एक उद्यमी के सामने उत्पादन, विपणन, मूल संरचना, निधिकरण आदि के संबंध में अनेक प्रबंधन संबंधी समस्याएं आती है। इन मुद्दों में से अनेक का मूलभूत कारण बाजार के परिदृश्य में सघन प्रतिस्पर्द्धा का मौजूद होना है। बड़े पैमाने पर फर्मे / उद्योग, जिनमें विशाल उत्पादन और वितरण नेटवर्क है या ऐसे उद्यम जिनकी बाजार में साख है या जिनके पास अपने उत्पादों के लिए बौद्धिक संपदा अधिकार / मानकीकरण हैं या जो बड़ी संख्या में उत्पादों का उत्पादन करते हैं आदि द्वारा देश में व्यापार परिवेश पर प्रभुत्व बनाने की संभावना है। इसके विपरीत छोटे और मध्यम स्तर के उद्योग उत्पादों की किसी एक विशेष दिशा में कार्य करते हैं, उनके पास बहुत छोटे उत्पादन तथा वितरण नेटवर्क होते हैं और आम तौर पर उनके पास अपने उत्पादों की सुरक्षा नहीं होती है। इसके परिणाम स्वरूप उपयोगी तथा अच्छी गुणवत्ता के उत्पाद होने के बावजूद या बड़े स्तर की फर्मों द्वारा इनके समान उत्पादों के उत्पादन से वे अपने उत्पादों की मांग उत्पन्न / धारित नहीं कर पाते हैं और गला काट प्रतिस्पर्द्धा के कारण बड़े स्तर के उद्यमों के सामने अपने ग्राहक खो बैठते हैं।
जबकि केन्द्र और राज्य दोनों ही स्तरों पर सरकारें छोटे तथा मध्यम उद्यमों की मजबूत वृद्धि के लिए एक प्रेरक परिवेश बनाने के सभी प्रयास करती है, ताकि उन्हें बड़े स्तर के उद्यमियों के समकक्ष लाया जा सके और इस प्रकार उनके उत्पादों की पर्याप्त मांग उत्पन्न की जा सके। परन्तु फिर भी छोटे और मध्यम उद्यमों की प्रतिस्पर्द्धा वर्षों से सघन होती जा रही है, जो पूरे व्यापार परिदृश्य में बाधा पहुंचाती है और उनकी उत्पादन तथा विपणन लागत को बढ़ाती है।
स्वतंत्रता के बाद के वर्षों में छोटे और मध्यम स्तर के उद्यम इस प्रतिस्पर्द्धा से आरक्षण की नीति का पालन करते हुए काफी हद तक सुरक्षित थे। इनमें से अनेक उत्पाद विशिष्ट रूप से उनके द्वारा उत्पादन हेतु आरक्षित थे। जबकि, कुछ वर्षों बाद ऐसे अनेक उद्यमों को रोजगार तथा उद्यमशीलता गतिविधियों को प्रोत्साहन देने के लिए अनारक्षित किया गया। पुन: कुछ वर्ष बाद भारत के छोटे और मध्यम स्तर के क्षेत्र में सरल उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन से अनेक परिष्कृत और शुद्धता वाले उत्पादों तक प्रगति की जैसे कि इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रण प्रणालियां, माइक्रो वेव पुर्जे, विद्युत चिकित्सीय उपकरण आदि। आर्थिक उदारीकरण और बाजार के सुधारों की प्रक्रिया से इन उद्यमों को घरेलू तथा वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा का स्तर बढ़ाने की जानकारी मिली है।
यद्यपि एक स्वस्थ्य प्रतिस्पर्द्धी परिवेश उद्यमों की उचित वृद्धि के लिए अनिवार्य है ताकि वे नए और व्यावहार्य अवसरों का लाभ उठा सके। विनिर्माण क्षेत्र, विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्यम क्षेत्र में प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देने के लिए एक मंच प्रदान करने हेतु केन्द्रीय स्तर पर सरकार द्वारा राष्ट्रीय विनिर्माण प्रतिस्पर्द्धा परिषद (एनएमसीसी) की स्थापना की गई है। परन्तु अपने आप में छोटे और मध्यम स्तर के उद्यमियों के सामने फर्मों तथा उद्योगों के अंदर और उनके बीच बढ़ती अस्वस्थ प्रतिस्पर्द्धा की समस्या आती है।
पुन:, इन उद्यमियों के सामने क्षेत्र की प्रौद्योगिकी आवश्यकताओं और उनकी प्रतिस्पर्द्धा के रखरखाव की विशाल कठिनाई है। इसके कारणों में शामिल है : कमजोर वित्तीय परिस्थितियां और अनुसंधान तथा विकास का निम्न स्तर; जोखिम को टालने की मनोवृत्ति; तकनीकी रूप से प्रशिक्षित मानव संसाधना की अनुपलब्धता; प्रौद्योगिकीय सूचना और परामर्श सेवाओं तक पहुंच की कमी; प्रौद्योगिकी केन्द्रों से अलगाव; उत्पादन लागतों पर कम फोकस होना आदि।
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