कारपोरेट कार्य मंत्रालय भारतीय नैगम क्षेत्र में नैगम शासन के दक्ष, पारदर्शी तथा जवाबदेह स्वरूप को विनियमित तथा संवर्धित करने के लिए मुख्य प्राधिकरण है। यह निरंतर विधायी ढांचे तथा प्रशासनिक संघटन में सुधार के लिए कार्यरत है ताकि कम्पनियों के सहज निगमन तथा निकासी के साथ साथ नैगम शासन में पारदर्शिता तथा जवाबदेही के साथ विनियमों का सुविधाजनक अनुपालन सक्षम हो सके। यह मुख्यत: कम्पनी अधिनियम, 1956 तथा संबंधित विधानों के प्रशासन से संबधित है।
1. कम्पनी
अधिनियम, 1956 भारत में केंद्रीय विधान है जो
केंद्रीय सरकार को कम्पनियो के गठन, वित्तपोषण, कार्यकरण
तथा परिसमापन को विनियमित करने की शक्तियां देता हैं। यह
सम्पूर्ण भारत पर तथा सभी प्रकार की कम्पनियों पर
प्रयोज्य है चाहे वे इस अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत हो
या किसी पूर्ववर्ती अधिनियम के तहत पंजीकृत हो। यह निदेशकों तथा प्रबंधकों की शक्तियों तथा उत्तरदायित्व,
पूंजी जुटाने, कम्पनी की बैठकों का आयोजन करने, कम्पनी
लेखों के अनुरक्षण तथा लेखापरीक्षा, निरीक्षण की शक्तियों,
इत्यादि की व्यस्था करता है। इस का अर्थ है कि यह
केंद्रीय सरकार को कम्पनी की लेखाबहियों का निरीक्षण
करने, विशेष लेखापरीक्षा निदेशित करने, कम्पनी के
कार्यकरण की जांच का आदेश देने तथा अधिनियम के उल्लंघन के
लिए मुकदमा चलाने की शक्तियां देता है ये निरीक्षण यह पता
लगाने के लिए अभिकल्पित हैं कि क्या कम्पनियां अधिनियम
के प्रावधानों के अनुसार अपने कार्यकलापों का संचालन कर
रही हैं, क्या किसी कम्पनी या कम्पनियों के समूह द्वारा
जनहित के लिए पूर्वाग्रहपूर्ण अनुचित व्यवहारों का सहारा
लिया जा रहा है तथा इनमें यह जांच की जाती है कि क्या कोई
ऐसा कुप्रबंधन है जो शेयरधारकों, ऋणदाताओं, कर्मचारियों
तथा अन्यों के हित को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकता
है।
इस अधिनियम को बनाने के मुख्य उद्देश्य ये हैं - (i)
सुस्वस्थ रूपरेखा पर कम्पनियों के विकास में सहायता करना; (ii)
कम्पनी संवर्धन तथा प्रबंधन में अच्छे व्यवहार तथा व्यवसाय ईमानदारी के
न्यूनतम मानक का अनुरक्षण करना; (iii) शेयरधारकों
के साथ साथ ऋणदाताओं के हितों का संरक्षण करना; (iv)
कम्पनियों के वार्षिक प्रकाशित तुलनपत्र तथा लाभ और हानि लेखों में
कम्पनियों के कार्यों का सही तथा उचित प्रकटन सुनिश्चित करना; (v)
लेखाकरण तथा लेखापरीक्षा से उचित स्तर का सुनिश्चय करना; (vi)
प्रबंधकों तथा निदेशक मंडल के साथ साथ कम्पनी के कर्मचारियों इत्यादि को
उचित पारिश्रमिक उपलब्ध कराना।
कम्पनी अधिनियम, 1956 में कम्पनी अभिशासन में जुड़े
व्यापक प्रावधान है जो कम्पनियों के प्रबंधन तथा प्रशासन
से संबंधित है इसमें लेखा तथा लेक्षापरीक्षा, निदेशकों के
पारिश्रमिक, अन्य वित्तीय तथा गैर-वित्तीय प्रकटनों, नैगम
लोकतंत्र, कुप्रबंधन निवारण इत्यादि के संबंध में विशेष
प्रावधान निहित हैं।
प्रत्येक कम्पनी किन्ही अन्य बैठकों के अतिरिक्त हर वर्ष अपनी वार्षिक आम बैठक के रूप में एक आम सभी का आयोजन करेगी तथा उसके आयोजन के संबंध में भेजी गई सूचनाओं में बैठक को इसी नाम से विनिर्दिष्ट करेगी तथा कम्पनी की एक वार्षिक आम बैठक की तिथि तथा अगली बैठक की तिथि में बीच पन्द्रह माह से अधिक की अवधि का अंतर नहीं होगा। प्रत्येक वार्षिक आम बैठक में, प्रत्येक कम्पनी एक लेखापरीक्षक या लेखापरीक्षकों की नियुक्ति करेगी जो उस बैठक की समाप्ति से अगली आम वार्षिक बैठक की समाप्ति तक पदधारण करेंगा/करेंगे तथा नियुक्ति के सात दिनों के भीतर इस प्रकार नियुक्त प्रत्येक लेखापरीक्षक को ऐसी नियुक्ति की सूचना दी जाएगी।
कम्पनी के प्रत्येक लेखापरीक्षक को हर समय कम्पनी की बहियों तथा लेखों और वाउचरों तक अभिगम्यता का अधिकार होगा चाहे वे कम्पनी के मुख्यालय में रखे गए हो या अन्यत्र रखे गए हो तथा उसे कम्पनी के अधिकारियों से ऐसी सूचना तथा स्पष्टीकरण की अपेक्षा करने का अधिकार होगा जो लेखापरीक्षक के रूप में अपने कर्त्तव्य के निर्वहन के लिए लेखापरीक्षक आवश्यक समझे।
लेखापरीक्षक यह पूछताछ करेगा i)
क्या प्रतिभूति के आधार पर कम्पनी द्वारा दिए गए ऋण तथा
अग्रिम उचित प्रकार प्रतिभूत किए गए हैं तथा जिन शर्तों पर
वे दिए गए है, वे कम्पनी या इसके सदस्यों के हितों के
लिए प्रतिकूल तो नहीं हैं; (ii)
कम्पनी के मात्र बही प्रविष्टियों द्वारा दर्शाए गए
लेनदेन कही कम्पनी के हितों के प्रतिकूल तो नहीं,
इत्यादि।
प्रत्येक कम्पनी के मामले में, इसके निदेशक मंडल की
बैठक प्रत्येक तीन माह के कम से कम एक बार आयोजित की
जाएगी तथा प्रत्येक वर्ष ऐसी कम से कम चार बैठकों का
आयोजन किया जाएगा। कम्पनी का प्रत्येक निदेशक, जो किसी
भी प्रकार, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी संविदा
या व्यवस्था, या प्रस्तावित संविदा या व्यवस्था में
रुचि रखता है या उसमें संबंधित है जो कम्पनी द्वारा या
उसकी ओर से की गई है या की जानी है, अपने संबंध या रुचि के
स्वरूप का प्रकटन निदेशक मंडल की बैठक में करेगा।
कम्पनी का कोई भी निदेशक कम्पनी द्वारा या उसकी ओर से
की गई या की जाने वाली किसी संविदा या व्यस्था की चर्चा
में या मतदान में कोई भाग नहीं लेगा यदि वह किसी भी
प्रकार, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उस संविदा या
व्यवस्था से संबंधित दे या उसमें रुचि रखता है, न ही
उसकी उपस्थिति को ऐसी किसी चर्चा या मतदान के समय कोरम
निर्माण के प्रयोजनार्थ गणना में लिया जाएगा, तथा यदि वह
मतदान करता है तो उसका मत अवैध (निरस्त) माना जाएगा।
प्रत्येक कम्पनी एक या अधिक रजिस्टरों का अनुरक्षण
करेगी जिसमें पृथक रूप से सभी संविदाओं या व्यवस्थाओं के
ब्यौरे प्रविष्ट किए जाएंगे, जिनमें प्रत्येक मामले में
प्रयोज्यता की सीमा तक निम्न ब्यौरे शामिल हैं - (i)
संविदा या व्यवस्था की तिथि, (ii)
उसके पक्षकारों के नाम, (iii)
उसकी प्रमुख शर्तें तथा निबंधन, (iv)
उस संविदा या व्यवस्था के मामले में, जिस पर यह अधिनियम
प्रयोज्य है, बोर्ड के समक्ष उसे प्रस्तुत करने की तिथि
(v) संविदा या व्यवस्था के
पक्ष में या उसके विरुद्ध मतदान करने वाले निदेशकों के नाम
तथा निष्पक्ष रहने वाले निदेशकों के नाम। इसके अतिरिक्त,
प्रत्येक कम्पनी अपने पंजीकृत कार्यालय में अपने
निदेशकों, प्रबंध निदेशकों, प्रबंधन एजेंट, सचिवों तथा
कोषाध्यक्ष, प्रबंधक एवं सचिव के रजिस्टर का अनुरक्षण
करेगी।
प्रबंधन या पूर्ण कालिक निदेशक सहित कम्पनी के
निदेशकों को संदेय पारिश्रमिक का निर्धारण कम्पनी के
अनुच्छेदों द्वारा या किसी संकल्प द्वारा अथवा यदि
अनुच्छेदों में अपेक्षित हो, तो आम सभी में कम्पनी
द्वारा पारित विशेष संकल्प द्वारा किया जाएगा तथा ऐसे
किसी भी निदेशक को उपरोक्तानुसार निर्धारित संदेश
पारिश्रमिक में ऐसे निदेशक को उसके द्वारा किसी अन्य हैसियत में प्रदत्त सेवाओं के लिए संदेय पारिश्रमिक शामिल
होगा। तथापि, किसी ऐसे निदेशक द्वारा किसी अन्य क्षमता
में प्रदत्त सेवाओं के लिए पारिश्रमिक को इस प्रकार शामिल
नहीं किया जाएगा यदि (i)
प्रदत्त सेवाएं व्यावसायिक स्वरूप की हैं; तथा (ii)
केंद्र सरकार की राय में निदेशक के पास व्यवसाय का संचालन
करने के लिए अपेक्षित अर्हकताएं हैं।
निदेशक को बोर्ड की या उसकी किसी समिति की प्रत्येक
बैठक में भाग लेने के लिए शुल्क के रूप में पारिश्रमिक
दिया जाएगा। जो निदेशक न तो कम्पनी के पूर्णकालिक रोजगार
में है न ही प्रबंधन निदेशक है, उसे केंद्र सरकार के
अनुमोदन से मासिक, त्रैमासिक या वार्षिक भुगतान के रूप में
अथवा कमीशन के रूप में पारिश्रमिक अदा किया जा सकता है यदि
कम्पनी विशेष संकल्प द्वारा ऐसे भुगतान को प्राधिकृत हो। तथापि, ऐसे निदेशक को अदा किया गया पारिश्रमिक, अथवा जहां
एक से अधिक निदेशक है, उस सभी को मिलाकर अदा किया गया
पारिश्रमिक निम्न से अधिक नहीं होगा (i)
कम्पनी के निवल लाभों का एक प्रतिशत यदि कम्पनी का
प्रबंधन या पूर्ण कालिक निदेशक, प्रबंधन अभिकर्ता या सचिव
और कोषाध्यक्ष या प्रबंधन है (ii)
किसी भी अन्य मामले में कम्पनी के निवल लाभों का तीन
प्रतिशत।
प्रत्येक सरकारी कम्पनी, जिसकी प्रदत्त पूंजी कम से
कम पांच करोड़ रुपए है, बोर्ड की एक समिति का गठन करेगी
जिसे "लेखा परीक्षा समिति" कहा जाएगा
जिसके कम से कम तीन
निदेशक या निदेशकों की उतनी संख्या होगी जो बोर्ड निर्धारित
करे जिनमें से सदस्यों की कुल संख्या के दो तिहाई प्रबंधन
या पूर्ण कालिक निदेशकों से अन्यथा निदेशक होंगे। कम्पनी
की वार्षिक रिपोर्ट में लेखा परीक्षा समिति के संघटन का
प्रकटन किया जाएगा। लेखा परीक्षक, आंतरिक लेखा परीक्षक, यदि
कोई हो, तथा प्रभारी वित्त निदेशक लेखा परीक्षा समिति की
बैठकों में उपस्थित होंगे तथा उनमें भाग लेंगे किंतु
उन्हें मतदान का अधिकार नहीं होगा।
लेखा परीक्षा समिति आंतरिक नियंत्रण प्रणालियों,
लेखापरीक्षा के कार्यक्षेत्र में, जिसमें लेखा परीक्षकों के
अवलोकन शामिल है, के बारे में लेखापरीक्षकों के साथ आवधिक
विचार विमर्श करेगी तथा बोर्ड को प्रस्तुत करने से पूर्व
अर्धवार्षिक तथा वार्षिक वित्तीय विवरणों की समीक्षा करेगी
तथा आंतरिक नियंत्रण प्रणालियों के अनुपालन का भी
सुनिश्चय करेगी। इस बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट मदों के
संबंध में किसी भी मामले की जांच करने का प्राधिकार होगा
तथा इस प्रयोजनार्थ, कम्पनी के रिकार्डों में निहित
जानकारी तथा बाह्रय व्यावसायिक सलाह, यदि आवश्यक हो, तक
इसकी पूर्ण पहुंच होगे। लेखा परीक्षा रिपोर्ट सहित वित्तीय
प्रबंधन से जुड़े किसी भी मामले पर लेखापरीक्षा समिति की
सिफारिशें बोर्ड पर बाध्यकारी होंगी। यदि बोर्ड लेखा परीक्षा
समिति की सिफारिशों को स्वीकार नहीं करता तो वह उसके कारण
अभिलेखबद्ध करेगा तथा ऐसे कारणों की संसूचना शेयरधारकों को
देगा।
इसके अतिरिक्त, कोई सूचीबद्ध सरकारी कम्पनी, तथा ऐसे
व्यवसाय के संबंध में संकल्पों के मामले में जिनकी घोषणा
केंद्र सरकार अधिसूचना द्वारा केवल डाक से मतदान द्वारा
किए जाने के लिए करे, कम्पनी की आम बैठक में कारोगार का
लेनदेन किए जाने के बजाए डाक से मतदान के माध्यम से
संकल्प पारित कराएगी। जहां कोई कम्पनी डाक में मतदान का
सहारा लेकर कोई संकल्प पारित कराने का निर्णय लेती है, वह
उसके कारण स्पष्ट करते हुए एक मसौदा संकल्प शेयरधारकों
को भेजेगी तथा उनसे अनुरोध करेगी कि वे पत्र को डाक में
डालने की तिथि से तीन दिन की अवधि के भीतर डाक मतदान पत्र
पर लिखित में अपनी सहमति या असहमति भेज दें। यदि डाक से
मतदान के माध्यम से शेयरधारकों के अपेक्षित बहुमत द्वारा कोई
संकल्प सम्मत हो जाता है तो उसे इस संबंध में संयोजित आम
बैठक में विधिवत् पारित किया गया माना जाएगा। किंतु यदि
कोई शेयरधारक डाक से मतदान पत्र पर लिखित रूप में अपनी सहमति
या असहमति भेजता है तथा तत्पश्चात कोई व्यक्ति धोखे से
मतदान पत्र को या शेयरधारक की शिनाख्त की घोषणा को
विरुपित या नष्ट कर देता है तो ऐसे व्यक्ति को छ: माह तक
की अवधि के कारावास या अर्थदंड या दोनों सजाएं दी जा सकती
हैं।
2. प्रतिस्पर्धी तथा प्रौद्योगिकी चालित व्यवसाय माहौल
में, हालंकि नैगम को प्रचालन की अपेक्षाकृत अधिक स्वायत्तता तथा इष्टतम
अनुपालन लागतों के साथ स्वविनियमन के अवसर की आवश्यकता है, बेहतर अनुपालन
के लिए नैगम स्वामियों तथा प्रबंधन की ओर से बेहतर प्रकटन तथा अपेक्षाकृत
अधिक उत्तरदायित्व के साथ पारदर्शिता लाए जाने की आवश्यकता है। ऐसे बदलते
नैगम माहौल की अनुक्रिया में, कम्पनी अधिनियम, 1956 को समय-समय पर संशोधित
किया गया है ताकि नैगम शासन में अधिक पारदर्शिता की व्यवस्था की जाए तथा
लद्यु निवेशकों जमाकर्ताओं तथा ऋणपत्र धारकों इत्यादि के हितों का संरक्षण
किया जाएं।
इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम
कम्पनी विधेयक 2004, है जिसे कम्पनी विधि की व्यापक समीक्षा
की व्यवस्था करने के लिए पुन:स्थापित किया गया है। इसमें नैगम शासन से
जुड़े महत्वपूर्ण प्रावधान निहित हैं जैसे लेखापरीक्षकों की स्वतंत्रता,
कम्पनी के प्रबंधकों स्वतंत्र निदेशकों के साथ लेखापरीक्षकों के संबंध, जिसका उद्देश्य नैगम क्षेत्र में नैगम शासन व्यवहारों में सुधार लाना है।
यह कम्पनियों द्वारा अपेक्षाकृत अधिक नम्यता तथा स्वविनियमन, बेहतर
वित्तीय तथा गैर वित्तीय प्रकटनों, विधि के अधिक दक्ष प्रवर्तन के अध्यधीन
है।
कम्पनी अधिनियम 1956 में संशोधन मुख्यत: लेखापरीक्षा
प्रक्रिया तथा निदेशक मंडल के सुधार पर सकेंद्रित है। इसका
मुख्य उद्देश्य है - i)
लेखा परीक्षकों की नियुक्ति की प्रक्रिया तथा अर्हकताओं का
निर्धारण करना, ii)
लेखा परीक्षकों द्वारा गैर लेखापरीक्षा सेवाओं को
प्रतिषद्ध करना; iii) अनिवार्य
क्रमावर्तन कम से कम लेखा परीक्षा भागीदार का निर्धारित
करना; iv) सीईओ तथा सीएफओ,
दोनों के द्वारा वार्षिक लेखा परीक्षित लेखों के प्रमाणन की
अपेक्षा करना, इत्यादि। बोर्डों को सुधारने के लिए,
विधेयक में यह शामिल किया गया कि गैर कार्यपालक निदेशकों
के पारिश्रमिक को केवल शेयरधारकों द्वारा नियत किया जा
सकता है तथा उसका प्रकटन किया जाना चाहिए। अदा की जाने
वाली राशि की सीमा भी निर्धारित की जाएगी। यह भी परिकल्पित
किया गया है निदेशकों को उपयुक्त प्रशिक्षण दिया जाएगा।
तथापि, अन्यों के अलावा, किसी स्वतंत्र निदेशकों का
कम्पनी के शेयरों में महत्वपूर्ण आर्थिक हित नहीं होना
चाहिए।
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