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किसी कंपनी द्वारा विदेश में व्यापार का संदर्भ राष्ट्रीय सीमा के पार इसकी वाणिज्यिक गतिविधियां शुरू करने तथा उन्हें विस्तारित करने से है। इसमें विविध स्वरूप की गतिविधियां जैसे व्यापार करना (अपनी वस्तुओं तथा सेवाओं का निर्यात तथा आयात करना), विनिर्माण तथा विपणन के साथ साथ उत्पाद तथा विपणन के लिए आउटसोर्सिंग शामिल है। ऐसे विदेशी निवेश करने का मुख्य कारण विदेश में व्यापार अवसरों का अन्वेषण करना तथा ऐसे अवसरों का लाभ उठाना है। विकसित तथा विकासशील दोनों देशों में विदेशी बाजार विशाल अभिवृद्धि अवसर उपलब्ध कराते हैं। उदाहरणार्थ, अनेक भारतीय फार्मास्यूटिकल्स फर्मों ने अपने विदेशी व्यापार की अपेक्षाकृत काफी अधिक अभिवृद्धि हासिल की है। विदेशों में निवेश करने के विभिन्न अन्य कारण निम्नलिखित हैं :-
- अंतरराष्ट्रीयता के पीछे प्रमुख प्रेरक बल प्रतिस्पर्द्धा है। वर्ष 1991 में उदारीकरण तक भारतीय अर्थव्यवस्था एक अत्यधिक संरक्षित बाजार था। घरेलू उत्पादन न केवल विदेशी प्रतिस्पर्द्धा से संरक्षित थे बल्कि घरेलू प्रतिस्पर्द्धा भी अनेक नीति प्रेरित प्रवेश बाधाओं द्वारा प्रतिबंधित थी। आर्थिक उदारीकरण तथा वैश्वीकरण ने घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय दोनों प्रकार से प्रतिस्पर्द्धा में वृद्धि की है।
- सरकारी नीतियां तथा विनियम भी अंतरराष्ट्रीयता को प्रेरित करते हैं। अनेक सरकारें विदेशी निवेशों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अनेक प्रोत्साहन तथा अन्य सकारात्मक सहायता की पेशकश करती हैं, प्रतिबंधात्मक घरेलू सरकारी नीतियां, जो अपने देश में व्यापार विस्तार के कार्यक्षेत्र को सीमित करती हैं तथा उनकी प्रतिस्पर्द्धात्मकता को कम महत्व देती हैं, विदेशी बाजारों में प्रविष्ट होने के लिए एक महत्वपूर्ण कारक हैं।
- घरेलू मांग अवरोध कई कंपनियों को अपने बाजारों का विस्तार राष्ट्रीय सीमाओं के पार करने को उकसाते हैं। यदि घरेलू बाजार संभाव्यता का पूर्ण दोहन हो जाए तो ऐसे उत्पादों का बाजार संतृप्ति की ओर प्रवृत्त होता है। एक अन्य प्रकार की घरेलू बाजार बाधा पैमाना अर्थ व्यवस्थाओं से उत्पन्न होती है। प्रौद्योगिकी उन्नयनों ने अनेक उद्योगों में प्रचालनों के इष्टतम पैमाने के आकार के अतिरिक्त विदेशी बाजारों का होना आवश्यक बना दिया है। घरेलू मंदी अक्सर कंपनियों को विदेशी बाजारों का अन्वेषण करने के लिए उकसाती है।
- यह कंपनी को अपना घरेलू व्यापार बढ़ाने, अपने बाजार अंश को बढ़ाने तथा कंपनी की छवि स्थापित करने में भी सहायता करेगी।
विदेशी निवेश से जुड़ी व्यापार कार्यनीति व्यापार माहौल में अतरों के कारण घरेलू निवेश से भिन्न हैं :-
- राजनैतिक माहौल में राजनैतिक पक्षों की विशिष्टताएं तथा नीतियां, संविधान तथा सरकारी प्रणाली का स्वरूप शामिल होता है। विभिन्न राष्ट्रों में इन कारकों में काफी अंतर होता है।
- विश्व भर के विभिन्न देशों में विद्यमान कानूनी प्रणाली को एक सामान्य कानून, सिविल कानून अथवा संहता कानून तथा सैद्धांतिक कानून में श्रेणीकृत किया जा सकता है। सामान्य कानून परम्परा, विगत व्यवहारों तथा न्यायालयों द्वारा संविधियों, कानूनी विधानों तथा विगत निर्णयों की व्याख्या के माध्यम से स्थापित कानूनी उदाहरणों पर आधारित है। दूसरी ओर, संहिता कानून के लिखित नियमों की सर्वसमावेशी प्रणाली पर आधारित हैं। हालांकि सैद्धांतिक कानून धार्मिक अवबोधनों पर आधारित हैं। कानूनी ढांचे में ये अंतर विदेशी निवेश कार्यनीति में एक अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- अंतरराष्ट्रीय निवेशों को प्रभावित करने वाले सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक सांस्कृतिक अंतर हैं। किसी भी देश के सांस्कृतिक अथवा सामाजिक माहौल में भाषा, धर्म, प्रथाएं, परम्पराएं तथा विश्वास, रुचियां तथा वरीयताएं, सामाजिक वर्गीकरण, सामाजिक संस्थाएं इत्यादि समाहित होती हैं।
- आर्थिक माहौल भी प्रत्येक देश में भिन्न होता है। इसमें मोटे तौर पर अर्थव्यवस्था का स्वरूप तथा विकास का स्तर, आर्थिक संसाधन, अर्थव्यवस्था का आकार, आर्थिक प्रणालियां तथा आर्थिक नीतियां, आर्थिक दशाएं, विभिन्न आर्थिक संकेतकों जैसे राष्ट्रीय आय, प्रति व्यक्ति आय, विदेश व्यापार, मुद्रा स्फीति दर, उद्योग उत्पादन इत्यादि में प्रवृतियां शामिल हैं।
यदि कोई फर्म विदेश में निवेश करने की योजना बनाती है तो उसे अनेक कार्यनीतिक संबंधी निर्णय करने होते हैं :-
- कंपनी को पहला निर्णय यह करना होता है कि क्या विदेशों में उसे व्यापार बढ़ाना है अथवा नहीं। यह निर्णय कई महत्वपूर्ण कारकों पर आधारित होता है जैसे कि :-
- वर्तमान और भावी अवसर
- बाजार में वर्तमान और भावी अवसर
- कंपनी के संसाधन जैसे कौशल, अनुभव, वित्तीय सहायता, उत्पादन एवं विपणन क्षमताएं आदि
- कंपनी के उद्देश्य।
- कंपनी द्वारा एक बार विदेश में निवेश करने का निर्णय लेने के बाद, अगला महत्वपूर्ण निर्णय सर्वाधिक उपयुक्त बाजार के चयन का है। इसके लिए विभिन्न विदेशी बाजारों की संभावनाओं और उनके संबंधित विपणन वातावरण का सम्पूर्ण विश्लेषण अनिवार्य है।
- अगला महत्वपूर्ण निर्णय उन विदेशी बाजारों में प्रवेश करने के उपयुक्त तरीकों के निर्धारण से संबंधित है। विदेशी बाजार में प्रविष्टि संबंधी महत्वपूर्ण कार्यनीतियां निम्नलिखित हैं :-
- निर्यात :- किसी विदेशी बाजार में प्रवेश का सर्वाधिक पारम्परिक तरीका है, यह एक उपयुक्त कार्य नीति है जब निम्नलिखित में से कोई दशा मौजूद हो :- (i) विदेशी व्यापार की मात्रा इतनी बड़ी न हो कि विदेशी बाजार में उत्पादन का औचित्य ठहराया जा सके; (ii) विदेशी बाजार में उत्पादन की लागत अधिक हो; (iii) विदेशी बाजार में आधाभूत ढांचा संबंधी बाधाएं मौजूद हों; (iv) दूसरे देश में राजनैतिक या निवेश के अन्य जोखिम हों; (v) कंपनी की संबंधित विदेशी बाजार में कोई स्थाई रुचि न हो अथवा बाजार के लम्बी अवधि के किए उपलब्ध होने की कोई गारंटी न हो; (vi) संबंधित देश विदेशी निवेश के पक्ष में न हो; (vii) लाइसेंसिंग या संविदा विनिर्माण एक बेहतर विकल्प न हो।
- लाइसेंसिग और फ्रेंचाइचिंग :- विदेशी बाजारों में प्रवेश के सरल तरीके हैं। अंतरराष्ट्रीय लाइसेंसिग के अंतर्गत, एक देश में कोई फर्म (लाइसेंसदाता) दूसरे देश में किसी फर्म (लाइसेंस प्राप्त कर्ता) को इसकी बौद्धिक सम्पदा (जैसे कि पेटेंट, ट्रेडमार्क, कॉपीराइट, प्रौद्योगिकी, तकनीकी जानकारी, विपणन कौशल या कोई अन्य विशिष्ट कौशल) का प्रयोग करने की अनुमति देता है। लाइसेंसदाता को मौद्रिक लाभ लाइसेंसधारक द्वारा अदा की जाने वाली रायल्टी या शुल्क है।
फ्रेंचाइजिंग एक प्रकार की लाइसेंसिंग है जिसमें एक मूल कंपनी (फ्रेंचाइजर) दूसरी स्वतंत्र संस्था (फ्रेंचाइजी) को एक निर्दिष्ट तरीके से व्यापार करने का अधिकार प्रदान करती है। यह अधिकार फ्रेंचाइजर के उत्पादों का विक्रय, इसके नाम, उत्पादन और विपणन तकनीकों अथवा सामान्य व्यापारी दृष्टिकोण के प्रयोग करने के रूप में हो सकता है। फ्रेंचाइजिंग का एक सर्वमान्य रूप फ्रेंचाइजर के तैयार उत्पाद के लिए महत्वपूर्ण अवयव की आपूर्ति करना है जैसे कि कोकाकोला द्वारा बोटलर्स को सिरप की आपूर्ति करना।
- प्रबंधन संविदाकरण :- एक ऐसा तरीका है जिसमें आपूर्तिकर्ता कौशल के ऐसे पैकेज को इकट्ठा लाता है जो स्वामित्व के जोखिम और लाभ में पड़े बिना ग्राहक को एक एकीकृत सेवा प्रदान करता है। यह किसी फर्म को महत्वपूर्ण निवेशों से निर्मित मौजूदा ज्ञान के वाणिज्यीकरण में सक्षम बनाता है और अनुभवी कार्मिकों, जिनकी अन्यथा छंटनी करनी पड़ती, का प्रयोग करके व्यापार की मात्राओं में उतार-चढ़ाव के प्रभाव को बार-बार कम किया जा सकता है। इसके अंतर्गत प्रबंधन की जानकारी उपलब्ध कराने वाली फर्म के प्रबंधित किए जा रहे उद्यम में कोई इक्विटी भागीदारी नहीं हो सकती है।
- टर्न-की संविदाएं :- तेल रिफाइनरियों, इस्पात मिलों, सीमेंट और उर्वरक संयंत्रों आदि जैसे संयंत्रों की आपूर्ति, निर्माण और स्थापना में अंतरराष्ट्रीय व्यापर में आय हैं। टर्न-की आपरेशन विक्रेता द्वारा पूर्णतया सुसज्जित सुविधा और क्रेता के कार्मिकों जिन्हें विक्रेता द्वारा प्रशिक्षित किया जाएगा, द्वारा प्रचालित किए जाने के लिए तैयार सुविधा सहित क्रेता की आपूर्ति करने के लिए एक करार है।
- पूर्ण स्वामित्वाधीन विनिर्माण सुविधाएं :- विदेशी बाजार में दीर्घावधिक और बहुत अधिक रूचि वाली कंपनियां सामान्यतया वहां पूर्ण स्वामित्वाधीन विनिर्माण सुविधाएं स्थापित करती हैं। यह फर्म का उत्पादन और गुणवत्ता पर पूर्ण नियंत्रण प्रदान करती हैं। इसमें सम्भावित प्रतिस्पर्द्धी विकसित होने का जोखिम नहीं होता है, जैसा कि लाइसेंसिंग और संविदा विनिर्माण के मामले में होता है।
- एसेम्बली ऑपरेशन :- एक विनिर्माता जो विदेशी विनिर्माण सुविधाओं से जुड़े लाभ उठाना चाहता है परन्तु उस सीमा तक नहीं जाना चाहता है, चुनिंदा बाजारों में विदेशों में एसेम्बली सुविधाएं स्थापित कर सकता है। यह निर्यात और विदेशी विनिर्माण के बीच का एक स्वरूप हैं। यह एक आदर्श कार्यनीति है जब पुर्जों और अवयवों के विनिर्माण में मितव्ययता हो और जब एसेम्बली ऑपरेशन श्रम-बहुल हो तथा श्रम दूसरे देश में सस्ता हो।
- संयुक्त उद्यम :- विदेशी बाजार में प्रवेश करने का एक बहुत सामान्य कार्यनीति है। यह दो (या अधिक) व्यापारी संस्थाओं द्वारा प्रदत्त परिसम्पत्तियों के सबसैटों का एक मिश्रण है और सीमित अवधि के लिए होता है। सामान्यतया इसमें निम्नलिखित विशेषताएं होती हैं :- (i) धन, सम्पत्ति, प्रयास, ज्ञान, कौशल या अन्य परिसम्पत्तियों के साझीदारों द्वारा एक सर्वनिष्ट उपक्रम में अंशदान; (ii) उद्यम की विषय वस्तु में संयुक्त सम्पत्ति हित; (iii) उद्यम के पारस्परिक नियंत्रण या प्रबंधन का अधिकार; (iv) सम्पत्ति में हिस्से का अधिकार।
अधिक ब्यौरों के लिए हमारा 'बढ़ता व्यापार' भाग देखें।
- विलयन और अधिग्रहण :- बहुत महत्वपूर्ण बाजार प्रवेश की कार्यनीति तथा इसका उत्पादन और विपणन प्रचालन बढ़ाकर कंपनी की वृद्धि को अधिकतम करने के लिए विस्तार की कार्य नीति है। उनका प्रयोग व्यापक क्षेत्रों जैसे सूचना प्रौद्योगिकी, दूरसंचार और बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग तथा पारम्परिक व्यवसायों में किया जा रहा है ताकि मजबूती प्राप्त की जा सके, ग्राहक आधार का विस्तार किया जा सके, प्रतिस्पर्द्धा कम की जा सके अथवा एक नए बाजार या उत्पाद खंड में प्रवेश किया जा सके।
अधिक ब्यौरों के लिए हमारा 'बढ़ता व्यापार' भाग देखें।
- अनुकूल गठजोड़ :- अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अधिक से अधिक लोकप्रिय हो रहा है। इस कार्य नीति का उद्देश्य फर्म के अति महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विद्यमान या सम्भावित प्रतिस्पर्द्धियों के साथ प्रतिस्पर्द्धी करने के स्थान पर गठजोड़ स्थापित करके फर्म की दीर्घावधिक प्रतिस्पर्द्धात्मक लाभ बढ़ाना है। यह कंपनी को अति महत्वपूर्ण क्षमताओं को बढ़ाना, नवीन खोजों का प्रवाह बढ़ाना तथा बाजार और प्रौद्यागिकीय परिवर्तनों का प्रत्युत्तर देने में लचीलापन बढ़ाने में मदद करता है।
- प्रतिव्यापार (काउंटर ट्रेड) :- का प्रयोग अनेक कंपनियों द्वारा एक प्रविष्टि कार्य नीति के रूप में सफलतापूर्वक किया गया है। यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार का एक रूप है जिसमें धन के भुगतान के स्थान पर कुछ निर्यात और आयात लेनदेनों को एक दूसरे के साथ प्रत्यक्ष रूप से संबद्ध किया जाता है। इसका मुख्य आकर्षण यह है कि यह किसी फर्म को जब अन्य साधन उपलब्ध न हों, तो एक निर्यात के सौदे को वित्तपोषित करने का एक माध्यम प्रदान करता है। उदाहरणार्थ, पेप्सिको ने इस कार्य नीति का प्रयोग करके यूएसएसआर में प्रवेश किया।
- अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से कंपनी के संस्थागत ढांचे की प्रकृति के बारे में निर्णय। यह अनेक कारकों पर निर्भर करेगा :- जैसे कंपनी का अंतरराष्ट्रीय अभिमुखीकरण; व्यापार की प्रकृति; व्यापार का आकार; भावी योजनाएं आदि,
- एक उपयुक्त विपणन सम्मिश्र तैयार करना – उत्पादन, संवर्धन, मूल्य और वास्तविक वितरण ताकि विदेशी बाजारों की विशेषताओं के अनुरूप ढाला जा सके।
इस प्रकार, एक फर्म विशिष्ट रूप से एक स्थानीय फर्म के बहु राष्ट्रीय फर्म बनने की संक्रमण काल में विभिन्न चरणों से होकर गुजरती है। अर्थात एक फर्म सामान्यतया जिसकी गतिविधियां पूर्णत: घरेलू है, वास्तविक रूप से वैश्विक बनने से पूर्व अंतरराष्ट्रीयकरण की विभिन्न अवस्थाओं से होकर गुजरती है। एक फर्म प्रायोगिक आधार पर अपने उत्पादों का निर्यात करना आरंभ कर सकती है और यदि परिणाम संतोषजनक हों तो यह अपने अंतरराष्ट्रीय कार्यकलापों का विस्तार करेगी और निश्चित समय पर विदेश में अपने कार्यालय, शाखाएं या सहायक कंपनियां या संयुक्त उद्यम स्थापित करेगी। इस विस्तारवादी प्रक्रिया में उत्पाद सम्मिश्र, बाजार खंडों की संख्या और प्रचालन के देशों की संख्या बढ़ाना शामिल है। इस प्रकार कंपनी बहुराष्ट्रीय या वैश्विक होती है। दूसरे शब्दों में बहुत सी फर्मों के लिए विदेशी व्यापार आरंभ में कम प्रतिबद्धता और संलिप्तता से आरंभ होता है और क्रमश: एक वैश्विक व्यापारी संगठन के रूप में विकसित होता है।
विदेशों में कुछ व्यापार के अवसरों के उदाहरण हैं :-
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