| वर्ष 1991 तक, शेष विश्व के साथ भारत का आर्थिक एकीकरण बहुत सीमित था। परन्तु नई आर्थिक नीति और इसमें शुरू किए गए उदारीकरण के उपायों ने भारतीय व्यापार के भूमंडलीकरण का रास्ता प्रशस्त किया। पहले, निर्यात विदेशों में व्यापार बढ़ाने का मुख्य तरीके के, अत: जो नकद बहिर्प्रवाहों पर प्रतिबंधों के साथ निर्यात संवर्धन रणनीतियों पर था, ताकि हमारे विदेशी मुद्रा भंडारों को संदर्भित किया जा सके। परन्तु विगत वर्षों में, यह अनुभव किया जा रहा है कि भारतीय कंपनियों के विस्तार और वृद्धि के लिए, यह आवश्यक है कि वे न केवल उनके उत्पादों का निर्यात करके वरन विदेशी परिसम्पत्तियों का अधिग्रहण करके तथा विदेशों में अपनी मौजूदगी कायम करके विश्व बाजार में अपनी भागीदारी बढ़ाए। तदनुसार चरणबद्ध उदारीकरण के साथ-साथ बर्हिगामी पूंजी प्रवाह बढ़ा है।
विदेशों में प्रत्यक्ष निवेश को शासित करने वाले दिशा निर्देशों के रूप में पहली नीति भारत सरकार द्वारा 1969 में जारी की गई थी। इन दिशानिर्देशों में विदेशी परियोजनाओं में भारतीय कंपनियों की भागीदारी की सीमा को परिभाषित किया गया था। उनमें भारतीय पक्ष द्वारा गौण भागीदारी की अनुमति दी गई थी जिसमें कोई नकदी पारेषण नहीं था। जहां कहीं आवश्यक हो, स्थानीय पक्षों, स्थानीय विकास बैंकों, वित्तीय संस्थाओं और स्थानीय सरकारों की सहबद्धता का पक्ष भी ऐसे निवेशों को प्रोत्साहित करने के लिए लिया गया।
सरकार ने 1978 में अधिक सर्वांगीण उपायों का सैट जारी करके इन दिशानिर्देशों को संशोधित किया। इन उपायों में वाणिज्य मंत्रालय द्वारा एक केन्द्र बिन्दु पर निवेश प्रस्तावों के अनुमोदन, निगरानी, मूल्यांकन का प्रावधान था। इन दिशानिर्देशों में किसी भारतीय कंपनी के विदेश में निवेशों से संबंधित इसके आरंभिक और अनुवर्ती खर्चों को पूरा करने के लिए विदेशी मुद्रा जारी करने हेतु भारतीय रिजर्व बैंक( आरबीआई) के पास आवश्यक अधिकार सौंपने की आवश्यकता को भी मान्यता दी गई।
इन दिशानिर्देशों को तदनंत्तर 1986, 1992 और 1995 में संशोधित किया गया। विदेशों में भारतीय निवेशों संबंधी नीति का सबसे पहले 1992 उदारीकरण किया गया। इसके अंतर्गत, विदेशी निवेशों के लिए एक स्वचालित मार्ग शुरू किया गया और कुल मूल्य पर प्रतिबंधों सहित पहली बार नकद पारेषणों की अनुमति दी गई। विदेशों में भारतीय निवेशों की व्यवस्था खोलने के लिए मूल तर्काधार भारतीय उद्योग को नए बाजारों और प्रौद्योगिकियों तक पहुंच प्रदान करने की आवश्यकता है ताकि वे वैश्विक रूप से अपनी प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ा सकें और देश के निर्यात को बढ़ावा दे सकें।
प्रक्रियाओं को और उदार बनाने और कारगार बनाने का कार्य 1995 में आरंभ किया गया। 1995 के दिशानिर्देशों में विदेशी निवेश से संबंधित कार्य वाणिज्य मंत्रालय से भारतीय रिजर्व बैंक( आरबीआई) को अंतरित करके एक विस्तृत फ्रेमवर्क की व्यवस्था की गई और भारतीय रिजर्व बैंक विदेशी निवेश नीति को प्रशासित करने के लिए एक केन्द्रीय एजेन्सी बन गई। इसमें विदेशी निवेश अनुमोदनों के लिए एक एकल बिंदु प्रणाली की व्यवस्था की गई। तब से, विदेशों में प्रत्यक्ष निवेश के सभी प्रस्ताव भारतीय रिजर्व बैंक( आरबीआई) को प्रस्तुत किए जा रहे हैं जिसके द्वारा इन पर कार्रवाई की जा रही है। इसके अतिरिक्त, इन दिशानिर्देशों का लक्ष्य निम्नलिखित मूल उद्देश्यों के साथ विदेशी निवेश नीति के ढांचे में पारदर्शिता लाना है :-
- भारतीय उद्योग और व्यापार को वैश्विक नेटवर्कों को पहुंच प्रदान करने के लिए फ्रेमवर्क की व्यवस्था करना;
- यह सुनिश्चित करना कि व्यापार और निवेश प्रवाह, यद्यपि ये वाणिज्यिक हितों द्वारा निर्धारित होते हैं, विशेष रूप से पूंजी प्रवाहों के आकार की दृष्टि से देश के वृहत आर्थिक और भुगतान संतुलन की विवशताओं के अनुरूप हों;
- भारतीय व्यापार को प्रौद्योगिकी हासिल करने अथवा संसाधन प्राप्त करने अथवा बाजार तलाशने के लिए उदार पहुंच प्रदान करना;
- यह संकेत देना कि सरकार की नीति में परिवर्तन है, और वह एक विनियामक या नियंत्रक के स्थान पर सुविधा प्रदाता है;
- भारतीय उद्योग को विदेशों में छवि सुधारने के उद्देश्य से स्व-विनियमन और सामूहिक प्रयास की भावना अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना।
तत्पश्चात 2000 में, फेमा (विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम) के लागू होने से विदेशी मुद्रा के संबंध में विशेषकर विदेशों में निवेश से संबंधित समूचे परिदृश्य में परिवर्तन आया, इस मुद्रा विनियमन के स्थान पर मुद्रा प्रबंधन पर जोर दिया। इसका लक्ष्य विदेशी व्यापार और भुगतानों को सुविधाजनक बनाना तथा भारत में विदेशी मुद्रा बाजार के व्यवस्थित विकास और रख-रखाव को बढ़ावा देना था।
पिछले वर्षों के दौरान भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशी निवेश के लिए उदारीकरण के उपाय जारी रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक ने दिनांक 13.01.2003 के ए.पी. (डीआईआर श्रृंखला) परिपत्र संख्या 66 द्वारा (अधिसूचना संख्या फेमा 19/2000-आरबी दिनांक 3 मई 2000 के आंशिक संशोधन में) स्वचालित मार्ग के तहत नीति में उदारीकरण किया गया है।
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