| विदेशों में व्यापार करना तथा अंतरराष्ट्रीय रूप से आगे बढ़ना कंपनी की व्यापार विस्तार नीति का एक अनिवार्य भाग है। यह राष्ट्रीय सीमाओं के पार कंपनी के अपनी वाणिज्यिक गतिविधियों को विविधीकृत करने तथा अपनी प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाने के लक्ष्य द्वारा शासित करती है। अत: ऐसे निगमों में विनिर्माणकारी सुविधाओं, संभार तंत्र प्रणालियों, वित्तीय प्रवाहों तथा विपणन नीतियों की आयोजना सम्पूर्ण विश्व को एक एकल बाजार के रूप में विचार में ले कर की जाती है।
भारत में आर्थिक सुधारों ने भारतीय उद्यमों द्वारा वैश्विक व्यापार को संवर्धित करने के लिए महत्वपूर्ण मार्ग खोल दिए। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश को शासित करने वाली प्रथम नीति 1969 मे जारी दिशानिर्देशों के रूप में थी, इन दिशानिर्देशों ने विदेशों में परियोजनाओं में भारतीय कंपनियों की सहभागिता के विस्तार को परिभाषित किया तथा तदनंतर इन्हें समय समय पर संशोधित किया गया है तथा उदार बनाया गया है। इनका उद्देश्य विदेशी निवेशों के ढांचे में पारदर्शिता लाना है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण विधान विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) था, जिसने विदेशी मुद्रा, विशेषतया विदेश में निवेश से जुड़ी विदेशी मुद्रा संबंधी सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य को ही बदल दिया। इसने महत्व को मुद्रा विनियमन से मुद्रा प्रबंधन की ओर अंतरित कर दिया।
भारतीय कंपनियां विदेशी निकाय में दीर्घावधिक रुचि दर्शाते हुए विदेशी निकाय की पूंजी में अंशदान या संगम ज्ञापन में अभिज्ञान के रूप में भारत के बाहर सीधे निवेश कर सकती हैं। इसमें विदेश में एक संयुक्त उद्यम (जे वी) अथवा पूर्णतया स्वामित्वाधीन सहायक कंपनी की स्थापना शामिल है। दिशानिर्देशों के अंतर्गत, संयुक्त उद्यम/पूर्णतया स्वामित्वाधीन सहायक कंपनियां स्थापित करने के लिए सभी आवेदन पत्र 'भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा किए तथा प्रक्रियान्वित किए जाने हैं।
विदेश में अपने निवेश करने के उद्देश्य से, भारतीय कंपनियों को अपनी विभिन्न पूंजी आवश्यकताएं पूरी करने विदेशी उद्यमों में इक्विटी सहभागिता करने के साथ साथी विदेशी कंपनियों या व्यापार अर्जित करने के लिए निधियों की आवश्यकता होती है। विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) तथा उसमें भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी विभिन्न अधिसूचनाओं के तहत, विदेशी संयुक्त उद्यमों/पूर्णतया स्वामित्वाधीन अनुषंगी कंपनियों में विदेशों का निधियन निम्न स्रोतों में से किसी एक या अधिक स्रोत में से किया जा सकता है :- किसी प्राधिकृत डीलर से विदेशी मुद्रा का आहरण, निर्यातों तथा अन्य देयताओं का पूंजीकरण, विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बांडों के साथ साथ अमरीकी निक्षेपागार प्राप्तियों (एडीआर) तथा वैश्विक निक्षेपागार प्राप्तियों (जीडीआर) के माध्यम से।
विदेश में निवेश करते समय भारतीय उद्यमी विभिन्न वाणिज्यिक तथा राजनैतिक जोखिमों का सामना करते हैं। सुरक्षित तथा सफल विदेशी विस्तार योजनाएं सुनिश्चित करने के लिए ऐसे सभी जोखिमों के विरुद्ध उनके लिए एक व्यापक बीमा सुरक्षा की व्यवस्था करना आवश्यक है। तदनुसार, भारतीय निर्यात गारंटी निगम लिमिटेड (ईसीजीसी) की स्थापना भारत सरकार द्वारा वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रणाधीन की गईं जो उन्हें ऐसी सभी बीमा सुविधाएं प्रदान करता है।
साथ ही भारत सरकार ने भी अब तक 68 देशें के साथ बीआईपीए पर हस्ताक्षर किए हैं, जिनमें से 53 बीआईपीए पहले से प्रभावी हो चुके हैं और शेष करार प्रभावी होने की प्रक्रिया में हैं। इसके अतिरिक्त अन्य अनेक देशों के साथ करारों को अंतिम रूप दिया गया है और / या बातचीत जारी है।
इसके अतिरिक्त, 'मध्यस्थता एवं समाधान अधिनियम, 1996' नामक एक महत्वपूर्ण विधान कानूनी न्यायालय का सहारा लिए बिना किसी उद्यम के समस्त वाणिज्यिक विवादों के निपटान के लिए एक सांविधिक प्रावधान की व्यवस्था करता है। भारत में द्विपक्षीय तथा एक पक्षीय राहत की योजनाओं के माध्यम से किसी उद्यमी द्वारा अपना व्यवसाय विदेश में विस्तारित करते समय सामना की जा रही दोहरे कराधान की समस्या के प्रति राहत भी प्रदान की जा रही है।
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