| भारतीय उद्यमी विदेशों में निवेश करते समय विभिन्न वाणिज्यिक और राजनैतिक जोखिमों का सामना कर सकते हैं। क्रेता के दिवालिएपन, निर्दिष्ट अवधि के भीतर के भीतर देय भुगतान करने में क्रेता की विफलता, अथवा कुछ शर्तों के कारण वाणिज्यिक जोखिम पैदा हो सकते हैं। जबकि, राजनैतिक जोखिम क्रेता के देश की सरकार द्वारा प्रतिबंधों के लगाने अथवा कोई सरकारी जो क्रेता द्वारा किए भुगतान के अंतरण को अवरूद्ध या विलम्बित करे; क्रेता के देश मे गृह युद्ध, क्रान्ति या नागरिक उपद्रव के कारण हो सकता हैं।
अन्य अप्रत्याशित घटनाएं जैसे कि क्रेता के देश में नए आयात प्रतिबंध या वैध आयात लाइसेंस का निरस्तीकरण; भारत के बाहर समुद्री यात्रा में अवरोध या विपपथन जिसके कारण अतिरिक्त माल भाड़े या बीमा प्रभारों का भुगतान करना पड़े जिन्हें क्रेता से वसूल नहीं किया जा सकता; और भारत के बाहर होने वाली हानि का कोई अन्य कारण जिसका सामान्यतया साधारण बीमाकर्ताओं द्वारा बीमा नहीं किया जाता है।
अत: सुरक्षित और सफल विदेशी विस्तार की योजनाओं को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से यह आवश्यक है कि किसी उद्यमी द्वारा सामना किए गए ऐसे सभी जोखिमों के विरूद्ध एक व्यापक बीमा कवर उपलब्ध कराया जाए। ऐसी किसी बीमा सुविधा का उद्देश्य एक अनुकूल वातावरण सृजित करना है जिसमें निर्यातकों सहित निवेशक देश में बैंकों से सामयिक और उदार ऋण सुविधाएं प्राप्त कर सकें।
तदनुसार ऋण पर निर्यात करने के जोखिम को कवर करके निर्यात संवर्धन अभियान का मजबूत करने के उद्देश्य से भारत सरकार द्वारा वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में भारतीय निर्यात ऋण गारंटी निगम लिमिटेड (ईसीजीसी) की स्थापना की गई। इसमें निर्यातकों को वस्तुओं और सेवाओं के निर्यात में होने वाली हानि के बदले ऋण जोखिम बीमा कवरों की श्रृंखला का प्रावधान है तथा यह बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को गारंटियां प्रदान करता है जिसमें जिससे निर्यातक उनसे बेहतर सुविधाएं प्राप्त कर सकें। इसके उद्देश्य निम्न के लिए बीमा कवर प्रदान करना है :- (i) निर्यातकों को राजनैतिक और वाणिज्यिक जोखिमों के लिए; (ii) निर्यातकों को विनिमय दर में उतार चढ़ाव के लिए; (iii) बैंकों को उनके द्वारा प्रदत्त निर्यात ऋण और गारंटियों के लिए; (iv) विदेशों में भारतीय निवेशकों को राजनैतिक जोखिमों के लिए।
इसके द्वारा जारी बीमा कवर को मोटे तौर पर निम्नलिखित चार समूहों में विभाजित किया जा सकता है :-
- लघु अवधि ऋण अर्थात 180 दिन से अनधिक ऋण पर निर्यातों में अन्तर्निहित भुगतान के जोखिमों के विरूद्ध निर्यातकों को संरक्षित करने के लिए उन्हें
जारी मानक नीतियां अथवा एसीसीआर इसे शिपमेंट (व्यापक जोखिम) नीति के नाम से भी जाना जाता है। यह उन निर्यातकों को जारी की जाती है जिनका अनुमानित निर्यात टर्नओवर अगले 12 महीनों के लिए 50 लाख रुपए से अधिक है। यह जहाज पर लदान की तारीख से वाणिज्यिक और राजनैतिक जोखिमों को कवर करता है। तथापि नीति निम्नलिखित जोखिमों के कारण होने वाली हानियों को कवर नहीं करती है :-
- क्रेता द्वारा उठाए गए गुणवत्ता संबंधी विवादों सहित वाणिज्यिक विवाद, जब तक कि निर्यातक क्रेता के देश में उसके पक्ष में किसी न्यायालय से आदेश प्राप्त न करे।
- वस्तुओं की प्रकृति में अन्तर्निहित कारण
- क्रेता के देश में प्राधिकारियों से आवश्यक आयात या विनिमय प्राधिकार प्राप्त करने में क्रेता की विफलता
- निर्यातक के किसी एजेन्ट अथवा संग्रहकर्ता बैंक का दिवालियापन या चूक
- वस्तुओं की ऐसी हानि या क्षति जिसे साधारण बीमाकर्ताओं द्वारा कवर किया जा सकता है।
- विनिमय दर उतार-चढ़ाव
- निर्यात सविदा की शर्तों को पूरा करने में निर्यातक की ओर से विफलता या उपेक्षा
- भारतीय फर्मों को भुगतान की आस्थागित शर्तों, विदेशी पक्षों के निर्माण कार्यों और विदेशों में हाथ में ली गई टर्न-की परियोजनाओं में प्रदत्त सेवाओं पर निर्यातों में अन्तर्निहित जोखिमों के भुगतान के प्रति संरक्षित करने के लिए तैयार की गई विशिष्ट पालिसियां।
- विशिष्ट शिपमेंट नीति - अल्पावधि (एसएसपी-एसटी) :- यह 180 दिन से अधिक अल्पावधि ऋण पर वस्तुओं के निर्यात में अंतर्निहित वाणिज्यिक और राजनैतिक जोखिमों के प्रति भारतीय निर्यातकों को कवर प्रदान करता है। इन नीतियों के अंतर्गत निर्यातक संविदा के अंतर्गत क्रेता को एक शिपमेंट या कुछ शिपमेंटों के लिए कवर ले सकता है। इन पालिसियों का लाभ इनके द्वारा उठाया जा सकता है :-(i) वे निर्यातक जो एससीआर नीति धारण नहीं करते हैं और (ii) उन निर्यातकों द्वारा जो जिनके पास एससीआर नीति है, एससीआर नीति के पूर्वावलोकन में शामिल न किए जाने के लिए अनुमत शिपमेंटों के संबंध में।
- निर्माण कार्य नीति :- यह ऐसे भारतीय संविदाकार को कवर करने के लिए तैयार की गई है जो विदेशों में निर्माण कार्य करता है। निर्माण संविदा की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं :- (i) संविदाकार एक बिलिंग अवधि और दूसरी के बीच किए गए कार्य के मूल्य के लिए सम्पूर्ण संविदा अवधि में समय-समय पर बिल प्रस्तुत करता रहता है; (ii) भुगतान हेतु पात्र होने के लिए, बिलों को नियोजक द्वारा इस प्रयोजन हेतु नियुक्त परामर्शदाता या पर्यवेक्षक द्वारा प्रमाणित करवाना होता है।
- आपूर्ति संविदा के लिए विशिष्ट नीति :- पूंजीगत वस्तुओं के निर्यात अथवा टर्न-की परियोजनाओं अथवा निर्माण कार्यों के लिए अथवा विदेशों में सेवाएं प्रदान करने के लिए संविदाओं में मध्यम/दीर्घावधि ऋण शामिल होते हैं। अत: ऐसे लेनदेनों को ईसीजीसी द्वारा विशिष्ट नीतियों के अंतर्गत मामला दर मामला अधार पर बीमा किया जाता है।
- भारत में बैंकों को जारी वित्तीय गारंटियां उन्हें जहाज पर लदान से पूर्व तथा लदान-पश्च अवस्थाओं में निर्यातकों को वित्तीय सहायता प्रदान करने में अन्तर्निहित हानि के जोखिमों से संरक्षित करने के लिए
- पैकिंग क्रेडिट गारंटी :- लदान पूर्व अवस्था में सामयिक और पर्याप्त ऋण सुविधाएं निर्यातकों के लिए उनका पूर्ण निर्यात क्षमता को साकार करने के लिए अनिवार्य हैं। ईसीजीसी की पैकिंग क्रेडिट गारंटी निर्यातक को उनके बैंकरों से बेहतर और पर्याप्त सुविधाएं प्राप्त करने में सहायता करती है। गारंटियां बैंकों को यह आश्वस्त करती हैं कि किसी निर्यातक के बैंक के प्रति उसकी देनदारियों का भुगतान करने में विफल रहने की स्थिति में ईसीजीसी बैंक की हानि के बड़े भाग की क्षतिपूर्ति करेगी।
- निर्यात उत्पादन वित्त गारंटी :- इस गारंटी का प्रयोजन बैंकों को उत्पादन लागत की पूर्ण सीमा तक लदान-पूर्व अवस्था में अग्रिमों को स्वीकृत करने में समर्थ बनाना है जब यह संविदा/आदेश के एफओबी मूल्य से अधिक है, अन्तर प्राप्य प्रोत्साहन/शुल्क वापसी को दर्शाते हैं।
- लदान पश्च निर्यात ऋण गारंटी :- यदि निर्यातक विदेशी क्रेता से शिपमेंट का मूल्य की वसूली तक ऋण सुविधाएं जारी रखने का इच्छुक है, तो उसे लदान-पश्च ऋण का लाभ उठाना होता है। यह बैंकों को निर्यात प्राप्तियों के वसूले न जाने और इसके परिणामस्वरूप किए गए, अग्रिमों की अदायगी करने में निर्यातक की विफलता के बदले संरक्षण प्रदान करता है।
- निर्यात वित्त गारंटी :- यह गारंटी बैंकों द्वारा निर्यातकों को नकद सहायता, शुल्क वापसी आदि के रूप में प्राप्य निर्यात प्रोत्साहनों के बदले प्रदत्त लदान-पश्च अग्रिमों को कवर करती है।
- निर्यात निष्पादन गारंटी :- एक निर्यातक, जो एक विदेशी निविदा के लिए बोली लगाना चाहता है, को बिड बॉन्ड के रूप में एक बैंक गारंटी देनी पड़ सकती है। यदि वह संविदा प्राप्त कर लेता है तो उसे नियत निष्पादन सुनिश्चित करने के लिए अथवा अग्रिम भुगतान के बदले अथवा अवधारणा राशि के स्थान पर विदेशी क्रेता को अथवा यदि उसे उसकी संविदा के लिए विदेशी वित्त जुटाना होता है तो विदेशी बैंक को बैंक गारंटियां प्रस्तुत करनी पड़ सकती हैं। इसके अतिरिक्त कच्चा माल या पूंजीगत वस्तुओं के लिए आयात लाइसेंस प्राप्त करने हेतु निर्यातकों को निर्धारित समय के भीतर निर्दिष्ट मूल्य की वस्तुएं निर्यात करने के लिए एक वचनपत्र देना होता है जिसके साथ विधिवत बैंक गारंटी लगी होती है।
- निर्यात वित्त (विदेशी ऋण प्रदायगी) गारंटी :- यदि किसी विदेशी परियोजना को वित्तपोषित कर रहा कोई बैंक संविदाकार को विदेशी मुद्रा में ऋण प्रदान करता है तो यह स्वयं को निर्यात वित्त (विदेशी ऋण प्रदायगी) गारंटी प्राप्त करके संविदाकार द्वारा अदायगी न किए जाने के जोखिम से संरक्षित कर सकता है।
विदेशी निवेश बीमा के अंतर्गत कवरेज के लिए मानदण्ड निम्नलिखित हैं :-
- विदेशी परियोजनाओं की स्थापना अथवा विस्तार के प्रयोजन हेतु इक्विटी पूंजी या संयुक्त ऋण के रूप में किया गया कोई निवेश निवेश बीमा के अंतर्गत कवर के लिए पात्र होगा।
- कवर उन निवेशों के लिए उपलब्ध होगा जो भारत से आरंभ होते हैं और उन पर लाभांश या ब्याज का लाभ भारत को उद्ग्रहीत होता है।
- ये निवेश किसी भी रूप में भारत सरकार और विदेशी सरकार दोनों की नीतियों के प्रतिकूल नहीं होने चाहिए।
- निवेश बीमा हेतु अर्हता प्राप्त करने के लिए किसी देश में निवेश के लिए, जहां तक हो सके भारतीय निवेश के संवर्धन और संरक्षण के लिए भारत और मेजबान देश के बीच द्विपक्षीय करार होना चाहिए। यदि ऐसा कोई करार नहीं है तो निगम, यदि वह संतुष्ट है कि मेजबान देश के विद्यमान कानून भारतीय निवेश को पर्याप्त रूप से सुरक्षित करते हैं, कवर प्रदान करने पर विचार कर सकता है।
- युद्ध, सम्पत्तिहरण और पारेषणों पर प्रतिबंध के जोखिमों को भी स्कीम के अंतर्गत कवर किया जाता है। चूंकि निवेशक का संयुक्त उद्यम के प्रबंधन में हिस्सेदारी होगी, अत: स्कीम के अंतर्गत वाणिज्यिक जोखिमों के लिए कोई कवर नहीं प्रदान किया जाएगा।
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