भ सौंपा हो। ऐसा संदर्भ उस वित्तीय वर्ष, जिसके अंत में कम्पनी रुग्ण हो गई हो, के कम्पनी के विधिवत लेखा परीक्षित विवरणों को अंतिम रूप दिए जाने की तिथि से साठ दिन के भीतर सौंपा जाएगा। संदर्भ दाखिल करने के लिए निदेशक मण्डल के पास यह राय कायम करने के पर्याप्त कारण होने चाहिए कि कम्पनी रुग्ण हो गई हैं; अर्थात
- रुग्ण कंपनी के संबंध में ऐसी सूचना (संदर्भ) प्राप्त करने पर या कंपनी की वित्तीय स्थिति की स्वयं जानकारी होने पर। बोर्ड को ऐसा संदर्भ इनके द्वारा भेजा जा सकता है :- (i) केन्द्र सरकार; (ii) भारतीय रिजर्व बैंक; (iii) राज्य सरकारें; (iv) सरकारी वित्तीय संस्थाएं; (v) राज्य स्तर की संस्थाएं; (vi) अनुसूचित बैंक।
तथापि, किसी औद्योगिक कम्पनी के संबंध में ऐसा संदर्भ इनके द्वारा नहीं भेजा जा सकता :- (i) किसी राज्य सरकार द्वारा, बशर्तें सभी या कोई एक औद्योगिक उपक्रम (ऐसी कम्पनी का) उस राज्य में स्थित हो; (ii) सरकारी वित्तीय संस्था या राज्य स्तर की संस्था या अनुसूचित बैंक, बशर्तें इसका ऐसी कम्पनी में किसी वित्तीय सहायता या इसके द्वारा उठाए गए किसी दायित्व के साथ में कोई हित निहित हो।
बोर्ड इस मामले की जांच करने के लिए किसी प्रचालन अभिकरण को आदेश दे सकता है तथा जांच को यथाशीघ्र पूरा करेगा।
- यदि बोर्ड उपयुक्त समझता है कि किसी औद्योगिक कम्पनी की जांच करे या करवाए तो यह कम्पनी के वित्तीय और अन्य हितों की रक्षा करने के लिए कम्पनी के विशेष निदेशक (निदेशकों) के रूप में एक या अधिक व्यक्तियों को नियुक्त कर सकता है। कम्पनी अधिनियम, 1956 या फिलहाल प्रवृत्त किसी अन्य कानून में या संस्था के अंतर्नियमों में या औद्योगिक कम्पनी से संबंधित किसी अन्य दस्तावेज़ में विपरीत स्थिति का उल्लेख होने के बावजूद ऐसे निदेशक की नियुक्ति वैध और प्रभावी होगी।
इस प्रकार नियुक्त विशेष निदेशक :- (i) बोर्ड के निर्णयानुसार पदासीन होंगे और बोर्ड द्वारा लिखित आदेश दिए जाने पर हटाए जा सकते हैं या उनके स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त किया जा सकता है; (ii) केवल अपने निदेशक होने के कारण या निदेशक के रूप में अपने दायित्व निर्वहन में नेकनीयत से किए गए कार्य या भूल-चूक के लिए या उससे संबंधित किसी और कारण से उनकी कोई देनदारी या देयता नहीं होगी; (iii) चे क्रम परिवर्तन से सेवानिवृत्त नहीं होंगे और ऐसे सेवानिवृत्ति होने वाले निदेशकों की संख्या का आकलन करने के लिए शामिल नहीं किए जाएंगे; (iv) रुग्ण औद्योगिक कम्पनी के संबंध में अपने दायित्व निर्वाह में नेकनीयत से किए गए कार्य का भूल-चूक के लिए किसी कानून के तहत उन पर अदालती कार्रवाई नहीं की जाएगी।
|