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विनियामक अपेक्षाएं :
प्रतिस्‍पर्द्धा सुरक्षा
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प्रतिस्‍पर्द्धा का संदर्भ बाजार की स्थिति से हैं, जिसमें विक्रेता स्‍वतंत्र रूप से क्रेता के संरक्षण की खोज करता है ताकि लाभ, बिक्री या बाजार की हिस्‍सेदारी के व्‍यापार उद्देश्‍यों को पूरा किया जा सके। दूसरे शब्‍दों में एक उद्यमी द्वारा अन्‍य व्‍यापार उद्यमियों के विरुद्ध एक लाभ या लक्ष्‍य पाने या बाजार में प्रभुत्‍व बनाने के उद्देश्‍य को पूरा करने के लिए यह एक प्रतिस्‍पर्द्धा है। यह नींव है, जिस पर एक बाजार प्रणाली कार्य करती है। बाजार की अर्थव्‍यवस्‍था के सुचारु रूप से कार्य करने के लिए यह प्रतिस्‍पर्द्धा निष्‍पक्ष और स्‍वतंत्र रूप से होनी चाहिए। एक ऐसी प्रतिस्‍पर्द्धा - नवाचार को उद्दीपित करती है और उत्‍पादकता की प्रेरणा देती है तथा इस प्रकार अर्थव्‍यवस्‍था में संसाधनों का अनुकूलतम आबंटन होता है; उपभोक्‍ता हितों की सुरक्षा की गारंटी दी जाती है; लागत में कमी आती है और गुणवत्ता में सुधार आता है; वृद्धि तथा विकास में तीव्रता आती है एवं आर्थिक और राजनैतिक लोकतंत्र संरक्षित होता है।

परन्‍तु बाजार को विकृत बनाने वाली प्रथाएं और प्रतिस्‍पर्द्धा विरोधी बल अर्थव्‍यवस्‍था के स्‍वस्‍थ प्रतिस्‍पर्द्धी परिवेश की कार्यशैली को प्रतिबंधित कर सकते हैं। आर्थिक सुधारों के युग से उदारीकरण और वैश्‍वीकरण के माध्‍यम से लगातार बढ़ती प्रतिस्‍पर्द्धी ताकतें सामने आई हैं। पर्याप्‍त सुरक्षाओं के अभाव में उद्यम अल्‍पावधि लाभ पाने के लिए अनुचित प्रथाओं का आश्रय लेकर बाजार पर नियंत्रण पाने की कोशिश कर सकते हैं। इस प्रकार एक ऐसे उचित विनियामक परिवेश की आवश्‍यकता उत्‍पन्‍न होती है, जो अर्थव्‍यवस्‍था में एक स्‍वस्‍थ प्रतिस्‍पर्द्धा को सुनिश्चित कर सके, ताकि सभी व्‍यापार उद्यम एक देश के आर्थिक विकास की वृद्धि और विस्‍तार तथा उद्दीपन कर सकें। अत: सरकार ने एक प्रतिस्‍पर्द्धा नीति का निर्धारण किया है जो उपभोक्‍ताओं तथा उत्‍पादकों के हितों को एक उचित प्रतियोगिता के प्रोत्‍साहन और उसे स्‍थायित्‍व प्रदान कर संरक्षित करती है।

प्रतिस्‍पर्द्धा नीति

'प्रतिस्‍पर्द्धा नीति' का अर्थ है प्रतिस्‍पर्द्धा को सुनिश्चित करने एवं बाजार में एक निष्‍पक्ष प्रतियोगिता हेतु संकल्पित सरकारी नीति जिसे उन कारकों और ताकतों को हटा कर या उनके निवारण द्वारा बनाया गया है जो इस प्रतियोगिता में विकृति ला सकती है। यह एक माप है जो प्रत्‍यक्ष रूप से उद्यमों के व्‍यवहार और संरचना को प्रभावित करता है। यह सुनिश्चित करने के लिए एक ऐसी नीति की आवश्‍यकता है जो प्रतिस्‍पर्द्धी परिणामों में बाजार उन्‍मुख आर्थिक कार्यनीति बन सके। यह एक स्‍वस्‍थ व्‍यापार परिवेश के सृजन को प्रोत्‍साहन देती है जो स्‍थैतिक और गतिज दक्षताओं में सुधार लाती है और उपभोक्‍ता तथा उत्‍पादक कल्‍याण को अधिकतम बनाती है।

प्रतिस्‍पर्द्धा नीति के मुख्‍य उद्देश्‍य इस प्रकार है:-

  • सक्रिय प्रतिस्‍पर्द्धी परिवेश का सृजन करना ताकि एक अर्थव्‍यवस्‍था में संसाधनों के दक्ष आबंटन को सुनिश्‍चित किया जा सके।
  • बाजार की अर्थव्‍यवस्‍था में दक्षता को प्रोत्‍साहन देना और उपभोक्‍ता तथा उत्‍पादक कल्‍याण को अधिकतम बनाना।
  • आर्थिक शाक्ति को नियंत्रित करना और नवाचार को प्रोत्‍साहन करना।
  • छोटे और मध्‍यम आकार के उद्यमों को सहायता देना तथा क्षेत्रीय समेकन को प्रोत्‍साहन देना।
  • उन्‍नत निवेश और तकनीकी क्षमताओं के साथ वैश्विक रूप से प्रतिस्‍पर्द्धी फर्मों की प्रक्रिया में सहायता देना।

प्रतिस्‍पर्द्धा नीति के दो तत्‍व हैं :-

  • नीतियों का एक सेट जो स्‍थानीय तथा राष्‍ट्रीय बाजारों में प्रतिस्‍पर्द्धा को बढ़ाता है। इनमें शामिल हैं : उदारीकृत व्‍यापार नीति, रियायती प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नीति, बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा के लिए नीतियां, वित्तीय तथा पूंजी बाजारों का विनिमयन और साथ ही उदारीकृत राजकोषीय एवं मुद्रा विनिमय दर नीति। अन्‍य आर्थिक नीतियों के साथ ऐसे एक अंतरापृष्‍ठ से संसाधन आबंटन में अधिक दक्षता के साथ निष्‍पक्ष प्रतियोगिता को प्रोत्‍साहन देने में सहायता मिलती है।
  • प्रतिस्‍पर्द्धा विरोधी व्‍यापार प्रथाओं और कृत्रिम प्रवेश बाधाओं की रोकथाम के लिए संकल्पित एक विधान। एक ऐसे विधान से बाजार पहुंच और सरकार के प्रयासों को प्रोत्‍साहन देने वाली अन्‍य प्रतिस्‍पर्द्धा की पूरकता होती है।

प्रतिस्‍पर्द्धा अधिनियम, 2002

प्रतिस्‍पर्द्धा नीति के प्रावधानों के अनुसार भारत सरकार ने प्रतिस्‍पर्द्धा अधिनियम,2002 नामक एक विधान लागू किया है। यह अधिनियम प्रतिस्‍पर्द्धा रोधी प्रथाओं की रोकथाम, एक उद्यम द्वारा प्रभुत्‍व के दुर्व्‍यवहार तथा विलयन और अधिग्रहण जैसे संयोजनों के विनियमन के माध्‍यम से प्रतिस्‍पर्द्धा को प्रोत्‍साहन देने पर लक्षित है।

अधिनियम द्वारा एकाधिकार और प्रतिबंधात्‍मक व्‍यापार प्रथा (एमआरटीपी) अधिनियम, 1969 लागू किया गया था और इस प्रकार एकाधिकार और प्रतिबंधात्‍मक व्‍यापार प्रथा आयोग (एमआरटीपीसी) को समाप्‍त किया, जिसकी स्‍थापना एमआरटीपी अधिनियम के प्रावधानों में छानबीन के लिए की गई थी। इसके अलावा उदारीकरण, निजीकरण और वैश्‍वीकरण के युग में यह अनुभव किया गया था कि मौजूदा एमआरटीपी अधिनियम, 1969 कुछ विशिष्‍ट संदर्भों में पुराना पड़ गया था और प्रतिस्‍पर्द्धा को प्रोत्‍साहन देने के लिए एकाधिकार पर कटौती करने से फोकस हटाने की आवश्‍यकता है। नए प्रतिस्‍पर्द्धा कानून, प्रतिस्‍पर्द्धा अधिनियम, 2002 में प्रतिस्‍पर्द्धा के आधुनिक ढांचे को प्रस्‍तुत किया गया है। अधिनियम के मुख्‍य उद्देश्‍य इस प्रकार हैं :-

  • प्रतिस्‍पर्द्धा पर दुष्‍प्रभाव रखने वाली प्रथाओं की रोकथाम के लिए एक आयोग की स्‍थापना हेतु सहायता देना।
  • भारत के बाजारों में प्रतिस्‍पर्द्धा को प्रोत्‍साहन और स्‍था‍यित्‍व प्रदान करना।
  • उपभोक्‍ताओं के हितों की रक्षा करना।
  • भारत के बाजारों में प्रतिभागियों द्वारा किए गए व्‍यापार की स्‍वतंत्रता और संबंधित मामलों पर कार्रवाई सुनिश्चित करना।
प्रतिस्‍पर्द्धा अधिनियम, 2002 के स्‍थान पर प्रतिस्‍पर्द्धा (संशोधन) अधिनियम 2007 लाया गया है।

प्रतिस्‍पर्द्धा अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने के लिए एक स्‍वायत्त निकाय भारतीय प्रतिस्‍पर्द्धा आयोग (सीसीआई) का गठन विनियामक और क्‍वासी न्‍यायिक अधिकारों के साथ किया गया था। आयोग के न्‍यायाधिकार क्षेत्र में निम्‍नलिखित शामिल हैं -

  1. प्रतिस्‍पर्द्धा विरोधी करारनामों की छानबीन करना।
  2. यह प्रतिस्‍पर्द्धा विरोधी करारनामों की रोकथाम करता है। यह अधिनियम एक उद्यम या उद्यमों के संघ द्वारा किसी करारनामे के शून्‍य घोषित करता है, जो वस्‍तुओं के उत्‍पादन, आपूर्ति, वितरण, अधिग्रहण या नियंत्रण अथवा सेवाओं के प्रावधान को प्रतिबंधित करता है। इस अधिनियम में क्षैतिज और ऊर्ध्‍वाधर करारनामों को मान्‍यता दी जाती है, जिसमें एक अर्थव्‍यवस्‍था में प्रतिबंधात्‍मक प्रतिस्‍पर्द्धा की संभाव्‍यता है।

    शैक्षिक करारनामे वे करारनामें हैं जो उत्पादन, सेवाओं आदि के समान चरण में उद्यमों के बीच किए जाते हैं :-

    • क्रय या बिक्री मूल्‍यों का प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष निर्धारण;
    • सेवाओं के उत्‍पादन, आपूर्ति, बाजारों, तकनीकी विकास, निवेश या प्रावधान की सीमाएं या नियंत्रण;
    • इसमें बाजारों या स्रोत उत्‍पादन को बांटा जाता है अथवा सेवाओं का प्रावधान बाजार की भौगोलिक क्षेत्रों के आबंटन के रास्‍ते किया जाता है या वस्‍तुओं या सेवाओं के प्रकार द्वारा या बाजार में ग्राहकों की संख्‍या या किसी अन्‍य समान रूप से किया जाता है;
    • बोली या कपटपूर्ण बोली में प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष रूप से परिणामी।

    ऊर्ध्‍वाधर करारनामे ऐसे करारनामे हैं जो उन उद्यमों के बीच किए जाते हैं जो उत्‍पादन, वितरण आदि के अलग अलग चरणों पर है। इनमें निम्‍नलिखित करारनामे शामिल हैं :-

    • गठबंधन व्‍यवस्‍था;
    • विशिष्‍ट आपूर्ति करारनामे;
    • विशिष्‍ट वितरण करारनामे;
    • कारोबार से मना करना;
    • पुन: बिक्री मूल्‍य रखरखाव।

    यह तय करते हुए कि एक करारनामा प्रतिस्‍पर्द्धा पर उल्‍लेखनीय प्रतिकूल प्रभाव रखता है, निम्‍नलिखित कारकों पर आयोग द्वारा विचार किया जाएगा :-

    • बाजार में नए व्‍यक्तियों के प्रवेश पर बाधा डालना या मौजूदा प्रतिस्‍पर्द्धियों को बाजार से बाहर जाने के लिए प्रेरित करना;
    • बाजार में प्रवेश पर रोक लगाकर प्रतिस्‍पर्द्धा पर रोक लगाना;
    • उपभोक्‍ताओं को लाभ प्रदान करना;
    • वस्‍तुओं के वितरण या उत्‍पादन अथवा सेवाओं के प्रावधान में सुधार;
    • तकनीकी, वैज्ञानिक और आर्थिक विकास को प्रोत्‍साहन देना।

  3. प्रभुत्‍वकारी स्‍थान के दुर्व्‍यवहार की छानबीन करना
  4. यह अधिनियम किसी उद्यम द्वारा प्रभुत्‍वकारी स्‍थान के दुर्व्‍यवहार की रोकथाम करता है। प्रभुत्‍वकारी स्थिति का अर्थ है एक उद्यम द्वारा अनुभव की जाने वाली शक्ति का स्‍थान जो भारत के संगत बाजार में है। एक ऐसी स्थिति होने से फर्म को ये लाभ मिलते हैं :- (i) यह संगत बाजार में प्रचलित प्रतिस्‍पर्द्धी ताकतों का स्‍वतंत्र रूप से प्रचालित करती है; या (ii) संगत बाजार में इसके प्रतिस्‍पर्द्धियों या उपभोक्‍ताओं को इसके पक्ष में प्रभावित करता है।

    अधिनियम के अनुसार एक उद्यम द्वारा प्रभुत्‍व के दुर्व्‍यवहार में निम्‍नलिखित प्रथाएं शामिल हैं :-

    • वस्‍तुओं और सेवाओं की खरीद या बिक्री में अनुचित या भेदभाव पूर्ण शर्तों को प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष रूप से लगाना;
    • उपभोक्‍ताओं के प्रति पूर्वागृह रखते हुए वस्‍तुओं व सेवाओं से संबंधित तकनीकी या वैज्ञानिक विकास को प्रतिबंधित करना;
    • बाजार पहुंच को अस्‍वीकार करने के परिणाम स्‍वरूप प्रथाओं में शामिल होना;
    • अन्‍य पक्षों द्वारा स्‍वीकार्यता के अधीन संविदाओं के निष्‍कर्ष निकालना, जिनका उक्‍त संविदाओं के विषय से कोई संबंध नहीं हैक्;
    • एक अन्‍य बाजार में प्रवेश करने के लिए किसी संगत बाजार में प्रभुत्‍वकारी स्थिति का उपयोग करना।

    यह निर्धारित करते हुए कि क्‍या एक उद्यम प्रभुत्‍वकारी स्थिति में है या नहीं, आयोग द्वारा निम्‍नलिखित कारकों पर विचार किया जाएगा :-

    • उद्यम के माप और संसाधन, बाजार में हिस्‍सेदारी;
    • प्रतिस्‍पर्द्धियों का माप और महत्‍व;
    • प्रतिस्‍पर्द्धियों पर वाणिज्यिक लाभ सहित उद्यम की आर्थिक शक्ति;
    • उद्यम के उपभोक्‍ताओं पर निर्भरता;
    • किसी विधान के परिणाम स्‍वरूप या एक सरकारी कंपनी होने के नाते या एक सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम या अन्‍यथा होने पर अर्जित एकाधिकार या प्रभुत्‍वकारी स्थिति;
    • प्रवेश की बाधाएं जैसे विनियामक बाधाएं, प्रवेश की उच्‍च पूंजी लागत, विपणन प्रवेश बाधाएं, तकनीकी प्रवेश बाधाएं आदि;
    • क्रय शक्ति का संतुलन;
    • बाजार की संरचना और बाजार का आकार;
    • उद्यम का ऊर्ध्‍वाधर समेकन या उक्‍त उद्यमों का बिक्री या सेवा नेटवर्क;
    • अन्‍य कोई कारक, जिन्‍हें आयोग पूछताछ के लिए संगत पाएं।

  5. संयोजन विनियमन
  6. यह अधिनियम व्‍यापार संयोजनों के विभिन्‍न रूपों का विनियमन करता है और उनके सूत्रण को संदमित नहीं करता है। अधिनियम के तहत कोई व्‍यक्ति या उद्यम अधिग्रहण, विलयन या सम्मिलन के रूप में प्रवेश नहीं करेगा, जिससे संगत बाजार में प्रतिस्‍पर्द्धा में कोई उल्‍लेखनीय प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है या पड़ता है और इस संयोजन को शून्‍य बना दिया जाएगा।

    परन्‍तु सभी संयोजन संवीक्षा की मांग नहीं करते जब तक कि इनका परिणाम संयोजन परिसंपत्तियों या कारोबार के संदर्भ में थ्रेशोल्‍ड सीमाओं से अधिक न हो, जैसा कि भारतीय प्रतिस्‍पर्द्धा आयोग द्वारा निर्दिष्‍ट किया गया है।

    संयोजन का विनियमन करते हुए आयोग द्वारा निम्‍नलिखित कारकों पर विचार किया जाएगा :–

    • आयातों के माध्‍यम से वास्‍तविक और संभावित प्रतिस्‍पर्द्धा;
    • बाजार में प्रवेश के लिए बाधाओं की सीमा;
    • बाजार में संयोजन का स्‍तर;
    • बाजार में संतुलन शक्ति की डिग्री;
    • मूल्‍यों या लाभों को महत्‍वपूर्ण और पर्याप्‍त रूप से बढ़ाने के लिए संयोजन की संभावना;
    • एक बाजार में स्‍थायी बनने के लिए प्रभावी प्रतिस्‍पर्द्धा की सीमा;
    • संयोजन के पहले और बाद में प्रतिस्‍थापनों की उपलब्‍धता;
    • संयोजन में व्‍यक्ति के रूप में तथा एक संयोजन के रूप में पक्षों की बाजार में हिस्‍सेदारी;
    • सघन और प्रभावी प्रतिस्‍पर्द्धी या बाजार में प्रतिस्‍पर्द्धा को हटाने के लिए संयोजन की संभावना;
    • बाजार में ऊर्ध्‍वाधर समेकन का प्रकार और सीमा;
    • नवाचार का प्रकार और सीमा;
    • संयोजन पर प्रतिकूल प्रभाव के संयोजन के लाभ।

    इस प्रकार इस अधिनियम में संयोजनों को हटाया नहीं जाना है और यह केवल उनके हानिकारक प्रभावों को हटाने पर लक्षित हैं।

  7. प्रतिस्‍पर्द्धा समर्थन करना, सार्वजनिक जागरूकता का सृजन और प्रतिस्‍पर्द्धी मुद्दों पर प्रशिक्षण का आयोजन
  8. सीसीआई द्वारा निम्‍नलिखित रूप में प्रतिस्‍पर्द्धी मुद्दों के विषय में समर्थन प्रतिस्‍पर्द्धा और जागरूकता सृजन किया जाता है :-

    • आयोग द्वारा कार्यक्रमों, गतिविधियों का प्रयास और कार्यान्‍वयन किया जाएगा जो भारत और विदेश में आयोग द्वारा उपयुक्‍त पाए गए प्रतिस्‍पर्द्धी मुद्दों के बारे में प्रतिस्‍पर्द्धा समर्थन को प्रोत्‍साहन देने तथा जागरूकता लाने के विषय में होंगे;
    • आयोग द्वारा इस कार्यसूची को आगे बढ़ाने के लिए निरंतर आधार पर वि‍शेषज्ञ और पणधारी प्रतिभागिता तथा परामर्श पाने के‍ लिए के सलाहकार समर्थन समिति का गठन किया जाता सकता है;
    • आयोग द्वारा दृश्‍य और श्रव्‍य तथा अन्‍य सामग्री के साथ प्रतिस्‍पर्द्धा समर्थन को प्रोत्‍साहन देने और प्रतिस्‍पर्द्धी मुद्दों के बारे में जागरूकता पैदा करने सहित समर्थन साहित्‍य का विकास और प्रसार किया जाएगा। ऐसा करने के लिए आयोग उपयुक्‍त पाई गई व्‍यावसायिक सेवाओं को आउटसोर्स कर सकता है;
    • आयोग द्वारा प्रिंट तथा इलेक्‍ट्रॉनिक दोनों प्रकार के मीडिया के उपयोग द्वारा इसे प्रोत्‍साहन दिया जा सकता है। इस प्रयोजन के लिए, य‍ह मीडिया की बैठकें, प्रेस टिप्‍पणियां जारी करने, प्रकाशन की व्‍यवस्‍था तथा लेखों / समाचार पत्रों के प्रसार, विज्ञापन जारी करने एवं उपयुक्‍त पाए गए रूप में प्रतिस्‍पर्द्धी मुद्दों पर अन्‍य प्रचार संबंधी गतिविधियों को कर सकता है;
    • आयोग द्वारा पणधारियों के संगठनों, शैक्षिक समुदाय, क्षेत्र विनियामकों, केन्‍द्रीय और राज्‍य सरकारों, नागरिक समाज एवं अन्‍य संगठनों के साथ सक्रिय रूप से कार्य किया जाएगा जो प्रतिस्‍पर्द्धी मामलों पर संबंध रखते हैं और प्रतिस्‍पर्द्धा पर एक वाद विवाद को प्रोत्‍साहन देने के साथ एक बेहतर और अधिक जानकारी प्राप्‍त आर्थिक निर्णय लेने वाले व्‍यक्तियों को प्रोत्‍साहन दिया जाएगा;
    • आयोग द्वारा इस प्रयोजन के लिए अध्‍ययन तथा बाजार अनुसंधान किया जाएगा;
    • आयोग द्वारा प्रतिस्‍पर्द्धा कानून और उनके द्वारा लागू पाठ्यक्रमों में नीति के अनुसार शैक्षिक और व्‍यावसायिक संस्‍थानों को प्रोत्‍साहन दिया जा सकता है।

    आयोग के पदाधिकारियों की क्षमता पुन: बढ़ाने के‍ लिए भारतीय प्रतिस्‍पर्द्धा आयोग ने प्रतिस्‍पर्द्धा मंच की स्‍थापना की है। जिसमें कानून, अर्थशास्‍त्र, वित्त, लोक प्रशासन, प्रबंधन और अन्‍य ऐसे क्षेत्र शामिल हैं, जिन्‍हें उपयुक्‍त पाया गया है।

^ ऊपर

 
प्रतिस्‍पर्द्धा अधिनियम 2002
भारतीय प्रतिस्‍पर्द्धा आयोग
भारतीय प्रतिस्‍पर्द्धा द्वारा बार बार पूछे जाने वाले प्रश्‍न
प्रतिस्‍पर्द्धा संशोधन अधिनियम, 2007
 
 
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