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तीव्र मीनू

भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था
भारतीय अर्थव्यवस्था वर्ष 1991 से आर्थिक सूचकांक
भारतीय अर्थव्यवस्था भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था की वर्तमान स्थिति
भारतीय अर्थव्यवस्था अध्‍ययन/सर्वेक्षण/प्रतिवेदन
   
 
Indian Economy
1991 से आर्थिक सूचकांक
  Business राष्‍ट्रीय आय क्षेत्र
  Business कृषि क्षेत्र
  Business औद्योगिक क्षेत्र
  Business धन और बैंकिंग क्षेत्र
  Business मूल्‍यों का रुझान
     
वर्ष 1991 में आर्थिक सुधार आरंभ होने के समय से भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में पर्याप्‍त परिवर्तन हुए हैं। ये सुधार एक व्‍यापक प्रयास का परिणाम थे, जिसमें शामिल मुख्‍य घटक, नामत: उदारीकरण, निजीकरण और वैश्‍वीकरण। इनमें अनेक उपाय निहित थे, जैसे बाज़ारों का विनियमन और निजी पार्टियों के बीच व्‍यापार में उदारीकरण; घरेलू और निजी निवेशों पर लगे प्रतिबंध समाप्‍त करना और वित्‍तीय क्षेत्र तथा कर प्रणाली आदि में सुधार। इन सभी नीतिगत पहलों ने देश की आर्थिक व्‍यवस्‍था बदल कर रख दी तथा इसे शेष दुनिया के साथ समेकित किया। इस प्रकार, भारत को एक वैश्विक प्रतिस्‍पर्द्धी स्थिति में स्‍थान मिला, ताकि यह अर्थव्‍यवस्‍था की तीव्र वृद्धि की संभाव्‍यता और अवसरों का पूरी तरह उपयोग कर सके।

वर्ष 1991-92 में कारक लागत (1993-94 मूल्‍यों पर) पर निवल राष्‍ट्रीय उत्‍पाद (एनएनपी) 0.5 प्रतिशत से बढ़कर 1999-2000 में 6.3 प्रतिशत हो गया। यह 1999-2000 मूल्‍यों से बढ़ कर वर्ष 2003-04 में 8.8 प्रतिशत हो गया। इसी प्रकार, समान अवधि में प्रति व्‍यक्ति एनएनपी - 1.5 प्रतिशत से बढ़कर 4.4 प्रतिशत और फिर 7.0 प्रतिशत हो गया। कारक लागत (1993-94 मूल्‍यों पर) सकल राष्‍ट्रीय उत्‍पाद (जीएनपी) वर्ष 1991-92 में 1.1 प्रतिशत से बढ़कर 1999-2000 में 6.2 प्रतिशत हो गया। यह 1999-2000 के मूल्‍यों पर वर्ष 2003-04 में 8.7 प्रतिशत हो गया। कारक लागत पर सकल घरेलू उत्‍पाद (जीडीपी) (1999-2000 मूल्‍यों पर) वर्ष 2000-01 के दौरान 4.4 प्रतिशत की तुलना में बढ़कर 2004-05 के दौरान 7.5 प्रतिशत हो गया।

औद्योगिक क्षेत्र उदारीकरण के बाद से पुन:संरचना और समेकन की प्रक्रिया के माध्‍यम से गुजर रहा है। उद्योगों ने सम्मिलन तथा अधिग्रहण लागत कम करने के उपायों को अपनाकर, विदेशी सहयोग, प्रौद्योगिकी उन्‍नयन, और सीमेंट, इस्‍पात, एल्‍युमिनियम, फार्मास्‍युटिकल एवं ऑटोमोबाइल जैसे क्षेत्रों में बाह्य अभिमुखीकरण के माध्‍यम से सुधारों पर प्रतिक्रिया दी है। सुधारों के बाद शुरूआती पांच वर्षों में औद्योगिकी वृद्धि में काफी तेज़ी रही, परन्‍तु अगले पांच वर्षों में 4.5 प्रतिशत की वार्षिक दर पर धीमी हो गई। वर्ष 2001-02 में 2.7 प्रतिशत की धी‍मी वृद्धि दर से उद्योग में वर्ष 2002-03 में औद्योगिक क्षेत्र 7.1 प्रतिशत की दर से बढ़ा तथा वर्ष 2004-05 के दौरान 9.8 प्रतिशत हो गया।

सुधार आरंभ होने से अर्थव्‍यवस्‍था में धन की आपूर्ति में स्‍थायी और निरन्‍तर वृद्धि हुई है। आरक्षित धन वर्ष 1991-92 में 99,505 करोड़ रु. से बढ़कर वर्ष 2005-06 में 573066 करोड़ रु. (अनंतिम) हो गया है। इसी अ‍वधि के दौरान संकीर्ण धन 114406 करोड़ रु. से बढ़कर 825245 करोड़ रु. (अनंतिम) हो गया, जबकि स्‍थूल धन 317049 करोड़ रु. से बढ़कर 2729535 करोड़ रु. (अनंतिम) हो गया है।

आठवीं योजना (1992-1997) के दौरान 4.7 प्रतिशत से गिरावट दर्ज करते हुए भारतीय कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में अल्‍प और विस्‍फोटक वृद्धि दरें इस क्षेत्र की औसत वार्षिक वृद्धि दरें नौंवीं योजना (1997-2002) के दौरान 2.1 प्रतिशत हो गई। वर्ष 2002-03 के दौरान - 7.2 प्रतिशत की ऋणात्‍मक वृद्धि दर से वर्ष 2003-04 में कृषि क्षेत्र में 10.0 प्रतिशत की वृद्धि दर पर वृद्धि हुई और वर्ष 2005-06 के दौरान 6.0 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई है।

जीडीपी के अनुपात के रूप में, निर्यात की हिस्‍सेदारी, जो वर्ष 1990-91 में 5.8 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2004-05 में 12.2 प्रतिशत तक बढ़ गई थी, पुन: 2005-06 में 13.1 प्रतिशत तक बढ़ गई। वर्ष 1990-91 में आयात में संगत वृद्धि 8.8 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2004-05 में 17.1 प्रतिशत और वर्ष 2005-06 में 19.5 प्रतिशत तक बढ़ गई। इस प्रकार, जीडीपी के अनुपात के रूप में व्‍यापार में कमी, जो 1990-91 में 3.0 प्रतिशत से गिर कर 2002-03 में 2.1 प्रतिशत हो गई, वर्ष 2004-05 में 4.9 प्रतिशत और 2005-06 में पुन: 6.4 प्रतिशत हो गई है।

स्‍फीति के मोर्चें पर भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था का निष्‍पादन मूल्‍यों की स्थिरता के साथ सुधार प्रक्रिया के एक प्रमुख उद्देश्‍यों में से एक, संतोषजनक रहा है, विशेष तौर पर वर्ष 1990 के मध्‍य से। थोक मूल्‍य सूचकांक (डब्‍ल्‍यूपीआई) पर आधारित वार्षिक औसत स्‍फीति दर 1991-96 के बीच 10.6 प्रतिशत थी, जो 1996-2001 के बीच 5.1 प्रतिशत तक और 2001-06 के दौरान 4.7 प्रतिशत रह गई।

वर्ष 1991 से अर्थव्‍यवस्‍था के निष्‍पादन पर प्रकाश डालने वाले विभिन्‍न आर्थिक सूचकांक हैं।

 

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