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विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) तथा इसके अंतर्गत भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी विभिन्न अधिसूचनाओं के अंतर्गत, विदेशी संयुक्त उद्यमों/पूर्णतया स्वामित्वाधीन अनुषंगी कंपनियों में निवेशों का वित्तपोषण निम्नस्रोतों में से किसी एक या अधिक स्रोतों द्वारा किया जाएगा :-
| क्र. सं. |
वर्तमान श्रेणी |
निकाय |
संशोधित श्रेणी |
प्रमुख कार्यकलाप |
| 1. |
प्राधिकृत डीलर |
- वाणिज्यिक बैंक
- राज्य सहकारी बैंक
- शहरी सहकारी बैंक
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प्राधिकृत डीलर -श्रेणी - I |
समय समय पर जारी भा.रि. बैंक
के निदेशों के अनुसार चालू सभी
तथा पूंजी खाता लेनदेन |
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| 2. |
प्राधिकृत डीलर |
- उन्नयन किए गए एफएफएमसी
- सहकारी बैंक
- क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (आरआरबी)
- अन्य
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प्राधिकृत डीलर- श्रेणी - II |
नीचे पैराग्राफ 3 में दिए गए
विनिर्दिष्ट व्यापार मित्र संबंधित
चालू खाता लेनदेन तथा साथ ही पूर्णविकसित मनी चेंजरों को
अनुमत सभी गतिविधियां। रिजर्व
बैंक द्वारा यथा निर्णीत कोई अन्य गतिविधि |
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| 3. |
प्राधिकृत डीलर |
- चयनित वित्तीय एवं अन्य संस्थाओं
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प्राधिकृत डीलर - श्रेणी - III |
इन संस्थाआं द्वारा की गई विदेशी
मुद्रा (विनिमय) गतिवधियों से आनुषंगिक लेनदेन |
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| 4. |
पूर्ण विकसित मनी चेंजर (एफएफएमसी) |
- डाक विभाग एफएफएमसी
- शहरी सहकारी बैंक
- अन्य एफएफएमसी
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एफएफएमसी |
विदेशी मुद्रा का क्रय तथा विदेशों के निजी तथा व्यवसाय दौरों के लिए विक्रय |
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| स्रोत : भारतीय रिजर्व बैंक |
- निर्यातों तथा अन्य देयताओं का पूंजीकरण। भारतीय पक्षकारों को निम्न का पूंजीकरण करने की अनुमति हैं :- (i) विदेशी निकाय को किए गए निर्यातों के लिए उससे देय भुगतान, शुल्क, रायल्टियां; अथवा (ii) उच्चतम प्रयोज्य सीमा के भीतर तकनीकी जानकारी परामर्श, प्रबंधकीय तथा अन्य सेवाओं की आपूर्ति करने के लिए विदेशी निकाय से देय कोई अन्य हकदारिताएं। किन्तु, निर्यात की तिथि से छ: माह की अवधि से अधिक के लिए वसूल न की गई निर्यात प्राप्तियों के लिए पूंजीकरण से पूर्व रिजर्व बैंक का पूर्वानुमोदन अपेक्षित होगा।
साथ ही भारतीय साफ्टवेयर निर्यातकों को किसी विदेशी साफ्टवेयर कंपनी को उनके निर्यातों के 25 प्रतिशत मूल्य संयुक्त उद्यम करार किए बिना भारतीय रिजर्व बैंक के अनुमोदन से शेयरों के रूप में प्राप्त करने की अनुमति है।
- शेयर अदला बदली (स्वैप) जिसका संदर्भ (अर्थ) भारतीय कंपनी के शेयरों के विनिमय द्वारा किसी विदेशी कंपनियों के शेयर अधिप्राप्त करने से है। इसके अंतर्गत, भारतीय कंपनी निम्नलिखित शर्तों के पालन के अध्यधीन विदेशी मुद्रा रूपांतरणीय बांड तथा साधारण शेयर (निक्षेपागार प्राप्ति प्रक्रम के जरिए) योजना, 1993 तथा उसके तहत केन्द्र सरकार द्वारा समय-समय पर जारी दिशानिर्देशों के अनुसार उसी केन्द्रीय कार्यकलाप में विदेशी अधिप्राप्तियों के लिए अमेरिकी निक्षेपागार प्राप्तियां (एडीआर)/वैश्विक निक्षेपागार प्राप्तियां (जीडीआर) के अपने नए निर्गम को स्वत: अदल बदल कर सकती है :-
- एडीआर/जीडीआर भारत मे बाहर किसी स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हैं;
- भारतीय पक्ष द्वारा ऐसा निवेश निम्न राशियों में से उच्चतर राशि से अधिक नहीं है, नामत: :- (i) 100 मिलियन अमेरिकी डालर के समतुल्य राशि; अथवा (ii) पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष में भारतीय पक्षकार के लेखापरीक्षित वित्तीय विवरणों में यथा परिलक्षित उसके निर्यात अर्जनों के 10 गुणा से समतुल्य राशि;
- अधिप्राप्ति के प्रयोजनार्थ एडीआर तथा/अथवा जीडीआर निर्गम भारतीय पक्षकार द्वारा निर्गत निहित नए इक्विटी शेयरों द्वारा समर्थित हैं;
- नए एडीआर तथा/अथवा जीडीआर निर्गम के पश्चात विस्तारित पूंजी आधार में भारत से बाहर निवासी व्यक्तियों द्वारा भारतीय कंपनी के कुल धारित ऐसे निवेश के लिए संगत विनियमों के अंतर्गत निर्धारित क्षेत्रक उच्चतम सीमा से अधिक नहीं है;
- विदेशी कंपनी के शेयरों को मूल्यांकन :- (i) निवेश बैंकर की सिफारिशों के अनुसार होगा यदि शेयर किसी स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध नहीं हैं; अथवा (ii) अधिप्राप्ति किए जाने वाले माह के पूर्ववर्ती तीन महीनों के लिए किसी विदेशी स्टॉक एक्सचेंज में मासिक औसत मूल्य के आधार पर तथा उस पर प्रीमियम, यदि कोई हो जिसे निवेश बैंकर द्वारा अन्य मामलों में उसकी सम्यक् तत्परता रिपोर्ट में अनुशंसित किया गया है, के आधार पर परिकलित विदेशी कंपनी के वर्तमान बाजार पूंजीकरण पर आधारित होगा।
भारतीय पक्षकार द्वारा लेनदेन की तिथि से 30 दिन की अवधि के भीतर रिजर्व बैंक को प्रप्रत्र ओडीजी में ऐसी अधिप्राप्ति की सूचना दिया जाना अपेक्षित है।
- विदेशों में जुटाए गए विदेशी वाणिज्यिक उधार (ईसीबी)/विदेशी मुद्रा रूपांतरणीय बोर्ड (एफसीसीबी)। विदेशी वाणिज्यिक उधार (ईसीबी) का अर्थ है किसी निवासी भारतीय, फर्म, बैंक या भारतीय कम्पनी अधिनियम के अंतर्गत निगमित कंपनी द्वारा विदेशी मुद्रा में लिए गए उधार। इसमें अनिवार्यत: निम्न शामिल हैं :-
- विदेशी बैंकों द्वारा दिया गया क्रेडिट।
- विदेशी वित्तीय संस्थाओं द्वारा दिया गया क्रेडिट।
- विदेशी कार्पोरेट निकायों (ओसीबी) द्वारा दिया गया क्रेडिट।
- आयातों के लिए ऋण, निर्यातों के प्रति अग्रिम, विदेशी निर्यात ऋण अभिकरणों से अग्रिम।
- परिवर्ती दर नोट (एफआरएल) तथा बॉन्ड।
- अनिवार्य भारतीयों (एनआरआई) सहित विदेशों में रहने वाले व्यष्टियों द्वारा दिया गया ऋण।
सरकार ने उपयुक्त श्रेणी को शासित करने वाली नीतियों का प्रक्रियाओं का निरूपण किया है। ईसीबी पहले सरकार द्वारा 1999 में नई परियोजनाएं (जिन्हें हरित क्षेत्र परियोजनाएं कहा जाता है) स्थापित करने, विद्यमान व्यवसाय का विस्तार करने, मूल संरचना परियोजनाओं तथा सामान्यत: नए निवेश के लिए भारतीय कंपनियां या व्यष्टियों को वित्त के स्रोत के रूप में अनुमत किया गया था। ईसीबी संबंधी नीति का निरूपण भारत सरकार द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक के परामर्श से किया जाता है। भारतीय कार्पोरेटों को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में अधिक सुगम्यता हासिल करने में समर्थ बनाने के लिए सरकार ईसीबी प्रक्रियाओं को उदार बनाती रही है। इसने भारतीय रिजर्व बैंक को शक्तियां दी है कि वह भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रकाशित दिशानिर्देशों के अनुसार ईसीबी अनुमोदन प्रदान कर सके, इस नीति के अंतर्गत, ईसीबी तक सुगम्यता दो भागों से संभव है, नामत :-
- स्वचालित मार्ग :- रियल सैक्टर में निवेश के लिए ईसी के स्वत: मार्ग के अंतर्गत है अर्थात इसके लिए भारतीय रिजर्व बैंक या सरकार का अनुमोदन अपेक्षित नहीं है।
- अनुमोदन मार्ग :- स्वत: मार्ग के क्षेत्राधिकार (परिधि) से बाहर सभी मामलों का निर्णय भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा गठित एक अधिकार प्राप्त समिति द्वारा किया जाएगा। स्वत: मार्ग तक सुगम्यता की पात्रता के संबंध में संदेह के मामले में आवेदक अनुमोदन मार्ग का सहारा ले सकते हैं।
भारत में ईसीबी की पेशकश करने वाले बैंक हैं :-
विदेशी मुद्रा रूपांतरणीय बॉन्ड (एफसीसीबी)विदेशी मुद्रा रूपातंरणीय बांडों का निर्गम योजना तथा साधारण शेयर (निक्षेपगार प्राप्ति प्रक्रम) योजना, 1993 के अनुसार विदेशी बाजार में भारतीय कंपनियों द्वारा जारी किए जा सकते हैं। एफसीसीबी निर्गम भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अधिसूचना सं. फेमा 3/200-आरबी दिनांक 3 मई, 2000 के तहत जारी, समय-समय पर यथा संशोधित विदेशी वाणिज्यिक उधार दिशानिर्देशों के समनुरूप होना चाहिए।
- भारतीय पक्षकार का मुद्रा अर्जक का विदेशी मुद्रा (ईईएफसी) खाता ईईएफसी खाते का अर्थ है विदेशी मुद्रा में अभिव्यक्त तथा किसी अधिकृत डीलर (विदेशी मुद्रा में लेनदेन करने वाला बैंक) के पास भारत मे अनुरक्षित खाता जिसमें रूपांतरणीय विदेशी मुद्रा के अर्जनों की निर्धारित प्रतिशतता जमा की जाती है। भारत में रहने वाला कोई व्यक्ति जैसे व्यक्ति, फर्में, कंपनियां इत्यादि ऐसा खाता खोल सकती हैं। इस खाते में अनुज्ञेय जमा राशियां निम्नलिखित हैं :-
- विदेशी मुद्रा ऋण के लिए प्राप्त प्रेषणों या विदेश से प्राप्त निवेश अथवा खाताधारक द्वारा विशिष्ट देयताओं को पूरा करने के लिए प्राप्त राशि से अन्यथा सामान्य बैंकिंग माध्यम के जरिए प्राप्त आवक प्रेषण।
- 100 प्रतिशत निर्यातोन्मुखी यूनिट अथवा (क) निर्यात प्रक्रमण क्षेत्र अथवा (ख) साफ्टवेयर प्रौद्योगिकी पार्क अथवा (ग) इलेक्ट्रॉनिक हार्डवेयर प्रौद्योगिकी पार्क में किसी यूनिट द्वारा ऐसे समरूप किसी यूनिट को अथवा घरेलू प्रशुल्क क्षेत्र में किसी यूनिट की वस्तुओं की आपूर्ति के लिए विदेशी मुद्रा में प्राप्त भुगतान।
- घरेलू प्रशुल्क क्षेत्र में यूनिट द्वारा विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईज़ेड) में यूनिट को वस्तुओं की आपूर्ति के लिए विदेशी मुद्रा में प्राप्त भुगतान।
- किसी निर्यातक द्वारा काउंटर व्यापार के प्रयोजनार्थ किसी प्राधिकृत डीलर के पास अनुरक्षित खाते से प्राप्त भुगतान (काउंटर व्यापार एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें भारत मे आयातित वस्तुओं के मूल्य को भारत से बाहर निर्यात की गई वस्तुओं के मूल्य के प्रति रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों के अनुसार समायोजित किया जाता है)।
- किसी निर्यातक द्वारा वस्तुओं या सेवाओं के निर्यात के लिए प्राप्त अग्रिम प्रेषण।
- भारत से वस्तुओं तथा सेवाओं के निर्यात के लिए प्राप्त भुगतान, जो भारत में किसी प्राधिकृत डीलर के साथ बैंक फॉर फारेन इकोनॉमिक अफेयर्स, मॉस्को के खाते में धारित स्टेट क्रेडिट का अमेरिकी डालर मे पुनर्भुगतान का द्योतक हो।
- व्यावसायिक अर्जन जिनमें निदेशक शुल्क, परामर्शी शुल्क, व्याख्यान शुल्क, मानदेय तथा ऐसे समान अन्य अर्जन शामिल हैं जो किसी व्यवसायी को अपनी वैयक्तिक क्षमता में सेवाएं प्रदान करने के लिए प्राप्त होते हैं।
- खाते में धारित निधियों पर अर्जित ब्याज, यदि कोई हो।
- खाते से पूर्व में आहरित अप्रयुक्त विदेशी मुद्रा को पुन: जमा करना।
- खाता धारक के आयातकर्ता ग्राहक द्वारा ऐसा खाता धारक निर्यातक द्वारा प्रदत ऋण/अग्रिम के पुनर्भुगतान की द्योतक राशि।
- भारतीय कंपनियों को अमेरिकी निक्षेपागार प्राप्तियां (एडीआर)/वैश्विक निक्षेपागार प्राप्तियां (जीडीआर) के निर्गम के जरिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में पूंजी जुटाने की अनुमति है। वे भारतीय रिजर्व बैंक को पूर्वानुमोदन के बिना एडीआर/जीडीआर जारी कर सकते हैं यदि वे विदेशी मुद्रा रूपांतरणीय बांडों को निर्गम योजना तथा साधारण शेयर (निक्षेपागार प्राप्ति प्रक्रम के माध्यम से) योजना, 1993 के संदर्भ में एडीआर/जीडीआर जारी करने के लिए अर्हक हैं :-
ये लिखतें विदेश में किसी निक्षेपागार द्वारा जारी की जाती है तथा विदेशी स्टॉक एक्सचेंजों मे सूचीबद्ध की जाती हैं, इस प्रकार जुटाई गई आय को तब तक विदेश में रखा जाना अपेक्षित है जब तक भारत में उसकी वस्तुत: आवश्यकता न हो। एडीआर/जीडीआर के निर्गम के पश्चात कंपनी द्वारा रिजर्व बैंक अधिसूचना सं. फेमा 20/2000-आरबी दिनांक 3 मई 2000 के अनुबंध ‘ग’ में दिए गए प्रपत्र में एक रिटर्न दायर की जानी है। कंपनी द्वारा इसी विनियम के अनुबंध ‘घ’ में विनिर्दिष्ट प्रपत्र में एक त्रैमासिक विवरणी (रिटर्न) दायर की जानी भी अपेक्षित है। स्थावर सम्पदा तथा स्टॉक बाजारों में निवेश पर सुस्पष्ट निषेध के सिवाए जीडीआर/एडीआर निर्गम आय पर कोई अंत प्रयोग संबंधी प्रतिबंध नहीं हैं।
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