विदेशी व्यापार (विकास और विनियमन) अधिनियम, के प्रावधानों के अनुसार भारत सरकार ने एक आयात और निर्यात नीति का निर्धारण और घोषणा की है तथा इसे समय समय पर संशोधित किया जाता है।
एक्सिम नीति किसी देश के आयात और निर्यात के संदर्भ में अपनाए जाने वाले नीतिगत उपायों से संबंधित है। एक ऐसी नीति भारत जैसे देश के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है, जहां वस्तुओं का आयात और निर्यात न केवल बजटीय लक्ष्यों के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है बल्कि यह देश के समग्र आर्थिक विकास में भी अहम भूमिका रखता है। नीति के प्रधान उद्देश्य इस प्रकार हैं :-
- देश के निर्यातों की स्थायी वृद्धि की सुविधा प्रदान करना, ताकि वैश्विक कारोबारी व्यापार में अधिक बड़ी हिस्सेदारी बनाई जा सके।
- अच्छी गुणवत्ता की वस्तुओं और सेवाओं का घरेलू उपभोक्ता को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धी कीमतों पर प्रदान करना साथ ही घरेलू उत्पादकों के लिए एक अच्छे स्तर का क्षेत्र सृजित करना।
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अनिवार्य कच्ची सामग्रियों, माध्यमिक वस्तुओं, पुर्जों, उपभोज्य सामग्रियों और पूंजीगत वस्तुओं तक पहुंच बढ़ा कर स्थायी आर्थिक वृद्धि को उद्दीपित करना ताकि उत्पादन और सेवाएं प्रदान करने में वृद्धि की जा सके।
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भारतीय कृषि, उद्योग और सेवाओं की तकनीकी शक्ति और दक्षता को बनाना और इसके द्वारा वैश्विक बाजारों की आवश्यकताएं पूरी करने में उनकी प्रतिस्पर्द्धात्मकता में सुधार लाना।
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रोजगार के नए अवसर उत्पन्न करना और गुणवत्ता के अंतरराष्ट्रीय रूप से स्वीकार्य मानकों की प्राप्ति को बढ़ावा देना।
आर्थिक सुधारों के साथ देश की एक्सिम नीति ने आयातों पर प्रतिबंध हटाने, निर्यात अनुकूल परिवेश प्रदान करने एवं व्यापार की प्रक्रियाओं को सरल बनाने की प्रक्रिया जारी रखने के माध्यम से विदेशी कारोबार के उदारीकरण पर लक्ष्य केन्द्रित किया है। पिछले कुछ वर्षों से निवेश उपलब्धता और तकनीकी उन्नयन की सुविधा देने एवं बहुपक्षी तथा द्विपक्षी पहलों के माध्यम से निर्यातों को प्रोत्साहन देने के लिए एवं प्रबलन तथा फोकस क्षेत्रों की पहचान करने के लिए अनेक उपाय किए गए हैं। उदाहरण के लिए 2002-07 की एक्सिम नीति, जो दसवीं पंचवर्षीय योजना अवधि (2002-2007) को शामिल करते हुए इस दिशा में एक अगला कदम था।
31 अगस्त 2004 को 2004-09 की अवधि के लिए नई विदेश व्यापार नीति उद्घोषित की गई जिसमें विदेशी व्यापार नीति (एफटीपी) द्वारा एक्सिम नीति के नामकरण का स्थान ले लिया। अगले 5 वर्षों में वैश्विक कारोबारी व्यापार में भारत की स्थिति को दोहरा करने की सघन निर्यात उन्मुख वृद्धि कार्यनीति निर्यात विस्तार और रोजगार उत्पादन की संभाव्यता वाली संभावनाओं के क्षेत्रों पर फोकस सहित नीति का मुख्य आधार गठित करती है।
एफटीपी 2004 में निर्यात विस्तार और रोजगार उत्पादन की संभाव्यता के लिए कुछ प्रमुख प्रबलन क्षेत्रों को अभिज्ञात किया गया है, इन प्रबलन क्षेत्रों में कृषि, हथकरघा और हस्तशिल्प, रत्न और आभूषण और चमड़ा तथा जूते आदि के क्षेत्र शामिल हैं। इन उपायों से अंतराष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धा बढ़ने की आशा है और ये भारतीय निर्यात की स्वीकार्यता को पुन: बढ़ाने में भी सहायता देंगे।
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