पंजीकृत कम्पनी और अपंजीकृत कम्पनी का समापन किसी कम्पनी का समापन ऐसी प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया गया है जिसके जरिए किसी कम्पनी का जीवन समाप्त कर दिया जाता है और इसकी सम्पत्ति इसके सदस्यों और ऋणदाताओं के लाभ के लिए परिसमाप्त कर दी जाती है। एक प्रशासक, जिसे परिसमापक कहा जाता है, नियुक्त किया जाता है और वह कम्पनी को नियंत्रण में लेता है, इसकी परिसम्पत्तियों को एकत्र करता है, इसके ऋणों की अदायगी करता है और अन्तत: यदि कोई अधिशेष रह जाए तो सदस्यों के अधिकारों के अनुसार उनमें वितरित कर देता है। समापन हो जाने पर कम्पनी की कोई परिसम्पत्ति या देनदारी बाकी नहीं होगी। जब कम्पनी के कार्य पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं, कम्पनी भंग हो जाती है। भंग हो जाने के बाद, कम्पनी का नाम कम्पनियों के रजिस्टर में से हटा दिया जाता है और निगम के रूप में उसका विधिक अस्तित्व खत्म हो जाता है।
कम्पनी के पंजीकृत या अपंजीकृत होने के आधार पर समापन की प्रक्रिया भिन्न-भिन्न होती है। कम्पनी अधिनियम, 1956 के तहत पंजीकरण से बताई गई कम्पनी पंजीकृत कम्पनी कहलाती है। इसमें ऐसी मौजूदा कम्पनी भी शामिल है जो किसी पूर्ववर्ती कम्पनी अधिनियम के तहत बनाई या पंजीकृत की गई हो।
पंजीकृत कम्पनी का समापन
कम्पनी अधिनियम में पंजीकृत कम्पनी के समापन के दो तरीकों का प्रावधान है।
अनिवार्य समापन अथवा न्यायाधिकरण द्वारा किया गया समापन
- यदि कम्पनी ने विशेष प्रस्ताव से यह निश्चय किया है कि कम्पनी का समापन न्यायाधिकरण द्वारा किया जाएगा।
- यदि रजिस्ट्रार को सांविधिक रिपोर्ट भेजने अथवा सांविधिक बैठक आयोजित करने में चूक हुई हो। इस आधार पर रजिस्ट्रार या अंशदाता द्वारा उस तारीख, जब बैठक आयोजित की जानी अपेक्षित थी, से 14 दिन की अवधि मे ही एक याचिका दायर की जा सकती है। न्यायाधिकरण समापन के स्थान पर सांविधिक बैठक के आयोजन अथवा सांविधिक रिपोर्ट भेजने भेजने का आदेश दे सकता है।
- यदि कम्पनी इसके निगमीकरण के एक वर्ष के भीतर अपना व्यापार शुरू नहीं कर पाती अथवा पूरे वर्ष के लिए अपना व्यापार अस्थगित कर देती है। इस आधार पर समापन का आदेश तभी दिया जाता है यदि व्यापार जारी रखने का कोई इरादा न हो और इस स्थिति में न्यायाधिकरण को विवेकाधिकार होगा।
- यदि सदस्यों की संख्या सांविधिक न्यूनतम से कम रह जाए अर्थात सरकारी कम्पनी में सात से कम और निजी कम्पनी के मामले में दो से कम।
- यदि कम्पनी अपने उधार चुकाने में असफल रही हो।
- यदि न्यायाधिकरण की राय है कि कम्पनी का समापन उचित और साम्यपूर्ण है।
- न्यायाधिकरण रूग्ण एककों के पुन:सुधार और पुन:स्थापना की जांच-पड़ताल कर सकता है। यदि इसके पुन: सुधार की संभावना नहीं हो तो न्यायाधिकरण इसके समापन का आदेश दे सकता है।
- यदि कम्पनी ने लगातार पांच वित्तीय वर्षों तक रजिस्ट्रार के समक्ष अपना तुलन-पत्र और लाभ-हानि खाता या वार्षिक विवरणी दाखिल करने में चूक की हो।
- यदि कम्पनी ने भारत की प्रभुसत्ता और एकता, देश की सुरक्षा, विदेशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता के विरुद्ध कार्य किया हो।
न्यायाधिकरण द्वारा समापन की याचिका निम्नलिखित द्वारा दी जा सकती है :-
- कम्पनी द्वारा, समापन के लिए विशेष प्रस्ताव पारित करके।
- ऋणदाता द्वारा, कम्पनी के ऋण न चुका पाने की स्थिति में।
- अंशदाता या अंशदाताओं द्वारा, सांविधिक बैठक न बुला पाने या सांविधिक रिपोर्ट दाखिल न करने या सदस्यों की संख्या सांविधिक न्यूनतम से कम हो जाने की स्थिति की।
- रजिस्ट्रार द्वारा, बशर्तें केन्द्र सरकार का पूर्वानुमान प्राप्त कर लिया गया हो।
- केन्द्र सरकार द्वारा प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा, यदि कम्पनी के व्यापार की जांच से प्रतीत होता है कि कम्पनी का काम-काज इसके ऋणदाताओं, सदस्यों या किसी अन्य व्यक्ति को धोखा देने के इरादे से चलाया गया हैं।
- केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा, यदि कम्पनी ने भारत की प्रभुसत्ता, एकता या सुरक्षा अथवा सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता, नैतिकता इत्यादि के विरूद्ध कार्रवाई की हो।
जब किसी कम्पनी का समापन इसके सदस्यों या ऋणदाताओं द्वारा न्यायाधिकरण के हस्तक्षेप के बिना किया जाता है, तब इसे स्वैच्छिक समापन कहते हैं। यह निम्न रूप में किया जा सकता है :-
- आम सभा में साधारण प्रस्ताव पारित करके यदि :- (i) यदि नियमों द्वारा कम्पनी का कार्यकाल हेतु निश्चित अवधि समाप्त हो गई हो; या (ii) कोई ऐसी घटना जिसके कारण कम्पनी का समापन किया जाना हो, घटित हुई हो।
- किसी भी कारणवश स्वैच्छिक समापन के लिए विशेष प्रस्ताव पारित करके।
प्रस्ताव, भले ही साधारण या विशेष हो, पारित होने के 14 दिन के भीतर उसे सरकारी राजपत्र में और कम्पनी के पंजीकृत कार्यालय के जिले में प्रचलित कुछ महत्वपूर्ण समाचार पत्रों में विज्ञापित किया जाना चाहिए।
कम्पनी अधिनियम (धारा 484) में स्वैच्छिक समापन की दो विधियों का प्रावधान किया गया है :-
सदस्यों का स्वैच्छिक समापन
यह उन ऋणशोधन श्रम कम्पनियों के मामले में होता है जो अपनी देनदारियां पूरी तरह चुकाने में सक्षम है। ऐसे समापन के लिए दो शर्तें हैं :-
- अधिसंख्य निदेशकों द्वारा अथवा यदि उनकी संख्या दो है तो दोनों द्वारा ऋणशोधन-क्षमता की एक घोषणा की जानी चाहिए। इसमें यह उल्लेख किया जाएगा कि कम्पनी निर्धारित अवधि में जो समापन शुरू होने से अधिक से अधिक तीन वर्ष तक की होगी, अपने ऋणों की पूरी अदायगी कर सकेगी। यह घोषणा समापन के प्रस्ताव की तारीख से पांच सप्ताह पहले की जानी चाहिए और रजिस्ट्रार के पास दाखिल की जानी चाहिए। इसके साथ लाभ-हानि खाते तथा तुलनपत्र पर लेखा परीक्षक की रिपोर्ट, तथा नवीनतम व्यवहार्य तारीख तक परिसम्पत्तियों और देनदारियों का विवरण भी संलग्न होना चाहिए; और
- शेयरधारकों को कम्पनी के समापन हेतु एक साधारण अथवा विशेष प्रस्ताव पारित करना चाहिए।
सदस्यों के स्वैच्छिक समापन पर लागू उपबंध निम्नानुसार हैं :-
- आम सभा द्वारा परिसमापक की नियुक्ति और उनके पारिश्रमिक का नियतन।
- परिसमापक की नियुक्ति हो जाने पर बोर्ड की शक्तियों की समाप्ति सिवाय जो आम सभा या परिसमापक द्वारा मंजूर की गई हैं।
- परिसमापक के पद पर मृत्यु, त्यागपत्र या अन्यथा किसी कारण से हुई रिक्ति को आम सभा द्वारा भरा जाएगा जो ऋणदाताओं के साथ की गई व्यवस्था के अध्यधीन होना।
- परिसमापक की नियुक्ति का नोटिस रजिस्ट्रार को भेजना।
- कम्पनी के व्यापार की बिक्री के लिए प्रतिफल के रूप में शेयर या इसी प्रकार ब्याज को स्वीकारने की परिसमापक की शक्ति बशर्तें इस आशय का विशेष प्रस्ताव पारित किया गया हो।
- कम्पनी के दिवालिया होने की स्थिति में ऋणदाताओं की बैठक बुलाने और उनके समक्ष परिसम्पत्तियों और देनदारियों का विवरण रखने से संबंधित परिसमापक की जिम्मेदारी होगी।
- प्रत्येक वर्ष के अन्त में आम सभा आयोजित करना परिसमापक का कर्त्तव्य होगा।
- परिसमापक की जिम्मेदारी होगी कि समापन का विवरण तैयार करें और उसे अंतिम बैठक से पूर्व प्रस्तुत करे।
ऋणदाताओं द्वारा स्वैच्छिक समापन
ऐसी दिवालिया हो चुकी कम्पनियों के मामले में संभव है। इसके लिए स्वैच्छिक समापन की प्रक्रिया की ठीक शुरूआत से ही सदस्यों के अलावा ऋणदाताओं की बैठकें आयोजित करना जरूरी होता है। ऋणदाताओं को की परिसमापक की नियुक्ति करने का अधिकार होता है, और इसलिए समापन-कार्यवाहियों पर ऋणदाताओं का प्रभुत्व होता है।
ऋणदाताओं के स्वैच्छिक समापन पर लागू उपबंध निम्नानुसार हैं :-
- जिस बैठक में समापन का प्रस्ताव किया जाना हो, उसी दिन या अगले दिन निदेशक मण्डल ऋणदाताओं की बैठक बुलाएगा। बैठक का नोटिस सदस्यों को नोटिस भेजते समय साथ ही साथ ऋणदाताओं को भी भेजा जाएगा। यह सरकारी राजपत्र में तथा पंजीकृत कार्यालय के स्थान पर परिचालित दो समाचारपत्रों में विज्ञापित किया जाएगा।
- ऋणदाताओं की बैठक में कम्पनी की स्थिति का विवरण और ऋणदाताओं की सूची एंव उनके दावों की सूची प्रस्तुत की जाएगी।
- ऋणदाताओं की बैठक में पारित प्रस्ताव की प्रति रजिस्ट्रार के पास उसके पारित होने के 30 दिन के भीतर दाखिल की जानी चाहिए।
- ऐसा सदस्यों और ऋणदाताओं की संबंधित बैठकों में किया जाएगा। यदि मतभेद हो तो ऋणदाताओं को निमित्त ही परिसमापक होगा।
- परिसमापक के कार्य की देखरेख करने के लिए ऋणदाताओं द्वारा पांच सदस्यीय निरीक्षण समिति गठित की जाएगी।
- परिसमापक के परिश्रमिक का नियतन ऋणदाताओं या निरीक्षण-समिति द्वारा किया जाएगा।
- परिसमापक की नियुक्ति होने पर बोर्ड की शक्तियां समाप्त हो जाएंगी।
जैसे ही कम्पनी के मामले समाप्त होंगे, परिसमापक कम्पनी तथा ऋणदाताओं की बैठक बुलाएगा जो इस बैठक से एक माह पूर्व स्थानीय समाचारपत्रों तथा सरकारी राजपत्र में विज्ञापन के जरिए आयोजित की जाएगी तथा इसके समक्ष लेखा विवरण प्रस्तुत करेगा। इस बैठक से एक माह के भीतर परिसमापक रजिस्ट्रार को लेखा विवरणों की प्रति तथा प्रस्तावों का विवरण भेजेगा।
अपंजीकृत कम्पनी का समापन
कम्पनी अधिनियम के अनुसार, अपंजीकृत कम्पनी में कोई भी भागीदारी, एसोसिएशन, या समापन की याचिका प्रस्तुत करते समय सात व्यक्तियों से अधिक बनी कम्पनी शामिल हो सकती है। लेकिन इसमें निम्नलिखित शामिल नहीं होगा :-
- संसद के अधिनियम या किसी अन्य भारतीय कानून या ब्रिटिश संसद के अधिनियम द्वारा निगमित रेल कम्पनी;
- कम्पनी अधिनियम, 1956 के तहत पंजीकृत कम्पनी;
- किन्हीं पूर्ववर्ती कम्पनी कानूनों के तहत पंजीकृत कम्पनी;
- अधिनियम के उपबंधों के विरुद्ध बनी कोई गैर-कानूनी एसोसिएशन।
तथापि, भारत में व्यापार कर रही विदेशी कम्पनी का अपंजीकृत कम्पनी के रूप में समापन किया जा सकता है चाहे वह अपने निगमन के देश के कानूनों के तहत भंग या समाप्त कर दी गई हो।
अपंजीकृत कम्पनी के समापन से संबंधित उपबंध निम्नानुसार हैं :-
- ऐसी कम्पनी न्यायाधिकरण द्वारा समाप्त की जाती है लेकिन स्वैच्छिक तौर पर कभी नहीं।
- जिन परिस्थितियों के तहत अपंजीकृत कम्पनी का समापन किया जा सकता है, निम्नानुसार है :-
- यदि कम्पनी भंग कर दी गई है या व्यापार नहीं कर रही है या केवल अपना कार्य समाप्त करने के लिए ही व्यापार कर रही है।
- यदि कम्पनी अपने ऋण को न चुका पाए।
- यदि न्यायाधिकरण कम्पनी का समापन न्यायासन्नत और साम्यपूर्ण समझे।
- अंशदाता से अभिप्राय ऐसे व्यक्ति से है जो कम्पनी के समापन की स्थिति में परिसम्पत्तियों में अंशदान करने के लिए बाध्य हो। प्रत्येक व्यक्ति को अंशदाता माना जाएगा यदि उसे निम्नलिखित में से किसी की भी अदायगी करनी पड़े :-
- कम्पनी का कोई ऋण या देनदारी;
- सदस्यों के बीच अधिकारों के समायोजन हेतु कोई राशि;
- समापन की कोई लागत, प्रभार और खर्च;
- समापन आदेश देते समय, केवल न्यायाधिकरण की अनुमति से ही कोई कानूनी कार्यवाही की जा सकती है।
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