दोहरा कराधान का संदर्भ ऐसी स्थिति से हैं जहां एक ही आय एक ही कंपनी या व्यष्टि (करदाता) के हाथों में एक से अधिक देश में कर योग्य हो जाती है। ऐसी स्थिति विभिन्न देशों में आय के कराधान के भिन्न नियमों के कारण उत्पन्न होती है। आयकर के दो मुख्य नियम, जो दोहरे कराधान में परिणामी होते हैं, ये हैं :- (i) आय का स्रोत नियम जिसके तहत किसी व्यक्ति की आय पर उस देश में कर लगाया जाता है जहां ऐसी आय का स्रोत मौजूद है अर्थात जहां व्यापारी (व्यवसाय प्रतिष्ठान अवस्थित है अथवा जहां परिसम्पत्तियां/सम्पत्ति अवस्थित है बावजूद इसके कि वह आय अर्जक उस देश का निवासी हो या न हो; अथवा (ii) आवासीय प्रास्थिति नियम जिसके तहत आय अर्जक पर उस देश में उस की आवासीय प्रास्थिति के आधार पर कर लगाया जाता है। इस प्रकार, एक ही व्यक्ति पर एक देश में आय का स्रोत नियम के आधार पर उसकी आय पर कर लगाया जाएगा तथा किसी अन्य देश में आवास के आधार पर कर लगाया जाएगा जो दोहरे कराधान में परिणामी होगा। अन्य शब्दों में, दोहरे कराधान की समस्या निम्नलिखित में से किसी एक कारण से उत्पन्न हो सकती हैं :-
- कोई कंपनी या कोई व्यक्ति एक देश का निवासी है किन्तु किसी अन्य देश से भी उसे आय प्राप्त होती है, इस प्रकार दोनों देशों में उसकी आय कर योग्य हो जाती है।
- कंपनी या व्यक्ति पर उसकी विश्व आय पर दो या अधिक देशों में कर लगाया जाता है जिसे कर के प्रति सहवर्ती पूर्ण देयता कहा जाता है। एक देश कर दाता की राष्ट्रीयता के आधार पर कर लगाता है तथा दूसरा देश अपनी सीमा के भीतर उसके आवास के आधार पर उस पर कर लगाता है। इस प्रकार, एक देश में अपनी रिहायश रखने वाला व्यक्ति अपनी विश्व आय के संबंध में दोनों देशों में कर का दायी हो जाता है।
- कंपनी या व्यक्ति, जो दोनों देशों में अनिवासी हैं, की उनमें से किसी एक देश से प्राप्त आय पर उनमें से प्रत्येक देश में कर लगाया जा सकता है। उदाहरणार्थ, एक अनिवासी व्यक्ति का एक देश में स्थायी प्रतिष्ठान है तथा उसके जरिए वह दूसरे देश से आय प्राप्त करता है।
भारत में, आयकर अधिनियम के अधीन देयता कर निर्धारिती की पिछले वर्ष के दौरान आवासीय प्रास्थिति के आधार पर उत्पन्न होती है। अत:, यदि कर निर्धारिती भारत में निवासी है तो उसे न केवल उस आय पर कर देना होगा जो भारत में उसे प्राप्त होती है बल्कि उस आय पर भी कर देना होगा जो उसे
भारत के बाहर उपार्जित होती है अथवा भारत के बाहर प्राप्त होती है। इस प्रकार वह दोहरे करों का दायी हो जाता है। इससे कर दाता पर अनावश्यक तथा निषेधात्मक बोझ पड़ता है। यदि कर दरें पर्याप्त उच्च हो तो इससे उसके पास ऋणात्मक अधिशेष भी बच सकता है। इसके व्यापार तथा सेवाओं पर तथा साथ ही विभिन्न देशों में पूंजी तथा व्यक्तियों की आवाजाही पर भी नुकसानदेह प्रभाव पड़ते हैं।
भारत में ऐसे दोहरे कराधान के प्रति राहत आयकर अधिनियम की धारा 90 और धारा 91 के तहत प्रदान की गई है। इसमें दोहरे कराधान से राहत के दो तरीके हैं।
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