उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम ने उपभोक्ताओं के विवादों के तत्काल और मितव्ययी निपटान हेतु राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर तीन-स्तरीय क्वासी ज्युडिशियल उपभोक्ता विवाद निवारण तंत्र स्थापित किए हैं। यह सिविल कोर्ट के समक्ष कार्रवाई आरंभ करने की सामान्य प्रक्रिया का विकल्प है। ये मंच अनिवार्यत: उपभोक्ताओं की शिकायतों का सरल, त्वरित और मितव्ययी निपटान प्रदान करते हैं। तीन निपटान एजेंसियां निम्नवत् हैं :-
राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी)
अधिनियम केन्द्र सरकार को राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग की स्थापना करने की शक्ति प्रदान करता है। इसकी अध्यक्षता भारत के उच्चतम न्यायालय के आसीन अथवा सेवानिवृत्त जज करते हैं। इस अधिनियम के अन्य प्रावधानों के अध्यधीन राष्ट्रीय आयोग के अधिकार क्षेत्र में निम्नवत् आते है।
- उन शिकायतों को जिनमें सामान अथवा सेवाओं का मूल्य और मुआवजे, यदि कोई है, का दावा एक करोड़ रुपए से अधिक है; और किसी राज्य आयोग के आदेशों के विरूद्ध की गई अपील को स्वीकार करना; और
- किसी उपभोक्ता विवाद, जो राज्य आयोग के समक्ष लम्बित है अथवा आयोग द्वारा उसका निर्णय किया गया है, जहां राष्ट्रीय आयोग को ऐसा लगता हो कि उक्त राज्य आयोग ने कानून में विहित अधिकार क्षेत्र का उपयोग नहीं किया है अथवा विहित अधिकार क्षेत्र का उपयोग करन में असफल रहा है अथवा अपने अधिकार क्षेत्र के उपयोग में अवैध रूप से कार्य किया है अथवा स्पष्टत: अनियमितता बरती है, में रिकार्ड मांग सकता है और समुचित आदेश पारित कर सकता है।
राष्ट्रीय आयोग के अधिकार क्षेत्र, शक्तियों और प्राधिकार का उपयोग उसके अधीन पीठों द्वारा भी किया जाए। पीठ का गठन अध्यक्ष द्वारा एक अथवा अधिक सदस्य जैसा अध्यक्ष उचित समझें, द्वारा किया जाए।
तद्नुसार 1988 में, राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) का गठन किया गया। वर्तमान में माननीय न्यायमूर्ति एम बी शाह भारत के उच्चतम न्यायालय इसके अध्यक्ष है और इसमें आठ सदस्य - श्रीमती राज्यलक्ष्मी राव, श्री बी; के तैमिनी, माननीय न्यायमूर्ति के. एस. गुप्ता, माननीय न्यायमूर्ति एस. एन कपूर, डॉ. पी.डी. शिनॉय, श्री अनुपम दासगुप्ता, श्री एस. के. नायक और माननीय न्यायमूर्ति आर. सी जैन है।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए राष्ट्रीय आयोग को मामलों के प्राप्त होने, निपटान होने तथा लंबितता के संबंध में आवधिक रिटर्न मांगने के द्वारा सभी राज्य आयोग के ऊपर प्रशासनिक नियंत्रण की शक्तियां प्रदान की हैं। इसे निम्न के संबंध में निर्देश जारी करने की शक्ति प्रदान की गई है : (1) मामलों की सुनवाई में एक समान प्रक्रिया को स्वीकार करना; (2) एक पक्ष द्वारा दूसरे को भेजे गए दस्तावेजों की प्रति पहले से भेजना; (3) दस्तावेजों की प्रतियों का तत्काल अनुमोदन और (4) सामान्यतया राज्य आयोगों अथवा जिला मंचों के कार्यकरण का निरीक्षण करना ताकि क्वासी ज्युडिशियल स्वतंत्रता में किसी भी प्रकार से हस्तक्षेप किए बगैर अधिनियम के उद्देश्य और प्रयोजनों को बेहतर ढंग से प्राप्त करना सुनिश्चित किया जा सके।
राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग
अधिनियम के अंतर्गत राज्य सरकार द्वारा संबंधित राज्य के लिए राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का गठन किया जाए। वर्तमान में विभिन्न राज्यों में
35 राज्य आयोग कार्य कर रहे हैं। राज्य आयोगों की अध्यक्षता उस व्यक्ति द्वारा की जाती है जो उच्च न्यायालय का जज है अथवा रहा हो। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अंतर्गत राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का राज्य आयोगों के ऊपर प्रशासनिक नियंत्रण होता है। इस अधिनियम के अन्य प्रावधानों के अध्यधीन राज्य आयोग का क्षेत्राधिकार निम्न होगा :-
- उन शिकायतों जहां सामान अथवा सेवाओं का मूल्य और मुआवजे, यदि कोई है, का दावा बीस लाख रु. से अधिक है लेकिन एक करोड़ रु. से अधिक नहीं है; और
- किसी उपभोक्ता विवाद जो राज्य के भीतर जिला मंच के समक्ष लंबित है अथवा मंच द्वारा उसका निर्णय किया गया है जहां राज्य आयोग को ऐसा लगता हो कि उक्त जिला मंच ने कानून में विहित अधिकार क्षेत्र का उपयोग नहीं किया है अथवा विहित अधिकार क्षेत्र का उपयोग करने में असफल रहा है अथवा अपने अधिकार क्षेत्र के उपयोग में अवैध रूप से कार्य किया है अथवा स्पष्टत: अनियमितता बरती है, में रिकार्ड मांग सकता है और समुचित आदेश पारित कर सकता हे।
यही नहीं, राज्य में शिकायत की जा सकती है, जिसके अधिकार क्षेत्र में हैं :-
- सामने वाला पक्ष अथवा सामने वाले पक्षों में से प्रत्येक, जहां पर एक से अधिक पक्ष हैं, शिकायत करते समय वास्तव में और स्वेच्छा से निवास करता हो अथवा व्यवसाय करता हो अथवा उसका शाखा कार्यालय हो अथवा लाभ के लिए व्यक्तिगत रूप से कार्य करता हो; अथवा
- सामने वाले पक्षों में से कोई, जहां एक से अधिक पक्ष है, शिकायत करते समय वास्तव में और स्वेच्छा से निवास करता हो अथवा व्यवसाय करता हो अथवा उसका शाखा कार्यालय हो अथवा लाभ के लिए व्यक्तिगत रूप से कार्य करता हो बशर्ते कि ऐसे मामले में या तो राज्य आयोग की अनुमति हो अथवा सामने वाले पक्ष जो निवास नहीं करते अथवा व्यवसाय नहीं करते अथवा जिनका शाखा कार्यालय नहीं है अथवा जो लाभ के लिए व्यक्तिगत रूप से कार्य नहीं करते जैसा भी मामला हो, ऐसी शिकायत पर सहमत हों, अथवा
- कारवाई का कारण पूर्णत: अथवा आंशिक रूप से उत्पन्न होता हैं।
शिकायतकर्ता के आवेदन पर अथवा इसके प्रस्ताव पर राज्य आयोग कार्यवाही के किसी भी स्तर पर यदि न्यायहित में आवश्यक हो, जिला मंच के समक्ष लंबित किसी शिकायत को राज्य के भीतर अन्य किसी जिला मंच को अंतरित कर सकता है। राज्य आयोग सामान्यतया राज्य की राजधानी में कार्य करें लेकिन यह किसी अन्य स्थान पर अपने कार्य का निष्पादन कर सकता हें जिसे राज्य सरकार द्वारा राज्य आयोग के परामर्श से समय-समय पर सरकारी राजपत्र में अधिसूचित किया गया है।
जिला मंच
अधिनियम के अंतर्गत राज्य सरकार द्वारा राज्य के प्रत्येक जिले में एक जिला मंच स्थापित करेगी, यद्यपि, एक जिले में एक से अधिक जिला मंच स्थापित किए जा सकते हैं, यदि ऐसा उचित लगता हो। वर्तमान में विभिन्न राज्यों में
604 जिला मंच कार्य कर रहे हैं। जिला मंचों की अध्यक्षता उस व्यक्ति द्वारा की जाती है जो जिला न्यायाधीश है अथवा रहा हो अथवा नियुक्त किए जाने हेतु पात्र है। मंच के पास उन शिकायतों को स्वीकार करने का अधिकार क्षेत्र (अधिनियम के अन्य प्रावधानों के अध्यधीन) होना चाहिए जहां पर समान अथवा सेवाओं का मूल्य और मुआवजे, यदि है, का दावा बीस लाख रुपए से अधिक न हो, जिला मंच जिसके अधिकार क्षेत्र की स्थानीय सीमाओं के भीतर शिकायत दर्ज की जाए :-
- सामने वाला पक्ष अथवा सामने वाले पक्षों में से प्रत्येक, जहां पर एक से अधिक पक्ष है, शिकायत करते समय वास्तव में और स्वेच्छा से निवास करते हो अथवा व्यवसाय करता हो अथवा उसका शाखा कार्यालय हो अथवा लाभ के लिए व्यक्तिगत रूप से कार्य करता हो; अथवा
- सामने वाले पक्षों में से कोई, यहां एक से अधिक पक्ष है, शिकायत करते समय वास्तव में और स्वेच्छा से निवास करता हो अथवा व्यवसाय करता हो अथवा उसका शाखा कार्यालय हो अथवा लाभ के लिए व्यक्तिगत रूप से कार्य करता हो बशर्ते कि ऐसे मामले में या तो जिला मंच की अनुमति हो अथवा सामने वाले पक्ष, जो निवास नही करते अथवा व्यवसाय नहीं करते अथवा लाभ के लिए व्यक्तिगत रूप से कार्य नहीं करते, जैसा भी मामला हो, ऐसी शिकायत पर सहमत हों; अथवा
- कारवाई का कारण पूर्णत: अथवा आंशिक रूप से उत्पन्न होता हैं।
जहां दो या अधिक मंचों का अधिकार क्षेत्र हो शिकायत दोनों में से किसी में भी की जा सकती है। तथापि यदि न्यायालय का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है तो करार द्वारा अधिकार क्षेत्र विहित नहीं किया जा सकता। यदि पक्षें के बीच विवाद सिविल न्यायालय में लंबित है तो उपभोक्ता मंच का उसे स्वीकार करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है।
बिक्री किए गए अथवा सुपुर्द किए गए अथवा ब्रिकी किए जाने हेतु सहमत अथवा सुपुर्द किए जा चुके सामान अथवा दी गई अथवा दी जाने के लिए सहमत की गई सेवा के संबंध में शिकायत निम्न द्वारा जिला मंच में दर्ज की जाए :-
- उपभोक्ता द्वारा जिसे ऐसा सामान बेचा गया अथवा सुपुर्द किया गया अथवा बिक्री किए जाने हेतु सहमति की गई अथवा सुपुर्द कर दिया गया अथवा ऐसी सेवा दी गई अथवा दी जाने पर सहमति की गई;
- किसी मान्यता प्राप्त उपभोक्ता संघ द्वारा, चाहे उपभोक्ता, जिसे सामान बेचा गया अथवा जिसके सुपुर्द किया गया अथवा जिसको बेचे जाने हेतु सहमति दी गई अथवा जिसकों सुपुर्द कर दिया गया अथवा जिसे सेवा दी गई अथवा दी जाने हेतु सहमति दी गई, उक्त संघ का सदस्य है या नहीं;
- जहां पर अधिकांश उपभोक्ताओं का हित जुड़ा हो, जिला मंच की अनुमति से, सभी उपभोक्ताओं की ओर से अथवा उनके लाभ के लिए एक या अधिक उपभोक्ता द्वारा; अथवा
- केन्द्र सरकार अथवा राज्य सरकार द्वारा, जैसा भी मामला हो, या तो व्यक्तिगत रूप से या सामान्य तौर पर उपभोक्ताओं के हितों के प्रतिनिधि के रूप में।
प्रत्येक शिकायत के साथ निर्धारित शुल्क दिया जाए तथा इसका निर्धारित विधि से भुगतान किया जाए। जिला मंच द्वारा शिकायत प्राप्त होने पर इस पर कार्रवाई करने अथवा इसे निरस्त करने की अनुमति दी जाए। तथापि, शिकायत तब तक खारिज नहीं की जाए जब तक कि शिकायतकर्ता को एक बार सुनवाई का अवसर न दिया गया हो। शिकायत की ग्राह्यता पर सामान्यतया शिकायत प्राप्त होने के 21 दिनों के भीतर निर्णय कर लिया जाए। इसकी ग्राहयता के पश्चात् शिकायत को किसी अन्य न्यायालय, अधिकार अथवा कुछ समय के लिए प्रवृत्त किसी कानून द्वारा अथवा उसके अधीन गठित किसी अन्य प्राधिकरण को न भेजा जाए।
यदि उपभोक्ता जिला मंच के निर्णय से संतुष्ट नहीं है तो वह उसे राज्य आयोग के समक्ष चुनौती दे सकता है और राज्य आयोग के आदेश के विरुद्ध उपभोक्ता राज्य आयोग में जा सकता है।