भारत सरकार योजना युग के शुरू से ही मूल संरचना सुविधाओं और राष्ट्र की प्रगति के बीच संबंध से पूरी तरह वाक़िक है तब से मूल संरचना विकास को प्राथमिकता क्षेत्रक के रूप में देखा गया है। आरंभ में इस उद्योग में निवेश निजी क्षेत्र का एकाधिकार समझा जाता था। यह बड़ा वित्तीय परिव्यय, लंबी परिपक्वन अवधि, अनिश्चित प्रतिफल और मूल संरचना परियोजनाओं में सन्निहित बाहरीपन होने के कारण था।
परंतु देश के उदारीकरण और वैश्विकरण से मूल संरचना क्षेत्र निजी निवेशों के लिए देशीय और विदेशी हेतु उत्तरोत्तर खुल गया है। इसका कारण जैसे जैसे अर्थ व्यवस्था तेजी से बढ़ती हैं, विश्व मंच पर इसकी प्रतिस्पर्धात्मकता कायम रखने के लिए मूल संरचनात्मक ढांचा अपरिहार्य हो जाता है। बढ़ते हुए औद्योगिक क्रियाकलाप और जनसंख्या में वृद्धि का मौजूदा मूल संरचनात्मक सुविधाओं पर अत्यधिक दबाव पड़ता है।
इसके होते हुए भारत सरकार यह मानती है कि जबकि मूल संरचना में सार्वजनिक निवेश का बढ़ना जारी रहेगा तो देश में बढ़ती मूल संरचना की कमी का समाधान करने के लिए निजी भागीदारी को महत्वपूर्ण रूप से विस्तारित करने की आवश्यकता है। इसलिए, यह सरकारी निजी भागीदारी (पी पी पी) कार्यक्रम के जरिए लगभग सभी मूल संरचना यूनिटों में निजी क्षेत्र के निवेश को प्रोत्साहित करती रही है।
सरकारी निजी भागीदारी का अभिप्राय है एक परियोजना जो मूल संरचना सुविधा मुहैया कराने के लिए एक ओर सरकार या सांविधिक निकाय और दूसरी ओर निजी क्षेत्र की कंपनी के बीच संविदा या रियायत करार पर आधारित हो। इसके तहत निजी क्षेत्रक की भूमिका को सुविधाकारी और समर्थकारी के रूप में पुन- परिभाषित किया जाता है जबकि निजी साझेदार वित्तपोषक निर्माणकर्ता तथा सेवा या सुविधा के संचालक की भूमिका निभाता है। सरकार स्थिर अभिशासन प्रदान करती है, वित्तीय सहायता तथा सामाजिक, पर्यावरणीय एवं राजनैतिक जोखिमों के लिए बीमा प्रदान करती है। निजी क्षेत्रक प्रचालनात्मक सक्षमता, पुनरुद्धारक प्रौद्योगिकी, प्रबंधकीय प्रभावोत्पादकता ओर अतिरिक्त वित्त पोषण की पहुंच मुहैया कराता है। इस प्रकार से पी पी पी सरकारी और निजी क्षेत्रों की कौशल विशेषज्ञता और अनुभव को एक साथ मिलाता है ताकि अंत में अंतरराष्ट्रीय स्तर प्राप्त किया जा सके।
भारत में सरकारी निजी भागीदारी के कुछ आरंभिक उदाहरण हैं :- दि ग्रेट इंडियन पेनिन्सुलर रेलवे कंपनी, जो बॉम्बे और थाणे के बीच (1853) कार्यरत है, दि बॉम्बे ट्रामवे कंपनी जो बॉम्बे में ट्रामवे सेवा चलाती है (1874) तथा बॉम्बे और कलकत्ता में विद्युत उत्पादन और पारेषण कंपनियां 20वीं शताब्दी के आरंभ में। रेलवे, नौवहन, विद्युत, विमानन दूरसंचार आदि जैसे उच्च प्राथमिकता वाली उपयोगिता एवं मूल संरचना के विकास और प्रचालन हेतु सरकार सक्रिय रूप से पी पी पी मोड का संवर्धन कर रही है। कुछ अध्ययनों के अनुसार सबसे अधिक संख्या में पी पी पी परियोजनाएं सड़क एवं पूलों के क्षेत्र में हैं इसके बाद पत्तनों विशेषकर ग्रीनफील्ड पत्तन में। साथ ही 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान भौतिक मूल संरचना में निवेश लगभग 2,002 हजार करोड़ रु. आंका गया है (2006-07 का मूल्य जो लगभग 500 बिलियन अमेरिकी डॉलर के समकक्ष है जब एक डॉलर का मूल्य 40 रु. हो)। इसे सार्वजनिक निवेश, सार्वजनिक - निजी भागीदारी के संयोजन के साथ विशिष्ट रूप से निजी निवेशों द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।
पीपीपी परियोजनाओं को त्वरित करने के लिए और दीर्घावधिक वित्त पोषण करने के लिए सरकार ने व्यावहार्य अंतर निधियन (वाइएब्ल गैप फंडिंग) योजना शुरू की है और इंडिया इंन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनी लिमिटेड (आईआईएफसीएल) की स्थापना की है। वीजीएफ योजना एक विशेष सुविधा है जिसका स़ृजन उन मूल संरचना परियोजनाओं की सहायता करना है जो आर्थिक रूप से न्यायसंगत है परन्तु तत्काल भविष्य में वाणिज्यिक रूप से व्यावहार्य नहीं है। इसमें पी पी पी परियोजनाओं के लिए 20 प्रतिशत तक अपफ्रंट अनुदान सहायता देना शामिल है। जबकि आईएफसीएल एक विशेष प्रयोजन वाहन (एसपीवी) है, जिसका सृजन निम्नलिखित के माध्यम से मूल संरचना परियोजनाओं में दीर्घ अवधि वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए किया गया है:-
- पात्र परियोजनाओं को प्रत्यक्ष रूप से उधार देना;
- बैंकों तथा वित्तीय संस्थानों को पुन: निधिकरण प्रदान करना; और
- भारत सरकार द्वारा अनुमोदित अन्य विधियां।
इस प्रकार से यह परिसंपत्ति दायित्व बेमेल को कम करता है और अन्य संगठनों के बाजार उधार के लिए बेंच मार्क निर्धारित करता है।
सरकार द्वारा प्रदत्त ऐसा ढांचा देश के विभिन्न मूल संरचना क्षेत्रकों में निवेश के लिए असंख्य अवसर मुहैया कराता है जिनके पास आगे और विकास और विस्तार के लिए अपार अप्रयुक्त क्षमता है।
|