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Indian Economy
Legal Aspects अर्थ और संकल्‍पना
Legal Aspects कानूनी रूपरेखा
Legal Aspects संगठनात्‍मक संरचना
Legal Aspects मानक, भार और मापन
Legal Aspects उपभोक्‍ताओं की शिक्षा और जागरुकता
Legal Aspects बौद्धिक सम्‍पदा अधिकार और उपभोक्‍ता संरक्षण
Legal Aspects उपभोक्‍ता शिकायत निवारण
Legal Aspects मुद्दे और समस्‍याएं
Legal Aspects सुझाव या मत
   
 
Consumer Rights

उपभोक्‍ता शिकायत निवारण

उपभोक्‍ता मामले विभाग को आपूर्तियों/उपभोक्‍ताओं की आकांक्षाओं की कमी के संबंध में उपभोक्‍ताओं से बड़ी संख्‍या में शिकायतें प्राप्‍त हो रही है। इन शिकायतों में कई प्रकार के विषय जैसे त्रुटिपूर्ण रेफ्रिजरेटर, टीवी सेट को आपूर्ति, फ्लैटों के निर्माण बिल्‍डरों द्वारा घटिया सामग्री का प्रयोग, परिपक्‍वता पर कंपनियों द्वारा सावधि जमा खातों की अदायगी न करना और सेवा प्रदात्ताओं के विरूद्ध अनुचित व्‍यापार पद्धति की शिकायतें आदि शामिल हैं।

उपभोक्‍ता शिकायत निवारण प्रकोष्‍ठ तथा उपभोक्‍ता समन्‍वय परिषद्

विभाग ने निम्‍नलिखित श्रेणियों से संबंधित उपभोक्‍ताओं की शिकायतों के निवारण के लिए सेवाएं प्रदान करने हेतु फरवरी 2002 में उपभोक्‍ता शिकायत निवारण प्रकोष्‍ठ (सी जी आर सी) का गठन किया था:
  • त्रुटिपूर्ण सामान की बिक्री अथवा खराब सेवाएं और अधिक मूल्‍य प्रभारि‍त करना इत्‍यादि।
  • कैबिनेट सचिव तथा प्रधानमंत्री कार्यालय से प्राप्‍त उपभोक्‍ता मामलों से संबधित शिकायतों सहित सामान्‍य शिकायतें।
  • समाचार पत्रों के कॉलम में प्रकाशित होने वाली उपभोक्‍ता शिकायतों को यथासंभव देखना।
यही नहीं विभिन्‍न जिलों/राज्‍यों/राष्‍ट्रीय आयोग के पास लंबे पड़े मामलों के निपटान में विलंब से संबंधित शिकायतें प्राप्‍त हुई तथा सक्रिय उपाय के रूप में उन पर कार्रवाई कर आवश्‍यक अनुवर्ती कार्रवाई की गई ताकि उनकी संतुष्टि के अनुरूप शिकायतों का निवारण किया जा सके। निवारण प्रकोष्‍ठ को 31 मार्च 2007 तक 2272 शिकायतें प्राप्‍त हुई थी। सामान बदलने,टेलिफोन / बिजली पुन: लगाने, गलत बिलों को सुधारने, आबंटित फ्लैटों का अधिग्रहण, परिपक्‍वता पर निवेशकों को देय राशि का भुगतान आदि से संबंधित इन शिकायतों को निवारण हेतु उपभोक्‍ता समन्‍वय परिषद् (सी सी सी) को भेजा गया था।

उपभोक्‍ता शि‍कायत निवारण प्रकोष्‍ठ और उपभोक्‍ता समन्‍वय परिषद् के पास उपभोक्‍ताओं की शिकायतों पर कार्रवाई करने के लिए कोई सांविधिक शक्तियां नहीं है, अत: वे शिकायतों को निपटान के संबंधित प्राधिकारियों को भेज देते हैं।

उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम के अनुसार निवारण तंत्र

  • शिकायत दर्ज कौन कर सकता है?

  • किसी सामान अथवा सेवाओं के संबंध में शिकायत निम्‍न द्वारा दर्ज की जा सकती है:-

    • कोई उपभोक्‍ता अथवा
    • कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का) अथवा कुछ समय तक प्रवृत किसी अन्‍य कानून के अंतर्गत पंजीकृत कोई स्‍वयंसेवी उपभोक्‍ता एसोसिएशन
    • केन्‍द्र सरकार अथवा कोई राज्‍य सरकार, अथवा
    • एक अथवा अधिक उपभोक्‍ता, जहां अधिकांश उपभोक्‍ताओं का हित है अथवा
    • उपभोक्‍ता की मृत्‍यु होने की दशा में उसका वैध उत्तराधिकारी अथवा प्रतिनिधि

    अटार्नीधारी अधिनियम के अंतर्गत शिकायत दर्ज नहीं कर सकता।

  • शिकायत क्‍या है?

  • शिकायत का अर्थ है शिकायतकर्ता द्वारा लिखित में कोई आरोप लगाया जाना कि -

    • किसी व्‍यापारी अथवा सेवा प्रदाता द्वारा अनुचित व्‍यापार पद्धति अथवा प्रतिबंधित व्‍यापार पद्धति अपनाई जा रही है।
    • उसके द्वारा खरीदा गया समान अथवा जिस समान को खरीदने के लिए स्‍वीकृति की गई है, उसमें एक या अधिक खराबी है।
    • उसके द्वारा ली जाने वाली सेवाएं अथवा ली गई अथवा जिन्‍हें लिए जाने हेतु सहमति दी गई है अथवा जिन्‍हें ले लिया गया है, में किसी भी प्रकार की कमी है।
    • किसी व्‍यापारी अथवा सेवा प्रदाता, जैसा भी मामला है, ने शिकायत में उल्लिखित सामान अथवा सेवा के लिए कुछ समय के लिए प्रवृत्त कानून द्वारा अथवा उसके अंतर्गत निर्धारित अथवा समान पर अथवा ऐसे सामान के पैकेज पर दर्शाए गए अथवा कुछ समय के लिए प्रवृत्त किसी कानून द्वारा अथवा कानून के अंतर्गत निर्धारित मूल्‍य सूची में दर्शाए गए अथवा दोनों पक्षों के बीच समहत हुए मूल्‍य से अधिक मूल्‍य लिया हो।
    • सामान जो प्रयोग करने पर जीवन और सुरक्षा के लिए हानिकारक होगा, लोगों को बेचा जा रहा हो।
    • सेवा प्रदाता द्वारा ऐसी सेवाएं जो प्रयोग किए जाने पर लोगों के लिए हानिकारक है अ‍थवा हो सकती हैं, दी जा रही हों और जिन्‍हें वह व्‍यक्ति ध्‍यान देने पर जान सकता हो कि ये जीवन और सुरक्षा के लिए हानिकारक हैं।

  • शिकायत कैसे दर्ज की जाए?

    • शिकायत सादे कागज पर दर्ज की जा सकती है। इसमें निम्‍नलिखित बातें होनी चाहिए :

      • शिकायतकर्ता और विपक्ष का नाम, ब्‍यौरा और पता।
      • शिकायत से संबंधित तथ्‍य और यह कब और कहां से उत्‍पन्‍न हुई।
      • शिकायत में लगाए गए आरोपों के समर्थन में दस्‍तावेज।
      • वह राहत जो शिकायतकर्ता पाना चाहता है।
      • शिकायत पर शिकायतकर्ता अथवा प्राधिकृत एजेंट के हस्‍ताक्षर होने चाहिए।

    • शिकायत दर्ज करने के लिए किसी वकिल की आवश्‍यकता नहीं है।
    • न्‍यायालय शुल्‍क नाममात्र का है।

  • शिकायत कहां पर दर्ज करनी है (सामान की लागत अथवा सेवा अथवा मांगी गई प्रतिपूर्ति पर आधारित)

    • जिला मंच : यदि यह 20 लाख रु. से कम की हैं।
    • राज्‍य आयोग : यदि यह 20 लाख रु. से अधिक है लेकिन 1 करोड़ रूपए से कम है।
    • राष्‍ट्रीय आयोग : यदि 1 करोड़ रुपए से अधिक है।

  • एकीकृत तीन स्‍तरीय उपभोक्‍ता शिकायत निवारण तंत्र

  • इस तंत्र में स्‍तर एक पर उपभोक्‍ता ऑन लाइन अनुसंधान और सशक्‍तीकरण (सीओआरई) केन्‍द्र, राष्‍ट्रीय उपभोक्‍ता हेल्‍पलाइन (एनसीएच) और उपभोक्‍ता की आवाज तथा स्‍तर दो पर फिक्‍की एलांयस फार कंज्‍यूमर केयर शामिल है। जबकि स्‍तर तीन पर गैर-मुकदमा तंत्र अथवा वै‍कल्पिक विवाद निपटान (एडीआर) शामिल है।

    • उपभोक्‍ता ऑनलाइन अनुसंधान और सशक्‍तीकरण (सीओआरई) केन्‍द्र

    • सीओआरई केन्‍द्र की स्‍थापना उपभोक्‍ता समन्‍वय परिषद/सीसीसी के सहयोग से समझौता ज्ञापन पर हस्‍ताक्षर कर की गई है। इसका उद्देश्‍य समाज के सभी वर्गों में उपभोक्‍ताओं में जागरूकता पैदा करने और उनके सशक्‍तीकरण के लिए उपभोक्‍ता संबंधी जानकारी एकत्र करने और उसका प्रसार करने की सर्वाधिक वैज्ञानिक और प्रभावी प्रणाली उपलब्‍ध कराना है। यह उपभोक्‍ता कार्य विभाग की एकमात्र प्राधिकृत एजेंसी है जो मध्‍यस्‍थता द्वारा ऑनलाइन उपभोक्‍ता शिकायतों का निवारण करती है। सीओआरई स्‍वयं को पंजीकृत कर सकते हैं और अपनी शिकायत ऑनलाइन दर्ज करा सकते हैं।

      यदि शिकायत/परिवाद का निपटान अभी भी नहीं किया गया है तो शिकायतकर्ता को सलाह दी जाती है कि वह स्‍वयं निर्णय करे कि उसे मामले को उपभोक्‍ता न्‍यायालय में ले जाना है अथवा नहीं। इसके लिए शिकायतकर्ता को प्रक्रिया के बारे में बताकर और सी. सी. सी. के नजदीकी सदस्‍य संगठन जो इस संबंध में उसकी सहायता कर सकते हैं, का संपर्क पता बताकर, उसकी सहायता की जाती है।

    • राष्‍ट्रीय उपभोक्‍ता हेल्‍पलाइन (एनसीएच)

    • उपभोक्‍ता मामले विभाग द्वारा दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय, वाणिज्‍य विभाग के समन्‍वय से 3.12 करोड़ रु. की अनुमोदित लागत से राष्‍ट्रीय उपभोक्‍ता हेल्‍पलाइन परियोजना आरंभ की गई। हेल्‍पलाइन के अंतर्गत देश भर के उपभोक्‍ता टोल फ्री नम्‍बर 1800-11-4000 पर डायल कर सकते हैं और उपभोक्‍ता के रूप में उनके समक्ष आ रही समस्‍याओं के लिए दूरभाष पर परामर्श ले सकते है। हेल्‍पलाइन का उद्देश्‍य दूरसंचार, कूरियर, बैकिंग, बीमा, वित्तीय सेवाएं इत्‍यादि से संबंधित समस्‍याओं को दूर करना है।

    • उपभोक्‍ता की आवाज -उपभोक्‍ता शिक्षा के हित में स्‍वयंसेवी संगठन

    • यह एक स्‍वयंसेवी कार्य दल है जिसमें शिक्षाविद्, व्‍यवसायिक और स्‍वयंसेवी शामिल हैं जो शिक्षित उपभोक्‍ता तैयार करने के लिए अपनी ऊर्जा या उपयोग कर रहे है। यह उपभोक्‍ताओं में न केवल बाजार में फैले रहे कदाचारों की जानकारी देता है अपितु, उसे उसके अधिकारों से भी अवगत कराता है। 'आवाज' या उद्देश्‍य उपभोक्‍ताओं और पर्यावरण की सुरक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य के लिए अनुभावी बेहतर पद्धतियों और वैज्ञानिक ज्ञान को एकीकृत करने के द्वारा सभी को उपभोक्‍ता शिक्षा प्रदान कर परिवर्तनशील और गतिशील बाजार में सही विकल्‍पों को बढावा देना है। यह उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अंतर्गत शिकायत निवारण हेतु अपने अभिदाताओं को कानूनी परामर्श भी देता है।

    • फिक्‍की अलांयस फॉर कंज्‍यूमर केयर (एफ ए सी सी)

    • फिक्‍की ने उपभोक्‍ता कार्य विभाग के सहयोग से एक समर्पित केन्‍द्र ''फिक्‍की अलांयस फॉर कंज्‍यूमर केयर'' स्‍थापि‍त करने की पहल की है। एफएसीसी व्‍यवसाय और उपभोक्‍ता के बीच की कड़ी है और उपभोक्‍ता की शिकायतों के तत्‍काल निपटान में सहायता करता है। यह उत्तरदायी व्‍यवसाय पद्धतियों को बढावा देने तथा उपभोक्‍ता की संतुष्टि के लिए व्‍यवसाय और उपभोक्‍ताओं के बीच बातचीत का माध्‍यम है। यह एक तंत्र स्‍थापित करने तथा ऐसा मंच जो स्‍वैच्छिक स्‍वविनियमन तथा उपभोक्‍ता शिक्षा के माध्‍यम से उपभोक्‍ता की शिकायतों के तत्‍काल निपटान में सहायता करता है उपलब्‍ध कराने के उद्देश्‍य से स्‍थापित किया गया है।

    • एफ ए सी सी विवाद निपटान

    • यह एक तटस्‍थ निकाय है जिसमें व्‍यावसायिक रूप से प्रशिक्षित मध्‍यस्‍थों का पैनल होगा और जो शिकायत निपटान हेतु उत्तरदायी होगा। केन्‍द्र केवल शिकायत का समाधान करने के लिए दोनों पक्षों की मदद हेतु कंपनी और शिकायतकर्ता के बीच बातचीत कराएगा। कई मामलों में विवाद के निपटान में सहायतार्थ मध्‍यस्‍थता और समायोजन का भी प्रावधान है।

      एफ ए सी सी का व्‍यवसाय समुदाय में महत्‍व इसकी तटस्‍थता पर आधारित है। इस प्रणाली का उद्देश्‍य व्‍यवसाय अथवा उपभोक्‍ताओं की वकालत करना नही है अपितु विवादों के निपटान तथा संप्रेषण हेतु सैद्धांतिक व्‍यवसाय पद्धतियों के अनुसार सूचना प्रदान करने के लिए पारस्‍परिक विश्‍वस्‍त मध्‍यस्‍थ के रूप में कार्य करना है।

      जब एफएसीसी बोर्ड को शिकातय प्राप्‍त होती है तो यह इसे इससे संबंधित व्‍यवसाय को भेज देता है और अधिकांश कंपनियां समस्‍या के समाधान के लिए प्राप्‍त अवसर से प्रसन्‍न होंगी क्‍योंकि उपभोक्‍ता द्वारा उनका संरक्षण सुरक्षित रहता है। साथ ही, एफएसीसी के पास कोई कानूनी शक्तियां नहीं हैं और यह किसी कंपनी को न तो प्रतिक्रिया करने के लिए बाध्‍य कर सकता है और न ही वे किसी संस्‍वीकृति को प्रवृत्त कर सकते हैं।

    • गैर मुकदमा तंत्र अथवा वैकल्पिक विवाद निपटान (ए डी आर)

    • वैकल्पि‍क विवाद निपटान (ए डी आर) में विवाद के समाधान हेतु कई पहल अपनाता है जिनमें से अधिकांश तटस्‍थ व्‍यक्ति जैसे मध्‍यस्‍‍थ जो पक्षों की उनकी असहमति का समाधान करने में सहायता कर सकता हो, का उपयोग करते हैं। ए डी आर औपचारिक प्रशासनिक प्रक्रियाओं और मुकदमों (जो काफी महंगे तथा लंबे समय तक चलने वाले होते हैं) से पहले अथवा के दौरान विवादों के निपटान के लिए पक्षों के अवसरों में वृद्धि कर देता है।

      ए डी आर सामान्‍यतया तीन उप-प्रकारों में वर्गीकृत है : बातचीत मध्‍यस्‍थता और निर्णयन। प्रत्‍येक प्रकार की विशिष्‍टताएं निम्‍न है :

      • बातचीत में भागीदारी स्‍वैच्छिक होती है और इसमें कोई तीसरा पक्ष नहीं होता जो समाधान प्रक्रिया में सहायता करता है अथवा समाधान आरोपित करता है।
      • मध्‍यस्‍थता में तीसरा पक्ष, मध्‍यस्‍थ, होता है जो समाधान प्रक्रिया में सहायता करता है (और समाधान का सुझाव दे सकता है जिसे 'मध्‍यस्‍थ का प्रस्‍ताव' कहा जाता है) लेकिन पक्षो पर समाधान आरोपित नहीं करता।
      • निर्णयन में भागीदारी विशिष्‍ट रूप से स्‍वैच्छिक होती है और इसमें तीसरा पक्ष होता है जो कि निजी जज होता है जो समाधान आरोपित करता है। निर्णयन कई बार होता है क्‍योंकि करार के पक्ष इस पर सहमत होते है कि करार से संबंधित किसी भावी विवाद को निर्णयन द्वारा हल किया जाएंगा। हाल के वर्षों में निर्णयन के खंडों की प्रवर्तनीयता विशेषकर उपभोक्‍ता करारों (जैसे क्रेडिट कार्ड करार) के संदर्भ में न्‍यायालयों द्वारा संवीक्षा की जाती है। यद्यपि पक्ष निर्णय के परिणामों के संबंध में न्‍यायालय में अपील कर सकते है तथापि इन अपीलों की अत्‍यधिक समीक्षा की जाती हैं।

  • देश में उपभोक्‍ता मंचों का कंप्‍यूटरीकरण और कंप्‍यूटर नेटवर्किंग
  • यह योजना 2004-05 से लागू किए जाने के लिए महत्‍वपूर्ण परियोजना के रूप में राष्‍ट्रीय सूचनाविज्ञान केंद्र (नेशनल इन्‍फार्मेटिक्‍स सेन्‍टर) (एनआईसी) के माध्‍यम से शुरू की गई है। इस योजना का उद्देश्‍य आईटी समाधान उपलब्‍ध कराना है ताकि ई-शासन पारदर्शिता, उपभोक्‍ता मंचों की समक्षता प्राप्‍त की जा सके और समय बद्ध तरीके से मामलों के निपटान में सहायता की जा सके। इसे विभिन्‍न प्रकार के मामलों, आंकडों और रिपोर्ट तैयार करने के लिए की जाने वाली कार्रवाई को व्‍यवस्थि‍त करने में सहायता मिलेगी और आगामी अनुरक्षण हेतु बेहतर प्रशासनिक नियंत्रण में भी सहायता मिलेगी। इससे उपभोक्‍ता अपनी शिकायतें ऑनलाइन दर्ज करा सकेंगे और अपने मामलों की स्थिति को वेबसाइट पर देख सकेंगे। इसके अंतर्गत उपभोक्‍ताओं से संबंधित सभी वेबसाइटें (राष्‍ट्रीय आयोग, राज्‍य आयोगों, जिला मंचों, उपभोक्‍ता मामले विभाग, सीओआरई केन्‍द्र, राष्‍ट्रीय उपभोक्‍ता हेल्‍पलाइन इत्‍यादि) एक-दूसरे से जुड़ी होगी ताकि उपभोक्‍ता इनमें से किसी भी वेबसाइट से उपभोक्‍ता से संबंधित जानकारी प्राप्‍त कर सकें।

^ऊपर

 
उपभोक्‍ता कार्य विभाग
उपभोक्‍ता संरक्षण अधिनियम, 1986
उपभोक्‍ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम,2002
उपभोक्‍ता संरक्षण नियम, 1987
उपभोक्‍ता संरक्षण विनियम 2005
 
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