सीमाशुल्क भारत में आयातित तथा साथ ही भारत से बाहर निर्यात की गई वस्तुओं पर उद्ग्रहीत एक प्रकार का अप्रत्यक्ष कर है। करयोग्य स्थिति भारत में आयात अथवा भारत के बाहर निर्यात है। वस्तुओं के आयात का अर्थ है भारत के बाहर किसी स्थान से भारत में वस्तुएं लाना। भारत में भारत की भूसीमा के अंतर्गत जलक्षेत्र शामिल है जो समुद्र में 12 नॉटीकल मीलों से भारत के तट तक फैले हुए हैं। वस्तुओं के निर्यात का अर्थ है वस्तुओं को भारत से भारत के बाहर स्थित किसी स्थान पर ले जाना।
भारत में सीमाशुल्क के उद्ग्रहण तथा संग्रहण के लिए बुनियादी कानून सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 है। इसमें आयात तथा निर्यात पर शुल्क के उद्ग्रहण तथा संग्रहण, आयात/निर्यात प्रक्रियाविधियों, वस्तुओं के आयात तथा निर्यात पर प्रतिबंधों, शास्तियों, अपराधों इत्यादि के लिए प्रावधान किया गया है। सांविधानिक उपबंधों में केन्द्र को आयातों एवं निर्यातों संबंधी विधान बनाने तथा शुल्क संग्रहण करने का अधिकार दिया गया है। केन्द्रीय उत्पाद एवं सीमाशुल्क बोर्ड (सीबीईसी) सीमाशुल्क मामलों के लिए शीर्षस्थ निकाय है। यह वित्त मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन राजस्व विभाग का एक भाग है। यह सीमाशुल्कों के उद्ग्रहण तथा संग्रहण से संबंधित नीति के निरूपण के कार्य, तस्करी के निवास तथा शुल्कों के अपवंचन तथा सीमाशुल्क संगठनों से जुड़े सभी प्रशासनिक मामलों के संबंध में कार्रवाई करता है। बोर्ड अपने क्षेत्र संगठनों नामत: सीमाशुल्क (निवारक) तथा केन्द्रीय उत्पाद शुल्क मंडलों, सीमाशुल्क आयुक्तालय, केन्द्रीय राजस्व नियंत्रण प्रयोगशाला तथा निदेशालयों की सहायता से इसे समनुदेशित विभिन्न कार्यों का निर्वहन करता है। यह भी सुनिश्चित करता है कि विदेश तथा अंतर्देशीय यात्रा पर करों के कानून के अनुसार प्रशासित किया जाए तथा संग्रहण अभिकरण एकत्र किए गए कर तत्काल सरकारी राजकोष में जमा करा दें।
आयात शुल्क सामान्यत: दो प्रकार के होते हैं :-
- बुनियादी शुल्क :- यह मानक दर पर हो सकता है, अथवा कुछ अन्य देशों से आयात के मामले में अधिमानी दर पर हो सकता है।
- अतिरिक्त सीमाशुल्क :- यह भारत में उत्पादित या विनिर्मित समान प्रकार की वस्तुओं पर उद्ग्रहणीय केन्द्रीय उत्पाद शुल्क के समतुल्य है। अतिरिक्त शुल्क को आम तौर पर प्रतिकारी शुल्क या सीवीडी कहा जाता है। यह तभी संदेय है जब आयातित वस्तु ऐसी है मानों उसका भारत में उत्पादन किया गया है, इसके उत्पादन की प्रक्रिया केन्द्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम,1944 में परिभाषा के अनुसार 'विनिर्माण' के समरूप होगी। उत्पादन से छूट में अतिरिक्त सीमाशुल्क की छूट भी प्रभावी होती है।
- सही प्रतिकारी शुल्क या अतिरिक्त सीमाशुल्क :- इसका उद्ग्रहण समरूप भारतीय वस्तुओं की निविष्टियों पर उच्च उत्पाद शुल्क के कारण उनको होने वाले अलाभ को प्रतिसंतुलित करने के लिए किया जाता है। इसका उद्ग्रहण स्वदेशी वस्तुओं के लिए एक समान प्रतिभागिता अवसर उपलब्ध कराने के लिए किया जाता है जिन्हें विभिन्न आंतरिक करों का भार वहन करना पड़ता है। इस अतिरिक्त शुल्क के लिए मूल्याधार सीमाशुल्क प्रशुल्क अधिनियम, 1975 के अंतर्गत सीवीडी क मामले की भांति होगा जिसमें से खुदरा बिक्री मूल्य प्रावधान को कम कर दिया जाएगा। विनिर्माता अपने तैयार उत्पादों पर उत्पाद शुल्क के भुगतान के लिए इस अतिरिक्त शुल्क का क्रेडिट लेने में समर्थ होंगे।
- डम्पिंग रोधी शुल्क/सुरक्षोपाय शुल्क :- अनुचित क्षति से घरेलू उद्योग को संरक्षित करने के उद्देश्य से विनिर्दिष्ट वस्तुओं के आयात के लिए। यह शत प्रतिशत ईओयू (निर्यातोन्मुखी यूनिटों) तथा एफटीजेड (नि:शुल्क व्यापार क्षेत्र) में यूनिटों तथा एसईजेड (विशेष आर्थिक क्षेत्र) द्वारा आयातित वस्तुओं पर प्रयोज्य नहीं होगा। वस्तुओं के निर्यात पर, डम्पिंग रोधी शुल्क ड्राबैक (आहरण) की विशेष ब्रांड दर के रूप में छूट योग्य है। सुरक्षोपाय शुल्कों में अनुचित व्यापार व्यवहार को पता लगाना अपेक्षित नहीं है जैसे निर्यातकारी देशों की ओर से डम्पिंग या आर्थिक सहायता किन्तु उन्हें विभिन्न देशों से आयातों के बीच भेदभाव नहीं करना चाहिए। सुरक्षोपाय कार्रवाई का सहारा केवल तभी लिया जाता है यदि यह सिद्ध हो गया हो कि आयातों में अकस्मात वृद्धि से घरेलू उद्योग को गंभीर क्षति हुई है अथवा होने की आशंका है।
- शिक्षा उपकर :- निर्धारित दर पर शिक्षा उपकर सीमाशुल्क के सकल शुल्कों की प्रतिशतता के रूप में उद्ग्रहीत किया जाता है। यदि वस्तुएं शुल्क से पूर्णत: छूट प्राप्त हों अथवा उन पर शून्य शुल्क प्रभार्य किया जाता है अथवा उन्हें निर्धारित प्रक्रियाविधि जैसे बॉन्ड के अधीन समाशोधन के तहत शुल्क के भुगतान के बिना समाशोधित किया गया है तो उपकर का उद्ग्रहण किया जाएगा।
सभी वस्तुओं को सीमाशुल्क के उद्ग्रहण के उद्देश्य से समूहों तथा उपसमूहों में विभाजित किया जाएगा। सीमाशुल्क प्रशुल्क अधिनियम, 1975 में वस्तुओं का श्रेणीकरण दिया गया है तथा तदनुसार उसमें शुल्क दर विनिर्दिष्ट की गई है। अधिनियम में दो अनुसूचियां निहित हैं:-
- अनुसूची 1 में आयात के लिए वस्तुओं को श्रेणीकृत किया गया है तथा आयात शुल्क की दर निर्धारित की गई है। इसमें प्रणालीबद्ध रूप से तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापारित वस्तुओं की श्रेणीकरण की अंतरराष्ट्रीय योजना के अनुसार आयात मदों की विभिन्न श्रेणियों को विनिर्दिष्ट किया गया है - इस 'वस्तु श्रेणीकरण की सुमेलीकृत प्रणाली' कहा जाता है।
- अनुसूची 2 में निर्यात के लिए वस्तुओं को श्रेणीकृत किया गया है तथा निर्यात शुल्क की दर निर्धारित की गई है।
इसके अतिरिक्त, सीमाशुल्क प्रशुल्क अधिनियम में अतिरिक्त शुल्क (सीवीडी), अधिमानी शुल्क, डम्पिंग रोधी शुल्क, संरक्षात्मक शुल्क इत्यादि के लिए प्रावधान किए गए हैं।
शुल्क विशिष्ट तथा यथा मूल्य दोनों आधारों पर उद्ग्रहीत किए जाते हैं जबकि कुछ ऐसे मामले हैं जहां कई बार विशिष्ट सह यथा मूल्य शुल्क आयातित मदों पर भी संग्रहीत किए जाते हैं। जहां यथा मूल्य शुल्क (अर्थात मूल्य के संदर्भ में शुल्क) संग्रहीत किए जाते हैं जो उद्ग्रहण की प्रबल विधि है, वस्तुओं के मूल्य का निर्धारण सीमाशुल्क प्रयोजनार्थ सीमाशुल्क अधिनियम तथा उसके तहत जारी सीमाशुल्क मूल्य निर्धारण (आयात वस्तुओं की कीमत का निर्धारण) नियमावली, 1988 के अंतर्गत निर्धारित प्रावधानों के अनुसार किया जाना है। ये प्रावधान अनिवार्यत: जीएटीटी आधारित मूल्य निर्धारण प्रणाली का अंगीकरण है तथा इन का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुसरण किया जाता है (अब इसे विश्व व्यापार संगठन मूल्यनिर्धारण करार कहा जाता है)। आयातकर्ता के साथ साथ निर्धारण अधिकारी द्वारा इन प्रावधानों का सावधानी पूर्वक अध्ययन तथा अनुप्रयोग किया जाता है ताकि कानून के अनुसार उचित मूल्यनिर्धारण के पश्चात यथा देय शुल्क वस्तुओं के सीमाशुल्क नियंत्रण से बाहर जाने से पूर्व अदा कर दिए जाएं।
सीमाशुल्क संबंधी अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
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