कारपोरेट गवर्नेंस एक वैयक्तिक साधन के स्थान पर एक संकल्पना है। इसमें कम्पनी के समुचित प्रबंधन तथा नियंत्रण संरचनाओं पर वाद-विवाद शामिल है। इसमें मालिकों, निदेशक मंडल तथा पणधारकों जैसे कर्मचारी, आपूर्तिकर्त्ता, ग्राहक तथा कुल मिलाकर जनता के बीच शक्ति संबंधों से जुड़े नियम शामिल है।
विश्व भर में निगम वर्धित रूप से यह मान्य कर रहे हैं कि उनके संगठन की स्थायी वृद्धि के लिए सभी पणधारकों का सहयोग अपेक्षित है जिसके लिए सर्वोत्तम कारपोरेट गवर्नेंस प्रक्रियाओं का अनुपालन आवश्यक है। इस संबंध में, प्रबंधन द्वारा कुल मिलाकर शेयरधारकों के न्यासियों के रूप में कार्य करना तथा शेयरधारकों के विभिन्न संभागों विशेषतया मालिक-प्रबंधकों तथा शेष शेयरधारकों के बीच लाभों की विषमता का निवारण करना आवश्यक है।
भारत में कारपोरेट गवर्नेंस पहलें कारपोरेट कार्य मंत्रालय तथा भारतीय प्रतिभूति और विनियम बोर्ड द्वारा की गई है। सूचीबद्ध कम्पनियों के लिए विशेष रूप से कारपोरेट गवर्नेंस के लिए प्रथम औपचारिक विनियामक ढांचा सेबी द्वारा कुमार मंगलम बिरला समिति रिपोर्ट की अनुशंसाओं के अनुसरण में फरवरी 2000 में स्थापित किया गया था। इसे सूचीयन करार के खंड 49 के रूप में अधिष्ठापित किया गया। इसके अतिरिक्त, सेवी अन्य कानूनों जैसे प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम 1992; तथा निक्षेपागार अधिनियम, 1996 के माध्यम से कारपोरेट गवर्नेंस के मानकों का अनुरक्षण कर रहा है।
कारपोरेट कार्य मंत्रालय ने विभिन्न कारपोरेट गवर्नेंस मुद्दों की जांच करने के उद्देश्य से वर्ष 2002 में कारपोरेट लेखापरीक्षा तथा अभिशासन संबंधित नरेश चंद्र समिति को नियुक्त किया था। इसने कारपोरेट गवर्नेंस के दो प्रमुख पहलुओं के बारे में अनुशंसाएं की :- वित्तीय तथा गैर वित्तीय प्रकटन तथा स्वतंत्र लेखा परीक्षा एवं प्रबंधन की बोर्ड ओवर साइट। यह कम्पनी अधिनियम के अधिनियमन तथा इसके संशोधनों के जरिए कारपोरेट गवर्नेंस की संरचना में पारदर्शिता लाने के सभी प्रयास कर रहा है।
^ ऊपर