कंपनी की उचित तथा स्थायी संवृद्धि के लिए एक प्रभावपूर्ण
विनियामक तथा कानूनी ढांचा अपरिहार्य है। तीव्रता से बदलते
राष्ट्रीय तथा वैश्विक व्यवसाय माहौल में यह आवश्यक हो
गया है कि नैगम निकायों का विनियमन उभरते आर्थिक
रुझानों के अनुरूप हो, अच्छे नैगम शासन को
प्रोत्साहन दे तथा निवेशकों और अन्य पणधारकों के हितों
का संरक्षण सक्षमकारी बनाए। इसके अतिरिक्त, व्यवसाय
प्रचालनों की जटिलताओं में निरंतर वृद्धि के कारण,
नैगम संगठन के स्वरूप निरंतर बदल रहे हैं। परिणामत:,
यह आवश्यक है कि कानून में उन विभिन्न प्रकार की
कंपनियों की आवश्यकतों को ध्यान में रखा जाए जो विद्यमान
है तथा ऐसे आम सिद्धांतों की व्यवस्था की जाए जिसका
संदर्भ सभी प्रकार की कंपनियां अपनी नैगम शासन
संरचना तैयार करते समय ले सकें।
संपूर्ण नैगम
संरचना को विनियमित करने तथा कंपनियों में शासन के
वभिन्न पहलुओं संबंधी संव्यवहार करने के लिए महत्वपूर्ण
विधान कंपनी अधिनियम, 1956 तथा कंपनी विधेयक, 2004 हैं।
नैगम अभिशासन के प्रावधानों में अधिक पारदर्शिता तथा
जवाबदेही लाने के लिए ये कानून बनाए गए हैं तथा समय समय
पर इनमें संशोधन किया गया है। इसका अर्थ है कि नैगम
कानूनों को इस प्रकार सरल बनाया गया है कि उनकी सहज
व्याख्या की जा सके तथा वे ऐसा ढांचा उपलब्ध कराए जो
तीव्रतर आर्थिक संवृद्धि को सुकर बनाए।
दूसरे, प्रतिभूति बाज़ारों में निवेशकों के हितों को
संरक्षण करने तथा साथ ही देश में कॉर्पोरेट अभिशासन के
मानकों का अनुरक्षण करने के लिए भारतीय प्रतिभूति और
विनियम बोर्ड द्वारा प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम,
1956, भारतीय प्रतिभूति और विनियम बोर्ड अधिनियम 1992 तथा
निक्षेपागार अधिनियम, 1996 को प्रवृत्त किया गया है।
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