सभी प्रकार के व्यापार उद्यमों को अपनी नियत या कार्यकारी पूंजी आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त धन राशि की आवश्यकता होती है। वित्त सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र के विकास और वृद्धि के लिए एक महत्वपूर्ण निवेश है। उन्हें न केवल उद्यम को चलाने के लिए ऋण सहायता की आवश्यकता होती है और प्रचालन आवश्यकताएं पूरी करनी होती है बल्कि सुविधाओं के विविधीकरण, आधुनिकीकरण / उन्नयन, क्षमता विस्तार आदि के लिए भी इसकी आवश्यकता होती है।
ऋण तक अपर्याप्त पहुंच सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र के सामने आने वाली एक प्रमुख समस्या है। आम तौर पर इन उद्यमों में बजट में बड़ी तंगी होती है, वे अधिकांशत: अपने स्वयं को अंशदान से निधिकृत होते हैं, मित्रों और रिश्तेदारों से ऋण प्राप्त करते हैं तथा कुछ बैंक ऋण का उपयोग करते हैं। अधिकांशत: मशीनरी, उपकरण और कच्ची सामग्री की खरीद और अपने दैनिक व्ययों को पूरा करने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधनों के प्रापण में अक्षम होते हैं। इसका कारण है उनकी कम साख और अल्प नियत निवेश, वे उचित ब्याज दरों पर ऋण प्राप्त करने में कठिनाई का अनुभव करते हैं। इसके परिणाम स्वरूप उन्हें बड़े स्तर पर आंतरिक संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ता है।
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र के संदर्भ में ऋण की समस्या और भी अधिक गंभीर बन जाती है, जब कभी कोई कठिन परिस्थिति आती है जैसे कि कोई बड़े क्रयादेश मिलना, प्रेषण को अस्वीकार कर दिया जाना, भुगतान में असाधारण विलंब आदि। कभी कभार उन्हें धन की कमी के कारण अपने प्रचालन बंद करने पड़ते हैं। साथ ही पूंजी की कमी के कारण वृद्धि और विस्तार की बहुत कम या नहीं के बराबर गुंजाइश होती है। अत: किफायत का स्तर उपलब्ध नहीं होता।
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र की स्थायी वृद्धि सुरक्षित करने के लिए आसान और पर्याप्त ऋण उपलब्धता का महत्व समझते हुए सरकार ने निम्नलिखित उपाय किए हैं :
प्राथमिकता क्षेत्र उधार देना
क्षेत्र के निधिकरण बैंकों की 'प्राथमिकता क्षेत्र उधार देने की नीति' का भाग है (भारत में प्रचालित स्वदेशी और विदेशी दोनों ही बैंक) निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए निवल बैंक ऋण (एनबीसी) के 40% को निजी क्षेत्र के लिए उद्दिष्ट किया गया है। विदेशी बैंकों के लिए एनबीसी की 32% राशि प्राथमिकता केन्द्र के लिए उद्दिष्ट की गई है, जिसकी 10% राशि छोटे स्तर के क्षेत्र के लिए उद्दिष्ट है। भारत में प्रचालित विदेशी बैंकों के मामले में, जो प्राथमिकता क्षेत्र के उधार देने के लक्ष्य या उप - लक्ष्य पाने में असफल रहते हैं तो उन्हें कमी के समकक्ष राशि पर 8 प्रतिशत प्रति वर्ष की ब्याज दर पर एक वर्ष के लिए सिडबी के पास यह राशि जमा करानी होती है।
भारतीय लघु उद्योग विकास निगम (सिडबी)
सिडबी की स्थापना आर्थिक वृद्धि की प्रक्रिया में योगदान देने, रोजगार उत्पादन और संतुलित क्षेत्रीय विकास में योगदान देने के विकास से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र को सशक्त बनाने के अभियान सहित की गई है। यह क्षेत्र के प्रोत्साहन, निधिकरण और विकास के लिए उत्तरदायी प्रधान वित्तीय संस्थान है। क्षेत्र को वित्तीय सहायता प्रदान करने के अतिरिक्त यह समान प्रकार की गतिविधियों में संलग्न संस्थानों के कार्यों का समन्वय करता है। उद्योग की लघु स्तर के क्षेत्र में क्रमिक वृद्धि हेतु सिडबी के निम्नलिखित चार मूलभूत उद्देश्य हैं :
- निधिकरण
- प्रवर्तन
- विकास
- समन्वय
सिडबी के प्रमुख प्रचालन इन क्षेत्रों में हैं (i) पुन: निधिकरण सहायता (ii) प्रत्यक्ष उधार देना और (iii) विकास तथा सहायता सेवाएं।
इस तथ्य को विचार में लेकर की ऐसे अधिकांश उद्यम संस्थागत निधिकरण के दायरे के बाहर हैं जो क्षेत्र के निचले सिरे पर हैं। अत: सिडबी द्वारा बेरोजगार व्यक्तियों को अपने स्वयं के उद्यम स्थापित करने के लिए सूक्ष्म निधिकरण को प्रोत्साहन देने के निरंतर प्रयास किए गए हैं। सिडबी द्वारा 100 से अधिक सूक्ष्म निधिकरण संस्थान (एमएफआई) हैं जो
सूक्ष्म निधिकरण कार्यक्रम के कार्यान्वयन में संलग्न हैं। सिडबी ने इस कार्यक्रम के तहत लगभग 50 लाख लाभार्थियों को लाभ देते हुए लगभग 1700 करोड़ रु. (संचयी) का संवितरण किया है।
राज्य स्तर पर राज्य औद्योगिक विकास निगम (एसआईडीसी) के साथ राज्य वित्तीय निगम (एसएफसी) क्षेत्र के लिए दीर्घ अवधि ऋण के मुख्य स्रोत हैं। राज्य वित्तीय निगम, राज्य स्तरीय संस्थानों ने अपने अपने राज्यों में इन उद्यमों की संतुलित क्षेत्रीय वृद्धि, निवेश के उत्प्रेरण, रोजगार उत्पादन और उद्योग के स्वामित्व आधार को बढ़ाने के लिए निधिकरण और प्रोत्साहन के मुख्य उद्देश्य सहित छोटे और मध्यम उद्यमों के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
लघु उद्यमों के लिए ऋण गारंटी कवर कोष योजना को भारत सरकार और सिडबी द्वारा अगस्त 2000 में 4:1 योगदान के आधार पर पार्श्वीय प्रतिभूति के बिना क्षेत्र में ऋण का अधिक प्रवाह सुनिश्चित करने के विचार से आरंभ किया गया था। 10वीं योजना के अंतिम 2 वर्षों में इसने गति पकड़ी और मार्च 2007 के अंत तक 68062 प्रस्ताव अनुमोदित किए गए तथा 1705 करोड़ रु. के गारंटी कवर जारी किए गए।
छोटे और मध्यम उद्योगों को ऋण प्रदान करने के लिए नीति पैकेज,
को पांच वर्ष की अवधि के अंदर इस क्षेत्र में ऋण के प्रवाह को दोगुना करने के उद्देश्य से आरंभ किया गया था। इस नीति पैकेज के उपायों के साथ बैंक को सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र को न्यूनतम 20 प्रतिशत वर्ष दर वर्ष वृद्धि प्राप्त करने के लिए बैंक और प्रतिवर्ष अर्धशहरी / शहरी, प्रत्येक शाखा में कम से कम 5 नए सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र का औसत शामिल करना तय किया गया है।
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