एक व्यवसाय फर्म को अपने प्रचालन आरंभ करने, अपने प्रचालनों को जारी रखने तथा अपने विस्तार तथा अभिवृद्धि के लिए वित्त (धन) की आवश्यकता होती है। भारतीय कंपनियों को विदेशों में अपने निवेश करने के लिए वित्तीय सहायता की आवश्यकता है। व्यवसाय में तथा उसके बार निधियों का निरंतर प्रवाह होना चाहिए। उन्हें अपनी विभिन्न पूंजी अपेक्षाओं को पूरा करने; विदेशी उद्यमों में इक्विटी भागीदारी करने तथा साथ ही विदेशी कंपनियों या व्यवसायों का अधिग्रहण करने के लिए निधियों की आवश्यकता होती हैं। ठोस योजनाएं दक्ष उत्पादन तथा विपणन ये सभी वित्त (धन) के सहज प्रवाह पर निर्भर हैं।
वर्ष 1990 तक, सरकारी नीतियां विदेशी बाजारों से वित्त या पूंजी प्राप्त करने के पक्ष में नहीं थी तथा कुल मिलाकर भारतीय उद्योग विदेशों से सस्ते वित्त की उपलब्धता का लाभ नहीं उठा सकते थे। विदेशों से पूंजी जुटाने (इक्विटी या ऋण के रूप में) का तर्काधार कंपनियों द्वारा निम्न निधियों का दोहन करने की इच्छा तथा शेयरधारक आधार को व्यापक बनाना था। यह भावी विदेशी प्रचालनों यथा शाखाएं खोलने, विदेशों में परिसंपत्तियां अर्जित करने के साथ-साथ विदेशों में व्यवसाय प्रचालनों का विस्तार करने के लिए एक शुरूआती आधार के रूप में कार्य भी करता है। साधारण शेयरों तथा विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बांडों (एफसीसीबी) का निर्गम वर्ष 1992 में सरकार द्वारा विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बांड तथा साधारण शेयर निर्गम (निक्षेपागार प्राप्त प्रक्रम के माध्यम से) योजना, 1993 को अधिसूचित करने के साथ हुआ।