भारत में नैगम शासन के लिए संगठनात्मक ढांचे में
कम्पनी कार्य मंत्रालय तथा भारतीय प्रतिभूति और विनियम
बोर्ड शामिल है। सूचीबद्ध कम्पनियों के लिए विशिष्ट रूप
से नैगम शासन हेतु प्रथम औपचारिक विनियामक ढांचा
सेबी द्वारा फरवरी 2000 में कुमार मंगलम बिरला समिति
रिपोर्ट की अनुशंसाओं के अनुसरण में किया गया था। इसे
सूचीयन करार के खंड 49 के रूप में अधिष्ठापित किया गया।
तत्पश्चात, सेबी ने खंड 49 की समीक्षा करने तथा
नैगम शासन मानकों में सुधार लाने के लिए उपाय
सुझाने हेतु श्री एन आर नारायण मूर्ति की अध्यक्षता में एक
अन्य समिति स्थापित की। समिति की कुछ प्रमुख अनुशंसाएं
प्रमुख रूप से लेखा परीक्षा समितियों लेखा परीक्षा रिपोर्टों,
स्वतंत्र निदेशकों, सबंधित पक्षकार लेनदेनों, जोखिम
प्रबंधन, निदेशाकत्मक तथा निदेशक क्षतिपूर्ति, आचार संहित
तथा वित्तीय प्रकटनो से संबंधित थी।
कारपोरेट कार्य मंत्रालय ने विभिन्न नैगम शासन मुद्दों की जांच करने के उद्देश्य से वर्ष 2002 में नैगम लेखापरीक्षा तथा शासन संबंधी नरेश चन्द्र समिति भी नियुक्त की थी। इसने नैगम शासन के दो प्रमुख पहलुओं में अनुशंसाएं की वित्तीय तथा गैर वित्तीय प्रकटन तथा देख रेख की।
इसने सीआईआई, आईसीएआई तथा आईसीएसआई
के साथ मिलकर गैर लाभार्थ न्यास के रूप में नेशनल
फाउंडेशन फॉर कॉर्पोरेट गवर्नेस (एनएफसीजी) का गठन भी किया
ताकि निम्न व्यवस्था की जा सके - अच्छे नैगम शासन संबंधी मुद्दों पर विचार विमर्श करना,
नैगम
नेताओं को अच्छी नैगम शासन प्रक्रियाओं की महत्ता
के संबंध में संवेदी बनाना तथा साथ ही नैगम नेताओं,
नीति निर्माताओं विनियामकों, कानून प्रवर्तन प्राधिकारियों
तथा गैर सरकारी संगठनों में अनुभवों तथा विचारो के विनियम
को सुकर बनाना।
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